<h3 style="text-align: justify;">अमरूद</h3> <p style="text-align: justify;">अप्रैल में सिंचाई न करें, फूलों को तोड़ दें, ताकि फल मक्खी फूलों में अण्डे न दें पाएं, जिससे फल सड़ जाते हैं। अमरूद की सिर्फ शरदकालीन फसल ही लेनी चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">उकठा तथा काला वर्ण फल गलन</h3> <p style="text-align: justify;">अमरूद में उकठा तथा काला वर्ण फल गलन या टहनी मार रोग नियंत्रण के लिए खेत साफ-सुथरा रखना चाहिए। अधिक सिंचाई नहीं करनी चाहिए एवं जैविक खादों का प्रयोग करना चाहिए। रोगग्रस्त डालियों को काटकर 0.3 प्रतिशत कॉपर ऑक्सीक्लोराइड के घोल का छिड़काव दो या तीन बार 15 दिनों के अन्तराल पर करना चाहिए।</p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <h3>आम</h3> <p style="text-align: justify;">आम के फलों को गिरने से बचाने के लिए यूरिया के 2 प्रतिशत घोल का पेड़ पर छिड़काव करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">मिलीबग</h3> <p style="text-align: justify;">मिलीबग नई कोपलों, फूलों व फलों का रस चूसकर काफी नुकसान करती है। नियंत्रण के लिए 700 मि.ली. मिथाइल पैराथियान 70 ई.सी. को 700 लीटर पानी में छिड़कें तथा नीचे गिरी या पेड़ों पर चढ़ रहे कीटों को इकट्ठा करके जला दें और घास साफ रखें। यदि तेला (हाॅपर) फूल पर नजर आये तो 700 मि.ली. मैलाथियान 70 ई.सी700 लीटर पानी में छिड़कें।</p> <h4 style="text-align: justify;">फुदकाकीट</h4> <p style="text-align: justify;">आम में फुदकाकीट से बचाव के लिए इमिडाक्लोरोपिड 0.3 मि.ली./लीटर पानी में घोलकर प्रथम छिड़काव फूल खिलने से पहले करते हैं। कार्बारिल 4 ग्राम/लीटर का दूसरा छिड़काव फल, मटर के दाने के बराबर हो जाएं तब करना चाहिए। आम की डासी मक्खी के नियंत्राण के लिए मिथाइलयूजीनाॅल ट्रैप का प्रयोग करना चहिये।</p> </td> </tr> </tbody> </table> <p style="text-align: justify;">आम, अमरूद, अंगूर, बेर, नीबू एवं पपीता उत्पादन में सिंचाई पर ध्यान देना अतिआवश्यक है। गर्मियों में 7-8 दिनों के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिए। लेकिन बड़े होने पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिए। इस माह आम के बागों में एक वर्ष के वृक्ष के लिए 50 ग्राम नाइट्रोजन, 25 ग्राम फॉस्फोरस और 50 ग्राम पोटाश का प्रयोग करें, जो क्रमशः बढ़ाकर 10 वर्ष या उससे अधिक आयु के पौधों के लिए प्रति वृक्ष 500 ग्राम नाइट्रोजन, 250 ग्राम फॉस्फोरस और 500 ग्राम पोटाश देना चाहिए। आम के गुच्छा रोग या मालफारमेशन से ग्रस्त बौर की तुड़ाई कर दें। आम के फलों को गिरने से बचाने के लिए नेफ्थलीन एसिटिक एसिड 20 मि.ग्रा./लीटर या प्लेनोफिक्स 5 मि.ली./10 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। पहला छिड़काव फल बनने पर तथा दूसरा छिड़काव उसके 15 दिनों के अन्तर पर करें। </p> <h4 style="text-align: justify;">ऊतक क्षय रोग के नियंत्रण</h4> <p style="text-align: justify;">आम में ऊतक क्षय रोग के नियंत्रण के लिए 10 ग्राम/लीटर (1 प्रतिशत) बोरेक्स का छिड़काव करें। </p> <h3 style="text-align: justify;">नींबू</h3> <p style="text-align: justify;">नीबू में एक वर्ष के पौधे के लिए दो कि.ग्रा. कम्पोस्ट और 70 ग्राम यूरिया प्रति पौधा दें।</p> <h4 style="text-align: justify;">सिल्ला, लीफ माइनर और सफेद मक्खी के नियंत्रण</h4> <p style="text-align: justify;">अप्रैल में नीबू के सिल्ला, लीफ माइनर और सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए 300 मि.ली. मैलाथियान 70 ईसी. को 700 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।</p> <h4 style="text-align: justify;">तने व फल गलन रोग</h4> <p style="text-align: justify;">तने व फल गलन रोग के लिए बोडों मिश्रण का छिड़काव करें। जस्ते की कमी के लिए तीन कि.ग्रा. जिंक सल्फेट को 1.7 कि.ग्रा. बुझे हुए चूने के साथ 500 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। नीबूवगीर्य पौधों में सूक्ष्म तत्वों का छिड़काव करें। फलों को फटने से बचाने के लिए 100 मि.ग्रा. जिब्रेलिक एसिड प्रति 10 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। </p> <h3 style="text-align: justify;">केले</h3> <p style="text-align: justify;">केले में प्रति पौधा 25 ग्राम नाइट्रोजन, 25 ग्राम फॉस्फोरस और 100 ग्राम पाटेाश मृदा में गुड़ाई कर मिला दें। केले के पौधों में चारों ओर से निकलते हुए सकर्स को निकाल दिया जाता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">अंगूर</h3> <p style="text-align: justify;">अंगूर में एक वर्ष के पौधे के लिए 50 ग्राम नाइट्रोजन, 40 ग्राम पोटाश, जिसे क्रमशः बढा़कर 5 वर्ष या इससे अधिक आयु की उम्र में 250 ग्राम नाइट्रोजन, 200 ग्राम पोटाश का प्रयोग करें। </p> <h3 style="text-align: justify;">लीची </h3> <p style="text-align: justify;">लीची के बागों में आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें। लीची-100 ग्राम यूरिया प्रति पेड़ प्रति वर्ष आयु की दर से डालें। लीची में फलछेदक की रोकथाम के लिए डाइक्लोरोवास 5 मि.ली.(70 ई.सी. न्यूवान) 10 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। </p> <h3 style="text-align: justify;">आंवला</h3> <p style="text-align: justify;">आंवला के नवरोपित बागों में गर्मियों के समय 10-12 दिनों के अन्तराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए। पौधों के बड़े हो जाने पर बागों में मई-जून में एक बार पानी देना आवश्यक है। फूल आते समय बागों में किसी भी तरह से पानी नहीं देना चाहिए। शुरू में आंवला के बगीचों में बीच की जगह में कोई फसल ली जा सकती है।</p> <h4 style="text-align: justify;">निराई-गुड़ाई</h4> <p style="text-align: justify;">सिंचाई के बाद निराई-गुड़ाई करना अति आवश्यक रहता है। इससे मृदा मुलायम रहे तथा खरपतवार न उग सके। पेड़ बड़े होने पर गुड़ाई करनी चाहिए और घास एवं खरपतवार से साफ रखना चाहिए। </p> <h3 style="text-align: justify;">आंवला</h3> <p style="text-align: justify;">आंवला में शूटगाल मेकर/छाल वाले कीट प्रमुख हैं। इनके नियंत्रण के लिए मेटासिस्टॉक्स या डाईमिथोएट तथा 10 भाग मिट्टी का तेल मिलाकर रुई भिगोकर तना के छिद्रों में डालकर चिकनी मिट्टी से बन्द कर देना चाहिए।</p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <h3>पपीता</h3> <h4>पपीते की नर्सरी</h4> <p style="text-align: justify;">अप्रैल में पपीते की नर्सरी लगाने के लिए 70 वर्ग मीटर में 170 बीज को 6×6 इंच की दूरी और एक इंच गहरा लगाएं।</p> <h4 style="text-align: justify;">उन्नत किस्में</h4> <p style="text-align: justify;">उन्नत किस्मों में सनराइज, हनीड्यू, पूसा डिलीशियस, पूसा ड्वार्फ व पूसा जायंट हैं।</p> <h4 style="text-align: justify;">बीज उपचार </h4> <p style="text-align: justify;">एक नर्सरी में एक क्विंटल खाद मिलाकर क्यारी तैयार करें और बीज को एक ग्राम कैप्टाॅन से उपचारित करें।</p> <p style="text-align: justify;">पपीता की रोपाई यदि मई में की गयी है, तो अगले वर्ष अप्रैल में फल आने लगते हैं।</p> <h4 style="text-align: justify;">सिंचाई का उचित प्रबंध</h4> <p style="text-align: justify;">पपीता के लिए सिंचाई का उचित प्रबंध होना आवश्यक है। गर्मियों में 6-7 दिनों के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिए। सिंचाई का पानी पौधे के सीधे संपर्क में नहीं आना चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">रोग एवं नियंत्रण</h4> <p style="text-align: justify;">पपीते में मोजैक, लीफ कर्ल, रिंगस्पाॅट, जड़ एवं तना सड़न, एंथ्रेक्नोज एवं कली तथा पुष्प वृंत का सड़न आदि रोग लगते हैं। इनके नियंत्रण के लिए पेड़ों पर सड़न-गलन को निकालकर बोर्डोमिक्स्चर का 5ः5ः20 के अनुपात से छिड़काव करना चाहिए। इसके साथ ही डाइथेन एम-45, 2-2.5 ग्राम/लीटर पानी में अथवा मैन्कोजेब या जिनेव 0.2ः.0.25 प्रतिशत का घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।</p> </td> </tr> </tbody> </table> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका(भाकृअनुप) राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-11001, विनोद कुमार सिंह, निदेशक, भाकृअनुप-केन्द्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान, संतोष नगर, हैदराबाद।</p>