बदलता पर्यावरण, खेतों की कम होती उपजाऊ क्षमता, छोटी जोत, रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों/फफूंदनाशकों/खरपतवारनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग ने भारतीय कृषि के सामने गहन चुनौती की स्थिति ला दी है। उपभोक्ताओं के बीच खाद्य पदार्थों के प्रति जागरूकता एवं स्वास्थ्य के उच्च मापदंडों ने जनसामान्य को जैविक खाद्य पदार्थों की तरफ आकर्षित किया है। भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है। भारतीय कृषि उत्पादन अभी भी वर्षा पर आधारित है, क्योंकि 55.7 प्रतिशत कृषि क्षेत्र वर्षा पर निर्भर है। देश का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.87 करोड़ हैक्टर है, जिसमें से 14.14 करोड़ हैक्टर में खेती की जाती है। वर्ष 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व में कुल जैविक फसलों के 5.78 करोड़ हैक्टर क्षेत्रफल में से भारत में मात्र 0.15 करोड़ हैक्टर में जैविक फसलों का उत्पादन होता है। इस प्रकार विश्व में कुल जैविक फसल उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी मात्र 2.59 प्रतिशत है, जोकि बहुत कम है। इस दिशा में भारत सरकार का कृषि एवं किसान कल्याण मंत्राालय एवं नीति आयोग लगातार प्रयास कर रहे हैं। भारत सरकार ने जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अनेक योजनाएं शुरू की हैं, जिनके वांछित परिणाम आगामी वर्षों में भारतीय कृषि में नजर आयेंगे। किसानों को ऐसे उपाय अपनाने की आवश्यकता है, जिनसे उत्पादन लागत में कमी लाई जा सके। वर्ष 2022 तक भारत सरकार द्वारा किसानों की आमदनी दोगुनी करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। जैविक खेती में किसान बाहरी आदान पर कम निर्भर रहते हैं। जैविक खेती, जिसे ऑर्गेनिक पफार्मिंग या बायो पफार्मिंग भी कहा जाता है, कई प्रकार से परिभाषित की जा सकती है। इसमें मृदा एक जीवित माध्यम है, मात्र भौतिक माध्यम नहीं। मृदा में असंख्य जीव रहते हैं और ये एक-दूसरे के पूरक तो होते ही हैं साथ ही पौधों की बढ़वार के लिए पोषक तत्व भी उपलब्ध करवाते हैं। जैविक खेती का आधार हमारा वर्तमान कृषि विज्ञान, आयातित कृषि विज्ञान है। यह रसायन आधारित विज्ञान है। देश में पर्याप्त जैविक स्रोत हैं, जो न केवल कमी की पूर्ति करने के लिए पर्याप्त हैं बल्कि इनसे 21वीं सदी के लक्ष्यों को प्राप्त करना भी संभव है। हमें कृषकों को जागरूक करना है और समस्त उपायों से जैव स्रोतों, जीवांश को बढ़ाने और उन्हें खेतों में मिश्रित करने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। जैविक उत्पादन तकनीक इस तकनीक में परिशोधन करके प्रजातियों, बीज और भूमि की तैयारी, रोपाई, फसल ज्यामिति, पोषक तत्व प्रबंधन, फसलचक्र, हरी खाद, कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट, जल प्रबंधन, अंतर-कृषि क्रियाएं, खरपतवार नियंत्रण, कीट एवं रोग प्रबंधन तथा कटाई सहित सभी बिन्दुओं पर ध्यान देना जरूरी है। जैविक खेती में हमें फसलों की ऐसी प्रजातियों का चयन करना चाहिए, जोकि जलवायु क्षेत्राें और मृदा के अनुकूल हों। इसके साथ ही कीट व रोगों की प्रतिरोधी क्षमता वाली हों। हमें फसलों के बीज व रोपण सामग्री उन संस्थाओं से लेनी चाहिए, जो ये प्रमाण दें कि वे जैविक पद्धति से विकसित किये गए हैं। जैविक खेती में आनुवंशिक रूपांतरण के बीज का प्रयोग सर्वथा वर्जित है। एन.एस.ओ.पी. के अनसुार बीज/रापेण सामग्री प्रमाणित जैविक हाेनी जरूरी है। खरपतवाराें काे नियंत्रित करने, मृदा में नमी को संरक्षित रखने और मृदा में कार्बनिक अवशेषों को विघटित करने में पलवार बहुत प्रभावी हैं। राष्ट्रीय जैविक उत्पादन मानक के मानदंडों के अनुसार पौधों में पोषण के लिए बायोगैस स्लरी, गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट, फसल अवशेष या किसी भी सुरक्षित जैविक स्रोत का उपयोग फायदेमंद है। इस प्रणाली में जैव उर्वरकों का उपयोग लाभप्रद है। एजोटोबैक्टर, एजोस्पिरिलम, पफॉस्पेफट-साल्यूब्लाजिंग बैक्टीरिया का बीज उपचार के लिए प्रयोग कर सकते हैं। परन्तु इन जैव उर्वरकों को हमेशा विश्वसनीय संस्था से खरीदें तथा इनका उचित रिकॉर्ड रखना भी जरूरी है। जैविक खेती में फसलचक्र का भी अत्यंत महत्व है। एक ही फसल को बार-बार नहीं लेना चाहिए। इस प्रकार की खेती में फव्वारा या टपक सिंचाई विधि से फसलों की अच्छी उत्पादकता मिलती है, क्योंकि जितने पानी की आवश्यकता होती है उतना पानी देने से पोषक तत्वों का क्षरण नहीं होता है। पलवार के साथ सूक्ष्म सिंचाई देने से इसमें फसलों की उपज एवं उत्पादकता में वृद्धि देखी गई है। कीट एवं रोग नियंत्रण सामान्यतः फसलें हानिकारक कीटों, फपफूंद, जीवाणु, विषाणु और सूत्रकृमि से प्रभावित हाेती हैं। इनकाे नियंत्रित करने के लिए एकीकृत रोग-कीट प्रबंधन को अपनाना जरूरी है। इसमें प्रमुख रूप से प्रतिरोधी प्रजातियां लगाना, रोगमुक्त बीज का उपयोग, क्षतिग्रस्त और खराब बीज को लगाने से पहले अलग करना, कीटों की निगरानी तथा नियंत्रण करने के लिए कनेरी पीला जल प्रपंच या चिपचिपा प्रपंच, रस चूसने वाले कीटों जैसे-सफेद मक्खी, माहूं एवं थ्रिप्स आदि के लिए उपयुक्त हैं। इसके साथ ही उड़ने वाले कीटों के नियंत्रण के लिए लाईट ट्रैप (प्रकाश प्रपंच) का प्रयोग भी प्रभावी है। ट्राइकोडर्मा विरिडी नामक फफूंद से 4 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करने पर यह फफूंद बीज के आसपास बढ़कर फैल जाती है और दूसरे हानिकारक फफूंदों को बढ़ने नहीं देती है। इसके अलावा मृदा सौरीकरण, फसलों के बीच में गेंदे जैसी ट्रैप फसल भी सूत्रकृमि की संख्या को कम करती है। सामान्यतः विषाणुजनित रोगों के प्रसार को रोकने के लिए स्वच्छ खेती व नियमित रूप से रोगग्रस्त पौधों को खेत से निकालना प्रभावी है। पानी में तैयार EPN(HeterorhabditisIndica) और गैलरियाकोकून में तैयार ईपीएन कल्चर का प्रयोग मृदा में सफेद सूंडी के लार्वा को कम करता है। पत्ती खाने या रस चूसने वाले कीटों के नियंत्रण के लिए नीम का तेल (2.0-3.0 मि.ग्रा./लीटर) फसल के अनुसार उपयोगी पाया गया है। विभिन्न पत्ती खाने वाले या फसल को सीधे नुकसान पहुंचाने वाले कीट-पतंगों के लिए पफेरोमोन ट्रैप का भी उपयोग कर सकते हैं। विभिन्न मित्र कीटों जैसे-परभक्षी, परजीवी कीटों की पहचान, जैविक खेती में जरूरी है। इन कीटों में संवर्धन एवं उचित प्रबंधन से हानिकारक कीटों के प्रभावी नियंत्रण में मदद मिलती है। फसलों की खुदाई एवं भंडारण उचित समय एवं स्थान पर, बीजों में नमी की मात्राा व तापमान को देखते हुए करने से भंडारण घर में फसलों की हानि को कम किया जा सकता है। वस्तुतः जैविक खेती पद्धति प्राचीन भारतीय कृषि प्रणाली है। इस रसायन प्रधान आधुनिक युग में भी यह प्रासंगिक है। जैविक खेती प्राकृतिक संसाधनों पर आधरित आधुनिक विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में युक्तिसंगत समन्वय व सामंजस्य स्थापित करने की एक कला है। रासायनिक उर्वरकों से उत्पादित खाद्यान्न की तुलना में, जैविक खेती से उत्पादित खाद्यान्न अधिक पौष्टिक, रुचिकर व ज्यादा गुणवत्तायुक्त होता है। अतः इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। जैविक खेती अपनाकर, हम भी भूमि के क्षरण एवं दोहन को रोकने में योगदान दे सकते हैं। इससे फसलों की उत्पादन लागत में कमी आयेगी और फसलों का उचित मूल्य मिलेगा। इससे खेती अधिक लाभकारी होगी एवं वर्ष 2022 तक खेती से किसान की आमदनी को दोगुना प्राप्त करने के भारतीय कृषि के लक्ष्य को प्राप्त करना संभव होगा। जैविक खाद्य पदार्थों का प्रमाणन जैविक खाद्य का प्रमाणन यह सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि ये उत्पाद सभी निर्धारित मापदंडों/मानकों का पालन करते हैं। सभी हानिकारक रसायनों की सीमा, उपयुक्त विनियमों के तहत निर्धारित अधिकतम सीमा से कम हो। संगठित बाजार व निर्यात के लिए एनपीओपी द्वारा मान्यता प्राप्त प्रमाणन और प्रारंभिक दौर में घरेलू बाजार के लिए कृषि एवं किसान कल्याण मंत्राालय से संबंद्धित पार्टिसिपेटरी गारंटी स्कीम ;पीजीएसद्ध के मामले में क्षेत्राीय परिषद इन जैविक खाद्य उत्पादों को प्रमाणित करने के लिए जिम्मेदार है। इसके अलावा कृषि और प्रसंस्करित खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण ;एपीडाद्ध, जैविक भारत, राष्ट्रीय जैविक कृषि केंद्र एवं राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम से भी उपयुक्त जानकारी ली जा सकती है। स्त्राेत : खेती पत्रिका, अनुज भटनागर 'प्रधान वैज्ञानिक, भाकृअनुप-केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान परिसर, मोदीपुरम, मेरठ-250110 (उत्तर प्रदेश)।