<div id="MiddleColumn_internal"> <h3>एनाकार्डियम आक्सीडेंटल (काजू)</h3> <p style="text-align: justify;"><strong>कुल:</strong> एनाकार्डियासी</p> <p style="text-align: justify;">सामान्य नाम: कैश्यू, काजू</p> <p style="text-align: justify;">मूल स्थान: दक्षिण अमेरिका</p> <p style="text-align: justify;"><strong>प्राप्ति स्थान:</strong> उष्ण कटिबन्धीय एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका</p> <p style="text-align: justify;"><strong>भारत में</strong>: दक्षिण भारत, तटवर्ती क्षेत्र, अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>जलवायु और मिट्टी की आवश्यकताएँ </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">नम और अर्ध शुष्क, उष्ण, सालाना वर्षा 800 मि.मी. से 3250 मि.मी. तक, समुद्र तल से 600 मी. तक ऊँचाई पर उग सकता है। अत्यंत गरम या ठंडा तापमान नहीं सह सकता। तटवर्ती क्षेत्रों के लिए सर्वोत्तम। बलुई, कंकरीली, लैटराइट, अम्लीय, लवणीय और अन्य मिट्टियों में उग सकता है। यदा-कदा आने वाली बाढ़ सह सकता है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>संवर्धन की विधि और बीज-उपचार </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">प्राय: नर्सरी में तैयार की गयी पौध से उगाया जाता है। व्यावसायिक स्तर पर पौदा करने के लिए कलमें भी लगायी जाती है। बीज-उपचार आवश्यक नहीं लेकिन बुआई से पहले बीजों को 2-3 दिन तक भिगोये रखें ताकि अच्छा अंकुरण हो। काटने पर सामान्य कोंपलें फूटती हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>बढ़वार और उपज</strong></p> <p style="text-align: justify;"><strong><img src="https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/agriculture/crop-production/91d93e930916902921-915947-93293f90f-90592894193690293893f924-91594393793f-924915928940915/91d93e93091692394d921-915947-92a92093e930940-91594d93794792494d930-92e947902-92b93294b902-915940-90992894d928924-916947924940/fruits.jpg" alt="" width="276" height="183" /></strong></p> <p style="text-align: justify;">बड़ा सदाबहार, 25 मी. तक ऊँचा, तना बड़ा 90-120 सें.मी. व्यास वाला और काफी फैलाववालीप्रकृति। पौधे गहरी मिट्टी में जल्दी-जल्दी बढ़कर 5 साल में 4-5 मी. ऊँचे हो जाते हैं और अगले 40-50 साल तक फल देते रहते हैं।</p> <p style="text-align: justify;">लकड़ी भारी होती है। मध्यम दर्जे की ईंधन और कोयला बनता है। फल खाने योग्य होते हैं। इसकी गिरियाँ बेच कर पैसा कमाया जता है। इसका तेल लकड़ी के परिरक्षक तले के रूप में प्रयुक्त होता है। तटवर्ती क्षेत्रों में फल बहुतायत से पैदा होता है। ऊँची जगहों और ठंडे क्षेत्रों पर लगाने से भरपूर फूल नहीं लगते। फूल शहद के अच्छे स्रोत हैं। पशु इसकी पत्तियाँ नहीं खाते।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>कीट-व्याधियां</strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">पत्तियों या लकड़ी पर कीट-व्याधियों की विशेष समस्या नहीं। फूलों पर चूर्णी फफूंद लगती है। जिससे फलों की पैदावार घटती है।</p> <h3>एनोना रेटीकुलाटा (राम फल)</h3> <p style="text-align: justify;"><strong>कुल:</strong> एनोनासी</p> <p style="text-align: justify;"><strong>सामान्य नाम:</strong> रामफल</p> <p style="text-align: justify;"><strong>मूल स्थान:</strong> वेस्ट इंडीज</p> <p style="text-align: justify;"><strong>भारत में:</strong> दक्षिण तथा मध्य भारत, तटवर्ती क्षेत्र।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>जलवायु तथा मिट्टी की आवश्यकताएँ </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">नम, उष्ण तथा उपोष्ण, सालाना वर्षा 1000 मि.मी. से अधिक या सूखे क्षेत्रों में नियमित सिंचाई आवश्यक। समुद्र तल से 1200 मी. ऊँचाई तक। तरह-तरह की मिट्टियों में उगता है जिनमें बलुई, लैटराइट, पथरीली, चिकनी, अम्लीय और क्षारीय शामिल हैं। आरम्भ में अच्छी नमी की आवश्यकता लेकिन बड़े पेड़ लम्बी सूखी अवधि सह सकते हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>संवर्धन की विधि और बीज-उपचार </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">आमतौर पर सीधे बीज से या नर्सरी में उगायी गयी पौध से बोया जाता है। मूल सकर (भूस्तरी) भी पैदा किए जाते हैं। <a href="../../../../../../../agriculture/91594393793f-906917924/92c94091c/91693094092b-915940-92b938932/92c94091c94b902-91593e-90992a91a93e930">बीज उपचार </a>आवश्यक नहीं है। बुवाई से पहले पूरी रात पानी में भिगाने से जल्दी अंकुरण होता है। काटने पर अच्छा पुनर्विकास होता है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>बढ़वार और उपज </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">मध्यम दर्जे का, पर्णपाती, 12 मी. तक ऊँचा, तना सीधा या टेढ़ा और 30 सें. मी. व्यास का और आधी सीधी बढ़वार की प्रवृति। तीन साल में पौधा बढ़कर 3-4 मी. हो जाता है और 7-8 साल बाद फल देना शुरू करता है।</p> <p style="text-align: justify;">लकड़ी भारी होती है, अच्छी ईंधन है। देहातों में इसकी लकड़ी के सीधे खंभे प्रयुक्त हो सकते हैं। फल खाने योग्य होते हैं। पशु इसकी पत्तियाँ नहीं खाते।</p> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;"><strong>कीट-व्याधियां:</strong> कोई समस्या नहीं।</p> <h3>एनोना एक्वैमोसा (शरीफा)</h3> <p style="text-align: justify;"><strong>कुल:</strong> एनोनासी</p> <p style="text-align: justify;"><strong>सामान्य नाम:</strong> सीताफल, शरीफा</p> <p style="text-align: justify;"><strong>मूल स्थान:</strong> दक्षिण अमेरिका</p> <p style="text-align: justify;"><strong>भारत में प्राप्ति स्थान:</strong> आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, मध्य प्रदेश, उड़ीसा।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>जलवायु और मिट्टी की आवश्यकताएँ </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">अर्धशुष्क और शुष्क, उष्ण, सालाना वर्षा 600 मि.मी. से अधिक, 1200 मी. तक की ऊँचाई पर उगता है। रामफल की अपेक्षा शरीफा अधिक ठंडी और शुष्क जगहों में पनपता है। अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी की आवश्यकता। रेतीली, कंकरीली, चिकनी, अम्लीय और क्षारीय मिट्टियों में उग सकता है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>संवर्धन की विधि और बीज उपचार </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">नर्सरी में उगायी गयी पौध से संवर्धन व्यावसायिक स्तर पर बाग़ लगाने के लिए कलमों का प्रयोग किया जता है। बीजों के उपचार की आवश्यकता नहीं है। काटने पर अच्छी कोंपलें आदि फूटती हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>बढ़वार और उपज </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">छोटे से मध्यम आकार की झाड़ी, 4-6 मी. ऊँची, शाखाओं वाला तना, तने का व्यास 15-20 सें.मी. और झाड़ीनुमा। चार साल में पौधे बढ़कर 3 मी. ऊँचे हो जाते है और फल देना शुरू कर देते हैं।</p> <p style="text-align: justify;">लकड़ी अच्छी जलती है लेकिन बायोमास की उपज काफी नहीं। फल के अच्छे दाम मिलते हैं। मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए, कृषि वानिकी और बाड़ के लिए उत्तम, यद्यपि इसकी उपयोगिता की पूरी संभावनाओं का पता नहीं लगाया गया है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>कीट-व्याधियां:</strong> कीट-व्याधियां की विशेष समस्या नहीं।</p> <h3>आर्टोकारपस हेटरोफाइलस (कटहल)</h3> <p style="text-align: justify;"><strong>कुल:</strong> मोरासी</p> <p style="text-align: justify;"><strong>सामान्य नाम:</strong> कटहल</p> <p style="text-align: justify;"><strong>मूल स्थान:</strong> भारत</p> <p style="text-align: justify;"><strong>प्राप्ति स्थान:</strong> उष्णकटिबन्धीय एशिया</p> <p style="text-align: justify;"><strong>भारत में:</strong> पूरे देश में।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>जलवायु और मिट्टी की आवश्यकताएँ </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">नम, उष्ण, लेकिन अर्ध्रशुष्क और उपोष्ण क्षेत्रों में उगने योग्य, सालाना वर्षा 1250 मि.मी. और अधिक उग सकता है। 1200 मी. की ऊँचाई तक 0 डिग्री सें. से 46 डिग्री सें. तापमान गहरी मिट्टी की आवश्यकता परन्तु क्षारीय, अम्लीय, लेटराइट, बलुई और चिकनी मिट्टियों में भी उग सकता है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>संवर्धन की विधि और बीज-उपचार </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">नर्सरी में उगायी गई पौध से प्राय: उगाया जाता है। कलमे भी फलों के बाग़ लगाने के लिए इस्तेमाल की जाती है। बुआई से पहले बीजों को पूरी रात भिगोना चाहिए। काटने पर अच्छा पुनर्विकास होता है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>बढ़वार और उपज </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">बड़ा, सदाबहार, 40 मी. तक ऊँचा, सीधा साफ तना, 80-100 सें.मी. व्यास, फैलाव की प्रवृति। काफी तेजी से बढ़ती है और 6-8 साल में फल देने लगता है। बायोमास के आंकड़े उपलब्ध नहीं है। लकड़ी भारी, पीले रंग की और पच्चीकारी व खराद, फर्नीचर निर्माण कार्य व ईंधन के लिए इस्तेमाल होती है। कच्चे फलों व बीजों की सब्जी बनती है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>कीट-व्याधियां </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">बहुत से कीड़े इसकी लकड़ी, पत्तियों व पक्के फलों को हानि पहुँचाते हैं। कई फफूंदियां जड़ गलन, टहनी अंगमारी, कैंकर, ह्रदय गलन, चित्ती आदि का कार बनती है पर गंभीर समस्या पैदा नहीं करती।</p> <h3>एम्ब्लीका आफीसीनेलिस (आँवला)</h3> <p style="text-align: justify;"><strong>कुल:</strong> यूफोरबियासी</p> <p style="text-align: justify;"><strong>सामान्य नाम:</strong> आँवला</p> <p style="text-align: justify;"><strong>मूल स्थान:</strong> उष्ण दक्षिणी एशिया</p> <p style="text-align: justify;"><strong>प्राप्ति स्थान:</strong> भारत, श्रीलंका, बर्मा, मलेशिया, दक्षिणी चीन।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>भारत में:</strong> दक्षिणी व मध्य भारत।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>जलवायु और मिट्टी की आवश्यकताएँ </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">नम, उष्ण, उपोष्ण, सालाना वर्षा 800 मि.मी. से अधिक। लम्बा सूखा मौसम। समुद्र तल से 1800 मी. तक की ऊँचाई। तरह-तरह की मिट्टियों में उग सकता है, जिनमें लैटराइट, बलुई, कंकरीली, गहरी चिकनी, जलोढ़, क्षारीय, अम्लीय और घटिया सूखी मिट्टियाँ शामिल है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>संवर्धन की विधि और बीज-उपचार </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">कलमी पौधों से व्यावसायिक स्तर पर उगाने के लिए संवर्धन किया जाता है। लेकिन सबसे अधिक प्रचलित तरीका नर्सरी में तैयार किये गए पौधों से उगाना है। पके फलों को धूप में सुखाकर उनके बीज निकाले जाते है। प्रत्येक गुठली में 6 बीज होते है जिन्हें और अधिक सुखाकर अलग कर दिया जता है। बुआई से पहले बीजों को रात भर पानी में भिगोया जाता है। काटने पर अच्छा पुनर्विकास होता है और भुस्तारी पैदा होते हैं।</p> <p style="text-align: justify;">लकड़ी का विशिष्ट घनत्व 0.74-0.80, सामान्य तथा भारी, ईंधन व कोयला अच्छा बनता है। पत्तियां पशु खाते हैं। फल थोड़े खट्टे और विटामिन ‘सी’ से भरपूर होते हैं। दवाओं व परिरक्षण में प्रयुक्त होता है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>कीट-व्याधियां:</strong> कोई गंभीर समस्या नहीं।</p> <h3>मैंगीफेरा इंडीका (आम)</h3> <p style="text-align: justify;"><strong>कुल:</strong> एनाकार्डियासी</p> <p style="text-align: justify;"><strong>नाम:</strong> आम</p> <p style="text-align: justify;"><strong>मूल स्थान:</strong> उत्तर पूर्वी भारत</p> <p style="text-align: justify;"><strong>प्राप्ति स्थान:</strong> एशिया, उष्ण अफ्रीका, अमेरिका (हवाई, फ्लोरीडा)</p> <p style="text-align: justify;"><strong>भारत में:</strong> पूरे देश में।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>जलवायु और मिट्टी की आवश्यकताएँ </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">नम, उष्ण, सालाना वर्षा 1000 मि.मी. से अधिक लेकिन कम वर्षा में भी उग सकता है, बशर्ते कि सिंचाई की व्यवस्था हो। समुद्र तल से 1200 मी. की ऊँचाई तक और 4 डिग्री सें.से 50 डिग्री सें. तक तापमान में पैदा होता है लेकिन लम्बा ठंडा मौसम फल लगने के लिए अनुकूल नहीं। तरह-तरह की मिट्टियों में उगता है लेकिन गहरी, अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में खूब पनपता है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>संवर्धन की विधि और बीज-उपचार </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">कलमी पौधे व्यावसायिक स्तर पर बागीचा लगाने के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं लेकिन बंजर भूमि पर उगाने के लिए पौध इस्तेमाल की जा सकती है। कलमी पौधों से उगाये गये पेड़ नर्सरी से लिए गए पौधों से उगाये जाने वाले पेड़ों की अपेक्षा अधिक फैलते व बौने होते पाए गए हैं। बीज उपचार की आवश्यकता नहीं है। केवल नये ठूंठों पर सामान्य झुरमुट बनता है। परिपक्व वृक्षों को काटने पर प्राय: पुनर्विकास नहीं होता।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>बढ़वार और उपज </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">ऊँचा, सदाबहार पेड़, 36 मी. तक ऊँचा, मोटा सीधा तना, व्यास 1-2 मी. लम्बा साफ़ तना, विशेष रूप से पौध से उगाये गए पेड़ का, खूब फैलाव की प्रवृति। तीन साल में पौधे की ऊँचाई 3-4 मी. तक, बशर्ते कि स्थितियां अनुकूल हों।</p> <p style="text-align: justify;">बायोमास के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।</p> <p style="text-align: justify;">लकड़ी का विशिष्ट घनत्व 0.59, मध्यम से लेकर नरम, अच्छा ईंधन, इमारती लकड़ी और मध्यम दर्जे के फर्नीचर के लिए उपयुक्त। पशु पत्तियाँ खाते हैं। फल स्वादिष्ट होते है और इनसे अच्छी आमदनी होती है। फूल शहद के अच्छे स्रोत हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>कीट-व्याधियां </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">पेड़ पर प्राय: तनाछेदक और फुदका कीड़ा हमला करता है। पुष्प क्रम पर फफूंदी हमला करती है। फलों की उपज बढ़ाने के लिए बागों में पौध रक्षा के उपाय अपनाए जाने चाहिए।</p> <h3>मोरिंगा ओलीफेरा (सहजन)</h3> <p style="text-align: justify;"><strong>कुल:</strong> मोरिगगेसी</p> <p style="text-align: justify;"><strong>सामान्य नाम:</strong> सहजन, ड्रमस्टिक</p> <p style="text-align: justify;"><strong>मूल स्थान:</strong> भारत</p> <p style="text-align: justify;"><strong>प्राप्ति स्थान:</strong> एशिया, प्रशांत द्वीपसमूह, हवाई (अमेरिका)</p> <p style="text-align: justify;"><strong>भारत में:</strong> तटवर्ती क्षेत्र, दक्षिण और मध्य भारत।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>जलवायु और मिट्टी की आवश्यकताएँ </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">नम, उष्ण, सालाना वर्षा 750-2500 मि.मी., 1 डिग्री सें. से 48 डिग्री सें. तक का तापमान, 1000 मी. तक ऊँचाई। जललग्नता, पाला और सूखे की स्थितियां सहन नहीं करता।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>संवर्धन की विधि और बीज-उपचार </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">कलमों या बीजों से लगाया जाता है। उपजाऊ मिट्टी में सीधी बुवाई की जा सकती है। बीज-उपचार आवश्यक नहीं। काटने पर अच्छा पुनर्विकास होता है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>बढ़वार और उपज </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">मध्यम आकार का पर्णपाती, 15 मी. ऊँचा, सीधा तना, तने का व्यास 25-50 सें.मी. और आधी सीधी बढ़वार की प्रवृति। तेजी से बढ़ता है और तीसरे साल से फल देना शुरू करता है।</p> <p style="text-align: justify;">लकड़ी का विशिष्ट घनत्व 0, 3-0, 4 नरम, जल्दी टूटने वाली, अच्छा ईंधन नहीं। कोमल पत्तियों, फूलों और कच्चे फलों की सब्जी बनाई जाती है। पत्तियों को पशु खाते है। फूल शहद का स्रोत हैं। कृषि वानिकी के लिए यह अति उत्तम किस्म है। मिट्टी के कटाव की रोकथाम करता है। सहजन की फलियों से अच्छी आमदनी होती है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>कीट-व्याधियां:</strong> कुछ कीटों के लार्वा पत्तियाँ चट कर जाते है और कलियों को हानि पहुँचाते हैं।</p> <h3>सिजीजियम क्यूमिनाई (जामुन)</h3> <p style="text-align: justify;"><strong>कुल:</strong> मिरटासी</p> <p style="text-align: justify;"><strong>सामान्य नाम:</strong> जामुन</p> <p style="text-align: justify;"><strong>मूल स्थान: भारत </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;"><strong>प्राप्ति स्थान:</strong> श्रीलंका, फिलिपीन, वेस्ट इंडीज, फ्लोरीडा और हवाई (अमेरिका), मध्य अमेरिका, आस्ट्रेलिया, भारत, पाकिस्तान।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>भारत में:</strong> पूरे देश में</p> <p style="text-align: justify;"><strong>जलवायु और मिट्टी की आवश्यकताएँ </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">नम, उष्ण और उपोष्ण, सालाना वर्षा 1200 मि.मी. से अधिक, 1800 मी.तक की ऊँचाई पर। अधिक ठंडी जगहों में नहीं पनपता। बलुई, चूने वाली, क्षारीय, कुछ-कुछ अम्लीय मिट्टियों में उगता है। बड़े पेड़ लम्बे समय तक बाढ़ और सूखी की स्थितियां सह सकता है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>संवर्धन की विधि और बीज-उपचार </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">सीधी बुआई या नर्सरी में तैयार की गई पौध से उगाया जता है। जड़ वाली कलमें, वायवीय दाब कलम और आँख वाली पौध को भी लगाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन ऐसा खेतों में व्यावहारिक नहीं है। बीज-उपचार आवश्यक नहीं है। काटने पर अच्छा पुनर्विकास होता है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>बढ़वार और उपज </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">बड़ा सीधा पेड़, 30 मी. ऊँचा, सीधा तना, तने का व्यास 1 मी. तक, फैलाव की प्रवृति। दो साल में पौधा 4 मी. ऊँचा हो जाता है। बायोमास के आंकड़े उपलब्ध नहीं है। 7-8 साल बाद फल देना शुरू करता है।</p> <p style="text-align: justify;">लकड़ी का विशिष्ट घनत्व 0.77 और कैलोरी मान 4800 कि. कैलोरी प्रति कि.ग्रा. । ईंधन, कोयले, निर्माण के लिए लकड़ी, कृषि के औजारों और नौका बनाने के लिए अत्युत्तम है। फल खाए जाते है। छाल में 13-19 प्रतिशत टेनिन होता है जिसे रंगाई के लिए इस्तेमाल किया जाता है। फूल शहद के उत्तम स्रोत है पत्तियों को पशु खाते हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>कीट-व्याधियां:</strong> शल्क (स्केल) कीट, सफेद मक्खी और पत्ती भक्षक सुंडी पत्तियों पर हमले करती है।</p> <h3>टेमेरिंड्स इंडिका (इमली)</h3> <p style="text-align: justify;"><strong>कुल:</strong> लेग्यूमिनोसी (उपकुल: केसल पिनोइडी)</p> <p style="text-align: justify;"><strong>सामान्य नाम:</strong> इमली</p> <p style="text-align: justify;"><strong>मूल स्थान:</strong> उष्ण कटिबन्धीय अफ्रीका</p> <p style="text-align: justify;"><strong>प्राप्ति स्थान:</strong> पश्चिम अफ्रीका, कास्टारीका, प्योरटो रीको, उष्णकटिबन्धीय एशिया।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>भारत:</strong> पूरे देश में।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>जलवायु और मिट्टी की आवश्यकताएँ </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">अर्ध शुष्क, नम, उष्ण, सालाना वर्षा 500-2500 मि.मी., 00 सें. से 460 सें. तक तापमान, समुद्र तल से 1000 मी. तक की ऊँचाई। बड़े पेड़ सूखे और तेज हवाओं के प्रतिरोधी। तरह-तरह की मिट्टियों में उग सकता जिनमें कंकरीली, चट्टानी, बलुई, गहरी चिकनी, अम्लीय, क्षारीय मिट्टियाँ शामिल हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>संवर्धन की विधि और बीज-उपचार </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">सीधी बुवाई या नर्सरी में तैयार की गई पौधों से उग सकता है। बीज-उपचार आवश्यक नहीं। लेकिन अच्छे अंकुरण के लिए बीजों को बुआई से पहले रात भर पानी में भिगोये रखना चाहिए। वातावरण से नाइट्रोजन नहीं खींचता। नये-नये ठूंठों पर अच्छी कोंपलें फूटती हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>बढ़वार और उपज </strong></p> <p style="text-align: justify;">बड़ा, सदाबहार, 30 मी. ऊँचा, सीधा तना, तने से शाखाएं निकलती है। तने का व्यास 100 सें.मी. और अधिक फैलाव वाली प्रवृति। पौध काफी तेजी से बढ़ती है और पहले साल के अंत तक 1 मी. ऊँचा होता है। 8-10 साल की उम्र में वृक्ष फल देना शुरू कर देते हैं। वृक्ष 200 साल तक फल देता है। बायोमास के अनुमानित आंकड़े उपलब्ध नहीं है।</p> <p style="text-align: justify;">लकड़ी का विशिष्ट घनत्व 0.91-1.28, भारी होती है। निर्माण, खराद, फर्नीचर और ईंधन के लिए उत्तम। पेड़ से हर साल 150-200 कि.ग्रा. फल या प्रति हैक्टर प्रति वर्ष लगभग 12-16 मीट्रिक टन फल मिलते है। इमली का गूदा खाने में चटनी आदि के लिए प्रयुक्त होता है। बीज मवेशी खाते है और औद्योगिक, मांड (स्टार्च) के काम आते हैं। पशु पत्तों को खाते हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>कीट-व्याधियां </strong></p> <p style="text-align: justify;">कुछ कीटों के लार्वा फलियों पर हमला करते है। कुछ कीट टहनियों से रस चूसते है। इसकी मुख्य बीमारियाँ हैं: सैपरौट (रस सड़न) और व्हाइट रौट (श्वेत विगलन) लेकिन कोई विशेष समस्या नहीं है।</p> <h3>जिजिफस मौरीटियाना (बेर)</h3> <p style="text-align: justify;"><strong>कुल:</strong> रहैमनेसी</p> <p style="text-align: justify;"><strong>सामान्य नाम:</strong> इंडियन जुजुबे, बेर</p> <p style="text-align: justify;"><strong>मूल स्थान:</strong> दक्षिण एशिया</p> <p style="text-align: justify;"><strong>प्राप्ति स्थान:</strong> एशिया, आस्ट्रेलिया, वेस्टइंडीज, उष्ण कटिबन्धीय अमेरिका तथा अफ्रीका।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>भारत में:</strong> पूरे देश में।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>जलवायु और मिट्टी की आवश्यकताएँ </strong></p> <p style="text-align: justify;">शुष्क, उष्ण, उपोष्ण क्षेत्र जिन में अत्यधिक गरमी और थोड़ा पाला सहन करने की क्षमता हो। सालाना वर्षा 500-2500 मि.मी. । समुद्र तल से 800 मी. तक की ऊँचाई पर। तरह-तरह की मिट्टियों में उगता है। जिनमें समुद्र की रेतीली, कंकरीली, चिकनी, लवणीय क्षारीय और सूखी मिट्टियाँ शामिल हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>संवर्धन की विधि और बीज उपचार </strong></p> <p style="text-align: justify;">सीधे बीज से बुआई या नर्सरी में तैयार की गई पौध से। कलमी या आँख वाली पौध भी व्यावसायिक स्तर पर फल पैदा करने के लिए इस्तेमाल की जाती है। पौध से निकलने वाली नई कोंपल काटकर नई जाति की कलम लगाई जाती है। इस तकनीक को ‘टाप वर्किग’ कहते है। बीज-उपचार की आवश्यकता नहीं है। लेकिन अच्छे अंकुरण के लिए बीजों को सावधानीपूर्वक तोड़ा जा सकता है लेकिन ध्यान रहे कि अंदर की गिरी को क्षति न पहुंचे। काटने पर अच्छी कोंपलें फूटती हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>बढ़वार और उपज </strong></p> <p style="text-align: justify;">मध्यम आकार, कंटीला पेड़, 12 मी. ऊँचा, टेढ़ी टहनियों वाला तना, तने का व्यास 30 सें.मी. और आधी सीधी बढ़वार की प्रवृति। कुछ किस्में तेजी से बढ़ती हैं। पाँच साल में 3-5 मी. तक ऊँची हो जाती है और फल देना शुरू कर देती हैं। बायोमास के आंकड़े उपलब्ध नही हैं।</p> <p style="text-align: justify;">लकड़ी का विशिष्ट घनत्व 0.93 और कैलोरी मान 4900 किलो. कैलोरी प्रति किलोग्राम। ईंधन, कोयला, कृषि औजारों और आम प्रयोग के लिए अच्छी लकड़ी। फलों को ताजा या सुखा कर खाया जाता है। पशु पत्तियाँ खाते हैं। इसके पेड़ों पर टसर के कीड़े और लाख के कीड़े पाले जा सकते हैं। बाड़ों के लिए भी लगाए जाते हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>कीट-व्याधियां </strong></p> <p style="text-align: justify;">पत्ती भक्षक सुंडियां और फलछेदक कीड़े हानि पहुँचाते हैं। फलछेदक कीड़ों से बचाव के लिए कीटनाशी रसायन का छिड़काव आवश्यक है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>स्रोत: भारतीय कृषि उद्योग संस्थान</strong></p> </div>