गुलाब सदियों से सौन्दर्य व प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए सारे संसार में प्रसिद्ध है। अन्य पुष्प इसके अनुपम सौन्दर्य एवं मधुरगुणों की तुलना में पीछे रह गए है। इसलिए यह सारे विश्व में पसंद किया जता है। भारत में इसे पूजा के लिए इस्तेमाल करने के साथ-साथ मालाओं में, गुलदस्ता में, महिलाओं द्वारा जुड़े बाँधने में, पुष्प विन्यास में, गुलाब जल, इत्र तथा गुलकन्द बनाने में उपयोग करते हैं। यह एक सदाबहार झाड़ी है जिसे पूरे देश में सफलतापूर्वक उगाया जता है। इनकी वृद्धि के अनुरूप इसे विभिन्न उपयोगों के लिए इस्तेमाल करते हैं, जैसे कि दीवाल को ढँकने के लिए, गोलाकार मेहराब हेतु, क्यारियों के लिए, हेज के लिए तथा गमले में लगाने के लिए इत्यादि। इसके बिना कोई भी उद्यान एवं वाटिका पूर्ण नहीं हो सकती है। गुलाब के फूलों के रंगो की विविधता, उसके आकार, सुगंध, पौधों की वृद्धि, फूलों के धीरे-धीरे खिलने के गुण एवं ज्यादा देर तक खिला रहने की क्षमता के कारण कट-फ्लावर के रूप में इसकी माँग देश एवं विदेश के बाजारों में दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। इसके उत्पादन, खपत एवं व्यवसाय के कारण कट-फ्लावर में इसका स्थान सबसे ऊपर है। भारत में इसकी खेती आर्थिक रूप से फायदेमंद हो गयी है। गुलाब की प्रजारियाँ रोजा डेमेसिना एवं रोजा बॉरबियाना से व्यावसायिक उत्पाद जैसे गुलाब जल एवं गुलकन्द का निर्माण किया जाता है। आधुनिक गुलाबों का वर्गीकरण निम्न तरीकों से किया गया है हाईब्रिड –टी ये किस्में मूलतः हाइब्रिड परपिचुअल एवं टी गुलाबों के बीच संकरण द्वारा उत्पन्न किए गए हैं। हाईब्रिड -टी प्रजाति अच्छी वृद्धि तथा अधिक फूल पैदा करने वाली होती है। इसके फूल लंबे डंठल पर आते हैं। ये फूल धीरे-धीरे खिलते हैं, जिससे कि इसे ज्यादा देर तक रखा जा सके। ये किस्में ठंढ के प्रति सहिष्णु होती हैं। विभिन्न उपयोग हेतु इनकी किस्में इस प्रकार हैं: (क) क्यारियों वाली किस्में: क्यारियों में लगाने के लिए विभिन्न रंगों की कुछ किस्में निम्न हैं: पीला : वसंत, पूर्णिमा, गंगा, डच गोल्ड, किंग्स रेनसम। नारंगी पीला : विएना चार्म, राजा राममोहन राय, कनकांगी। गुलाबी : डॉ. बी.पी. पाल, मृणालिनी, सुरभि, मधुमति, पिक्चर, सोनिया। लाल : भीम, रक्त गंधा, लालिमा, हैपीनेस, क्रिमसन ग्लोरी, पूसा मोहित। सफेद : जून ब्राईड, तुषार, डॉ. होमी भाभा, जवाहर, मृदुला। मिश्रित रंग : अमेरिकन हेरिटेज, केयरलेस लव, किस ऑफ़ फायर। (ख) प्रदर्शिनी हेतु किस्में: इन किस्मों के फूल बड़े होते हैं तथा इनकी आकृति अच्छी होती हैं। इनकी मुख्य किस्में निम्न हैं: एफिल टावर, एनविल स्पार्क, फ्रस्ट प्राइज, गोल्डन जायंट, पूसा सोनिया, सुपर स्टार, स्टर्लिग सिल्वर, मांटज्यूमा इत्यादि। (ग) सुगंधित किस्में: गुलाब की कुछ सुगंधित किस्में निम्न हैं: एवन ब्लू मून, क्रिमसन ग्लोरी, हर्ट थ्राब सुगंधा, दि डॉक्टर इत्यादि। (घ) व्यावसायिक किस्में: ये किस्में कट फ्लावर के लिए उगायी जाती है, जैसे कि सुपर स्टार, मांटज्यूमा, सोनिया, हैपीनेस, मर्सीडीज इत्यादि। फ्लोरीबंडा यह प्रजाति हाई ब्रिड टी एवं बौने पोलीएन्था के संकरण से विकसित हुई है। इसके फूल गुच्छों में खलते हैं, परन्तु पोलिएंथा से बड़े जबकि हाईब्रिड टी से छोटे होते हैं। ये गुच्छों में खिलने के कारण गुलदस्ता में लगे हुए से प्रतीत होते हैं। इनकी कुछ मुख्य किस्में इस प्रकार हैं: लाल : जन्तर-मन्तर, रोब रॉय, गेब्रिएला। नारंगी सिंदूरी : सिंदूर, इंडिपेंडेंस, फ्लेमेन्को, दीपशिखा, शोला, सूर्यकिरण, सूर्योदय, उषा श्रृंगार आदि। पीला : ऑल गोल्ड, बालेना, गोल्ड बन्नी। गुलाबी : अरुणिमा, क्वीन एलिजाबेथ, जूनियर मिस, मर्सिडीज, पूसा रंजना, पूसा उर्मिला। दोहरे रंग : रेड गोल्ड, कंटासिया, सबरी, डांस। मिश्रित रंग : बंजारन, करिश्मा, मधुरा। लत्तर वाली प्रजाति इसमें लम्बे डंठल पर फूल आते हैं तथा इसे सीधा रखने के लिए सहारे की जरूरत होती है। ये लत्तर वाली किस्में मेहराब, दीवाल, खम्भे आदि पर चढ़ाने के लिए अत्यंत उपयुक्त हैं। यह प्रजाति देखने में बहुत ही आकर्षक लगती है। इसकी कुछ मुख्य किस्में निम्न हैं: लाल : एलेक रेड, सिम्पेथेटिक, फ्रेग्रेंट क्लाउड, कोरल। पीला : गोल्डेन शॉवर, मार्शल नील, रॉयल गोल्ड। सफेद : प्रॉस्पेरिटी, आईसबर्ग, स्वान लेक। रेम्बलर: यह एक अन्य प्रजाति का गुलाब है जो कि लत्तर से भिन्न है। परन्तु इसमें लताओं वाले गुण भी हैं। इसकी उत्पति हाईब्रिड परपिचुअल, रोज विचुरियाना तथा रोज मल्टीफ्लोरा के संकरण से हुई है। रेम्बलर में फूल साल में सिर्फ एक बार आते हैं, परन्तु वे कई सप्ताहों तक खिले रहते हैं। इसकी महत्वपूर्ण किस्में है: अमेरिकन पिलर- लाल रंग परन्तु बीच में पीला, सैंडर्स व्हाइट – व्हाइट, डोरोथी – गुलाबी। मिनिएचर गुलाब इसे बेबी या परी गुलाब भी कहा जाता है। इसके फूल सुंदर, घने तथा छोटे होते हैं। ये ज्यादा समय तक खिलने वाले होते हैं। ये ठंढ एवं बीमारी से कम प्रभावित होते है। इसकी पत्तियाँ छोटी होती है तथा इसे कटिंग द्वारा तैयार करते है। इसे क्यारियों के किनारे, गमलों में, पत्थरों पर या झूलते गमलों में लगाते हैं। इसका प्रसारण आसानी से मध्यम कड़ी लकड़ी से किया जाता है। विभिन्न रंगों वाली इसकी मुख्य किस्में इस प्रकार हैं: लाल : रेड फ्लश, लिटिल रेड, डेविल, डेजर्ट चार्म। गुलाबी : कपकेक, रोजमेरीन, कडल्स, स्वीट फेयरी। नारंगी : सन ब्लेज, मेरी मार्शल, स्तेरिना। पीला : समर बटर, लिटिल सनसेट। सफेद : सिंड्रेला, ग्रीन आइस, मिस्टी डॉन। दोहरे रंग : ड्रीमग्लो, ग्लोरिग्लो, सेसी लैसी। झाड़ीदार गुलाब झाड़ीदार गुलाब सालों भर खिलने वाले होते हैं। ये ऊँची झाड़ियोंवाले गुलाब से बड़े, परन्तु लत्तर से छोटे होते हैं। यह अनियमिताकार बगीचों, नमूनों, हेज एवं झाड़ीदार किनारों (स्त्रवरी बॉर्डर) के लिए अत्यंत ही उपयुक्त हैं। इसकी मुख्य किस्में हैं: सफेद : दिल्ली सफेद पर्ल, बटर फ्लाई विंग्स। गुलाबी : केयर फ्री ब्यूटी, पर्ल ड्रिफ्ट। लाल : कॉकटेल, फाउन्टेन। पीला : लूसिया। पोलिएंथा ये गुलाब खिलने से बाद पूर्ण रूप से खिल जाते हैं। प्रीति, चाइना डॉल, आरेन्ज ट्रिम्फ, आइडियल, बॉडर किंग, इत्यादि इसकी मुख्य किस्में हैं। गुलाबों को उगाना स्थान: गुलाब लगाने का आदर्श स्थान वह है जहाँ पर अच्छी धूप हो, खुला स्थान के साथ वहाँ तेज हवा से बचाव हेतु हेज,घेराबंदी या दीवाल हो। यह स्थान छाया से दूर तथा बड़े पेड़ों की भूमिगत जड़ों से मुक्त होना चाहिए। मिट्टी: गुलाब के लिए हल्की दोमट, चिकनी उपजाऊ मिट्टी की आवश्यकता होती है जो पानी को रोक सके तथा जिसमें पानी निकासी की उचित व्यवस्था हो। गुलाब के लिए मिट्टी का पी.एच.6-7.5 के बीच होना चाहिए। गुलाब की खेती के लिए क्षारीय मिट्टी में जिप्सम एवं अम्लीय मिट्टी में चूना मिलाकर मिट्टी के पी.एच. को ठीक किया जा सकता है। रेखांकन: गुलाब एक सुंदर फूल है। अत: इसका रेखांकन अच्छे ढंग से करना चाहिए। क्यारियों की आकृति पारंम्परिक (नियमित) हो या अपारम्परिक (अनियमित), यह बगीचे के रेखांकन पर निर्भर करता है। क्यारियों की नियमित आकृतियाँ जैसे – वर्गाकार, आयताकार, वृत्ताकार, U आकार या L आकार की बनायी जा सकती हैं। अनियमिताकार उद्यानों के लिए क्यारियों की अनियमित आकृतियों का चुनाव कर सकते है। पौधा रोपण: गुलाब लगाने के लिए उपयुक्त स्थान का चुनाव कर वहाँ की 60-90 सें.मी. तक की मिट्टी खोद कर उसे कुछ दिन सूखने के लिए छोड़ देते हैं। कुछ दिनों तक अच्छी तरह सुखाने के बाद मिट्टी में 10-15 किलो गोबर की सड़ी खाद या कम्पोस्ट प्रति वर्ग मीटर की दर से डालकर एवं बगीचे की ऊपरी मिट्टी को अच्छी तरह से मिलाकर गड्ढे को पुन: भर दें। पौधों के बीच की दूरी उसके बढ़ने की क्षमता एवं किस्मों के ऊपर निर्भर करती है। सामान्यत: हाईब्रिड-टी की किस्मों को 75 सें.मी. की दूरी पर, फ्लोरीबंडा को 60 सें.मी. पर, पोलिएंथा को 45 सें.मी. पर, मिनिएचर को 30 सें.मी. पर एवं लत्तर को 3 मीटर की दूरी पर लगाते है। व्यावसायिक रूप से खेती करने के लिए इसकी नजदीकी दूरी 60 X 30 सें.मी. भी रखी जाती है। गुलाब लगाने का सबसे उचित समय सितम्बर माह के अंत से अक्टूबर के मध्य तक है। परन्तु इसे फरवरी महीने तक भी लगाया जा सकता है। पौधे जल्दी लगाने से जाड़ा में ज्यादा अच्छे फूल आते हैं। पौधे को अगर गड्ढे में लगाना हो तो गड्ढे का व्यास 75 से 90 सें.मी. एवं गहराई लगभग 60-75 सें.मी. रखी जा सकती है। पौधा लगाते समय हरेक गड्ढे में 4-8 किलो गोबर की सड़ी हुई खाद, मुट्ठी भर हड्डी चूर्ण, दीमक एवं अन्य कीटों की रोकथाम हेतु कीटनाशकों, जैसे लिन्डेन इत्यादि मिलाकर गड्ढे में भर दिया जाता है। गड्ढा भरते समय बगीचे की ऊपरी परत वाली मिट्टी सदैव ऊपर रखी जाती है। पौधे की जड़ में लगी हुई मिट्टी के आकार का गड्ढा बनाकर उसमें पौधे को डालकर मिट्टी को अच्छी तरह से दबा देते हैं। अगर पौधे की जड़ों में मिट्टी न लगी हो तो गड्ढों में डालते समय उसकी जड़ों को अच्छी तरह से फैला कर ही लगाया जाता है। तेज वर्षा वाले मौसम में गुलाब लगाने से बचना चाहिए। स्टैंडर्ड गुलाब में सहारा देने के लिए कड़े बाँस या लोहे की छड़ का इस्तेमाल करना चाहिए। कलम वाले स्थान को हमेशा मिट्टी से 5-7 सें.मी. ऊपर रखना चाहिए। पौधा लगाने के पश्चात कुछ पत्तियों को तोड़ दिया जाता है तथा अतिरिक्त जड़ों, टेढ़ी-मेढ़ी टहनियों को भी काट कर हटा दिया जता है। इसके बाद लगातार पानी एवं समय-समय पर खाद डालते हुए, कलिकायन के नीचे से निकलने वाली शाखाओं को तोड़ते रहना चाहिए। प्रसारण: गुलाब का प्रसारण सामान्य रूप से ‘T’ या शील्ड बडिंग (कलिकायन) द्वारा मूलवृन्त पर किया जाता है। इसके प्रसारण में ‘T’ विधि द्वारा सबसे अधिक सफलता (लगभग 90-95%) मिलती है। इस प्रक्रिया को नवम्बर के अंत से मार्च के शुरू तक करते हैं। सामान्य रूप से मूलवृंत के लिए एडवर्ड रोज, रोजा मल्टीफ्लोरा एवं रोजा इंडिका ओडोरेटा का इस्तेमाल करते हैं। इसके मूलवृंत का प्रसारण आसानी से कड़ी लकड़ी या लगभग कड़ी लकड़ी द्वारा किया जाता है। यह मूलवृंत सितम्बर-अक्टूबर महीने में काटी-छांटी गई शाखाओं से तैयार किया जाता है। जब यह कटिंग पेन्सिल आकार की हो जाती है तभी वह कलिकायन के लिए उपयुक्त होती है। कटिंग को ‘सेरेडिक्स’ या रुटेक्स हार्मोन से उपचारित करने पर जड़ें जल्दी निकलती है। लत्तर, रेम्बलर पोलिएंथा एवं मिनिएचर को कटिंग द्वारा तैयार किया जता है। लत्तर एवं रैम्बलर को लेयरिंग द्वारा भी तैयार करते हैं। कली उपरोपण के बाद शेष अतिरिक्त शाखाओं को काटकर हटा देते हैं। कली उपरोपण स्टैंडर्ड गुलाब में जमीन से 3 मी. ऊँचाई पर, विपिंग एवं अर्द्धस्टैंडर्ड में 2 मी. एवं 45 सें.मी. ऊँचाई पर करते हैं। कलिकायन विधि द्वारा पौधा तैयार करने में लगे समय को कम करने के लिए एक नयी विधि विकसित की गई है जिसे कटेज-बडेज कहते हैं। इस विधि में कटिंग में तुरन्त कली उपरोपण कर उसे बालू या धान की भूसी की राख में सेरेडिक्स हार्मोन द्वारा उपचारित कर लगाते हैं। फिर पॉलीथिन द्वारा ढँक देते हैं। इस विधि द्वारा जड़ आने में तीन-चार हफ्ते लगते हैं। इससे पौधा साल भर दूसरी जगह पर लगाने के लिए तैयार हो जाता है। खाद एवं पोषण: गुलाब की पुराने शाखाओं की छंटाई करने के बाद 10-15 किलो गोबर की सड़ी हुई खाद प्रत्येक पौधे में देते हैं। साथ ही 100 ग्राम हड्डी चूर्ण, 250 ग्राम करंज या नीम खल्ली, 100 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 50 ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश खाद एवं एल्ड्रीन कीटनाशक दवा गड्डे में मिलायी जाती है। सामान्यतया खाद की मात्रा मिट्टी के प्रकार एवं उसकी उपजाऊ शक्ति पर निर्भर करती है। गुलाब के प्रसिद्ध विशेषज्ञ डॉ. बी.पी. पाल ने देश के विभिन्न भागों हेतु खादों के निम्न मिश्रण को अनुशंसित किया है। सरसों/करंज/मूंगफली खल्ली – 5 किलो हड्डी चूर्ण – 5 किलो 100 ग्राम मिश्रण अमोनियम फ़ॉस्फेट (11:48) - 2 किलो प्रति पौधा की दर से दें। सुपर फ़ॉस्फेट (सिंगल) – 2 किलो पोटेशियम सल्फेट – 1 किलो द्रवित खाद देने के लिए सरसों/करंज की खल्ली को अच्छी तरह सड़ाकर उसके घोल को पानी में डालकर इतना पतला किया जाता है कि उसका रंग हल्का पीला हो जाता है। द्रवित खाद के इस घोल का प्रति 2-5 वर्ग मीटर के क्षेत्र में छिड़काव किया जाता है। अच्छा फूल आने के लिए पत्तियों पर खाद का छिड़काव अत्यन्त उपयोगी पाया गया है। पत्तियों के लिए 2 भाग यूरिया, 1 भाग डी.ए.पी., 1 भाग पोटेशियम नाइट्रेट, 1 भाग पोटेशियम फास्फेट का प्रति लीटर पानी में 3 ग्राम की दर से घोल बनाकर एक सप्ताह के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए। यह छिड़काव कटाई-छंटाई के 3-4 सप्ताह के बाद से कली के खिलने तक करना चाहिए। सिंचाई: सिंचाई की कमोबेश आवश्यकता मिट्टी के प्रकार एवं मौसम पर निर्भर करती है। हल्की मिट्टी के लिए बार-बार पानी देने की आवश्यकता होती है। गर्मी में पानी की ज्यादा आवश्यकता होती है एवं जाड़े में कम। अत: मिट्टी में पर्याप्त नमी बनाए रखना चाहिए, परन्तु पानी न जमने पाये, इसका भी ध्यान रखना चाहिए। कटाई-छंटाई: गुलाब की खेती में यह एक मुख्य क्रिया है। जड़ों से निकलने वाली शाखाओं की हमेशा कटाई-छंटाई करते रहना चाहिए। गुलाब में प्रत्येक वर्ष कुछ ऐसी शाखाओं का विकास होता है जो कि कमजोर होती हैं तथा वे झाड़ी जैसा रूप ले लेती हैं। अगर इनकी कटाई-छंटाई न की जाए तो उसपर अच्छे फूल निन आते हैं। अत: कटाई-छंटाई की प्रक्रिया पौधों को रोग रहित रखने के साथ-साथ स्वस्थ एवं लम्बी शाखाओं के विकास में सहायता प्रदान करती है तथा इस प्रक्रिया द्वारा अच्छी गुणवत्ता वाले फूल प्राप्त होते हैं। पौधों के मुख्य भाग को धूप एवं हवा भी उचित मात्रा में मिलती है। गुलाब में कटाई-छंटाई करने का सबसे उपयुक्त समय है वर्षा ऋतु के बाद एवं जाड़ा आने के पहले। इस तरह का मौसम सितम्बर के अंतिम सप्ताह से अक्टूबर के मध्य तक रहता है। ज्यादातर गुलाब की किस्मों में छंटाई के 60-65 दिनों बाद से ही फूल आने शुरू हो जाते हैं। अत: किसी विशेष अवसर के लिए फूल को तैयार करने हेतु छंटाई के समय को भी ध्यान में रखा जता है। गुलाब की पोलिएंथा एवं मिनिएचर किस्मों में घनी शाखाओं को काटकर पतला किया जाता है एवं लत्तरों में सिर्फ टेढ़ी-मेढ़ी एवं रोगग्रस्त भागों को काटा जाता है। छंटाई के बाद कीटनाशक एवं फफूंदनाशक पेस्ट का प्रयोग, कटी हुई शाखाओं पर करना अत्यंत आवश्यक है। अन्यथा कटे हुए भाग में शाखा विलगन रोग लग सकता है और पौधे सूखने लगते हैं। कृत्रिम आराम: यह क्रिया छंटाई के पहले की जाती है। इसका उद्देश्य पौधों को 3-7 दिनों के लिए पानी न देना या बहुत कम देना होता है। यह पौधों की उम्र एवं मौसम पर निर्भर करता है। इसमें उन कमजोर शाखाओं के खाद्य पदार्थ पुन: जड़ की ओर आ जाते हैं, जिनकी छंटाई करनी होती है। इसमें पौधों की जड़ के चारो ओर की मिट्टी को करीब 15 सें.मी. तक हटा कर धूप दिखाने हेतु तीन दिनों के लिए छोड़ देते हैं। इसके परिमाणस्वरूप पत्तियाँ पीली होकर गिर जाती है और कमजोर शाखाएँ भी सूख जाती हैं। इस क्रिया में विशेष सावधानी की आवश्यकता होती है, अन्यथा पौधा सूख सकता है। यह क्रिया पौधों को कृत्रिम आराम देने के लिए की जाती है। इसके तीन-चार दिन बाद प्रति पौधा 5 किलो गोबर की सड़ी हुई खाद मिट्टी में मिलाकर पुन: जड़ में भर देते हैं तथा खूब पानी देते हैं। मुख्य कीट एवं बीमारियाँ: गुलाब पर बहुत सारे कीट एवं बीमारियों का आक्रमण होता है। अगर इसे समय रहते नियंत्रित न किया जाए, तो बहुत हानि हो सकती है। कीट एवं रोकथाम दीमक: यह पौधों एवं जड़ों पर आक्रमण करता है। इससे पौधे तुरन्त मर जाते हैं। इसको नियंत्रित करने के लिए 5 ग्राम डार्सवान दाने का प्रयोग पौधा को लगाते समय गड्डे में करना चाहिए। लाल कीट: यह गुलाब का एक बहुत ही घातक कीट है। इसका आक्रमण मुख्यत: अगस्त एवं सितम्बर महीने में होता है। इसमें शाखाओं पर भूरे व लाल रंग की परत बन जाती है एवं इसके अंदर कीट पौधों के रस को चूसते रहते हैं। लाल कीटों के बहुत ज्यादा आक्रमण होने से पौधा सूख सकता है। अत: इसकी रोकथाम हेतु मालाथियान या रोगर का 0.05% छिड़काव अगस्त-सितम्बर माह में करना चाहिए। लाही: यह रस चूसने वाला कीट जाड़े में दिखता है। इसके अलावे थ्रिप्स भी जाड़े में ही दिखते हैं। इसकी रोकथाम हेतु 0.05% रोगर या मालाथियान दवा का छिड़काव करना चाहिए। थाईमेट 10 जी. का दाना पौधों के पास डालने से भी इसे नियंत्रित किया जा सकता है। अन्य कीटों में डिग्गरवास्प एवं भृंग प्रमुख हैं। इसकी रोकथाम हेतु उपरोक्त दवाओं का प्रयोग कर सकते हैं। बीमारियाँ एवं रोकथाम शाखा विगलन: इसमें कटी हुई शाखाएँ काली पड़कर सूखने लगती हैं। इसके लिए वेनगार्ड या वेविस्टीन दवाओं के पेस्ट का इस्तेमाल कटे भाग पर करें। काला धब्बा: इसमें पत्तों पर काला धब्बा पड़ जाता है। इसके लिए केप्टान या ब्लीटॉक्स या डाइथेन एम.-45 के 0.25% का घोल का छिड़काव करना चाहिए। पाउडरी मिल्ड्यू: इसमें नई शाखाओं व पत्तियों पर सफेद चूर्ण जमा हो जाता है। पत्तियाँ पीली फ़ो जाती हैं तथा कलियों का विकास नहीं हो पाता है। इसकी रोकथाम के लिए 80% सल्फर या 0.1% केरथेन फफूंन्दनाशी का छिड़काव करते रहना चाहिए। स्त्रोत: रामकृष्ण मिशन आश्रम, दिव्यायन कृषि विज्ञान केंद्र, राँची। गुलाब और एंथुरियम की संरक्षित खेती कैसे कर सकते है ? जानिए अधिक, इस विडियो को देखकर