परिचय जैविक एवं पारंपरिक खेती प्रकियाओं की प्रासंगिकता उपादेयता तथा टिकाऊपन के साथ देश की बढ़ती आवश्यकताओं को लेकर पिछले कुछ वर्षों में अनके सत्रों पर बहस चल हरी है। जैविक खेती के समर्थक तथा विरोधी इस बात बल देते हैं कि आज की आवश्यकताओं के अनुरूप जैविक खेती न तो टिकाऊ है और न ही वांछित उत्पादन सुनिश्चित कर सकती है। इस बात को सिद्ध करने या गलत साबित करने के लिए तर्क तो अनेक हैं पर दोनों के ही पास सर्वमान्य वैज्ञानिक सबूत नहीं है। एक तरफ जहाँ पारंपरिक कृषि की उत्पादन क्षमता तथा रसायनिक आदानों की उपादेयता पर अनगिनत साहित्य उपलब्ध हैं वहीं जैविक प्रबन्धन तकनीक व् ऑस्की उपादेयता प् प्रमाणिक साहित्य का नितांत अभाव है। इन दोनों प्रक्रियाओं के तुलनात्मक अध्ययन देतु ऐसे दीर्घाविधि परीक्षणों की आवश्यकता है जो छोटे-छोटे प्लांटों पर न होकर बड़े-बड़े फार्मों में किये जाएं। ये दोनों प्रक्रियाएं दो अलग-अलग दर्शनों पर आधारित है, वहीं जैविक खेती समूची प्रबन्धन प्रक्रिया तथा मिट्टी की उर्वरता पर आधारित है। पारम्परिक कृषि तकनीकों को किसी भी परिस्थिति में छोटे-छोटे परीक्षणों से सिद्ध किया जा सकता जबकि जैविक खेती के लिए पूर्ण फार्म प्रबन्धन व मृदा संधारण आवश्यक है। इन विरोधाभासों के बीच कुछ संस्थानों ने इन प्रक्रियाओं की उपयुक्तता तथा उत्पादन क्षमता पर दीर्घाविधि प्रयोग किये हैं। ऐसे तीन दीर्घाविधि प्रयोगों के निष्कर्ष यहाँ दिये जा रहे हैं। इक्कीस वर्षीय परीक्षण स्विट्जरलैंड के जैविक खेती अनुसन्धान संस्थान के अंतर्गत एक 21 वर्षीय दीर्घाविधि परीक्षण में कृषि की चार विधाओं : बायोडायनेमिक, जैविक, पारंपरिक तथा समन्वित प्रक्रियाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया गया। जिन फसलों पर यह अध्ययन किया उनमें प्रमुख थीं आलू, दलहन, हरी खाद, गेहूँ चारा फसलें, बंद गोभी, जौ, रिजका, चुकन्दर सोयाबीन तथा मक्का। इस परीक्षण के मुख्य परिणामों का विवरण इस प्रकार है। उत्पादकता - उत्पादन के मामले में बायोडायनेमिक व् जैविक प्रणाली पारम्परिक के समकक्ष या 1 से 5% तक कम उपजाऊ पाई गई। परन्तु समन्वित प्रणाली की तुलना में उत्पादन लगभग 20% कम रहा। समन्वित प्रणाली में पारंपरिक व जैविक दोनों प्रणालियों का पूरा समावेश था। पोषण तत्व संतुलन - नत्रजन संतुलन सभी प्रणालियों में नकारात्मक रहा, फास्फोरस तथा पोटाश संतुलन पारंपरिक को छोड़कर अन्य ३ प्रणालियों में थोड़ा सा नाकारात्मक रहा परन्तु आश्चर्यजनक रूप से जैविक प्लांटों में इस कर्मी का लम्बे समय तक भी फसलों की बढ़ावर तथा उत्पादन क्षमता पर कोई प्रभाव नहीं दिखाई दिया और न ही इन तत्वों की कमी के कोई लक्षण दिखाई दिए। उर्जा की खपत - जैविक प्रक्रिया में पारंपरिक के मुकाबले उज्र की कम खपत हुई। मिट्टी की उर्वरा शक्ति में सुधार - जैविक खादों के प्रयोग से मिट्टी की संचरना तथा उर्वरता में सुधार हुआ। जिन प्लाटों में जैविक खादों का उपयोग हुआ उन प्लाटों की मिट्टी में कार्बन का अंश 15-20% तक अह्दिक पाया गया। जैविक तथा बायोडायनेमिक प्लाटों में केंचुआ तथा अन्य मित्र कीटों की मात्रा भी काफी अधिक पायी गई। समन्वित प्रक्रिया के मुकाबले जैविक प्लाटों में सूक्षम जीवाणु कार्बन अंश 20-40% तक तथा पारंपरिक के मुकाबले जैविक प्लांटों में 60-80% तक अधिक पाया गया। मृदा एंजाइम गतिवधि भी जैविक मिट्टी में अन्य प्रक्रियाओं के मुकाबले अधिक पाई गई। रोडेल संस्थान का 21 वर्षीय परिक्षण अमेरिका के पेन्सिल्वेनिया राज्य में रोडेल संस्थान में 1986 से जैविक व अन्य विधाओं के बीच परीक्षण चल रहा है। इस परिक्षण में प्रमुखतया (क) पांरपरिक विधा (ख) पशुमल तथा दलहन आधारित प्रबन्धन (जैविक) तथा (ग) केवल दलहन आधारित प्रबन्धन प्रक्रियाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जा रहा है। है। इस अध्ययन से प्राप्त कुछ प्रमुख निष्कर्ष निम्नानुसार है - सामान्य वर्षा की अवस्थाओं में उत्पादन - पहले 5 वर्ष की परिवर्तन कालाविधि में जैविक, दलहन तथा पारंपरिक प्लाटों में मक्का का औसत उत्पादन क्रमशः 4222, 4743 तथा 5903 कि./हेक्टेयर रहा। 5 वर्ष पश्चात औसत उत्पादन इन तीन विधाओं में बढ़कर क्रमशः 6431, 6368 तथा 6553 कि./हेक्टेयर रहा। सोयाबीन का उत्पादन सभी वर्षों में तीनों विधाओं में लगभग समान था। सूखे की अवस्थाओं में उत्पादन - 5 कम वर्षा में मक्का का उत्पादन जैविक व् जैविक दलहन विधाओं के अंतर्गत पारंपरिक के मुकाबले 28-34% तक अधिक रहा। अति सूखे की स्थितियों में भी जैविक विधा से अच्छा उत्पादन प्राप्त हुआ। इन सभी वर्षों में जैविक, जैविक दलहन तथा पारंपरिक प्लांटों में सोयाबीन का उत्पादन क्रमशः 1800, 1400 तथा 900 कि./हेक्टेयर प्राप्त हुआ। जल संधारण - लगभग सभी वर्षों में जैविक प्लांटों में वर्षा जल का सबसे अधिक संधारण होना पाया गया जो कि पारंपरिक के मुकाबले 15-20% अधिक था। उर्जा की खपत - उर्जा पर होने वाला खर्च जैविक व जैविक दलहन प्रकिया में पारंपरिक के मुकाबले 28 तथा 32% कम हुआ। आर्थिक लाभ- पारंपरिक विधा में जहाँ कुल वार्षिक खर्च लगभग ३54 डालर/हेक्टेयर तथा शुद्ध लाभ 184 डालर/हेक्टेयर रहा, वहीं जैविक प्रणाली का कुल वार्षिक खर्च 281 डालर/हेक्टेयर तथा शुद्ध लाभ लगभग 176 डालर/हेक्टेयर था। इस आकंलन में उत्पादों की कीमत समान मानकर गणना की गई है। मानव खर्च - जैविक प्रणाली में हालांकि पारंपरिक के मुकाबले लगभग 35% अधिक श्रम की आवश्यकता रही परन्तु या पुरे साल में समान रूप से वितरित रहने के कारण श्रम किये जाने वाला खर्च दो प्रणालियों में लगभग समान रहा। शुद्ध लाभ - यहाँ अगर हम केवल मक्का की बात करें और उसकी समान कीमत मानकर चलें तो 10 वर्षों के औसत में जैविक मक्का 25% अधिक लाभदायी रही। इसका प्रमुख कारण था उत्पादन में लगभग बराबरी परन्तु जैविक उत्पादन की लागत में कमी। सात वर्षीय इकीसेट परीक्षण भारत में हैदराबाद स्थित अंतराष्ट्रीय अनुसन्धान केंद्र में भी विभिन्न कृषि विधाओं पर एक दीर्घाविधि परीक्षण शुरू किया गया है। जिन चार विधाओं को यहाँ जांचा जा रहा है वे हैं (क)_ कम लागत प्रकिया-1 जिसमें धान का भूसा प्रमुख जैव अंश रूप में प्रयोग किया जा रहा है (ख) कम लागत प्रक्रिया-2 इसमें विभिन्न फसल अवशेष जैव अंश रूप में प्रयोग किये जा रहे हैं (ग) पारंपरिक- सभी रसायनिक उर्वरक व कीटनाशक तथा (घ) समन्वित- इस विधा में ख व ग दोनों का प्रयोग किया गया है। भारत में छोटे किसानों की अवस्था का ध्यान रखते हुए पशुमल खाद या अन्य जैविक खादों का प्रयोग नहीं किया गया है। 7 वर्षीय आंकलन के निष्कर्ष निम्नानुसार है:- फसल बढ़वार व उत्पादन - सोयाबीन, अरहर, मक्का, ज्वार, चौला तथा कपास प्रमुख फसलें थी। दूसरे वर्ष के बाद से 7 वर्ष तक दोनों जैविक विधाओं का उत्पादन लगभग 14% कम था। परन्तु यहाँ अगर हम शुद्ध लाभ की बात करें तो दोनों जैविक विधाएं अन्य दो विधाओं के मुकाबले अधिक लाभकारी रहीं। नाशी जीव प्रकोप - जैविक विधाओं में कच्चे जैव अंश के प्रयोग के बावजूद कोई बिमारी या कीट की प्रमुख समस्या नहीं सामने आई। कपास का पहली छेदक जो के एक प्रमुख नाशी जीव है उसका प्रकोप भी बहुत कम रहा। कुछ फसलों पर शुरू के वर्षों में एफिड्म की समस्या आई परन्तु इसे 1% साबुन के घोल के प्रयोग से नियंत्रित कर लिया गया। मृदा गुण तथा पोषण संतुलन - जैविक 1 तथा जैविक 2 प्रकियाओं में समान उत्पादन तथा किसी भी पराक्र के खाद उपयोग न करने के बाबजूद उनकी मिट्टी में पांरपरिक के मुकाबले कुल नत्रजन व् फास्फोरस की अधिक मात्रा पायी गई। तीसरे व चौथे वर्ष में यह वृद्धि नत्रजन में 11-34% तथा फास्फोरस में 11-16% रही। मृदा श्वसन प्रक्रिया जैविक प्लांटों में अन्य विधाओं के मुकाबले 17-27% तक अधिक थी। इसी प्रकार अन्य महत्वपूर्ण घटक भी जैविक प्लांटों की मृदा में अधिक मात्रा में पाए गए। इनमें प्रमुख थे सूक्ष्म जीव कार्बन (28-29% अधिक) सूक्ष्म जीव अंश नत्रजन (23-28% अधिक) तथा अम्ल व क्षार फस्फेटेज किया (5-१३% अधिक)। निष्कर्ष - चार फसल चक्रों के साथ 6 वर्षीय परिक्षण परिणामों से सिद्ध होता है कि रसायनिक तथा जैविक दोनों प्रकार के आदानों के सम्मिलित प्रयोग से सर्वाधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है परन्तु यह आर्थिक दृष्टि से काफी महंगा है और शायद छोटे किसानों की पहुँच से बाहर। कम लागत की जैविक प्रबन्धन तकनीक अपनाकर समान उत्पादन लगभग 25% अधिक लाभ के साथ प्राप्त किया जा सकता है। जैविक प्रबन्धन में नाशी जीव प्रबन्धन भी बहुत कम खर्च में किया जा सकता है। मृदा की उत्तरोत्तर बढ़ती उर्वरता को टिकाऊ रखा जा सकता है। बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए उन्नत उर्वर भूमि का आधार भी बनाया जा सकता है। स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार