<div id="MiddleColumn_internal"> <h3 style="text-align: justify;">भूमिका</h3> <p style="text-align: justify;"><img class="image-right" src="https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/agriculture/crop-production/91593f93893e92894b902-915947-93293f90f-92e94c93892e-90692793e93093f924-91594393793f-93893293e939/92e93e93993593e930-91594393793f-91593e93094d92f/bhindi.jpg" width="210" height="122" /></p> <p style="text-align: justify;">मार्च माह जिसे आप फाल्गुन-चैत्र भी कहते हैं, महाशिव रात्री तथा होली के त्यौहार लेकर आता है तथा मौसम में रंग भर देता है । लेख में नाप-तोल प्रति एकड़ के हिसाब से हैं ।</p> <p style="text-align: justify;">मार्च माह के प्रमुख कृषि कार्य इस प्रकार से हैं -</p> <ul style="text-align: justify;"> <li>चने और अलसी की फसल काटकर खेत को अगली फसल के लिए तैयार करते हैं।</li> <li>चारे के लिए ज्वार व लोबिया की मिश्रित बोनी करते हैं।</li> <li>गन्ने में पानी दिया जाता हैं। मक्का, बरबटी, लहसून फसल कटाई करके जानवरों को खिलाते हैं।</li> <li>अरहर, सरसों, चने और दूसरे दलहनी फसलों की कटाई की जाती है।</li> <li>खेत की जुताई करते हैं। इससे कीड़े मकोड़ों से पौधों की रक्षा होती है।</li> <li>कटी हुई फसलों को सुखाया जाता है। उसके बाद उड़ावनी करने के बाद ऐसी जगह मे रखा जाता है जहाँ नमी नहीं है।</li> <li>पहले गन्ने के खेत की सफाई होती है। और सिंचाई करते हैं। उर्वरक की जो मात्रा निर्धारित है, वह देकर सिंचाई करते हैं।</li> <li>जो गेहूँ असिंचित है, उसमें 2-3 प्रतिशत यूरिया का घोल छिड़कते हैं।</li> <li>प्याज और लहसुन की गुड़ाई की जाती है और उसके बाद मिट्टी चढ़ाते हैं।</li> <li>आलू की खुदाई करते हैं। जो सब्जियाँ तैयार हैं उनकी सामयिक तुड़ाई करते हैं।</li> <li>ग्रीष्मकाल के सब्जियों की बुवाई करते हैं - जैसे कद्दु, लौकी, भिण्डी, मूली आदि सब्जियाँ।</li> <li>पपीता के पेड़ों की सिंचाई की जाती है। केले की भी।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">सिंचाई संबंधी ध्यान योग्य बातें</h3> <p style="text-align: justify;">फब्बारा सिंचाई ( ३०-७० प्रतिशत पानी बचत)</p> <p style="text-align: justify;">सिंचाई की विधि बलई मिट्टी, ऊची-कानीची जमीन तथा कम पानी वाले क्षेत्रों में बहुत लाभदायक है। गेहूं, कपास, मूंगफली, तंबाकू, सब्जियां व फूलों की खेती में उपयुक्त हैं । पानी वर्षा की तरह गिरता है , पैदावार भी ज्यादा होती है व रोग कम लगते हैं।</p> <p style="text-align: justify;">टपक सिंचाई अथवा ड्रिप इरीगेशन ( ३०-७५ प्रतिशत पानी बचत)</p> <p style="text-align: justify;">सिंचाई की यह विधि ठोमट मिट्टी, उथली मिट्टी, ऊची-कानीची जमीन तथा पहाडी क्षेत्रों में काफी लाभदायक है । अंगूर, नींबू, गन्ना , पपीता, केला, अनार, अमरूद , अन्य फल व सब्जियों के लिए उपयुक्त है । पानी बूंद-बूंद करके गिरता है व पौधे की जड़ों तक पहुचता है । इससे रिसाव व वाष्पण ना के बराबर होता है । पानी के साथ खादें भी दी जा सकती हैं । इस विधि से ६०-८० प्रतिशत श्रम की बचत तथा पैदावार में काफी बढ़ोतरी होती है ।</p> <p style="text-align: justify;">कूड सिंचाई (१५-३० प्रतिशत पानी बचत)</p> <p style="text-align: justify;">सिंचाई की इस प्रणली से भी अच्छी पैदावार मिल जाती है। मक्का व कपास में हर दूसरी कूड में पानी लगाकर ३० प्रतिशत पानी की बचत की जा सकती है । इससे उर्वरकों की दक्षता भी बढ़ती हैं ।</p> <h3 style="text-align: justify;">शरदकालीन मक्का</h3> <p style="text-align: justify;">शरदकालीन मक्का में झंडे आने पर बकाया नत्रजन (२ बोरे यूरिया ) पौधे के तनों के पास डालें तथा मिट्टी चढ़ा दें ताकि फसल का गिरने से बचाव हो सके । इस अवस्था में 1 हल्की सिंचाई भी करें । बाद में २० दिन के अन्तर पर सिचाई करते रहें ।</p> <h3 style="text-align: justify;">गेहूं</h3> <p style="text-align: justify;">गेहूं की फसल फूल निकलने से लेकर दाने बनने की अवस्था में है । इस समय सिंचाई अवश्य करें नहीं तो पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है । हल्की सिंचाई २० दिन के अन्तर पर करें । इससे गर्म हवाओं का दाने बनने पर बुरा असर कम होगा तथा तेज हवाओं से फसल गिरेगी भी नहीं । बीजाई के समय यदि बीजोपचार नहीं किया हैं तो मार्च माह में निम्नलिखित बीमारियां नजर आ सकती हैं - खुली क्यारी में गेहूं की बालियां काले पाउडर में बदल जाती हैं । करनाल बंट में पौधे के दाने काले रंग का पाउडर बन जाते हैं जिनमें मछली जैसी गंध आती हैं । रोगी पोधों को सावधानीपूर्वक निकाल कर दूर जगह में जला दें । दोनों बीमारियों की रोगरोधी किस्में लगाएं तथा वैविस्टोन २ ग्राम और २ ग्राम थीरम प्रति कि.ग्रा. बीज के हिसाब से बीजोपचार करें । काला सिट्टा बीमारी में दानों का सिरा गहरा भूरा या काला हो जाता है । इसकी रोगथाम फूल आने से लेकर फसल पकने तक ८०० ग्राम जीनेव (डाझ्थेन जेड ७८) या मैनकोजेव (डाझ्थेन एम. ४७ ) को २५० लीटर पानी में घोलकर १०-१५१ दिन के अन्तर पर छिडकाव करें । ममनी व टुण्डु सूत्र कृमि रोग हैं इनमें पौधों के तनों का आधार फूल जाता हैं । रोगग्रस्त बालियां छोटी तथा मोटी हो जाती हैं । स्वस्थ्य दानों की जगह काले रंग की ममनियां बन जाती है जिनमें हजारों की संख्या में सुत्र कृमि होते हैं । पत्तों व वालियों पर पीले रंग का चिपचिपा लेसदार पदार्थ दिखई देता हैं । वालियां प्राय: मुडी हुई तथा बांझ होती है । रोकथाम सिर्फ बीजाई से पहले ही हो सकती हैं । बोने से पहले ममनी-रहित साफ बीज को पानी में अच्छी तरह धोकर बीजें । चेपा व तेला कीट भी गेहूं की पत्तियों व वालियों से रस चूसते हैं। १२ प्रतिशत वालियों या ऊपर के पत्तों पर १०-१२ चेपे का समूह नजर आयें तो ७०० मि.ली. एण्डोसल्फान ३७ ईसी या ४०० मि.ली. मैलाथियान ७० ईसी को २७० लीटर पानी में घोलप्रकर फसला पर छिडके ।</p> <h3 style="text-align: justify;">बसंतकालीन गन्ना</h3> <p style="text-align: justify;">बसंतकालीन गन्ना मार्च अंत तक बोया जा सकता हैं । गन्ने में शुरू में बढ़ोत्तरी धीमी होती है इसका लाभ उठाते हुए २ लाईनों के बीच 1 लाईन अल्प अवधि वाली वैशाखी मूंग, उर्द , लोबिया, मिंडी इत्यादि की मिश्रित फसल लगा सकते हैं । जिनके लिए अतिरिक्त खाद डालनी पडेगी । इससे अतिरिक्त फसल तो मिलती ही है तथा गन्ने में <a href="../../../../../../../agriculture/91594393793f-906917924/90591c94893593f915-90692693e928/91693092a92493593e930-92893f92f90292494d930923">खरपतवार नियंत्रण</a> भी रहता हैं। इन फसलों का उगाने की विधि पहले बता चुके हैं । गन्ने में दीमक, कनसुआ व जडवेधक से बचाव के लिए २.७ लीटर क्लोरपाइरिफास २० ईसी या १.७ लीटर एण्डोसल्फान ३५ ईसी का ८०० लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करें । गळ्याने की शरदकालीन व मोठी फसल में १/३ नत्रजन की दूसरी किश्त (१ बोरा यूरिया) मार्च अन्त तक डाल सकते हैं । यूरिया डालने से पहले खरपतवार निकाल त्नें तथा हल्की सिंचाई १० दिन के अन्तर पर करते रहें ।</p> <h3 style="text-align: justify;">जौ व आलसी</h3> <p style="text-align: justify;">जौ व आलसी मार्च माह में पक जाती है तथा पकते ही काट लें नहीं तो फसल झड़ जाती हैं तथा गिर भी जाती हैं । अधिक पैदावार के लिए दानों को बिखरने से रोकें ।</p> <h3 style="text-align: justify;">ग्रीष्मकालीन मूंग</h3> <p style="text-align: justify;">को मार्च में लगाया जा सकता है परन्तु सिंचाई की व्यवस्था होनी चाहिए । इसके लिए पूसा वैसाखी किस्म सर्वोत्तम है । जोकि ६७ दिनों में तथा बरसात आने से पहले पक जाती है और २.७ - ३ किंवटल पैदावार देती हैं । बाकी किस्मों में पी एस ७, पंत मूग 1, मालवीय जागृति, आशा भी लगा सकते हैं । मार्च के बाद बोने से फसल जल्दी बरसात आने की स्थिति में खराब हो सकती हैं । जायद मूग जितनी जल्दी लगे पैदावार उतनी ही जल्दी मिलती हैं । १० कि.ग्रा. स्वस्थध्य बीज को ४० ग्राम थोरम से उपचारित करने के बाद 1 पैकिट (२०० ग्राम) राइजोवियम जैव खाद से उपचारित करें । खेत तैयार करते समय १/३ बोरा यूरिया तथा २ बोरे सिंगल सुपर फास्फेट डालें । लाईनों में १० ईंच दूरी रखकर बीज बोयें फिर हल्का पलेवा लगा दें । २०-२२ दिन बाद पहली सिंचाई करें फिर १०-१७ दिन बाद हल्की सिंचाई जरूरत के हिसाब से करें । जब ७७ प्रतिशत फालियां पीली पडने लगें तो फसल कटने के लिए तैयार मानी जाती हैं । इसे दरांती से ध्यानपूर्वक काट कर ढेर लगा दें तथा पूरा सूखने पर गहाई करें । फसल कटने में देरी से दाने विखर जाते हैं तथा कम पैदावार हाथ लगती हैं ।</p> <h3 style="text-align: justify;">अरहर</h3> <p style="text-align: justify;">सिंचित अवस्था में अरहर की टी-२१, यूपीएएस १२० किस्में मार्च में लगाई जा सकती हैं । इसके लिए अच्छे जल निकाल वाली दोमट से हल्की दोमट मिट्टी में दोहरी जुताई करके खरपतवार निकाल लें तथा १/३ बोरा यूरिया व २ बोरे सिंगल सुपर फासफेट डालकर सुहागा लगा दें । अरहर का ७-६ कि.ग्रा.स्वस्थ्य बीज लेकर राइजोवियम जैव खाद से उपचारित करके १६ ईंच दूर लाईनों में बोयें । अरहर की २ लाईनों के बीच यदि बैसाखी मूग लगाना है तो दूरी २० ईंच कर लें । बीजाई के २७ और ४७ दिन बाद खरपतवारों की रोकथाम हेतु निराई-गुडाई करें । आवश्यतानुसार हल्की सिंचाई कर सकते हैं ।</p> <h3 style="text-align: justify;">चना, मसूर व दाना मटर</h3> <p style="text-align: justify;">चना, मसूर व दाना मटर की फसलों में ७७ प्रतिशत फलियां व पत्ते पीले हो जाएं तथा पौधे सूखने लगे तो इन फसलों को दरांती से सावधानीपूर्वक काटें तथा ढेर में रखें । पूरा सूखने पर गहाई करें इससे दाने बिखरते नहीं व पैदावार अधिक हाथ लगती हैं ।</p> <h3 style="text-align: justify;">सूरजमुखी</h3> <p style="text-align: justify;">सूरजमुखी के खेत में काफी नमी रहनी चाहिए तथा ३० दिन के अन्तर पर सिंचाई करते रहें इससे दूसरा फायदा कटुआ सुण्डी का पानी में डूबकर मर जाने का है । बालों वाली सुण्डी तथा कटुआ सुण्डी को १० कि.ग्रा. फैनवालरेट ०.४ प्रतिशत पाउडर के धुडे से भी नियंत्रित किया सकता हैं । फूल छेदक सुण्डी के लिए ७०० मि.लो. एण्डोसल्फान को २०० लीटर पानी में मिलाकर छिडकाव करें ।</p> <h3 style="text-align: justify;">आलू</h3> <p style="text-align: justify;">आलू पहाडी क्षेत्रों में आलू लगाने के लिए झुलसा रोग-रोधक कुफरी ज्योति किस्म उपयुक्त है । अच्छे जल निकाल वाली दोमट मिट्टी में बीजाई के समय 1 लीटर क्लोरपाइरीफास २७ ईसी को १० कि.ग्रा. रेत में मिलाकर डालने से दीमक से सुरक्षा रहती हैं । आलू के १०-१२ किवंटल मध्यम आकार के २-३ आंख वाले टुकडों को ०.२७ प्रतिशत एमीसान ६ के घोल में ६ घंटों तक डुबोएं । बीजाई के समय काफी नमी होनी चाहिए । खेत तैयार करते समय १० टन कम्पोस्ट, 1 बोरा यूरिया, २ बोरे डी ए पी तथा 1 बोरा पोटशियम सल्फेट १० इंच दूर कूडों में डालकर मिट्टी से ढक दें फिर उपर बीज आलू के टुकडे ८ इंच की दूरी रखकर मिट्टी से ढक दें । खरपतवार नियंत्रण के लिए बीजाई के ४८ घंटों के अन्दर ७०० ग्राम आइसोप्रोटोन ७७ घुलनशील पाउडर ३०० लीटर पानी में घोलकर छिडकें । बारानी क्षेत्रों में नमी बनाएं रखने के लिए खेत पर खूखी घास बिछा दें ।</p> <h3 style="text-align: justify;">चारा वाली फसलें</h3> <p style="text-align: justify;">रबी फसलों के कटने से खाली खेतों में निम्नलिखित चारा वाली फसलें लगा सकते हैं ।</p> <ol style="text-align: justify;"> <li>उवार - की उजे एस २०, एच सी १३६, एच एसी १७१, एच सी २६०, एच सी ३०८ किस्में १५१० - २०० किंवटल हरा चारा देती हैं । इनके १७ कि.ग्रा. बीज को १० ईंच दूर लाईनों में लगाएं ।</li> <li>बाजरा - की कोई भी किस्म के ३-४ कि.ग्रा. बीज को १२ ईंच दूर लाईनों में बोयें इससे ७०-७७ दिन बाद १६० किंवटल हरा चारा प्राप्त हो जाता हैं । दोनों फसलों में बीजाई के समय 1 बोरा यूरिया डालें तथा 1 महिने बाद आधा बोरा यूरिया और डाल दें । रेतीली मिट्टी में 1 बोरा सिंगल सुपर फासफेट भी बीजाई पर डालें ।</li> <li>लोबिया - की एफ ओ एस 1, न. १०, एच एफ सी ४२-१, सी एस ८८ किस्में १००-१७० किवटल हरा चारा २ महिनों में देती हैं । इनका १६-२० कि.ग्रा. बीज को राइजोवियम जैव खाद से उपचारित करने के बाद १२ ईंच दूर लाईनों बोयें । बीजाई पर आधा बोरा यूरिया तथा ३ बोरे सिंगल सुपर फासफेट डालें ।</li> <li>संकर हाथी घास - की नेपियर बाजरा संकर -२१ किस्म सारा साल हरा चारा देती हैं । इसें जड़ों या तनों के टुकुडों दवारा उगाया जाता हैं । २० ईच लम्बे २-३ गाठों वाले ११००० टुकुडे प्रति एकड़ लगते हैं। आधा टुकडा जमीन में तथा आधा हवा में रखकर ३० ईंच लाईनों में तथा २४ ईंच पौधे में दूरी रखें । रोपाई से पहले खेते में २० गाडी सडे-गले गोबर की खाद दें । हर कटाई के बाद 1 बोरा यूरिया डालें । गर्मियों में १०-१७ दिन के अन्तर पर सिंचाई करते रहें ।</li> </ol> <h3 style="text-align: justify;">फल</h3> <p style="text-align: justify;">बागों में अधिकतर पेड लगाने, काट-छांट व खाद-पानी देने का कार्य पूरा हो चुका है यदि नहीं तो शीघ्र कर लीजिए । मार्च में बागों में पानी जरूर दें । बेर के बीज भी मार्च में नर्सरी में बोये जा सकते हैं । आम के बागों में मिलिबग, तना छेदक व आम का तेला (हापर) के नियंत्रण के लिए मिथाइल पैराथियान प्रयोग करें । आम में ब्लैक टिप रोग ईट के भट्ठों की जहरीली गैस के कारण होता हैं । इससे फल बेढयो तथा पहले पक जाते हैं जिनका एक सिरा काला होता हैं । रोगथाम के लिए वोडों मिश्रण (4:4:50) या ०.३ प्रतिशत कोपर आक्सीक्लोराइड -७० का स्प्रे करें । आम तथा लीचियों के बागों में सिंचाई समय-समय पर करते रहें इससे फल पैदावार अच्छी होगी । तरबूज व खरबूज भी मार्च में लगा सकते हैं ।</p> <h3 style="text-align: justify;">सब्जियां</h3> <p style="text-align: justify;">मार्च के पहले हफ्ते तक घिया, कछू करेला, तोरी, मिडी लगा सकते हैं । पिछले माह लगी फसलों में आधा बोरा यूरिया डालें तथा हर हपते एक अच्छी सिंचाई करते रहें इससे समय पर फूल तथा काफी मात्रा में फल आएगें । यदि पाधों पर पाउडरी मिल्डयु (पत्तों पर सफेद पाउडर) नजर आए तो २०० ग्राम वैविस्टिन को २०० लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करें । डाउनी मिल्डयु ( पत्तों की निचली सतह पर बैंगनी - भूरे रंग के धब्बे ) के लिए ४०० ग्राम डाइथेन एम ४७ को २०० लीटर पानी में घोलकर छिडकें । स्प्रे १७ दिन बाद फिर दोहराएं । इस मौसम में कीड़े कम ही लगते हैं फिर भी कोई नजर आयें तो २०० ग्राम एण्डोसल्फान ३७ ईसी १०० लीटर पानी में घोलकर फसल पर स्प्रे करें । उपरोक्त स्प्रे खरबूज व तरबूज फलों की बेलों पर भी किया जा सकता हैं । बैगन व टमाटर - की नर्सरी जो फरवरी में लगाई थी अब रोपाई के लिए तैयार हैं । बाकी क्रियायें पिछले लेखों में दी हैं । रोपाई के तुरंत बाद सिंचाई करें । पुरानी फसल में हपते में एक बार सिंचाई अवश्य करें । फल छेदक नियंत्रण के लिए १०० मि.ली. एण्डोसल्फान ३७ ईसी या २०० मि.ली. मैलाथियान २०० लीटर पानी में मिलाकर छिडकाव करें । हमेशा दवाई छिडकने से पहले फल तोड़ लें ।</p> <h3 style="text-align: justify;">अदरक</h3> <p style="text-align: justify;">मार्च माह में अदरक के ७ कि.ग्रा. स्वस्थ कंदों को १८ ईंच लाईनों में तथा १२ इंच पौधों में दूरी रखकर लगाएं । खेत तैयारी पर १० टन कम्पोस्ट, 1 बोरा यूरिया, 1 बोरा डी ए पी तथा 1 बोरा पोटाशियम सल्फेट डालें । २ महिने बाद 1 बोरा यूरिया गुडाई के समय दें ।</p> <h3 style="text-align: justify;">मशरूम</h3> <p style="text-align: justify;">उगाने के लिए हल्के भीगे साफ गेहूं के भूसे या धान के पुआल में खुम्भ के बीज डालने से ३-४ सप्ताह बाद खुम्भ तोडने लायक हो जाते हैं । मशरूम उगाना बहुत आसान है तथा काफी आमदनी देती हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">फूल</h3> <p style="text-align: justify;">बंसत ऋतु आने पर चारों तरफ फूलों की बहार छाई हुई हैं। फूलों के राजा गुलाब तो पूरी मस्ती पर हैं । गलेडियोलस भी निखार पर है । फूलों की सुंदरता का आंनद लें तथा पैसा भी कमाएं गर्मी वालें फूलों की बीजाई भी इस माह पूरी कर लें । इनमें प्रमुख हैं - बालसम, फ्रैंच गैंदा, पेटूनिया, पोरचुलाका, साल्विया, सुरजमुखी, जिनियां, वरवीना इत्यादि । बीजाई के बार नियमित रूप से नर्सरी की सिंचाई करते रहे तथा निराई-गोडाई करके खरपतवार निकाल दें । फूलदार पेड व झाड़िया तथा हैज लगाना पूरा कर लें । मई-जून में लगने वाले घास के लान की जमीन तैयारी भी मार्च से शुरू कर दें ।</p> <p style="text-align: justify;">स्रोत: जेवियर सेवा संस्थान, राँची</p> </div>