<h3 style="text-align: justify;"><a href="../../../../../../../../agriculture/91594393793f-906917924/90591c94893593f915-90692693e928/91693092a92493593e930-92893f92f90292494d930923">खरपतवार नियंत्रण</a> </h3> <p style="text-align: justify;">टमाटर की अच्छी बढ़वार के लिए खरपतवार नियंत्रण अत्यधिक महत्वपूर्ण है। खरपतवार, <a href="../../../../../../../../agriculture/crop-production/91593f93893e92894b902-915947-93293f90f-92e94c93892e-90692793e93093f924-91594393793f-93893293e939/92e93e93993593e930-91594393793f-91593e93094d92f/दिसंबर-माह-के-कृषि-कार्य/सब्जी-वाली-फसलें/टमाटर-की-फसल">टमाटर की फसल</a> से प्रकाश, पानी एवं पोषक तत्वों के लिए प्रतियोगिता करते हैं। ये रोगों व कीटों को शरण देते हैं, जिससे फलों की उपज 20-80 प्रतिशत तक कम कर देते हैं। ये खरपतवार फसलों में शुरुआती 4-6 सप्ताह तक अधिक नुकसान करते हैं। पहली दो सिंचाई के बाद हल्की निराई-गुड़ाई करनी चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">रासायनिक खरपतवार नियंत्राण के लिए पेन्डीमिथेलीन (30 ई.सी.) 400 मि.ली. की मात्रा का प्रति एकड़ को 200 लीटर पानी में रोपाई से पहले छिड़काव करें।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccdownlod.jpg" width="211" height="129" /></p> <h3 style="text-align: justify;">फफूंद रोग से नियंत्रण</h3> <p style="text-align: justify;">फफूंद रोग से नियंत्रण के लिए 600-800 ग्राम इंडोफिल एम-45 को 250 लीटर पानी में मिलाकर एक एकड़ खेत में 10-15 दिनों के अंतर पर छिड़काव करें। सफेद मक्खी, हरा तेला एवं हड्ढा बीटल की रोकथाम के लिए 400 मि.ली. मैलाथियान 50 ई.सी. को 250 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ 15 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें। टमाटर तथा बैंगन में फलीछेदक कीट नियंत्रण के लिए कार्बारिल 2 ग्राम प्रति लीटर घोल का छिड़काव करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">तापमान का योगदान</h3> <p style="text-align: justify;">टमाटर की अच्छी पैदावार के लिए तापमान का बहुत बड़ा योगदान होता है। इसके लिए तापमान 18 से 27 डिग्री सेल्सियस के बीच उपयुक्त रहता है। फल लगने के लिए रात का आदर्श तापमान 15 से 20 डिग्री सेल्सियस के बीच रहना चाहिए। टमाटर के लाल रंग के लिए 21-24 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त रहता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">मृदा</h3> <p style="text-align: justify;">पोषक तत्वयुक्त दोमट मृदा खेती के लिए उपयुक्त रहती है। इसके लिए जल निकास की व्यवस्था जरूर होनी चाहिए। इसकी अच्छी पैदावार के लिए मृदा का पी-एच मान 6-7.5 के मध्य होनी चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;"> रोपाई</h3> <p style="text-align: justify;">उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में ग्रीष्मकालीन टमाटर की रोपाई मार्च में की जानी चाहिए। यह मई के अन्त या जून के प्रथम सप्ताह में तैयार हो जाती है। पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी रोपाई का सही समय अप्रैल से जनू के मध्य होता है। टमाटर की फसल में पंक्ति से पंक्ति तथा पौधों से पौधों की दूरी 45-60 × 30-45 सें.मी. रखनी चाहिए। पौध रोपाई का कार्य शाम के समय में करना चाहिए। </p> <h3 style="text-align: justify;">नर्सरी तैयार करना</h3> <p style="text-align: justify;">एक हैक्टर क्षेत्रफल के लिए नर्सरी तैयार करने के लिए संकर तथा अन्य किस्मों के लिए 200-250 एवं 350-400 ग्राम बीज पर्याप्त होते हैं। <a href="../../../../../../../../agriculture/91594393793f-906917924/92c94091c/91693094092b-915940-92b938932/92c94091c94b902-91593e-90992a91a93e930">बीज उपचार </a>थीरम या कैप्टॉन 2.5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज दर से करें। पौधशाला में पौध, उठी हुई क्यारियों में तैयार करें। इन क्यारियों की लंबाई व चौड़ाई 3×0.6 मीटर रखनी चाहिए। बीजों की बुआई पंक्तियों में करें तथा बुआई की गहराई 1.5 से 2.0 सें.मी. रखें। बीजों को बोने के बाद मिट्टी व गोबर की खाद के मिश्रण से ढककर हजारे की सहायता से हल्की सिंचाई करनी चाहिए। इस प्रकार क्यारियों में नमी बनी रहती है तथा बीजों का एक समान जमाव होता है एवं 35 से 40 दिनों में पौध रोपाई योग्य हो जाती है। </p> <h3 style="text-align: justify;">खाद व उर्वरकों का प्रयोग</h3> <p style="text-align: justify;">खाद व उर्वरकों का प्रयोग करने से पहले मृदा की जांच करवा लेनी चाहिए। मृदा की जांच के अनुसार उवर्रकों का प्रयोग करना चाहिए। </p> <p style="text-align: justify;">बुआई पूर्व 20-25 टन/हैक्टर अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद का प्रयाेग करना चाहिए। नाइट्राेजेन 120 कि.ग्रा, फाॅस्फोरस 100 कि.ग्रा. तथा पोटेशियम 80 कि.ग्रा./हैक्टर प्रयाेग करना चाहिए। नाइट्राेजेन की आधी मात्रा व फाॅस्फोरस एवं पोटेशियम की पूरी मात्रा खेत तैयारी के समय खेत में देनी चाहिए। नाइट्रोजन की शेष बची हुई मात्रा राेपाई के 45 दिनाें बाद टॉप ड्रेसिंग द्वारा खड़ी फसल में देनी चाहिए। </p> <p style="text-align: left;">स्त्रोत : खेती पत्रिका(आईसीएआर) राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर, सस्य विज्ञान संभाग,भाकृअनुप-भारतीय कृषिअनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012</p>