<div id="MiddleColumn_internal"> <h3>परिचय</h3> <p style="text-align: justify;"><a href="../../../../../../agriculture/crop-production/91593e93094d92f92a94d93092393e93293f92f94b902-91593e-938902915941932/91493792794092f-92a94c92794b902-915940-916947924940/सफेद-मूसली">सफेद मूसली</a> को मानव मात्र के लिए प्रकृति द्वारा प्रद्दत अमूल्य उपहार कहा जाए तो शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी। या औषधीय पौधा प्राकृतिक रूप से हमारे देश के जंगलों में पाया जाता है, परन्तु अंधाधुंध तथा अपरिपक्व विदोहन के कारण अब यह पौधा लुप्त होने की कगार पर है तथा यही कारण है कि अब इसकी विधिवत खेती करने की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ है सौभाग्यवश इसकी खेती करने की दिशा में किये गये प्रयोग न केवल अत्यधिक सफल रहे हैं बल्कि व्यवसायिक रूप से इसकी खेती अविश्वसनीय रूप से लाभकारी भी पाई गई है।</p> <p style="text-align: justify;">सफेद मूसली एक कंदयुक्त पौधा होता है जिसकी अधिकतम उंचाई डेढ़ फीट तक होती है तथा इसकी कुंदिल जड़े (जिन्हें कंद अथवा फिंगर्स कहा जा सकता है) जमीन में अधिकतम 10 इंच तक नीचे जाती है।</p> <p style="text-align: justify;">यूं तो मुसली की विभिन्न प्रजातियां पायी जाती हैं जैसे- क्लोरोफाइटम, बोरिवीलिएनम, क्लोराफाइटम ट्यूबरोजम, क्लोरोफाइटम, रुन्डीनेशियम, क्लोरोफाइटम एटेनुएटम, क्लोरोफाइटम ब्रीवि-स्केपम आदि| अधिकांशतः क्लोरोफाइटम बोरिवीलिएनम की ही खेती की जाती है।</p> <p style="text-align: justify;">मूलतः यह एक ऐसी जड़ी-बूटी मानी गई है जिसमें किसी भी प्रकार की तथा किसी भी कारण से आई शारीरिक शिथिलता को दूर करने की क्षमता पाई गई है।</p> <p style="text-align: justify;">इसके अतिरिक्त इससे माताओं का दूध बढ़ाने, प्रसवोपरांत होने वाली बीमारियों तथा शिथिलता को दूर करने तथा मधुमेह आदि जैसे अनेकों रोगों के निवारण हेतु भी दवाईयां बनाई जाती हैं। जिसके कारण या एक उच्च मूल्य जड़ी-बूटी बन गई है तथा भारत के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी प्रचुर मांग है।</p> <p style="text-align: justify;">क्योंकि मूसली मूलतः एक कंद है जिसकी बढ़ोत्तरी जमीन के अंदर होती है अतः इसकी खेती के लिए प्रयुक्त की जानेवाली जमीन नर्म होनी चाहिए। वैसे अच्छी जल निकासी वाली रेतीली दोमट मिट्टी जिसमें जीवाश्म की पर्याप्त मात्रा उपस्थित हो, इसकी खेती के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। भूमि ज्यादा नर्म (पोली) भी नहीं होनी चाहिए। अन्यथा कंद की फिंगर्स पतली रह जाएंगी जिससे इसका उत्पादन प्रभावित होगा।</p> <h3 style="text-align: justify;">फसल के लिए पानी की आवश्यकता</h3> <p style="text-align: justify;">मूसली की अच्छी फसल के लिए पानी की काफी आवश्यकता होती है। यूँ तो जून माह में लगाएं जाने के कारण जून-जुलाई-अगस्त के महीनों में प्राकृतिक बरसात होने के कारण इन महीनों में कृत्रिम रूप से सिंचाई करने की आवश्यकता नहीं होती, फिर भी यह ध्यान दिया जाना आवश्यक है कि जब तक फसल उखाड़ न ली जाए तब तक भूमि गीली रहनी चाहिए। अतः बरसात के उपरान्त लगभग प्रत्येक 10 दिन के अंतराल पर खेत में पानी देना उपयुक्त होगा।</p> <p style="text-align: justify;">पौधों के पत्ते सुखकर झड़ जाने के उपरांत भी जब तक कंद खेत में हों, हल्की-हल्की सिंचाई प्रत्येक दस दिन में करते रहना चाहिए। जिससे भूमिगत कंदों की विधिवत बढ़ोत्तरी होती रहे।</p> <h4 style="text-align: justify;">गोबर अथवा कम्पोस्ट खाद</h4> <p style="text-align: justify;">गोबर की खाद अथवा कम्पोस्ट खाद मूसली की फसल के लिए अत्यधिक उपयोगी रही है है। अच्छी फसल के लिए प्रति एकड़ 5 से 10 ट्रोली अच्छी पकी हुई गोबर की खाद डाला जाना उपयुक्त रहता है। गोबर की खाद खेत को तैयार करते समय बिजाई से पूर्व डाली जानी चाहिए तथा खेत में अच्छी तरह मिला दी जानी चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">रासायनिक खाद</h4> <p style="text-align: justify;">जहाँ तक संभव हो इसका उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">हरी खाद अथवा ग्रीन मैन्युर</h4> <p style="text-align: justify;">जनवरी-फरवरी माह में मूसली के कंदों की खुदाई के उपरांत अगली फसल (मई-जून) तक खेत खाली रहता है। ऐसे समय खेत में अल्पविधि वाली कोई फसल जैसे सन, बरु अथवा धतुरा उगा लिया जाना चाहिए तथा मई-जून में खेत की तैयारी करते समय इस फसल में हल चलाकर इसे खेत में ही मिला दिया जाना चाहिए। इस प्रकार की हरी खाद डालने के काफी अच्छे परिणाम देखे गये हैं।</p> <h4 style="text-align: justify;">हड्डी खाद</h4> <p style="text-align: justify;">प्रायः कंदयुक्त फसलों के लिए हड्डी खाद काफी लाभकारी सिद्ध हुई है। इस सन्दर्भ में अल हिलाल ग्रुप, 386, प्लाउन रोड, महू, जिला- इंदौर( मध्य प्रदेश) द्वारा तैयार की गिया ‘गोल्डन’ हड्डी खाद के काफी उत्साहवर्धक परिणाम देखने को मिले हैं।</p> <h4 style="text-align: justify;">सॉयल कंडीशनर</h4> <p style="text-align: justify;">जिस खेत में मूसली की खेती लेनी हो, वहां यदि सॉयल कंडिशनर का उपयोग किया जाए तो एक तो उस्ससे भूमि नर्म हो जाती है दूसरे इससे उपज में भी वृद्धि होती देखी गई है।</p> <h3 style="text-align: justify;">खेती की तैयारी</h3> <p style="text-align: justify;">मूसली की फसल के लिए खेत की तैयारी करने के लिए सर्वप्रथम खेत में गहरा हल चला दिया जाता है। यदि खेत में ग्रीन मैन्युर के लिए पहले से कोई अल्पविधि वाली फसल उगाई गई हो तो उसे काटकर खेत में डालकर मिला दिया जाता है। तदुपरान्त इस खेत में गोबर की पकी हुई खाद 5 से 10 ट्राली प्रति एकड़ भुरक कर इसे खेत में मिला दिया जाता है। इसके उपरांत एक बार पुनः गहरी जुताई कर दी जाती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">बेड्स बनाना</h3> <p style="text-align: justify;">मूसली की अच्छी फसल के लिए खेत में बेड्स बनाये जाना आवश्यक होता है। इस सन्दर्भ में 3 से 3.5 फीट चौड़े सामान्य खेत से कम से कम 6 इंच से 1.5 फीट ऊँचे रेजड बेड्स बना दिए जाते हैं। इनके साथ-साथ पानी के उचित निकास हेतु नालियों की पर्याप्त व्यवस्था की जाती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">मूसली की बिजाई हेतु प्रयुक्त होने वाला बीज अथवा प्लांटिंग मेटेरियल</h3> <p style="text-align: justify;">मूसली की बिजाई इसके घनकंदों अथवा ट्यूबर्स अथवा फिंगर्स से की जाती है। बीज के लिए ट्यूबर्स अथवा फिंगर्स के साथ पौधे के डिस्क अथवा क्राउन का कुछ भाग अवश्य साथ में लगा रहे अन्यथा पौधे के उगने में परेशानी सा सकती है इसके साथ-साथ प्रयुक्त किये जाने वाले ट्यूबर अथवा फिंगर का छिलका भी क्षतिग्रस्त नहीं होना चाहिए। प्रायः एक ट्यूबर (बीज) का वजन 0.5 ग्राम से 20 ग्राम तक हो सकता है परन्तु अच्छी फसल की प्राप्ति हेतु ध्यान रखना चाहिए कि प्रायः ट्यूबर 5 ग्राम से 10 ग्राम तक के वजन का हो।</p> <h3 style="text-align: justify;">क्या बीजों से भी मूसली की बिजाई की जा सकती है?</h3> <p style="text-align: justify;">बीजों से मुसली के पौधे तैयार करने की दिशा में भी शोध कार्य चल रहे हैं परन्तु अभी इस क्षेत्र में ज्यादा सफलता प्राप्त नहीं हो पाई है।</p> <h4 style="text-align: justify;">प्लांटिंग मेटेरियल की मात्रा</h4> <p style="text-align: justify;">मुसली की बिजाई हेतु 5 से 10 ग्राम वजन की क्राउनयुक्त फिंगर्स सर्वाधिक उपयुक्त रहेंगी जिनका 6x6 की दुरी पर रोपण किया जाता है। एक एकड़ के क्षेत्र में अधिकतम 80,000 बीज (क्राउनयुक्त फिंगर्स) लेगें जिनमें से कुछ बीज 2 ग्राम के भी हो सकते हैं, कुछ 3 ग्राम के , कुछ 3.5 ग्राम के, कुछ 3.5 ग्राम के अथवा कुछ 10 ग्राम के । इस प्रकार एक एकड़ के क्षेत्र हेतु लगभग 4 से किंवटल प्लांटिंग मेटेरियल की आवश्कयता होगी।</p> <h4 style="text-align: justify;">बिजाई स एपुव प्लांटिंग मेटेरियल का ट्रीटमेंट</h4> <p style="text-align: justify;">लगाए जानेवाले पौधे रोगमुक्त रहें तथा इनके नीचे किसी प्रकार की बीमारी आदि न लगे इसके लिए प्लांटिंग मेटेरियल को लगाने से पूर्व 2 मिनट तक बाबस्टीन के घोल में अथवा एक घंटा गौमूत्र में डुबोकर रखा जाना चाहिए जिसे ये रोगयुक्त हो जाते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">बिजाई की विधि</h3> <p style="text-align: justify;">खेती की तैयारी करने के उपरान्त 3 से 3.5 फीट चौड़े, जमीन से 1.1) फीट ऊँचे बैड बना लिये जाते हैं। बरसात प्रारंभ होते ही (15 जून के लगभग) इन बैड्स में लकड़ी की सहायता से ( जोकि इस कार्य हेतु विशेष रूप से बनाई जा सकती है) कतार से कतार तथा पौधे 6x6 इंच की दुरी रखते हए छेदकर लिए जाते हैं। छेद करने के पूर्व यह देखना आवश्यक है कि हाल में बारिश हुई हो अथवा उसमें पानी दिया गया हो। (जमीन गीली होनी चाहिए) इस प्रकार एक बैड में छः कतारे बन जाती हैं। फिर इस प्रत्येक छेद में हाथ से एक-एक डिस्क युक्त अथवा क्राउनयुक्त फिंगर अथवा सपूर्ण पौधे का रोपण कर दिया जाता है। रोपण करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि फिंगर जमीन में 1 इंच से ज्यादा गहरी न जाए।</p> <h3 style="text-align: justify;">पौधों का उगना तथा बढ़ना</h3> <p style="text-align: justify;">बिजाई के कुछ दिनों के उपरान्त ही पौधा उगने लगता है तथा इसमें पत्ते आने लगते हैं। इसी बीच फूल तथा बीज आते हैं तथा अक्तूबर-नवम्बर माह में पत्ते अपने आप सुखकर गिर जाते हैं और पौधे के कंद जमीन के नीचे रहजाते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">मूसली की फसल में होने वाली प्रमुख बीमारियाँ तथा प्राकृतिक आपदाएं</h3> <p style="text-align: justify;">मूसली की फसल में प्रायः कोई विशेष बीमारी नहीं देखी गई है अतः इसमें किसी प्रकार एक कीटनाशकों का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं होती। यदि पानी के उचित निकास की व्यवस्था न हो तथा पौधे की जड़ों के पास पानी ज्यादा दिन तक खड़ा रहे, तो पैदावार पर प्रभाव पड़ सकता है तथा कदं पतले हो सकते हैं। वैसे यह पौधा किसी प्रकार की बीमारी अथवा प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव से लगभग मुक्त है।</p> <h3 style="text-align: justify;">जमीन से पौधों/कंदों को उखाड़ना</h3> <p style="text-align: justify;">पत्तों के सुखकर गिर जाएं के उपरांत भी एक-दो-महीने तक के लिये कंदों को जमीन में ही रहने दिया जाना चाहिए तथा पत्तों के सुख जाने के उपरांत भी खेत में हल्का-हल्का पानी का छिड़काव करते रहना चाहिए। प्रारंभ में (कच्चे) कंदों का रंग सफेदी लिए हुए होता है जो कि धीरे- धीरे भूरा होने लगता है। जमीन में जब कंद पूर्णतया पक जाते हैं। तो इनका गहरा-भूरा हो जाता है। अतः जब कंदों का रंग गहरा-भूरा हो जाए तो कुदाली की सहायता से एक-दुसरे कंदों को निकला जा सकता है। प्रायः कदं निकालने का कार्य मार्च-अप्रैल माह में किया जाता है। कंदों को निकालने का कार्य हाथ से ही (ट्रैक्टर आदि से नहीं) करना चाहिए जिससे सभी कंद बिना क्राउन से अलग हुए निकाले जा सकें, तथा जिन कंदों का उपोग बीज (प्लानिंग मेटेरियल) बनाने हेतु करना हो, वे बीज के रूप में प्रयुक्त किये जा सकें तथा जिनको तोड़कर, छीलकर तथा सुखाकर सुखी मुसली के रूप में बेचा जाना हो, उन्हें बिक्री हेतु प्रयुक्त किया जा सके।</p> <h3 style="text-align: justify;">कंदों की धुलाई</h3> <p style="text-align: justify;">जमीन से कंद उखाड़ने पर उनके साथ मिट्टी आदि लगी रहती है अतः छीलने से पूर्व उन्हें धोया जाना आवश्यक होता है।</p> <p style="text-align: justify;">मूसली के कंदों की छिलाई</p> <p style="text-align: justify;">जिन कंदों का बीज (प्लानिंग मेटेरियल) हेतु करना हो, उन्हें छोड़कर शेष मुसली को विपणन हेतु भिजवाने से पूर्व उसके कंदों/ट्यूबर्स/फिंगर्स की छिलाई करना अथवा उनका छिलका उतारना अत्यावश्यक होता है ताकि छिलका उतारने पर यह अच्छी तरह से सुख जाने तथा इसे बिक्री हेतु प्रस्तुत किया जा सके।</p> <h3 style="text-align: justify;">किसे कहेंगे अच्छी गुणवत्ता की मूसली</h3> <ul style="text-align: justify;"> <li>जो छिलने तथा सूखने पर पूर्णतया सफेद रहे।</li> <li>जिसके सूखने पर अपेक्षाकृत ज्यादा उत्पादन मिले।</li> <li>जिसमें किसी प्राकर के काले/भूरे धब्बे न हों।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">छिली हुई मूसली को सुखाना</h3> <p style="text-align: justify;">छीलने के उपरान्त छिली हुई मूसली को सुखाया जाता है ताकि उसमें उपस्थित नमी पूर्णतया सुख जाए। ऐसा प्रायः छिली हुई मूसली को धूप में डालकर किया जाता है। प्रायः दो-तीन दिन तक खूली धुप में रखने से मूसली में उपस्थित नमी पूर्णतया सुख जाती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">मूसली की पैकिंग</h3> <p style="text-align: justify;">सुखी हुई मूसली की विपणन हेतु प्रस्तुत करने से पूर्व उसकी विधिवत पैकिंग की जाती है। यह पैकिंग प्रायः पौलिथिन में की जाती है ताकि यह सुरक्षित रह सके तथा इस पर किसी प्रकार से नमी आयद का प्रभाव न पड़े।</p> <h3 style="text-align: justify;">मूसली के खेती के लिए बीजों/प्लाटिंग मेटेरियल की प्राप्ति</h3> <p style="text-align: justify;">मूसली के उत्कृष्ठ बीजों/प्लाटिंग मेटेरियल की प्राप्ति हेतु श्री अनुराग त्रिपाठी/रमाशंकर त्रिपाठी, मन दंतेश्वरी हर्बल प्रोडक्ड्स प्रा० लि० (इलेक्ट्रोनिक टेलीफोन एक्सचेंज के सामने), कोंडागाँव, जिला बस्तर (मध्यप्रदेश)</p> <h3 style="text-align: justify;">मूसली का उत्पादन तथा इसकी खेती ए अनुमानित लाभ</h3> <p style="text-align: justify;">प्रायः एक एकड़ के क्षेत्र लगभग 2100 किलोग्राम मूसली प्राप्त होगी जो कि छीलने तथा सूखने के उपरान्त लगभग 4 किवंटल रह जाएगी। इसके अतिरिक्त इमसें एक एकड़ की बिजाई हेतु प्लांटिंग मेटेरियल भी बच जाएगा। यदि वर्तमान बाजार मूल्य (जो कि 1000 रूपये से 1700 रूपये प्रति किलोग्राम तक है) के अनुसार देखा जाए तो इस 4 किवंटल सुखी मूसली की औसतन 5 लाख रूपये की प्राप्तियां होंगी।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत एवं सामग्रीदाता: <a class="external_link ext-link-icon external-link" title="नए विंडोज में खुलने वाली अन्य वेबसाइट लिंक" href="https://agri.jharkhand.gov.in/" target="_blank" rel="noopener"> कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार </a></p> </div>