भूमि का चयन और तैयार करना हल्दी की खेती मसालेदार नगदी फसल के अतिरिक्त हर गृह वाटिका में भी सफलतापूर्वक की जा सकती है। इसकी खेती के लिए 4.5-7.5 पी.एच. के बीच और एक प्रतिशत से अधिक जैविक कार्बन युक्त सुनिकासी व्यवस्था वाली रेतीली अथवा चिकनी दोमट मृदा सर्वाधिक उपयुक्त होती है। यदि जैविक कार्बन की मात्रा 1 प्रतिशत से कम है तो 30-40 टन/है0 गोबर की खाद का प्रयोग करें और खाद को भली भांति मिलाने के लिए खेत को 2-3 बार अच्छी तरह जुताई करें। मानसून के आगमन से पूर्व भूमि तैयार की जाती है। चार बार गहरी जुताई करने के बाद भूमि को अच्छी तरह बुआई के लिए तैयार कर लिया जाता है। अमलीय मृदा के लिए 500 किलो ग्राम/है0 के हिसाब से जलयोजित चूने का प्रयोग करना होता है और मानसून पूर्व बौछारों के आगमन के तत्काल बाद अच्छी तरह जुताई की जाती है। क्यारियों के बीच 50 सें.मी. का अंतराल देते हुए 1.0 मीटर की चौड़ाई, 15 सें.मी. की ऊंचाई और सुविधाजनक लंबाई वाली क्यारियां बनाई जाती हैं। बुआई का समय निचले पर्वतीय क्षेत्र - मई- जून मध्य पर्वतीय क्षेत्र - अप्रैल-मई अनुमोदित किस्में पालम पिताम्बर, पालम लालिमा। बीज दर और अंतराल एक हैक्टेयर भूमि में रोपण के लिए 2000-2500 किलोग्राम (160-200 कि.ग्रा./बीघा) प्रकंदों की आवश्यकता होती है। मेढ़ों और नालियों में उपयुक्त अंतराल 30-40 सें.मी. और पौधों की पंक्तियों के बीच 20 सें.मी. का अंतराल ठीक हैं। मृदा उर्वरकता प्रबंधन भूमि तैयार करते समय अथवा क्यारियों के ऊपर आधारभूत परत के तौर पर अथवा रोपण के समय छितराकर अथवा जुताई द्वारा, गड्ढों में बिछाकर 45 दिन के अंतराल पर 5-10 टन/है0 के हिसाब से चूए की खाद और 12-15 टन/है0 के हिसाब से हर पत्ते युक्त मल्चिंग के साथ-साथ 30-40 टन/है0 की दर से गोबर की खाद अथवा कम्पोस्ट का प्रयोग किया जाता है। मृदा की जांच के आधार पर फास्फोरस और पोटेशियम अनुपूरक की अपेक्षित मात्रा प्राप्त करने के लिए चूने/डोलोमाइट रॉक फास्फेट और लकड़ी की राख का प्रयोग किया जाता है। रोपण के समय 5 टन/है0 के हिसाब से जिन्क का प्रयोग भी किया जा सकता है और 2 टन/है0 के हिसाब से जैविक खाद जैसे खली का प्रयोग भी किया जा सकता है। ऐसे मामलों में गोबर की खाद जैविक उर्वरक (एजोस्पिरिलियम) की मात्रा में कमी की जा सकती है और एनपी. के. की आधा संस्तुत मात्रा की सिफारिश भी की जाती है। इसके अतिरिक्त खली जैसे नीम खली (2 टन/है0), कम्पोस्टेड विलय जीवाणू के अनुपूरक से भी उर्वरकता और उत्पादकता में बढ़ौतरी होगी। सिंचाई और पानी की आवश्यकता हल्दी के लिए अंतराल पर बार-बार सिंचाई की आवश्यकता होती है जो मृदा और जलवायु की स्थिति पर निर्भर करती है। सामान्यतः चिकनी मृदा में 15-23 बार सिंचाई की जाती है और रेतीली दोमट मृदा में 40 बार सिंचाई की जाती है। अपरदन और जलप्रवाह को न्यूनतम करने के लिए ढाल के साथ-साथ क्यारियों के बीच अंतराल में संरक्षण गड्ढे बनाकर जल संरक्षण के उपाय भी किए जा सकते हैं। जलनिकास के लिए गहरे गड्ढे बनाकर निचली सतह वाले खेतों में पानी के ठहरने से बचा जा सकता है। परंपरागत विधियां और खरपतवार प्रबंधन रोपण के 60, 90 और 120 दिन बाद निराई की जाती है जो खरपतवार की तीव्रता पर निर्भर करता है। हल्दी को फलों के बागीचों में आंतर फसल के तौर पर भी उगाया जा सकता है। इसे मिर्च, अरबी, अदरक, भिंडी, रौंगी जैसे खाद्यान्नो आदि के साथ मिश्रित फसल के तौर पर भी उगाया जा सकता है। फसल की सुरक्षा कीट छद्म तने में छेद करता है और आंतरिक ऊतकों को खा जाता है जिसके जरिये द्रव्य बाहर निकलता है और मध्य से मुरझाया अंकुर कीट प्रकोप का लक्षण है। कीट प्रबंधन जुलाई - अक्तूबर के दौरान 21 दिन के अंतराल पर नीमगोल्ड 0.5 प्रतिशत अथवा नीम तेल 0.5 प्रतिशत का छिड़काव तना छेदक कीट के खिलाफ प्रभावी है। छिड़काव की शुरूआत तब करनी चाहिए जब सबसे आंतरिक पत्ते पर कीट के प्रकोप के लक्षण दिखाई देने लगे। यदि तना छेदक कीट की घटना दिखाई देती है, शूट्स को काट कर खोले, लार्वे को पकड़कर बाहर निकालें व नष्ट कर दें। प्रकन्द कीट प्रकन्द कीट (एस्पिडिएला हार्टी) खेत में प्रकदों (फसल की बाद की अवस्था में) और भण्डारण में क्षति पहुंचाता है। ये शिराओं के द्रव्य को खाते हैं और जब प्रकन्दों पर भयंकर प्रकोप होता है, वे रसरहित एवं सूखे हो जाते हैं जिससे इनका अंकुरण प्रभावित होता है। खेत की नियमित निगरानी और भौतिक स्वच्छता के उपायों को अपनाना। हल्दी के कीट हल्दी के कीट (पेन्केटोर्थिप्स इंडिकस) पत्तों को पीड़ित करता है जिससे वे मुड़ जाते हैं,पीले पड़ते हैं और धीरे-धीरे सूख जाते हैं। मानसून के बाद की अवधि के दौरान कीट का प्रकोप अधिक आम बात है विशेषकर देश के शुष्क क्षेत्रों में। यदि आवश्यक हो, एक पखवाड़े के अंतराल पर 0.5 प्रतिशत नीम तेल का छिड़काव करें। रोग प्रबंधन यह रोग पत्ते के किसी भी तरफ छोटे, अंडाकार, आयताकार अनियमित भूरे धब्बों के रूप में दिखाई देता है जो शीघ्र ही भद्दे पीले अथवा गहरे भूरे रंग के बन जाते हैं। कुछ मामलों में, पौधे झुलसाहट का आभास देते हैं और प्रकन्दों की उत्पादकता में कमी आ जाती है। पत्तों पर धब्बे, पत्तों पर दाग इस रोग को एक प्रतिशत बोरोडिक्स मिश्रण का छिड़काव कर नियंत्रित किया जा सकता है। यह रोग विभिन्न आकार के, अनियमित आकृति के और केन्द्र में सफेद अथवा हरे रंग के भूरे धब्बों के रूप में प्रकट होते हैं। बाद में, ये धब्बे आपस में मिल जाते हैं और पूरे पत्ते को ढकते हुए एक अनियमित धब्बा बना लेते हैं जो अंतत: सूख जाता है। गट्ठी सड़न रोग प्रभावित गठियां सड़ जाती हैं तथा पौधों की पत्तियां भूरी हो जाती हैं। रोकथाम इस रोग को 1 प्रतिशत बोरोडिक्स मिश्रण का छिड़काव कर नियंत्रित किया जा सकता है। छद्म तने का कॉलर क्षेत्र नरम और जल से तर बन जाता है जिसके परिमाणत: पौधा गिर जाता है और प्रकंद का क्षय हो जाता है। रोपण करते समय ट्राइकोडर्मा के प्रयोग से प्रकंद के सड़ने की घटना को | नियंत्रित किया जा सकता है। केवल रोगमुक्त गठियों का प्रयोग करें। कटाई/खुदाई फसल रोपण के 7-9 माह बाद नवम्बर - दिसम्बर के दौरान कटाई के लिए तैयार हो जाती है। अल्पकालीन किस्में 7-8 माह, मध्यम कालीन किस्में 8-9 माह और दीर्घकालीन किस्में 9 माह के बाद परिपक्व होती हैं। भूमि की जुताई की जाती है और प्रकन्दों को हाथ से एकत्र किया जाता है अथवा ढेर को खुरपी से सावधानीपूर्वक उठाया जाता है। कटाई किए प्रकन्दों से मिट्टी और उनसे चिपके अन्य तत्वों को साफ किया जाता है। सुरवाना और भण्डारण इसे बांस की बनी चटाई पर अथवा सूखी सतह पर 5-7 सें.मी. मोटी परतों पर फैलाकर धूप में सुखाया जाता है। रात्रि के समय, प्रकंदों को एकत्र किया जाना चाहिए अथवा ऐसी किसी चीज से ढक देना चाहिए जिससे हवा मिलती रहे, जिसे पूरी तरह सूरखने में 10-15 दिन का समय लगता है। अधिकतम 60 डिग्री सेल्सियस तापमान का प्रयोग कर आर - पार गर्म वायु के प्रयोग से कृत्रिम रूप से सुखाने पर भी संतोषजनक उत्पाद मिलता है। सामान्यतः बीज प्रयोजन के लिए प्रकंदों को हवादार कमरों में ढेरों में भंडारित किया जाता है और हल्दी के पत्ते से ढक दिया जाता है। बीज प्रकंदों को स्टिकनोस नक्सिवोमिका (कांजीराम) के पत्तों के साथ-साथ बुरादे, रेत के साथ गड्ढों में भी भण्डारित किया जा सकता है। उत्पादकता ताजा हल्दी की औसत उत्पादकता 15 -20 टन/हैक्टेयर (12-16 क्विंटल/बीघा) के बीच होती है। स्रोत: इंटरनेशनल कॉम्पीटेंस सेंटर फॉर आर्गेनिक एग्रीकल्चर