अश्वगंधा अश्वगंधा एक बहुमूल्य औषधीय पौधा है, जिसकी मोटी एवं मूसलाधार जड़ों का उपयोग किया जाता है। इसकी जड़ों में निकोटिन, सोमनीफेरीन, सोमनीविदानीन, विदानीनाइन आदि एलकोलाईड पाए जाते हैं। यह एक छोटा (लगभग 2-3 फीट का) पौधा होता है। तने रोयेंदार, हल्के हरे तथा जड़ें मोटी एवं मूसलाधार होती है। यह बलवर्धक है। गठिया के दर्द, जोड़ों की सुजन, पक्षाघात, रक्तचाप, स्त्री रोग एवं स्नायु रोग के उपचार में इसे काम में लाया जाता है। इसकी पत्तियां मोटापा कम करें, त्वचा रोग, सूजन एवं घावों को भरने के काम में आती है। झारखण्ड में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। मिट्टी एवं जलवायु अश्वगंधा एक पिछात बरसात की फसल है। इसके लिए सूखा मौसम होना चाहिए तथा जाड़े में एक दो पानी होने जड़ों का विकास अच्छा होता है। बलुई दोमट मिट्टी, जिसका पीएच 7.0.-8.0 हो, में जड़ों का विकास बढ़िया होता है। खेत की तैयारी, बीज एवं बुआई गर्मी के मौसम में खेत की जुताई दो बार करें। बीज की बुआई जुलाई के प्रथम सप्ताह से अगस्त के प्रथम सप्ताह तक करें। बीजों की जोते हुए खेतों में छिटकर या पंक्तियों में बुआई की जाती है। अंतिम जुताई में गोबर की सड़ी खाद मिला दें। ऊपरी जमीन में गर्मियों में जुताई के समय चूना दें। एक हेक्टेयर खेत के लिए 5-7 दिन बाद बीजों का अंकुरण होता है। अंकुरण के 10-15 दिन बाद पौधों को थिरलीकरण करें। निकाई-गुड़ाई एवं सिंचाई एकाध निकाई-गुड़ाई करने से जड़े अच्छी बढ़ती है। साधारणतः इसमें सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। फसल कटाई जुलाई में बोई गई फसल नवम्बर में फूलने लगती है। जड़ें 150-180 दिन पर उखाड़ने लायक हो जाई है। जड़ों को एकत्र करने के लिए पौधों को जड़ों सहित उखाड़ लें और अच्छी तरह साफ कर 8-10 सेमी. के टुकड़ों में काट लें एवं सूखा लें ज्यादा व्यास वाली अच्छी एंव कम व्यास वाली निम्न कोटि की मानी जाती है। बीमारियाँ एवं उपचार बीज गलन: बीज बोने के बाद पानी पड़ जाने से बीज गलन हो जाता है बीजें को डायथेन एम्-45 से उपचारित करें। पत्र गलत: इंडोफिल एम् 45 का 0.25% घोल का छिड़काव करें। उपज एवं आर्थिक लाभ: उपज 10-12 किवंटल प्रति हेक्टेयर सुखी जड़ बिक्री दर 50-60 रूपये प्रति किलो कुल आय 50000 -70000 रूपये प्रति हेक्टेयर कुल खर्च 25000 -30000 रूपये प्रति हेक्टेयर शुद्ध लाभ 25000 -40000 रूपये प्रति हेक्टेयर ब्राही औषधीय पौधों में ब्राही का एक प्रमुख स्थान है। चरक-संहिता एंव आयुर्वेद में यह बहुत पहले से ही दमा, जोड़ों का दर्द, मानसिक शक्ति बढाने, याददाश्त, बुखार एवं अन्य बीमारियों में उपयोग किया जाता है। इसे ज्यादातर जगंलों से ही इक्कठा किया जाता है, जिसमें भिन्नता पाई जाती ही। हाल के वर्षों में इसकी मांग बढ़ने के कारण इसकी खेती पर ध्यान दिया जाने लगा है। झारखण्ड के विभिन्न इलाकों में इसे सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है। इसके पूरे पौधों का उपयोग किया जात है। बाजार में इसके सूखे पौधों की कीमत 100 रूपये किलो मिल जाती है। इसमें बिकोसाइड- ए पाया जाता हो। मिट्टी ब्राही कई तरह की मिट्टियों में उगाया जा सकता है। नमी वाले खेतों में भी सफलतापूर्वक उगाते हैं। कम उपजाऊ वाले क्षेत्रों में बरसात में इसकी खेती की जा सकती है। खेत की तैयारी खेतों की अच्छी तरह जुताई कर घास-पात हटा दें। गोबर की सड़ी खाद प्रति हेक्टेयर 100 किवंटल की दर से देकर मिला दें। पौधों को लगाने से पहले खेतों को पटा देने से पौधे अच्छी तरह लग जाते हैं। पौधों को लगाना पौधों के 4-5 सेंटीमीटर के टुकड़े, जिसमें कई गाठें हों, लगाने के लिए उपयुक्त है। पौधे से पौधे की दूरी 30-40 सेंटीमीटर तथा पंक्ति की दूरी 40-45 सेंटीमीटर होनी चाहिए। पौधों को लगाने के बाद पटा देना चाहिए। बाद में प्रत्येक सप्ताह एक बाद पानी दें। निकाई-गुड़ाई पौधों को लगाने के बाद खेत में प्रथम निकाई-गुड़ाई 20 दिनों पर करें। जब पौधे अच्छी तरह फैल जाते हैं तब निकाई-गुड़ाई की जरूरत नहीं रहती है। सिर्फ कुछ बड़े घास की रह जाते हैं, जिन्हें बाद में निकाला जा सकता अहि। पौधा संरक्षण पत्तियाँ खाने वाले कीड़ों का आक्रमण होने पर नुबान या देमोक्रोन के 0.1% घोल का छिड़काव करें। पौधों की कटाई मार्च-अप्रैल के महीने में लगाने पर गर्मी में पौधों का बढ़ाव अधिक जोत है और जून के महीने में काटने लायक हो जाता है। बरसात के समय लगाने से प्रथम कटाई अक्तुबर –नबम्बर में होती है। बाद में कटाई करने से बेकोसाइड की मात्रा घट जाई है। पौधों को काटते समय जड से 5 सेंटीमीटर उपर काटा जाता है ताकि फिर नये पौधे निकल सकें। कटाई उपरांत प्रबन्धन पौधों को कटाई के बाद छाया में सूखाना चाहिए। सूखाने के लिए ड्रायर में आधे घंटे तक 80 सेंटीग्रेड पर रखें फिर बाद में छाया में सूखाएं। अच्छी तरह सूखाने गये पौधा मिलता है। इस तरह कुल उपज 100-150 किवंटल तक हो जाती है। विभिन्न मदों में खर्च प्रति हेक्टेयर खेत की जुताई, पाटा देना एवं क्यारी बनाना 2500रूपये कम्पोस्ट एवं नीम खली 400 रूपये पौधे की कटिंग एवं रोपाई 1000 रूपये सिंचाई (लगाने से पहले एवं बाद में) 600 रूपये निकाई-गुड़ाई 4500 रूपये कटाई (२ बार) 300 रूपये सूखाना एवं पैकिंग 10000 रूपये पौधा संरक्षण 1000 रूपये अन्य 45000 रूपये कुल खर्च 45000 रूपये सर्पगंधा सर्पगंधा या छोटी चाँद, जिसे अंग्रेजी में राऊलिफ्या सर्पटाईना कहते हैं, एपो काइनेसी कुल का पौधा है। यह झाड़ीदार पौधा है पर इस कुल के कुछ पौधे पेड़ों की तरह हो जाते हैं। इस पौधे की जड़ से सर्पेंटाईन नामक दवा निकाली जाती है, इसकी जड़ें मुसलादार होती है और जमीन के अंदर से सर्पटाईना के अलावे रेस्पेरिन, अजमेलिल, सेशाजेमलीन एवं रोलुम्बिन भी निकाले जाते हैं। औषधीय उपयोग यहाँ की पुरानी पुस्तकों में इस पौधे का वर्णन आता है। यह रक्तचाप, स्त्रीरोग, पागलपन दूर करने, निद्रा लाने, सांप काटने, दस्त , पेचिस, हैजा, सिरदर्द एवं नेत्र रोग में काम आता है। गांवों में औरतें इस पौधे की जड़ की मांग देश के अंदर एवं विदेशों में काफी बढ़ गई है। जलवायु हमारे देश के प्रायः सभी भागों जैसे- आसाम, मेघालय, शिमला, देहरादून, सिक्कम, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, बिहार एवं झारखण्ड में यह पौधा पाया जाता है। इसे नम गर्म जलवायु तथा खुले या बागानों में भी उगाया जा सकता है। मिट्टी सर्पगंधा की जड़ों की समुचित वृद्धि के लिए दोमट या बलुई मिट्टी अच्छी है। चिकनी मिट्टी में इसकी जड़ें नहीं बढ़ती। मिट्टी हल्की क्षारीय होनी चाहिए। प्रसारण एवं बीज दर छोटी चाँद का प्रसारण बीजों, तने या जड़ों की कलमों द्वारा किया जाता है। बीजों को तैयार होने पौधशाला में वर्षा शुरू होने पर मई-जून महीने में बोया जाता है। इसी तरह से जून के महीने में तने 15-20 सेंटीमीटर के टुकड़े काटकर पौधशाला में लगाये जाते हैं। जड़े आने पर खेतों में लगाते हैं। जड़ की भी 3-5 सेंटीमीटर कलम काटकर एक सेंटीमीटर छोड़कर गड्ढे में लगाकर ढँक दिया जाता है। 3 सप्ताह बाद कल्ले निकलने पर खेतों में लगाया जाता है। बीज दर प्रति हेक्टेयर 100 किलो होगी। बीजों को बोने के पहले 24 घंटे फुला लें। नर्सरी में 25-30 सेंटीमीटर की दूरी पर 2 सेंटीमीटर गहरे कुड में 2.5 सेंटीमीटर की दूरी पर गिराएं। बिचड़े दो महीने में तैयार हो जाते हैं। खेत की तैयारी, रोपाई एवं खाद की मात्रा इसकी खेती के लिए मई महीने में खेत को जोत दें। वर्षा होने पर गोबर की सड़ी खाद 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर देकर मिला दें। साथ ही लगाते समय 45 किलो नाइट्रोजन, 45 किलो फास्फोरस अतः 25 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर दें। नाइट्रोजन की यही मात्रा (45 किलो) दो बार अक्तूबर एवं मार्च में दें। बिचड़े 10-12 सेंटीमीटर के होने पर लगाने लायक हो जाते हैं। बीजों से तैयार बिचड़े या कलमों को 45ग 30 सेमी. या 35ग सेमी, की दूरी पर लगाकर पटा दें। पानी की कमी होने पर समय-समय पर पटा दें। निकाई-गुडाई पौधों को लगाने के बाद खरीफ में दो बार फिर जाड़े में एक बार खरपतवार निकाल दें। सिंचाई की सुविधा होने पर सिंचाई करें। कटाई एवं उपज सर्पगंधा डेढ़- दो साल का होने पर उखाड़ा जाता है। उस समय मूल जड़ 0.5 से 1.0 मीटर जमीन के नीचे चला जाता है। इसे उखाड़ने का सबसे अच्छा समय जाड़े का है। उस समय जड़ों में एल्केलाईड की मात्रा ज्यादा रहती है। जड़ों को छोड़ देने से ढाई साल पर उपज ज्यादा मिलती है। पौधों की जड़ों को उखाड़कर 12-15 सेमी. के टुकड़े का सूखा लें तथा वायुरिक्त ड्रमों में रखें। उपज: 1000 किलो (डेढ़ साल में) 2000 किलो (ढाई साल में) बिक्री दर- 70/रूपये प्रति किलो कुल आमदनी: 2500-40000- रूपये प्रति हेक्टेयर लाभ 4500-100000- रूपये प्रति हेक्टेयर इसके अलावे 5-15 किलो बीज भी मिल जाते हैं तथा पौधे की कटिंग भी तैयार हो जाती है। रजनीगन्धा व्यावसायिक तौर पर उगाये जाने वाले फूलों की फसलों में रजनीगन्धा का महत्वपूर्ण स्थान है। इसके फूल सफेद और सुगंधित होते हैं जो मन को मुग्ध कर लेते हैं। रजनीगन्धा के कटे फूल (डंठलयुक्त फूल या फ्लावर), गुलदस्ता बनाने, मेज, इंटेरियर (भीतरी) पुष्प सज्जा के लिए मुख्य रूप से प्रयोग किये जाते हैं। इसके अलावा बिना डंठल के पुष्प का गजरा और वेणी बनाने तथा सुगंधित तेल तैयार करें के लिए उपयोग किया जाता है। फूलों की बढ़ती मांग एवं व्यवसाय के कारण छोटानागपुर के पठारी भाग में भी रजनीगंधा की खेती की जाने लगी है। रजनीगन्धा की सफल खेती के लिए यह क्षेत्र उपयुक्त जलवायु प्रदान करता है। अतः उत्पादकों को इसकी खेती से सम्बन्ध कुछ वैज्ञानिक भी आवश्यक है। भूमि एवं खेती की तैयारी रजनीगन्धा की फसल की हर तरह की मिट्टी में उगाया जा सकता है, परन्तु बलुई दोमट या सिल्टी दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है। यह ध्यान देना आवश्यक है की खेत छायादार जगह न हो अर्थात जहाँ सूर्य का पूर्णरूपेण प्रकाश मिलता हो तथा जल निकास का उचित प्रबंध हो, वहीं इसकी खेती की जाए। खेत का चुनाव करें के बाद उसे एक बार मिट्टी पलटनेवाले हल से तथा 2-3 बार देशी हल से जुताई करके पाटा चलाकर मिट्टी की भुरभुरी बना दें तथा समतल कर दें। चूँकि, यह कंद वालों फसल है इसलिए कंद के समुचित विकास के लिए खेती की तैयारी ठीक ढंग से होनी चाहिए। अंतिम जुताई के समय ही खेत में कम्पोस्ट या गोबर की अच्छी सड़ी खाद मिला देते हैं। किस्मों का चुनाव फूल के आकार प्रकार तथा बनावट के अनुसार रजनीगन्धा की किस्मों को चार वर्गों में बांटा गया है- 1. सिंगल-सफेद रंग के फूल एवं पंखुड़ियों की केवल एक पंक्ति, २. डबल-सफेद, पंखुड़ियाँ में तथा सिरा हल्का गुलाबी, 3. हाफ डबल या अर्ध डबल-सफेद रंग एवं पंखुड़ियों की २-4 पंक्ति, 4. वेरीगेटेड- पंखुड़ियों के एक पंक्ति परन्तु पत्तियों के आकर्षक रगं एवं विभिन्नता के कारण दो प्रकार –स्वर्ण रेखा, रजत रेखा। सिंगल किस्म के फूल लगभग सभी मौसम में पुर्णतः खिल जाते हैं और इसके फूल सुगंधित होते हैं। सिंगल किस्म के फूलों के नाम उगाये जाने वाले जगहों के नाम पर रखे गये हैं, जैसे कलकत्ता सिंगल, कोयम्बटूर सिंगल, बंगलोर सिगल, मेसिक्कन सिंगल इत्यादि। इसके अलावा एक किस्म है सुहासिनीं। डबल में जो किस्में उपलब्ध है उनमें हर श्रृंगार मुख्य है। कन्दों की रोपाई छोटानागपुर के पठारी भागों में रजनीगन्धा के कंद रोपने का उपयुक्त समय अप्रैल-मई है, किन्तु सिंचाई की व्यवस्था न होने पर जून-जुलाई में भी कंदों की रोपाई की जा सकती है। 2 सेमी. व्यास या इससे बड़े आकार वाले कदं का चुनाव रोपाई के लिए करना चाहिए। किस्म तथा पश्ल की अवधि (एक दो या तीन वर्ष) के अनुसार 1-3 कंदों को प्रत्येक स्थान पर लगाना चाहिए। सिंगल रजनीगन्धा फूल के किस्म को यदि केवल एक वर्ष के लिए लगाना है, तो प्रत्येक स्थान पर तीन कदों की रोपाई करें, इससे उपज अधिक प्राप्त होती है। परन्तु एक वर्ष से ज्यादा समय की फसल लेनी हो तो 1-2 कंदों की रोपाई प्रति स्थान करें। डबल किस्म के कंद की एक वर्ष के लिए रोपाई प्रतिस्थान दो कदं तथा एक वर्ष से अधिक समय के लिए एक कदं की रोपाई करें। सिंगल किस्मों के कदं फसल की अवधि के अनुसार 15-30x 5-30 सेमी. (पंक्ति एवं पौधा) की दूरी पर, जबकि डबल किस्म के कंदों को 20x20 सेमी, या 25x25 सेमी. (पंक्ति एवं पौधा)पर रोपाई करना उत्तम होता है। कंदों को लगभग 5 सेमी. गहराई पर रोपना चाहिए। खाद एवं उर्वरक इसकी खेती के लिए खाद एवं उर्वरक की भरपूर मात्रा में आवश्यकता पड़ती है। खाद एवं उर्वरक में 250-300 किवंटल कम्पोस्ट या गोबर की अच्छी सड़ी खाद के अलावे 10-120 किग्रा. नाइट्रोजन (225-250 किग्रा.यूरिया), 80-100 किग्रा. फास्फोरस (350-450 किग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट) की मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से खेती में डालना चाहिए। नाइट्रोजन की मात्रा को तीन बार (30, 60, एवं 90-100 दिन पर) किस्तों में डालना चाहिए, जबकि कम्पोस्ट, फास्फोरस एवं पोटेशियम की पूरी मात्रा के कदं रोपने के समय देना चाहिए। सिंचाई एवं निराई-गुडाई कदं रोपने के बाद जमीन में पर्याप्त नमी आवश्यक है। बरसात के मौसम में नमी नहीं रहने पर, जबकि गर्मी में 4-6 के अंतर पर एवं शरद ऋतु में 7-8 दिन के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए। सही मात्रा में एवं सही समय पर सिंचाई करने से फूल की उपज में संतोषजनक वृद्धि होती है। खेत में खरपतवार दिखाई देते ही निराई-गुडाई करनी चाहिए, इससे मिट्टी ढीली होती है तथा कंद एवं जड़ों का विकास सही होता है। फूल/स्पाईक की तुड़ाई कदं रोपने के 60-70 दिन बाद स्पाइक निकलना प्रारंभ हो जाता है। स्पाईक निकालने के बाद से फूल खिलने में लगभग 25-30 दिन लगते हैं प्रत्येक कदं से 1-3 स्पाईक तक प्राप्त होते हैं। स्पाईक 90-10 सेमी, लंबे तथा 20-25 फूलों वाले होते हैं। डबल किस्म के स्पाइक लगभग 75-100 सेंमी, लंबे होते हैं जिससे 40-50 तक फूल प्राप्त होते हैं। अतः व्यावसायिक उत्पादन के लिए सिंगल किस्म अधिक उपयुक्त होते हैं। स्त्रोत एवं सामग्रीदाता : समेति, कृषि विभाग , झारखण्ड सरकार