फसलों में समेकित खरपतवार प्रबन्धन कृष्णा प्रसाद, रविकांत आर. उपासनी एवं ए.एन. पूरन खरपतवार फसलों से तीव्र प्रतिस्पर्धा करके भूमि में निहित नमी एवं पोषक तत्वों के अधिकांश भाग को शोषित कर लेते हैं, फलस्वरूप फसल की विकास गति धीमी पड़ जाती है तथा पैदावार कम हो जाती है। खरपतवारों की रोकथाम से न केवल फसलों की पैदावार बढ़ाई जा सकती है, बल्कि उसमें निहित प्रोटीन, तेल की मात्रा एवं फसलों की गुणवत्ता में वृद्धि की जा सकती है। विभिन्न फसलों में उगने वाले खरपतवारों को मुख्यतः तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है, जिनका वर्णन सारणी-1 में दिया गया है। सारणी-1, खरीफ फसलों में उगने वाले प्रमुख खरपतवार खरपतवारों की श्रेणी वैज्ञानिक नाम साधारण नाम सकरी पत्ती वाले खरपतवार Brachiaria ramosa Cenchrus cilliaris Cynodon dactylon Dactyloctenium aegyplium Digitaria sanguinalis Echinochloa colonum Echinochloa crusgalli Echinochloa glabresence Eleusine indica Leptochloa filiformis Polygonum barbatum Saccharum spontaneum Setaria glauca Setaria verticillate Sorghum halapnse सिंगनल घास अंजन घास/धामन दूबघास मकड़ा घास क्रैब घास सावक सामाघास/वर्नयारड ग्रास बहुवर्षीयसामा घास माँण्डला/जंगली मडुआ सिनर घास पोलीगोनम काँस/टाइगर घास बनरा-बनरी बजरा बरू/जंगली ज्वार/ जाँनसन घास चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार मोथा कुल के खरपतवार Acanthospermum hispidum Ageratum conyzoides Amaranthus blitum/viridis Boerhavia diffusa Celosia argentea Cleome viscose/icosandra Commelina nudiflora Corchours tridens Cucumis callosus Eclipta protrata Euphorbia hirta Hedyotis corymbosa Heliotropium marilifolium le Leucas aspera Phyllanthus Niruri Physalis Minima Trianthema Portulacastrum Tridax Procumbens Xanthium Strumarium Cyperus Esculantus Cyperus Iria Cyperus Rotundus बुटीकांटा महकुआँ चौलाई बिसखपरा/रक्तपुननर्वा/ बेंगसाग सफेदमूर्ग हुर-हुर हुर-हुर कनकवा जंगली जूट काचरी भांगरा बड़ी दूधी दमनपपड़ा चिमटी घास गुमा हजारदाना/भूआवला बनमकोय पत्थर चट्टा कोटा बटन/ टुनकी आधासीसी/बोखरु मोथा मोथा मोथा/नटग्रास खरपतवारों की रोकथाम यदि हम फसल उत्पादन हेतु उन्नत बीजों तथा रासायनिक खादों का प्रयोग करते हैं, तो समय पर सिंचाई एवं कीड़े-मकोड़े, रोग इत्यादि लगने पर इनकी रोकथाम की ओर तुरन्त ध्यान दें। खरपतवारों को यदि उचित समय पर प्रभावी, नियंत्रण नहीं करते हैं तो अधिकाधिक उत्पाद प्राप्त करने के लक्ष्य के लिये हमारे द्वारा उपरोक्त उपाय निरर्थक सिद्ध हो जाते हैं। किसान खरपतवारों को तब तक बढ़ने देते हैं, जब तक कि वह हाथ से पकड़कर उखाड़ने योग्य न हो जाए, लेकिन उस समय तक फसलों को वे काफी नुकसान कर चुके होते हैं। फसलों के पौधे अपनी प्रारंभिक अवस्था में खरपतवारों से मुकाबला नहीं कर पाते हैं। अतः फसलों को शुरू से ही खरपतवार रहित रखना आवश्यक हो जाता है एवं खरपतवारों पर प्रभावी नियंत्रण पाकर फसल को होने वाली क्षति से बचाया जाना चाहिए। फसलों में खरपतवारों की रोकथाम निम्नलिखित तरीकों से की जा सकती है। शुद्ध और साफ बीज का प्रयोगः बुआई के समय शुद्ध और साफ बीज का प्रयोग करके खरपतवारों में हो रही वृद्धि को रोका जा सकता है। हाथ से निकाई-गुडाईः यह खरपतवारों पर नियंत्रण पाने की सरल व प्रभावपूर्ण तथा उत्तम विधि है। फसलों की आरंभिक अवस्था बुआई के 15-45 दिन के मध्य का समय खरपतवारों से प्रतियोगिता की दृष्टि से क्रांतीक समय है। परिणामस्वरूप, आरंभिक अवस्था में ही फसलों को खरपतवार से मुक्त करना फसल के लिए अधिक लाभदायक होता है। बुआई के 20 दिनों के बाद ही खुरपी या डच हो से पहली निकाई करके खेत को खरपतवार रहित करना आवश्यक होता है जिससे खरपतवारों पर प्रभावी नियंत्रण किया जा सके। गहरी जुताई द्वाराः यदि गर्मी के दिनों में खेतों की गहरी जुताई करके छोड़ दिया जाए तो खरपतवारों के बीज व कंद जमीन के उपर आ जाते हैं तथा तेज धूप में अपनी अंकुरण क्षमता खोकर निष्क्रिय हो जाते हैं। इस विधि से कीटों एवं बीमारियों का प्रकोप भी काफी कम हो जाता है। खरपतवारों को नष्ट करने की यह पद्धति वहाँ अपनाई जा सकती है, जहाँ गर्मी में कोई भी फसल न ली जाती हो। गुड़ाई (होइंग) के द्वाराः हाथ से चलने वाले गुड़ाई यंत्र (डच हो या ग्रबर) से खरपतवारों को काफी सीमा तक नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन यह विधि भी अपनाई जा सकती है जहाँ फसलों को पंक्तियों में ही बोया गया हो। खरपतवारनाशक रसायनों के प्रयोग द्वाराः फसलों में खरपतवारनाशी रसायनों का प्रयोग करके भी खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है। जहाँ समय कम एवं श्रमिक तथा पारिश्रमिक ज्यादा हो उसकी तुलना में इस विधि को अपनाने से प्रति हेक्टेयर लागत कम आती है। समय की भी बचत होती है। इस विधि को अपनाने से श्रम शक्ति भी कम लगती है तथा मुख्य दलहनी व मिलवां फसलों में उगने वाले खरपतवारों को नष्ट करने हेतु कुछ खरपतवारनाशी रासायनों को उनकी मात्रा के साथ नीचे वर्णित किया गया है। सारणी 2- विभिन्न फसलों में प्रयोग किये जाने वाले खरपतवारनाशी रासायन फसलें खरपतवारनाशी रासायन मात्रा (कि.ग्रा. सक्रिय तत्व/ हेक्टेयर) प्रयोग का समय मूंग अरहर उरद मूंगफली मकई धान गेहूँ प्याज आलू सरसों एवं तिसी कुसुम चारा,मसुर एवं भिन्डी मटर,लहसुन,मूली, धनिया,टमाटर,गाजर फ्लुक्लोरालिन एलाक्लोर पेन्डीमेथालिन मेटोलाक्लोर एट्राजिन व्यूटाक्लोर आइसोप्रोटुरॉन +2,4 - डी. ऑक्सीफ्लारफेन मेट्रीब्यूजिन आइसोप्रोटुरॉन पेन्डीमेथालिन पेन्डीमेथालिन फ्लुक्लोरालिन 1.0 1.0 1.0 1.0 1.5 1.0 1.0+0.5 0.2 0.4 1.0 0.75 1.0 1.0 बुवाई के पहले छिड़क कर भूमि में मिला दें. बुवाई के बाद परन्तु अंकुरण से पूर्व. -तदैव- -तदैव- -तदैव- -तदैव- बुआई करने के 25-30 दिनों के बाद रोपा करने के 10-15 दिनों के अन्दर बुआई करने के बाद, परन्तु अंकुरण से पूर्व. -तदैव- -तदैव- -तदैव- -तदैव- कैसे करें बासमती धान की खड़ी फसल का प्रबंधन कार्य सूचना प्रदाता बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, काँके, राँची- 834006 दूरभाष- 0651 2450610, फैक्स- 0651 -2451011/ 2450850