चना चने की फसल में लगने वाला झुलसा रोग(एस्कोकाइटा) मृदा व बीजजनित रोग की श्रेणी में आता है और यह रोग फरवरी एवं मार्च माह में अधिक दिखाई देता है। झुलसा रोग के कारण पौधे में छोटे और अनियमित आकार के भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं। इसके कारण अक्सर पौधे के आधार पर बैंगनी या नीला/काला घाव हो जाता है। इसके गंभीर संक्रमण के कारण फलों पर सिकुड़न हो जाती है।फल सूखने लगते हैं, जिससे बीज की सिकुड़न और गहरे भूरे रंग के विघटन के कारण बीज की गुणवत्ता में कमी हो जाती है। इस रोग का मुख्य कारक मृदा में अत्यधिक नमी का होना है। झुलसा रोग के नियंत्रण के लिए ट्राइकोडर्मा विरिडी 500 ग्राम या स्यूडोमोनास फ्लोरोसेंस 250 ग्राम प्रति एकड़ या जिंक मैग्नीज कार्बामेंट 2.0 कि.ग्रा. अथवा जीरम 90 प्रतिशत2 कि.ग्रा प्रति हैक्टर या क्लोरोथालोनिल ( 70प्रतिशत डब्ल्यू.पी.) 300 ग्राम या कार्बेन्डाजिम 12 प्रतिशत + मैन्कोजेब (63 प्रतिशत डब्ल्यू.पी.) 500 ग्राम या मेटिराम 55 प्रतिशत + पायरोक्लोरेस्ट्रोबिन (5 प्रतिशत डब्ल्यू.जी.) 600 ग्राम या टेबूकोनाजोल 50 प्रतिशत +ट्रायफफ्लोक्सीस्ट्रोबिन (25 प्रतिशत डब्ल्यू.जी.) 100 ग्राम या ऐजोस्ट्रोबिन 11 प्रतिशत + टेबूकोनाजोल (18.3 प्रतिशत एस.सी.) 250 मि.ली. प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। सिंचाई चना मसूर और मटर चने में आवश्यकता हो तो फूल आने से पूर्व ही सिंचाई करें। फूल आते समय सिंचाईं नहीं करनी चाहिए, अन्यथा फलू झड़ने से हानि होती है। चने की फसल बारानी क्षेत्रों में जल की उपलब्धता होने तथा जाड़े की वर्षा न होने पर बुआई के 75 दिनों बाद सिंचाई करना लाभप्रद होता है। असिंचित क्षेत्रों में चने की कटाई फरवरी के अन्त में होने लग जाती है। फलीछेदक कीट एवं उपाय फेरोमोन ट्रैप ऐसा रसायन है जो अपने ही वर्ग के कीटों को संचार द्वारा आकर्षित करता है। मादा कीट में, जो हार्मोन निकलता है, यह उसी तरह की गंध से नर कीटों को आकर्षित करता है। इन रसायनों को सेक्स फेरोमोन ट्रैप कहते हैं। इसका उपयोग चने के फलीछेदक कीट का फसल पर प्रकोप होने पर किया जाता है। फेरोमोन का रसायन एक सेप्टा (कैप्सूल) में यौन-जाल में रख दिया जाता है, जब 5-6 फलीछेदक कीटों के नर यौन-जाल में फंसे, उसी समय चने की फसल पर कीटनाशी दवाओं का प्रयोग कर देना चाहिये। यदि चने के खेत में चिड़िया बैठ रही हो तो यह समझ लें कि चने में फलीछेदक कीट का प्रकोप होने वाला है। फलीभेदक चने की फसल में लगने वाला सबसे विनाशकारी नाशाीजीव कीट है और उपज को भारी नुकसान पहुंचाता है। यह बहुभक्षी होने के कारण चने की खेती वाले सभी क्षेत्रों में पाया जाता है। वयस्क मादाओं में पीले-नारंगी आरै नरों में हरे-धूसर रंग के अग्रणी पंख होते हैं। मादा, फूल और फल सहित पौधों के सभी भागों पर अंडे देती हैं। इस कीट की सूंडी मुख्यतः कली, फूल और फली को खाकर नुकसान पहुंचाती हैं। अंडों से निकलने के बाद गिडारें थोड़े समय के लिए कोमल पत्रक फूलों की कलियों और कोमल फलियों को खाती हैं। बाद में जब ये बड़े होते हैंतो बढ़ती फली के अंदर विकसित हो रहे बीजों को खाती हैं। बड़ी फलियों में, सूंडी विकसित हो रहे बीजों को खाती हैं और उस समय इनके शरीर का आधा हिस्सा बाहर होता है। फलीभेदक कीट की एक गिडार अपनी परिपक्वता के पहले 30-40 फलियों को नुकसान पहुंचा सकती है। एक अनुमान के अनुसार फलीभेदक कीट अकेले ही लगभग 750-1000 करोड़ रुपये का वार्षिक नुकसान पहुचांते हैं। नियंत्रण इस कीट के नियंत्रण के लिएः समय पर बुआई और फसल परिपक्वता के माध्यम से फसल का बचाव फलीबेधक कीट की निगरानी के लिए 5 फेरोमोन ट्रेप प्रति हैक्टर प्रयोग करें। हेलिकोवर्पा आर्मिजेरा न्यूक्लियर पॉलीहेड्रोसिस वायरस 250-350 शिशु समतुल्य + 1 प्रतिशत टीनोपोल का प्रयोग फलीछेदक, (हेलिकोवर्पा आर्मिजेरा) 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव फरवरी के अन्तिम सप्ताह में करने से ज्यादा अच्छी तरह नियंत्रित कर सकते हैं, बीवेरिया बेसियाना (1.0 कि.ग्रा.) और बेसिलस थूरीनजेनसीस (1-15 कि.ग्रा.) प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव लाभदायक है। दो प्रतिशत नीम के पत्ते का निचोड़ या 5 प्रतिशत नीम के बीज कर्नेल (एन.एसके.ई.) या 3 प्रतिशत नीम का तेल भी फलीछेदक के रोकथाम का एक अच्छा विकल्प है। पारंपरिक कीटनाशकों जैसे-मैलाथियान (50 इ.सी.)1 मि.ली./लीटर या इमामेक्टीन बेन्जोएट (5 एस.जी.) 0.2 ग्राम/लीटर या राइनेक्सीपीर (50 ई.सी.) 1-1.15 मि.ली./लीटर या डाइफ्लूओरोबेन्जूरॉन (25 डब्ल्यू.पी.) 2 ग्राम/लीटर या मोनोक्रोटोफॉस (36 ई.सी.) 750 मि.ली. या क्यूनालफॉस (25 ई.सी.) 1.50 लीटर या इंडेक्सोकार्ब एक मि.ली./लीटर पानी या क्वीनालफॉस (25 ई.सी.) 1-1.1 प्रति मि.ली. पानी या स्पाइनोसडै 45 प्रतिशत 0.2 मि.ली. प्रति लीटर को पानी में घोलकर छिड़काव अवश्य करें। रस्ट रोग चने की फसल में रस्ट रोग के लक्षण फरवरी एवं मार्च में दिखाई देते हैं। पत्तियों की ऊपरी सतह, फलियों, टहनियों पर हल्के भूरे काले रंग के उभरे हुए चकत्ते बन जाते हैं। इस रोग के लक्षण दिखाई देने पर मैंकोजेब (75 प्रतिशत डब्ल्यू.पी.) 500 ग्राम या थायोफिनेट मिथाइल(70 प्रतिशत डब्ल्यूपी) 300ग्राम या प्रोपिकोनाजोल (25 प्रतिशत ई.सी.) 200 मि.ली. प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी के साथ छिड़काव करें। मसूर रतुआ रोग मसूर की फसल में रतुआ रोग के लक्षण दिखाई देते ही रतुआरोधी किस्में इसरोग के प्रभाव को निष्क्रिय करती हैं। रोग दिखाई देते ही फसल पर मैंकोजेब के 0.2 प्रतिशत घोल (5.2 ग्राम दवा 1 लीटर पानी) का छिड़काव करें। माहूं कीट माहूं कीट मसूर की फसल में पत्तियों तथा अन्य कोमल भागों का रस चूसकर हानि पहुंचाता है। इससे ग्रसित भाग सूख जाते हैं और पौधा कमजोर हो जाता है। तेलिया या थ्रिप्स कीट तेलिया या थ्रिप्स कीट मसूर की पत्तियों, फूल एवं फलियों पर पाया जाता है। पत्तियों से ये रस चूसते हैं, जिससे उन पर सफेद रंग के चकत्ते पड़ जाते हैं। मृदा में नमी की कमी से पौधों को अधिक हानि हो सकती है। माहूं तथा तेलिया कीट के नियंत्रण के लिए क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. 750 मि.ली. या इमिडाक्लोरोपिड 150 मि.ली. या फॉस्फोमिडान 85 ई.सी. 250 मि.ली. या डायमिथियेट 30 ई.सी. 500 मि.ली. मात्र प्रति हैक्टर को 500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। मसूर की फसल में फलीछेदक के लिए इमामेक्टीन बेंजोइट का 100 ग्राम प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करना चाहिये। पाउडरी मिल्ड्यू रोग मसूर की फसल में पाउडरी मिल्ड्यू रोग, एरीसायफी पोलीगोनी नामक कवक से होता है। इसमें फूल आने की अवस्था अतिसंवेदनशील होती है। अनुकूल परिस्थितियों में रोग बहुत अधिक हानि पहुंचाने में सक्षम है। यह धीरे-धीरे फैलकर तनों, पत्तियों एवं फलियों पर फैल जाता है। रोगी फसल पर ट्रायडोमार्फ एवं घुलनशील गंधक के 2 प्रतिशत का छिड़काव करें मटर सिंचाई मटर की फसल में पुष्पण एवं शुरूआत के समय एक या दो सिंचाई करना लाभप्रद होता है। फूलों एवं पत्तियों को पाले से सुरक्षा के लिए भी सिंचाई की आवश्यकता होती है। देर से बोई गई मटर की फसल में फली आने पर सिंचाई करें। अगेती फसल पकने की अवस्था में होगी, अतः समय पर कटाई करें। लीफ माइनर मटर की फसल में इस कीट का प्रकोप पौधों की निचली व मध्य पत्तियों में दिसंबर के अंतिम सप्ताह से शुरू होता है और फरवरी के अंतिम सप्ताह से मार्च के प्रथम सप्ताह तक बहुत अधिक प्रकोप हो जाता है। ये कीट पत्तियों में सुरंग बनाते हैं, जिससे पत्तियां भोजन नहीं बना पाती हैं और पौधों की वृद्धि रुक जाती है। कीटग्रसित पत्तियां सूख जाती हैं और फूल व फल या कम बनते हैं। इसके नियंत्रण के लिए मिथाइल डिमेटोन 1.0 मि.ली. प्रति लीटर पानी या ट्राइजोफॉस 15 लीटर प्रति हैक्टर में घोलकर छिड़काव करें। फलीछेदक पौधों में इसका प्रारंभ फरवरी से होकर अप्रैल तक चलता है। अंडे से निकली हुई सूंडी अपने चारों ओर जाला बुनती है और छेदकर फलों में घुसकर दानों को खाती रहती है। इससे काफी नुकसान होता है। फलियां बदरंग हो जाती हैं और उनमें पानी भर जाता है। ऐसी फलियों से दुर्गंध आने लगती है। इसके नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 0.5 प्रतिशत या डाइमेथोएट 0.03 प्रतिशत का 400-600 लीटर पानी में घोल बनाकर या मैलाथियान 5 प्रतिशत या क्विनालफॉस 1.5 प्रतिशत डस्ट का 20 से 25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करें। शीघ्र पकने वाली किस्मों का उपयोग एवं समय से बुआई फलीबेधक के प्रकोप से बचने में सहायक होते हैं। स्त्राेत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और अवनि कुमार सिंह,सस्य विज्ञान संभाग एवं संरक्षित खेती और प्रौद्योगिकी, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012