<h3 style="text-align: justify;">नींबू</h3> <h4 style="text-align: justify;">नये बाग लगाने का काम</h4> <p style="text-align: justify;">नीबू, बेर, केला, जामुन, पपीता, आम, अमरूद, कटहल, लीची, आंवला के नये बाग लगाने का काम इस महीने पूरा कर लें। नीबूक्षेत्र को ध्यान में रखकर ही अच्छी किस्मों के पौधे लगायें। इसमें नीबू और लीची में गूटी बांधने का उपयुक्त समय होता है।</p> <h4 style="text-align: justify;">सिट्रस कैंकर रोग</h4> <p style="text-align: justify;">नीबू में सिट्रस कैंकर रोग, जिसमें रोग के लक्षण पत्तियों से प्रारंभ होकर बाद में टहनियों, कांटों और फलों पर आ जाते हैं, की रोकथाम के लिए गिरी हुई पत्तियों को इकट्ठा कर नष्ट कर दें। इसके अलावा रोगयुक्त टहनियों की काट-छांट कर बोर्डाे मिश्रण (5:5:50) का छिड़काव करें। ब्लाइटाॅक्स 0.3 प्रतिशत (3 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोलकर) का छिड़काव पेड़ पर करें।</p> <h4 style="text-align: justify;">रस चूसने वाले कीट </h4> <p style="text-align: justify;">नीबूवर्गीय फलों में रस चूसने वाले कीट आने पर मेलाथियान को 2 मि.ली./लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।</p> <h4 style="text-align: justify;">नीले फफूंद रोग </h4> <p style="text-align: justify;">नीबू के पौधे में नीले फफूंद रोग की रोकथाम करने के लिए फलों को बोरेक्स या नमक से उपचारित करें। फलों को कार्बेन्डाजिम या थायोफनेट मिथाइल 0.1 प्रतिशत से उपचारित करके भी रोग नियंत्रित किया जा सकता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">लीची</h3> <h4 style="text-align: justify;">बार्क इटिंग कैटरपिलर</h4> <p style="text-align: justify;">लीची छिलका खाने वाले पिल्लू (बार्क इटिंग कैटरपिलर) की रोकथाम के लिए जीवित छिद्रों में पेट्रोल या नुवाॅन या फार्मलीन से भीगी रूई ठूंसकर चिकनी मिट्टी से बंद कर देना चाहिए। इन कीटों से बचाव के लिए बगीचे को साफ रखना श्रेयस्कर पाया गया है।</p> <h3 style="text-align: justify;">पपीता</h3> <h4 style="text-align: justify;">फूल आने के समय</h4> <p style="text-align: justify;">पपीता के पौधों पर फूल आने के समय 2 मि.ली. सूक्ष्म तत्वों को एक लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC.jpg" width="141" height="123" /></p> <h4 style="text-align: justify;"> पनामा विल्ट </h4> <p style="text-align: justify;">पनामा विल्ट की रोकथाम के लिए बाविस्टीन के 1.5 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी के घोल से पौधों के चारों तरफ की मृदा पर 20 दिनों के अंतराल से दो बार छिड़काव कर देना चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">काॅलर राॅट</h4> <p style="text-align: justify;">पपीता के पौधों पर काॅलर राॅट के प्रकोप से पौधे जमीन की सतह से ठीक ऊपर गल कर गिर जाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए पौधशाला में पौधों पर रिडोमिल (2 ग्राम/लीटर) दवा का छिड़काव करें। खेत में जलभराव न होने दें और जरूरत पड़ने पर खड़ी फसल में भी रिडोमिल (2 ग्राम/लीटर) के घोल से जल सिंचन करें।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका(आईसीएआर), राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और ऋषि राज सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली।</p> <p style="text-align: justify;"> </p>