परिचय पृथ्वी मानव व पर्यावरण के बीच मधुर परस्पर लाभदायी तथा दीर्घायु संबधों की अवधारणा को आधार बनाकर आज की जैविक खेती की परिकल्पना की गई। समय के बदलते स्वरुप के साथ जैविक खेती अपने प्रारंभिक कल के मुकाबले अब और अधिक जटिल हो गया है और अनेक नये आयाम अब इसके प्रमुख अंग है। जैविक खेती का नीति निर्धारण प्रक्रिया में प्रवेश तथा अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उत्कृष्ट उत्पाद के रूप में पहचान इसकी बढ़ती महत्ता का प्रतीक है। विगत दो दशकों में विश्व समुदाय में खाद्य गुणवत्ता सुनिश्चित करने के साथ पर्यावरण को स्वस्थ रखने हेतु जागरूकता बढ़ी है। अनेक किसानों व संस्थाओं ने इस विधा को भी समान रूप से उत्पादन क्षम पाया है। जैविक खेती प्रणेताओं का तो पूरा विशवास है कि इस विधा से न केवल स्वस्थ वातावारण, उपयुक्त उत्पादक तथा प्रदूषणमुक्त खाद्य प्रप्त होगा बल्कि इसके द्वारा संपूर्ण ग्रामीण विकास की एक नई स्वपोषित स्वाबलंबी प्रक्रिया शुरू होगी। शुरूआती हिचकिचाहट के बाद जैविक खेती अब विकास की मुख्य धारा से जुड़ रही है और भविष्य में आर्थिक, सामजिक तथा पर्यावरणीय सुरक्षा के नये आयाम सुनिश्चित कर रही है। हालाकिं प्रारंभिक काल से अब तक जैविक खेती के अनेक रूप प्रचलित हुए हैं परन्तु आधुनिक जैविक खेती पाने मूल रूप से बिलकुल अलग है। स्वस्थ मानव्, स्वस्थ मृदा तथा स्वस्थ खाद्य के साथ स्वस्थ व् टिकाऊ वातावरण के प्रति संवेदनशील इसके प्रमुख बिंदु है। जैविक खेती अवधारणा विश्व को जैविक खेती भारत देश की दें है। अब भी जैविक खेती का इतिहास टटोला जाएगा, भारत और चीन इसके मूल में होंगे। इन दोनों देशों की कृषि परंपरा 4000 वर्ष पुरानी है तथा यहाँ के किसान चार सहस्त्राब्दी के कृषि ज्ञान से परिपूर्ण किसान है और जैविक खेती ही उन्हें इतने वर्षों तक पालती पोसती रही है। जैविक खेती प्रमुखतया निम्न सिद्धांतों पर आधारित है। जैविक खेती चूँकि अधिक बाह्य उत्पादन उपयोग पर आश्रित नहीं और इसके पोषण के लिए जल कि अनावश्यक मात्रा भी वांछित नहीं है इस कारण यह प्रक्रति के सबसे नजदीक है और प्रकृति ही इसका आदर्श है। पूरी विधा प्राकृतिक प्रक्रियाओं के सामंजस्य व उनके एक-दूसरे पर प्रभाव की जानकारी पर आधरित होने के कारण इससे न तो मृदा जनित तत्वों का दोहन होता है और न ही मृदा की उर्वरता का ह्रास होता है। पूरी प्रक्रिया में मिट्टी के जीवंत अंश है। मृदा में रहने वाले सभी जीव रूप इसकी उर्वरता के प्रमुख अंग है और सतत उर्वरता संरक्षण में योगदान करते हैं। अतः इनकी सुरक्षा व पोषण किसी भी कीमत पर आवश्यक है। पूरी प्रक्रिय में मृदा पर्यावरण संरक्षण सबसे महत्वपूर्ण है। आज की परिभाषा में जैविक खेती कृषि की वह विधा है जिसमें मृदा को स्वस्थ व जीवंत रखते हुए केवल जैव अवशिष्ट जैविक तथा जीवाणु खाद के प्रयोग से प्रकृति के सस्थ समन्वय रख कर टिकाऊ फसल उत्पादन किया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका के कृषि विभाग की परिभाषा के अनुसार जैविक खेती एक ऐसे प्रणाली है, जिसमें सभी संश्लेषित आदानों (जैसे रासायनिक खाद, कीटनाशी, हारमोन इत्यादि) के प्रयोग को नकारते हुए केवल फसल चक्र, जैव फसल अवशिष्ट, अन्य जैविक आदान तथा जीवाणु खादों के प्रयोग से फसल उप्तादन किया जाता है। विश्व खाद्य संगठन की एक अन्य परिभाषा के अनुसार जैविक खेती एक ऐसी अनूठी कृषि प्रबन्धन प्रक्रिया है जो कृषि वातावरण का स्वस्थ, जैव विविधता, जैविक चक्र तथा मिट्टी की जैविक प्रणालियों का संरक्षण व पोषण करते हुए उत्पादन सुनिश्चित करती है। इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के संश्लेषित तथा रसायनिक आदानों के उपयोग के लिए कोई स्थान नही है। दार्शनिक परिभाषा के अनुसार जैविक खेती का अर्थ प्रकृति के साथ जुड़कर खेती करना है। इस प्रकिया में सभी अवयव व प्रणालियाँ एक दूसरे से जुडी है। चूँकि जैविक खेती का अर्थ है सभी अंगों के बीच आदर्श समन्वित संबंध अतः में हमें मिट्टी, जल, जिव, पौधे, जैविक चक्र पशु व् मानव तथा उनके आपसी संबधों की गहन जानकारी होनी चाहिए। इन समस्त संबंधों तथा सबका सम्मिलित सहयोग जैविक खेती का मूल आधार है। जैविक खेती वैष्विक परिदृश्य आइफोम तथ स्वाइल एसोसिएशन के वर्ष २००७ के सर्वेक्षण के अनुसार पुरे विश्व में लगभग 3.2 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र जैविक प्रबन्धन के अतंगर्त है। यह कुल कृषि क्षेत्र का लगभग 0.75% है। महाद्वीपों में आस्ट्रेलिया तथा प्रशांत महाद्वीप 1.21 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र के साथ स्थान पर है। इसके बाद यूरोप (78 लाख है) लेटिन अमेरिका (64 लाख है) एशिया (29 लाख है) तथा उत्तरी अमेरिका (22 लाख है) का स्थान है। देशों में आस्ट्रेलिया (1.21 करोड़ है) अर्जेन्टीना (27.7 लाख है) तथा अमेरिका (16 लाख है) सबसे अग्रणी देश है। परन्तु कुल क्षेत्र के मुकाबले जैविक खेती क्षेत्र के % हिस्से के मामले में यूरोप सबसे आगे है। पिछले कुछ वर्षों में यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका में जैविक खेती क्षेत्र का तेजी से विस्तार हुआ है। उत्तरी अमेरिका में तो यह वृद्धि दर लगभग 30% तक रही है। हालाकिं पिछले कुछ वर्षों से अधिकाँश देशों में जैविक क्षेत्र का विकास हुआ है परन्तु कुछ देशों में जैसे चीन, चिली तथा आस्ट्रेलिया में इसमें कुछ कमी हुई है। वर्ष 2009 के सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 3.1 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र की विस्तृत सूचना उपलब्ध है। इसमें लगभग 50% हिस्सा स्थायी चरागाहों का 14% विभिन्न फसलों का, 10% स्थायी फसलों का तथा 5% लगभग अन्य फसलों का हिस्सा है। वैष्विक स्तर पर लगभग दो तिहाई क्षेत्र स्थायी चारागाहों के अधीन है, जिसका आधे से अधिक भाग आस्ट्रेलिया में है। फसलों में खाद्यान फसलें, कपास, हरी खाद फसलें, दलहन, सब्जी वाली फसलें, तिलहन तथा औषधीय फसलें प्रमुख हैं। इसके अलावा पुरे विश्व में लगभग ३.1 करोड़, हेक्टेयर क्षेत्र में फैला जंगल भी जैविक प्रकिया के अंतर्गत है।सबसे बड़े जैविक जंगल क्षेत्र यूरोप तथा अफ्रीका में है जहाँ से बांस की कलियाँ, फल, फलियाँ व सूखे मेवे प्रमुख रूप से एकत्र किये जाते हैं। वर्ष 2005 से 2007 के बीच वैशिवक जैविक खाद्यान बाजार ३९% की वृद्धि दर के साथ तेजी से बढ़ा है। कुल बाजार वर्ष 2002 में लगभग 33 मिलियन डालर का था जो वर्ष 2007 में 46.1 बिलियन डालर तक पहुँच गया। वर्ष 2009 में इसके 50 बिलियन डालर के समकक्ष हो जाने की आशा है। जैविक खेती हालांकि अब विश्व के अनेक देशों में अपने पाँव फैला चुकी हिया परन्तु जैविक उत्पादों की सर्वाधिक मांग यूरोप व उत्तरी अमेरिका तक सिमित है। यह स्थिति काफी जटिल है और इन देशों के जैविक बाजार में थोड़ा भी उतार-चढ़ाव विश्व जैविक बाजार को प्रभावित कर सकता है। यदि जैविक बाजार को सुदृढ़ था स्थायी बनाना है तो आवश्यक है कि सभी उत्पादक देश अपने स्थानीय जैविक बाजार को भी बढ़ावा दें। मानक तथा प्रमाणीकरण प्रक्रिया आज विश्व के 71 से अधिक देशों में जैविक मानक तथा प्रमाणीकरण प्रकिया स्थापित है तथा इसके प्रचालन हेतु 481 प्रमाणीकरण संस्थायें कार्यरत है। लगभग 21 देश प्रमाणीकरण प्रक्रिया लागू करने हेतु प्रयासरत हैं। इनमें सबसे अधिक 170 यूरोप में , 105 एशिया में तथा 80 उत्तरी अमेरिका में है। सवसे अधिक प्रमाणीकरण संस्थाएं संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान, चीन तथा जर्मनी में है। 40% संस्थाएं यूरोपीय संघ द्वारा अनुमोदित हैं, 32% संस्थाएं ISCO 65 प्रकिया के अंतर्गत प्राधिकृत हैं तथा लगभग 28% अमेरिकी कृषि विभाग द्वारा स्वीकृत हैं। भारत में राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कायर्क्रम के अंतर्गत 16 प्रमानिकरण संस्थाएं प्राधिकृत की जा चुकी हैं। भारत में जैविक खेती परिदृश्य जनवरी 1994 की सेवाग्राम घोषणा के बाद से भारत में जैविक खेती का तेजी से विस्तार हुआ है। सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर अनेक प्रयासों ने इसे एक नई दिशा दी है। राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम के अंतर्गत मानक और प्रमाणीकरण कार्यक्रम स्थापित किया गया है। राष्ट्रीय जैविक खेती परियोजना के अंतर्गत जैविक प्रबन्धन के प्रचार-प्रसार तथा जैविक खेती क्षेत्र के विस्तार हेतु अनेक योजनाएं शुरू की गई है। 9 से अधिक राज्यों ने जैविक खेती उन्नयन कार्यक्रम को अपनाया और वांछित नीतियों की घोषणा की है। 4 वर्ष पूर्व उत्तराखंड राज्य ने जैविक राज्य हेतु संकल्प लिया है। मिजोरम तथा सिक्किम राज्यों ने पूर्ण जैविक खेती राज्य होने की दिशा में कदम बढ़ाने शुरू किये हैं। अभी हाल में नागालैंग राज्य ने भी पूर्ण जैविक का लक्ष्य प्राप्त करने हेतु प्रयास करने का संकल्प लिया है। भारत सरकार के कृषि एंव सहकारिता विभाग के राष्ट्रीय जैविक खेती कार्यक्रम के अंतर्गत लगभग 468 सेवा प्रदायी संस्थाओं का चयन किया गया है जो जैविक खेती के प्रचार –प्रसार में सलंग्न हैं इसकी कार्यक्रम के अंतर्गत अनेक राज्य तथा सरकारी व गैर सरकारी संस्थाओं ने भी जैविक खेती के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। बढ़ता प्रमाणीकृत जैविक क्षेत्र एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2003-04 में पुरे भारत में जैविक खेती के अंतर्गत कुल फसलीय प्रमाणीकृत क्षेत्र लगभग 42000 हेक्टेयर था। वर्ष फसलीय था तथा शेष क्षेत्र जंगल का था। पिछले चार वर्षों में इसमें अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। जैविक फसलीय क्षेत्र का विस्तार बढ़कर वर्ष 2005-06 में 1.173 लाख हेक्टेयर 200-07 में 5.38 लाख तथा वर्ष 2007-08 में 8.65 लाख हेक्टेयर तक हो गया। वर्ष 2007-08 में राज्यवार कुल जैविक खेती क्षेत्र, प्रमाणीकृत जैविक क्षेत्र तथा प्रमाणीकरण अधीन क्षेत्र का विवरण तालिका-1 में दिया गया है। घटती प्रमाणीकृत लागत प्रमाणीकृत प्रक्रिया की अत्यधिक लागत छोटे किसानों के लिए चिंता का विषय रही है पंरतु जैविक खेती के प्रसार और प्रमाणीकरण संस्थानों के बीच बढ़ती स्पर्धा के कारण प्रमाणीकरण लागर में कमी आई है। उत्पादक समूह प्रमाणीकरण प्रकिया के लागु होने से इस लागत में अभूतपूर्व कमी आई है। एक प्रोजेक्ट की लागत जो पहले लगभग 1.5 से 2 लाख रूपये होती थी वह अब घटकर 45000 से 75000 रूपये के बीच हो गई है। उत्पादक समूह प्रमाणीकरण प्रकिया के अंतर्गत प्रति किसान यह लागत जो पहले रु. 500 से 25 तक थी घटकर 100 से 150 रूपये प्रति किसान हो गई है। सरकारी प्रमाणीकरण संस्थाओं के प्रवेश से प्रमाणीकरण शुल्क में और भी कमी होगी।उत्तराखंड राज्य जैविक प्रमाणीकरण संस्था प्रति प्रोजेक्ट मात्र 10000 से 15000 रु. में प्रमाणीकरण कर रही है। जैविक कपास उत्पादन में भारत अग्रणी देश है चूँकि जैविक प्रबन्धन के अंतर्गत एक साथ कई फसलें उगाई जाती है अतः किसी एक फसल के अतर्गत कितना क्षेत्र जैविक है इसका आंकलन कठिन है। अधिकाँश क्षेत्रों में एक प्रमुख फसल के साथ 2 से 3 अन्य सह व अंतरफसलें उगाई जाती है। मध्य व पूर्वी भारत में कपास जैविक प्रबन्धन के अंतर्गत उगाई जाने वाली प्रमुख फसल है। वर्ष 2007-08 में देश में लगभग 73.702 टन जैविक कपास (रेशा) का उत्पादन हुआ है जो कि पुरे विश्व में कुल जैविक कपास उत्पादन का लगभग 50% है। दलहन, सोयाबीन, धान, गेंहूँ तथा तिलहन अन्य प्रमुख जैविक फसलें है। जैविक कपास प्रमुखतया महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उड़ीसा तथा आंध्रप्रदेश में उगाई जाती है। केरल मसालों के उत्पादन में अग्रणी है। पश्चिम बंगाल चाय तथा तमिलनाडु कॉफी प्रमुख उत्पादक राज्य है। शहद जो कि सर्वाधिक निर्यात किया जानेवाल उत्पाद है प्रमुखतया मध्य प्रदेश तथा उत्तरप्रदेश के जंगलों से एकत्रित किया जाता है। वर्ष 2007-08 में कुछ प्रमुख फसलों के कुल उत्पादन का विवरण तालिका-2 में दिया है। जैविक प्रमाणीकरण प्रकिया अधीन कुल क्षेत्र (2007-08) राज्य क्षेत्र हेक्टेयर में कुल प्रमाणित क्षेत्र कुल परिवर्तन अधीन क्षेत्र (हे.) योग (हे.) आंध्रप्रदेश 9336.55 12136.43 21472.98 अरुणाचल प्रदेश 53.75 985.05 1038.8 असम 3284.7 1462.62 4747.32 बिहार 125 0 125 छत्तीसगढ़ 0 177.98 177.98 दिल्ली 0 0 0 गोवा 14164.21 448.75 14612.96 गुजरात 7633.05 158262.44 165885.49 हरियाणा 972.12 1118.83 2090.95 हिमाचल प्रदेश 0 10605.92 10605.92 जम्मू कश्मीर 33047.10 0 33047.10 झारखण्ड 0 0 0 कर्नाटक 57626.24 7581.41 65207.65 केरल 6961.99 4972.72 11934.71 मणिपुर 171.60 10697.992 10869.592 महाराष्ट्र 45320.02 79775.58 125095.85 मध्यप्रदेश 138320.02 75767.94 214087.96 मिजोरम 0 16121.40 16121.69 मेघालय 226.00 47.40 33375.85 273.40 नागालैंड 69.00 14421.69 14490.40 उड़ीसा 4230.65 33375.85 75678.50 पंजाब 67.30 3252.90 3320.20 राजस्थान 17631.07 6149.583 23780.59 सिक्किम 172.08 0 172.08 त्रिपुरा 0 0 0 तमिलनाडु 4006.20 3661.054 7667.254 उत्तरप्रदेश 4811.72 15633.06 22444.78 उतरांचल 8260.607 4233.234 12493.85 पश्चिम बंगाल 64338.846 3441.234 9880.08 अन्य 0 0 0 योग 401002.01 464321.076 865323.086 73.702 टन जैविक कपास उत्पादन के साथ भारत जैविक कपास उत्पादन के क्षेत्र में टर्की को पीछे छोड़ते हुए अग्रणी देश के रूप में उभरा है। जैविक प्रबन्धन के अंतर्गत उगाई जाने वाली कपास को कपड़े मने बदलकर निर्यात किया जाता अहि। यद्यपि विश्व स्तर पर जैविक कपड़े के कोई मानक नहीं हैं फिर भी जैविक कपास से बने कपड़े “प्रमाणीकृत जैविक कपास से निर्मित” लेबल के साथ निर्यात किये जा रहे हैं। प्रमाणीकृत/प्रमाणित जैविक प्रबन्धन क्रिया के अंतर्गत कुछ महत्वपूर्ण फसलों का अनुमानित उत्पादन (वर्ष 2007-08) फसलों का नाम उत्पादन (मैट्रिक टन में ) धान/चावल 44193.3 गेहूँ 10161.5 अन्य खाद्यान तथा ज्वार बाजरा 28894 दालें 17225 सोयाबीन 202101.7 अन्य तिलहन 20151.5 कपास (रेशा) 73702 मसाले (मर्च, अदरक, हल्दी सहित) 26217.3 चाय/काफी 19647 फल तथा सब्जियां 369814 गन्ना 83480 अन्य फसलें/जड़ी-बूटी, औषधीय पादप तथा गुआर 145943.68 जैविक खाद्य बाजार में वृद्धि विगत 7 वर्षों के दौरान खाद्य बाजार के आकार के बारे में अनेकों प्रकार के अनुमान लगाये जाते रहे हैं। कुछ का कहना है कि जैविक खाद्य अमीरों का खाद्य है तथा इसका कोई बाजार नहीं हैज जबकि अन्य के मतानुसार रु. 98 बिलियन के समकक्ष बाजार की संभावनाएं है और लगभग 2-3 बिलयन उपभोक्ताओं के होने की आशा है । वर्ष 2006 खाद्य बाजार तथा उपभोक्ताओं की जैविक खाद्य के प्रति रूचि एवं व्यवहार के झुकाव का मूल्याकंन व सर्वेक्षण किया गया। इस अध्ययन के अनुसार राष्ट्र के 8 बड़े महानगरों के आधुनिक खुदरा बाजार में लगभग 562 करोड़ रूपये का जैविक खाद्य बाजार उपलब्ध है। कुल जैविक खाद्य बाजार लगभग 1452 करोड़ रूपये का अनुमानित है। विभिन्न प्रकार के जैविक उत्पाद खरीदने की प्राथमिकता के सर्वेक्षण में पाया गया कि ताजा जैविक सब्जियां वरीयता कम में सबसे ऊपर हैं। तदुपरान्त फल तथा इसके बाद दूध तथा डेयरी उत्पाद का स्थान है। प्राथमिकता कम में 20 विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ तथा इन श्रेणियों हेतु सम्भावित बाजार को तालिका-3 में दर्शाया गया है। देश में जैविक खेती में नियमन तथा उन्नयन हेतु सरकारी प्रयास वर्ष 2001 में भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (NPOP) का शुभारंभ तथा वर्ष 2004 में कृषि एवं सहकारिता विभाग द्वारा राष्ट्रीय जैविक खेती परियोजना की शुरुआत दो प्रयास हैं। भारत के 8 महानगरों के अध्ययन द्वारा जैविक खाद्य पदार्थ हेतु संभावित बाजार (2005-06 में खुदरा स्तर पर मूल्य-10-20% जैविक खाद्य पर लाभ) पदार्थ/उत्पाद जिनका अध्ययन किया गया प्रवेश योग्य संभावना बाजार संभावना मिलियन रूपये में प्रतिशत मिलियन रूपये में प्रतिशत सब्जियां 1023 18 3220 22 फल 710 13 2460 17 दूध 520 9 1660 11 डेरी उत्पाद 500 9 1110 8 बेकरी उत्पाद 480 9 1860 13 तेल 320 6 590 4 चावल 270 5 460 3 फास्ट फ़ूड 260 5 360 2 गेंहूँ का आटा 250 5 4700 3 स्नैक्स 220 4 560 4 फोजेन फ़ूड 220 4 300 2 दालें 180 3 320 2 स्वास्थ्य पेय 170 3 340 2 केंड फ़ूड 170 3 230 2 चाय 120 2 230 1 काफी 100 2 170 1 कंडीमेंट्स 50 1 120 1 मसालें 40 1 80 1 चीनी 2.8 0 4.8 0 शिशु आहार 0.2 0 0.30 0 योग 5620 100 14520 100 जैविक उत्पादन का राष्ट्रीय कार्यक्रम राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कायर्क्रम के अधीन वाणिज्य मंत्रालय के निर्यात के उद्देश्य से जैविक खेती उन्नयन हेतु कार्य शुरी किया तथा इसके नियामक तंत्र की स्थापना की। इसके अंतर्गत जैविक कृषि कायर हेतु मानक, प्रमाणीकरण की अधिकारिता तथा नरीक्षण संस्थानों के चयन व उनकी नियुक्ति हेतु दिशा-निर्देश जारी किये गये । यह क्रार्यक्रम वाणिज्य मंत्रालय के अधीन एक राष्ट्रीय प्राधिकरण समिति के तहत चलाया जा रहा है। कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य विकास प्रधिकार्न(एपीडा) इसका सचिवालय है। इसके अंतर्गत अब तक 16 प्रमाणीकरण संस्थाओं को स्वीकृत किया यगा है। यद्यपि जैविक उत्पाद राष्ट्रीय कार्यक्रम विदेश व्यापार विकास अधिनियम के अधीन मुख्यतया जैविक वस्तुओं के उत्पादन, नियमन तथा प्रमाणीकरण हेतु घोषित किया गया थे परन्तु घरेलू नियमों के आभाव में उन्हीं नियमों को स्वेच्छा से घरेलू बाजार के लिए भी प्रयोग किया जा रहा है। जैविक खेती की राष्ट्रीय परियोजना भारत सरकार के कृषि मंत्रालय तथा कृषि एवं सहकारिता विभाग के अधीन शुरू कि गई राष्ट्रीय जैविक खेती परियोजना ने वर्ष 2004-05 से प्रचार-प्रसार तथा जैविक खेती क्षेत्र के विस्तार हेतु क्रमबद्ध तरीके से कार्य करना शुरू का दिया है। यह परियोजना एक राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र तथा इसके छः केन्द्रों द्वारा क्रियान्वित की जा रही है। 600 से अधिक सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाएं परियोजना के अधीन कार्यरत है। 468 से अधिक किसान समूह जिसमें प्रत्येक समूह में लगभग 1500 किसान हैं, सेवा प्रदायी संस्थाओं को मार्फत जैविक प्रबन्धन के अंतर्गत लाया जा रहा है। अनेक जैविक उत्पादन इकाइयों को सहायता दी गयी है। जिनके द्वारा प्रतिवर्ष लगभग 2500 मीट्रिक टन सब्जी बाजार कचरा कम्पोस्ट, 5600 मीट्रिक टन जैव उर्वरक तथा 69.214 टन केंचुआ कल्चर/कहद उत्पादन की क्षमता निर्मित की गई है। 4850 प्रशिक्षण सत्रों का आयोजन कर 99.600 से अधिक प्रसार कार्यकर्त्ता, व्यवसायिओं तथा किसानों को प्रशिक्षित किया गया है। उपरोक्त के अलावा लगभग 62 से अधिक प्रक्षेत्र प्रदर्शन किये गे हैं तथा 443 आदर्श जैविक फार्मों की स्थापना की गई है। भविष्य की आशाएँ यद्यपि भारत जैविक खेती का परंपरागत क्षेत्र रहा है। परन्तु आधुनिक वैज्ञानिक आदानों के उपयोग से सघन कृषि ने जैविक खेती को पीछे कर दिया था। फिर भी गुणवत्तायुक्त सुरक्षित खाद्यान किसानों के लिए अधिक लाभदायी तथा कर्ज विहीन खेती कि संभावना ने जैविक खेती को मुख्य धारा की ओर मोड़ दिया है। 5 वर्षों के अल्पकाल में जैविक खेती कृषि अनेक विरोधाभासों से गुजरी है। फिर भी विगत 5 वर्षों में इसने अभूतपूर्व (लगभग 20 गुणा) वृद्धि दर योजना अवधि में संस्थागत यंत्र रचना तथा सरकारी आलम्बन के कारण इसमें स्थायी वृद्धि होना सुनिश्चित है। परन्तु कृषकों की आशाओं को पूरा करने हेतु इसे विशेष बाजार से जोड़ने हेतु प्रयासों की आवश्यकता है। इस कार्य के लिए उसी तरह के प्रयास किये जाने आवश्यक है जैसे कि जैविक खेती के क्षेत्र वृद्धि हेतु प्रारंभ किए गये हैं। स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार