भारतीय पुष्पों में गेंदा अत्यंत लोकप्रिय है एवं इसे सरलता से उगाया भी जा सकता है। कम समय में ज्यादा फूल खिलने, इसके कई रंगों में उपलब्ध होने तथा जल्दी न खराब होने एवं सभी मौसमों और मिट्टी में उगाये जाने के कारण यह व्यावसायिक दृष्टि से एक आकर्षक फसल है। उपयोग गेंदा कट फ्लावर खासकर माला बनाने के लिए विशेष उपयुक्त है। प्रसिद्धि में यह चमेली के बाद दूसरे स्थान पर है। कभी-सभी पूरे पौधे को काटकर सजावट के लिए इस्तेमाल करते हैं। गेंदे को क्यारी में, बार्डर के लिए तथा गमले में भी उगाते हैं। गेंदे की पंखुड़ियों से प्राकृतिक रंग तथा इसके पौधों से नीमटोड कृमि की दवाइयाँ तैयार करते हैं। बौने किस्म, विशेषत: फ्रेंच गेंदा झूलती टोकरी, खिड़कियों के बॉक्स, रॉक गार्डन एवं किनारों के लिए बहुत ही उपयुक्त हैं। फ्रेंच गेंदा रास्तों के किनारे भी लगाये जा सकते हैं। इसे पुष्पविन्यास एवं रंगोली बनाने में भी इस्तेमाल करते हैं। वर्गीकरण गेंदा का वर्गीकरण मुख्यत: दो वर्गों में किया जाता है: पहला अफ़्रीकी गेंदा एवं दूसरा फ्रेंच गेंदा। अफ़्रीकी गेंदा बड़ा होता है तथा फ्रेंच गेंदा की लम्बाई छोटी होती है। (क) अफ़्रीकी गेंदा (टेगेट्स इरेक्टा): यह बहुत फैला हुआ एवं लंबा बढ़ने वाला (लगभग 90 सें.मी. तक) होता है तथा इसके फूल बड़े (लगभग 15 सें.मी.) एवं विभिन्न रंगों, यथा नींबू जैसा पीला, चमकीला पीला, स्वर्णपीला, नारंगी एवं लगभग सफेद होते हैं। किस्में: पूसा नारंगी, पूसा बसंती, कैकट जैक, जीनिया गोल्ड, मेंलिंग स्माईल, फिस्ता, टिटानिया, पीला सुशिम, जायंट डबल अफ्रीकन आरेन्ज, जायंट डबल अफ्रीकन पीला, फर्स्ट लेडी, क्राउन ऑफ़ गोल्ड स्मिथ, येल्लो स्टोन, मिस्टान, स्पन गोल्ड। (ख) फ्रेंच गेंदा (टेगेटस पेटुला): ये छोटे आकार के एवं बहुत ही सघन होते हैं। लंबाई लगभग 30-37.5 सें.मी. होती है। फूल इकहरे व दोहरे प्रकार के होते हैं। ये विभिन्न रंगों जैसे पीला, नारंगी, सुनहरा, महोगनी, चित्तीदार, लाल एवं मिश्रित रंगों के पाये जाते है। बौनी दोहरी किस्में रस्टी रेड, फ्लेम और स्प्रे हैं। अन्य इकहरी किस्मों में स्टार ऑफ़ इंडिया वोनीटा, आरेन्ज पिटाइटयलो, लेमन ड्रॉप एवं हार्मोनी हैं। अन्य प्रजातियों में टेजेट्स टिनुफोलिया है जिसकी किस्में गोल्डन जेम, लुलु, पुमिला उर्सुला हैं। मिट्टी एवं जलवायु की आवश्यकता मिट्टी: गेंदे को किसी भी मिट्टी में सफलता पूर्वक उगा सकते हैं। फिर भी मिट्टी अगर उपजाऊ हो, पानी धारण करने योग्य हो और पानी की निकासी की समुचित व्यवस्था हो तथा मिट्टी का पी.एच. लगभग 7.0-7.5 के बीच हो, तो पैदावार बहुत अच्छी होगी। जलवायु: समशीतोष्ण जलवायु गेंदा फूल की अच्छी वृद्धि एवं ज्यादा फूल के लिए अति उपयुक्त है। ज्यादा तापमान में फूल की पैदावार एवं गुणवत्ता बहुत प्रभावित होती है। अत्यधिक ठंड के कारण पाला लगने से फूल काला हो जाता है और मर जाता है। फूलों की रोपाई एवं बोआई क्रमश: जाड़ा, गर्मी एवं बरसात में की जाती है। अत: गेंदा के फूलों को हम सालों भर ले सकते हैं। उत्तरी भारत के मैदानी क्षेत्रों में अच्छे फूल जाड़े के मौसम में सामान्यत: अक्टूबर से अप्रैल तक प्राप्त किए जाते हैं। गर्मी में ज्यादा तापमान एवं लंबे दिनों के कारण वानस्पतिक वृद्धि ज्यादा होती है तथा फूल कम खिलते हैं।इससे फूल का आकार छोटा हो जता है। मिट्टी की तैयारी: मिट्टी की जुताई 2-3 बार करके उसमें 30 टन प्रति हेक्टेयर पूर्ण रूप से गोबर की सड़ी हुई खाद अच्छी तरह से मिला दें। क्यारियों की लंबाई अपनी सुविधा के अनुसार रखें। पौधा लगाना: गेंदा लगाने की दो विधियाँ मुख्य हैं – पहला बीज द्वारा एवं दूसरा कटिंग द्वारा। बीज द्वारा तैयार पौधे लम्बे, अच्छी वृद्धि वाले एवं फूल देने वाले होते हैं, अत: इसे कटिंग की अपेक्षा ज्यादा पसंद किया जता है। बीज दर एवं नर्सरी लगाना: बीज से अंकुरण के लिए उचित तापमान क्रमश: 18-300 सेंटीग्रेट के बीच होता है। एक हेक्टेयर के लिए लगभग 1.5 किलो बीज की आवश्यकता होती है। गेंदे के बीज को गमले में, बीज बक्से में, समतल या ऊँची क्यारियों में उगाया जा सकता है। नर्सरी की 3 X 1 मीटर आकार की क्यारियों को अच्छी तरह तैयार कर उसमें प्रति वर्ग मीटर 10 किलो खाद मिला देनी चाहिए। इस प्रकार की 8-10 क्यारियाँ एक हेक्टेयर क्षेत्र में पौधे लगाने के लिए उपयुक्त होती हैं। चींटी एवं अन्य कीड़ों से बचाव हेतु लिन्डेन धूल या फ्युराडान धूल का छिड़काव करें। बीज को लाइन विधि द्वारा या छिड़काव विधि द्वारा लगाया जता है। परन्तु छिड़काव विधि में ज्यादा घने पौधों को उखाड़ कर दूसरी जगह लगा देना चाहिए। बीज को हल्की मिट्टी या बालू या छानी हुए पत्ती खाद से ढँक दें एवं महीन हजारे से हल्का पानी देते रहें जिससे नमी बनी रहे। परन्तु नर्सरी का बेड ज्यादा गीला नहीं होना चाहिए। कर्त्तन (कटिंग): इस विधि का प्रयोग सामान्यत: प्रजातियों की शुद्धता को बनाये रखने के लिए होता है। इसमें लगभग 10 सें.मी. की कटिंग को सेरेडिक्स पाउडर नं. 1 या रुटेक्स पाउडर से उपचारित कर उन्हें बालू में लगा दिया जाता है, जिससे कर्त्तन में जड़ें जल्दी निकल आती हैं। बाद में उन्हें बेड एवं गमले में लगा दिया जाता है। बीज या कटिंग लगाने का समय: गेंदा की फसल को साल में तीन बार लगा सकते हैं, यथा-जाड़ा, गर्मी एवं बरसात में। बीज बोने एवं उसे लगाने का समय प्रत्येक ऋतु के लिए निम्न है: मौसम बीज कटिंग लगाने का समय पौधा लगाने का समय वर्षा जून के अंत से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक अगस्त के दूसरे सप्ताह तक जाड़ा मध्य सितम्बर तक मध्य अक्टूबर तक गर्मी जनवरी के प्रथम सप्ताह फरवरी के प्रथम सप्ताह में बिचड़ों का रोपण: बिचड़े रोपण के बाद आसानी से स्थापित हो जाते हैं। इस कारण जड़ों का तेजी से विकास होता है, जिससे पौधों की मृत्यु दर कम होती है। एक महीने के बिचड़ों में 3-4 पत्तियाँ अवश्य आ जानी चाहिए। बिचड़ों को अच्छी तरह से तैयार क्यारियों में शाम को लगाना चाहिए, विशेषकर वर्षा एवं गर्मी के मौसम में, जिससे बिचड़े मौसमी आघात को अच्छी तरह से शन कर सकें एवं रात भर में स्थापित हो जायें। दूरियाँ: पौधे की अच्छी वृद्धि एवं फूल उत्पादन के लिए उचित दूरी आवश्यक है। अफ़्रीकी गेंदा में फ्रेंच गेंदा की अपेक्षा ज्यादा दूरी की जरूरत होती है। अफ़्रीकी गेंदा को 40 X 40 सें.मी. तथा फ्रेंच गेंदा को 20 X 20 सें.मी. की दूरी पर लगाना चाहिए। खाद एवं उर्वरक: फूलों की सबसे अच्छी पैदावार के लिए 100 किलो नाईट्रोजन (225 किलो यूरिया), 100 किलो फास्फोरस (625 किलो सिंगल सुपर फ़ॉस्फेट) एवं 100 किलो पोटाश (165 किलो म्यूरेट ऑफ़ पोटाश) को खेत तैयार करते समय डाल देना चाहिए तथा बिचड़ों को लगाने के एक महीने बाद निकाई गुड़ाई कर 100 किलो नाइट्रोजन (225 किलो यूरिया) प्रति हेक्टेयर की दर से डाल देना चाहिए। खरपतवार नियंत्रण: बरसात में खरपतवार ज्यादा बढ़ जाते हैं इसलिए बिचड़ों को लगाने के बाद समय-समय पर घास निकालते रहना चाहिए। अन्यथा ये पूरी फसल की वृद्धि एवं उत्पादन को प्रभावित करेंगी। सिंचाई: गेंदा एक शाकीय पौधा है जिसमें आरंम्भिक अवस्था में बहुत तेजी से वृद्धि होती है। इसकी वानस्पतिक वृद्धि 55-60 दिनों में पूरी हो जाती हैं। इसके बाद फूल खिलने का समय आता है। सभी अवस्थाओं में उचित मात्रा में मिट्टी में नमी का होना आवश्यक है। किसी भी अवस्था में पानी की कमी उसकी वृद्धि एवं उत्पादन को प्रभावित करती है। पानी की मात्रा एवं सिंचाई का अंतराल मुख्यत: मिट्टी एवं मौसम पर निर्भर करता है। हल्की मिट्टी में भारी मिट्टी की अपेक्षा ज्यादा पानी की जरूरत होती है। वर्षा अगर सामान्य हो तो कम पानी लगेगा, परन्तु कम वर्षा होने पर ज्यादा पानी लगेगा। पौधा 10 दिनों तक सूखे में रह सकता है, परन्तु इससे फूलों के उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। अप्रैल से जून तक 4-5 दिनों के अंतराल पर पानी डालें। शाखाओं को छाँटना: अफ़्रीकी गेंदा में ऊपरी तने को तोड़ देते हैं जिससे बगल वाली शाखाओं में भी वृद्धि हो सके। बगल वाली शाखाओं के बढ़ने से ज्यादा मात्रा में एवं एक समान रूप से फूल खिलते हैं। बिचड़ा लगाने के 40 दिन बाद मुख्य शाखा काटने पर पौधा ज्यादा फूल देगा। फ्रेंच गेंदा में इसकी आवश्यकता नहीं होती है। फूलों को तोड़ना, पैक करना एवं भेजना फूलों को तोड़ना: गेंदा का फूल जब पूर्ण रूप से बढ़ जाय तभी तोड़ना चाहिए। फूल का आकार उसकी किस्म के ऊपर निर्भर करता है। फूलों को ठंडे समय में, विशेषकर सुबह या शाम में तोड़ना चाहिए। खेत में सिंचाई कर देने से फूल को तोड़े जाने के बाद ज्यादा समय तक रख सकते है। फूलों को हाथ से तोड़ना चाहिए। फूलों को बराबर तोड़ते रहने से इसकी उत्पादकता बढ़ जाती है। पैकिंग: गेंदा के फूल को ज्यादातर माला बनाने के काम में लाते हैं। अत: नजदीक के बाजार में भेजने के लिए जूट से बने बोरे का इस्तेमाल करते हैं तथा दूर भेजने के लिए बाँस की टोकरी का प्रयोग करते हैं। परिवहन: परिवहन के लिए विभिन्न साधनों का इस्तेमाल करते हैं जैसे – रिक्शा, बस, ट्रेन आदि। यह सभी दूरी के ऊपर निर्भर करता है। उत्पादन: फूलों की उत्पादकता उसके लगाने के मौसम के साथ-साथ विभिन्न कृषिगत क्रियाओं पर निर्भर करती है। औसतन ताजा फूल जाड़े में 150-175 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, गर्मी में 100-120 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और वर्षा ऋतु में 200-225 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त किये जा सकते है। बीमारियाँ एवं कीड़े-मकोड़े गेंदा सामान्यत: बीमारियों एवं कीड़े-मकोड़ों के प्रकोप से मुक्त होता है। फिर भी कभी-कभार बीमारियों एवं कीड़े-मकोड़े का प्रभाव देखा गया है। बीमारियाँ एवं रोकथाम: गेंदे में निम्न मुख्य बीमारियाँ देखी गई है – (1) पौधे का गलना: इस रोग में पौधे जमीन की सतह से गलने लगते हैं। इसकी रोकथाम के लिए वेविस्टीन दवा का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से बना घोल का छिड़काव करना चाहिए। (2) पत्ती की दाग, ब्लाईट एवं कलियों का सड़ना: इस रोग में पत्तियों, तनों तथा फूलों पर भूरे रंग के दाग दिखाई देते हैं। इसके लिए डाइथेन एम. – 45 फफूंदीनाशक दवा के 3 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से बने घोल का छिड़काव करना चाहिए। (3) पाउडरी मिल्ड्यू: इस रोग में पौधों पर सफेद पाउडर सा छा जता है। इसकी रोकथाम के लिए सल्फर पाउडर 2.5 ग्राम या केरेथान (40 ई.सी.) के 1.5 मि. ली. प्रति लीटर पानी की दर से बना घोल का छिड़काव करना चाहिए। कीड़े एवं रोकथाम (1) लाल मकड़ी: यह कीट पौधे का रस चूस कर पौधे को सफेद कर देता है। इसके नियंत्रण के लिए रोगर 35 ई.सी. या नुवाक्रॉन 40 ई.सी. का छिड़काव प्रति लीटर पानी में 1 मि.ली. डालकर करें। (2) रोयेंदार लार्वा: यह कीट पत्तियों को खा कर नुकसान पहुँचाता है। इसकी रोकथाम हेतु नुवान 50 ई.सी. या थायोडान 35 ई.सी. का छिड़काव प्रति लीटर पानी में 1 मि.ली. डालकर करें। स्त्रोत: रामकृष्ण मिशन आश्रम, दिव्यायन कृषि विज्ञान केंद्र, राँची।