मूंगफली छोटानागपुर एवं संथालपरगना क्षेत्र के लिए खरीफ तिलहनी फसल के रूप में इसकी संभावना बहुत ही प्रबल है। इस क्षेत्र की मिट्टी एवं जलवायु मूंगफली की खेती के लिए बड़ी ही उपयुक्त है। किसान भी मूंगफली की खेती के महत्व एवं लाभों को समझ चुके हैं,इसलिए इसकी लोकप्रियता इस क्षेत्र में और अधिक बढ़ने की संभावना है, जैसा की मूंगफली की खेती के अंतर्गत लगातार बढ़ रहे क्षेत्र को देखने से पता चलता है। पठारी क्षेत्रों में ऊपरी भूमि, जिसमें धान,रागी एवं अन्य लघु–मोटे अनाजों की खेती की जाती है, में मूंगफली की खेती वर्षा पर आधारित स्थिति में अधिक लाभ के साथ की जा सकती है। इसकी खेती शुद्ध फसल के रूप में की जा सकती है या इसे अरहर के साथ अंतरवर्ती फसल के रूप में भी लिया जा सकता है। ९० से. मी. की दूरी पर अरहर की दो कतारों को लगातार इसकी अंतरवर्ती फसल लेना किसानों में प्रचलित हुआ है। मूंगफली की उत्पादक (टन/हे.) इस क्षेत्र में राष्ट्रीय औसत उत्पादकता से थोड़ी अधिक ही है,परन्तु इसमें और वृद्धि की सम्भानाएँ हैं। मूंगफली के ए.के. १२-१४ प्रभेद जो स्पेन की एक पारंपरिक झाड़ीदार किस्म है,से लगभग १० क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज की प्रप्ति होती है जिसकी जगह अगर बिरसा मूंगफली-१ या बी.जी.-२ या बी.जी.-३ की खेती की जाये तो लगभग २५ क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज की प्राप्ती हो सकती है। उत्पादन तकनीक प्रभेद अगात – (१००-११५ दिन ) ए.के. १२-२४, बी.जी.-१ तथा फूले प्रगति। उपज क्षमता १५-२० क्विंटल प्रति हेक्टेयर । मध्य अगात (११२-१२० दिन ) बिरसा मूंगफली -१, बिरसा मूंगफली-२, बिरसा मूंगफली ३, बी.जी.-२ तथा बी.जी.-३ उपज क्षमता १८-२४ क्विंटल प्रति हेक्टेयर । भूमि का चुनाव हल्की बलुही दोमट मिट्टी, अच्छी जल निकास सुविधा एवं कार्बनिक पदार्थों से युक्त । ६.५ से ७.० पी.एच. वाली मिट्टियाँ मूंगफली की खेती के लिए सर्वोत्तम हैं। भूमि की तैयारी ३-४ जुताई, जो १०-१५ से.मी. गहराई पर हल या बिहार हल द्वारा की गयी हो। जहां तक संभव हो सके खर पतवार के नियंत्रण हेतु गर्मी के मौसम में जुताई करनी चाहिए।अंतिम जुताई के बाद पाट्टा चला देना चाहिए। बुआई का समय १५ जून से २५ जून तक बुआई का समुचित समय।परन्तु ए.के. १२-२४ किस्म की बुआई के समय को जुलाई के प्रथम सप्ताह तक बढाया जा सकता है, क्योंकि यह प्रभेद शीघ्र तैयार होती है।बी.जी. प्रभेदों की बुआई २५ जून तक अवश्य कर लेनी चाहिए जिससे कि हर हालत में फसल हथिया नक्षत्र में होने वाली वर्षा के तुरन्त बाद कटनी के लिए तैयार हो जाये। बीज दर एवं बुआई ए.के. १२-२४ प्रभेद के लिए ८०-८५ किलोग्राम दाना प्रति हेक्टेयर तथा बी.जी. प्रभेदों के लिए १००-११० किलोग्राम दाना प्रति हेक्टेयर। पंक्ति की दूरी ३० से.मी. तथा पौधे से पौधे कि दूरी १५ से.मी.। खाद एवं उर्वरक बुआई से १०-१५ दिन पूर्व कम्पोस्ट या गोबर कि सड़ी खाद २५ क्विंटल प्रति हेक्टेयर कि दर से डालकर मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। बुआई के समय ५० किलोग्राम यूरिया, २ क्विंटल सिंगल सुपर फास्फेट तथा ३५ किलोग्राम म्युरित आफ पोटाश प्रति हेक्टेयर कि दर से देना चाहिए। अम्लीय मिट्टी में २५ क्विंटल प्रति हेक्टेयर कि दर से चुना का व्यवहार ४-५ वर्षों में एक बार करना चाहिए। अंतिम जुताई के समय दीमक से बचाव के लिए एल्ड्रिन धूल ५% का व्यवहार करना चाहिए। बी.एच. सी. व्यवहार कभी नहीं करना चाहिए। बीजोपचार बिजजनित बीमारियों के नियंत्रण हेतु बीजों का उपचार कैप्टान या बैविस्तिन नमक कवकनाशी दवा २ ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से करना चाहिए। कवकनाशी दवाओं का प्रयोग राइजोबियम कल्वर के प्रयोग से ४-५ दिन पूर्व कर देना चाहिए। राइजोबियम कल्वर राइजोबियम कल्वर से बीजोपचार करने पर नेत्रजनीय उर्वरकों की आवश्यकता ४०% तक घट जाती है। इसका व्यवहार बुआई के तुरन्त पहले करना चाहिए। खरपतवार नियंत्रण एवं अन्त्रकर्षण बुआई के बाद २ दिन तक टोक इ-२५ नामक खरपतवारनाशी दवा का ४ लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने पर लगभग ३-४ सप्ताह तक खरपतवारों पर रोक लगाई जा सकती है। जब पौधों में ३-४ पतिया निकल आए तब १५ दिनों के अन्तराल पर १-२ बार निकाई करना श्रेयस्कर होता है। परन्तु पेगिंग प्रारम्भ होने के बाद निकाई नहीं करना चाहिए। पौधा संरक्षण बीमारियां-तिक्कालिफ स्पॉट नियंत्रण :- परिस्थिति के अनुसार २-३ सप्ताह के अन्तराल पर बोडो मिक्सचर ( ४:४:५०) या डायथेन ऍम – ४५ (०.२%) या ब्लैताक्स (०.२५%) या बैविस्तिन दवा का २-३ छिड़काव करने पर रोग नियंत्रित हो जाता है। रस्ट नियंत्रण :- यह बीमारी अब कोई खास समस्या नहीं रह गई है, परन्तु अगर प्रकोप अधिक हो जाता है तो इसके भयंकर परिणाम होते हैं। इसके नियंत्रण हेतु कवकनाशी दवाओ से बीजोपचार करना चाहिए। दैएथेन्न ऍम -४५ (०.२%) का छिड़काव करने से पौधे आक्रान्त नहीं होते। किट व्याधियां इस फसल में मुख्य रूप से भुआ पिल्लू का प्रकोप होता है। प्रारम्भिक अवस्था में शिशु कीट झुण्ड में पत्तों पर पाए जाते हैं। प्रौढ़ अवस्था में ये पत्तियां बड़ी तेजी से झरने लगती हैं। इसके नियंत्रण के निम्नलिखित उपाय हैं: १) प्रौढ़ कीटों को हाथ से चुनकर उन्हें नष्ट करना। २) २-३ सप्ताह के अन्तराल पर इंडोसल्फान (१२०० मि. ली.) या नुवान (३०० मी. ली.) दवा को सैन्दोविच या टिपाल (४०० मि. ली.) के साथ मिलाकर २-३ बार छिड़काव करना चाहिए। कटनी एवं भण्डारण ए.के. १२-२४ प्रभेद की कटाई १००-१०५ दिनों के बाद तथा बी.जी. -१ प्रभेद ११२-११५ दिनों के बाद तथा बी.जी. २ एवं बी.जी. ३ प्रभेदों की कटाई ११७-१२० दिनों के बाद करनी चाहिए। फसल की खुदाई एवं पौधों से फलियों को अलग करने के बाद ८-१० दिनों तक धूप में अच्छी तरह से सुखा लेने के बाद ही मूंगफली का भंडारण करना चाहिए। स्रोत: बिहार पठारी विकास परियोजना कृषि विकास कार्यक्रम, तेलहन फसलों की वर्षाश्रित खेती ऐसे कीजिए मूंगफली की खेती