<div id="MiddleColumn_internal"> <h3 style="text-align: justify;">भूमिका</h3> <p style="text-align: justify;"><img class="image-right" title="Keet1" src="https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/agriculture/crop-production/91d93e930916902921-915947-93293f90f-90592894193690293893f924-91594393793f-924915928940915/91d93e93091692394d921-92e947902-93892c94d91c940-915948938947-90991793e92f947902/keet3.jpg" alt="Keet1" width="175" height="130" /></p> <p style="text-align: justify;">झारखण्ड राज्य में फूलगोभी, पत्तागोभी, टमाटर, मटर, शिमला मिर्च, फ्रेंचबीन, बैगन, आलू, सेम, कद्दू वर्गीय, करेला इत्यादि प्रमुख सब्जियों की फसलें पैदा की जाती है। जबकि फल वृक्षों में आम, लीची, अमरुद, बेर, कटहल प्रमुख है। इन फसलों एवं पहल वृक्षों में विभिन्न प्रकार की कीड़े-मकोड़े का प्रकोप होता है। क्षति के लक्षण के आधार पर कीड़े-मकोड़े को निम्न रूप से वर्गीकरण किया जा सकता है:</p> <ul> <li style="text-align: justify;">मिट्टी मरण रहकर नुकसान करने वाले कीड़े जैसे दीमक</li> <li style="text-align: justify;">काटकर एवं कुतरकर एवं खाने वाले कीड़े जैसे पिल्लू</li> <li style="text-align: justify;">रस चूसने वाले कीड़े-मकोड़े जैसे लाही, मधुआ, मकड़ी।</li> <li style="text-align: justify;">फलों में छेदकर खाने वाले कीड़े जैसे फलमक्खी।</li> <li style="text-align: justify;">तना एवं टहनियों में छेद करने वाले कीड़े-तना छेदक</li> <li style="text-align: justify;">पत्तियों में सुरंग बनाने वाले कीड़े जैसे पर्ण सुरंग</li> </ul> <p style="text-align: justify;">अंधाधुंध रसायनिक कीतनाशी के व्यवहार करने से विभिन्न प्रकार की समस्याएं पैदा हो रही हैं:</p> <ul style="text-align: justify;"> <li>पर्यावरण दूषित होना</li> <li>कीड़े-मकोड़े में रासायनिक कीटनाशी के प्रति सहनशीलता का विकास होना</li> <li>खाद्य पदार्थों एवं खास करके साग-सब्जियों में रासायनिक कीटनाशी का अवशेष पाया जाना</li> <li>मित्र कीड़ों जीव-जन्तुओं का विनाश होना</li> <li>नगण्य कीड़ों के प्रमुख कीड़ों में बलदना</li> <li>उत्पादन लागत में वृद्धि होना</li> </ul> <p style="text-align: justify;">उपयुक्त समस्याओं पर काबू पाने के लिए <a href="../../../../../../agriculture/crop-production/91d93e930916902921-915947-93293f90f-90592894193690293893f924-91594393793f-924915928940915/91d93e93091692394d921-92e947902-91594393793f-92a94d93093893e930-915947-92893594092892492e-924915928940915/93892e94791593f924-91594091f-92a94d93092c92894d927928">समेकित कीट प्रबन्धन</a> की तकनीक को अपनाना जरूरी है। समेकित कीट प्रंबधन एक तकनीक है जिसमें सभी मौजूद नियंत्रण विधियों को (खेतों की गहरी जुताई से लेकर घर में अनाज को सही तरीका से रखने तक) ऐसा प्रबंध किया जाता है, ताकि दुश्मन कीड़े-मकोड़े की संख्या आर्थिक क्षतिस्तर से नीचे रहे तथा मित्र जीव-जंतुओं का कम से कम नुकसान हो एवं पर्यावरण भी सुरक्षित रहे।</p> <p style="text-align: justify;">समेकित कीट प्रबन्धन को सफल बनाने के लिए निम्न तकनीक को अपनाने की आवश्यकता है:</p> <ul style="text-align: justify;"> <li>खेतों की गहरी जुताई</li> <li>खरपतवार एवं घास इत्यादि को नष्ट करना</li> <li>खेतों में संतुलित उर्वरक एंव खल्ली तथा चूना का व्यवहार करना।</li> <li>उन्नत एवं प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग</li> <li>फसल चक्र अपनाना</li> <li>उचित समय पर सिंचाई की व्यवस्था एवं अधिक जल का उचित निकास</li> <li>अन्तः फसल एवं मिश्रित खेती को बढ़ावा देना</li> <li>फंदा फसल को समुचित प्रयोग करके कीड़ो की संख्या को कम करना</li> <li>चिड़ियों को आधार प्रदान करना।</li> <li>परजीवी एवं परभक्षी कीड़ों को बढ़ावा देना</li> <li>घरेलू चीजों से कीटनाशी तैयार करना</li> <li>जैविक कीटनाशी का व्यवहार</li> <li>आवश्कतानुसार सुरक्षित कीट नाशी का उचित मात्रा एवं उचित समय पर व्यवहार करना।</li> </ul> <p style="text-align: justify;"><strong>क) दीमक से बचाव के उपाय</strong></p> <p style="text-align: justify;">फसलों को दीमक से सुरक्षा के लिए खेतों की गहरी जुताई के साथ-साथ पौधों की जड़ें, खुटीयां, डंठल इत्यादि को चुनकर जला दें।</p> <ul style="text-align: justify;"> <li>खेतों में सड़ा हुआ गोबर, कम्पोस्ट, नीम या करंज की खल्ली का व्यवहार करना चाहिए।</li> <li>क्लोरपारीफास 20 ई.सी. से बीजोपचारित करके बीज को लगाने से दीमक का नियत्रण होता है।</li> <li>सिंचाई करने से भी दीमक के प्रकोप को कम किया जाता है।</li> </ul> <p style="text-align: justify;"><strong>ख) काटकर एवं कुतरकर खाने वाले कीड़े</strong></p> <ul style="text-align: justify;"> <li>बड़े पिल्लू जैसे भुआ पिल्लू, आराममक्खी का पिल्लू, सेमीलुपर चना का फली छेदक का पिल्लू, गोभी की तितली, एपीलेकना भृंग कीड़ों को चुनकर नष्ट कर देना चाहिए।</li> <li>खेतों में चिड़ियों को बैठने के लिए खुटियां गाड़ने से भी पिल्लू को नियंत्रित किया जा सकता अहि।</li> <li>प्रकाश प्रपंच एवं फेरोमोंन प्रपंच के द्वारा भी वयस्क कीटों को नियंत्रित किया जा सकता है।</li> <li>नीम निर्मित कीटनाशी के व्यवहार से कीड़ों का नियंत्रण संभव है।</li> <li>जैविक कीटनाशी (बीटी, वायरस निर्मित) के द्वारा भी पिल्लू ( लार्वा) को नियंत्रित किया जा सकता है।</li> </ul> <p style="text-align: justify;"><strong>ग) रस चूसने वाले कीड़े-मकोड़े</strong></p> <ul style="text-align: justify;"> <li>नीम सीड करनल एक्सट्रैक्स (5%), नीम निर्मित कीटनाशी (अचूक, निमोरिन) के व्यवहार से कीटो को नियंत्रित किया जा सकता है।</li> <li>खैनी के डंठल से निर्मित कीटनाशी व्यवहार से भी लाही, मधुआ, श्वेतमक्खी को नियंत्रित किया जा सकता है।</li> <li>आवश्कतानुसार मिथाएल डीमेटोन, डायमथोयट तरल का छिड़काव करना चाहिए।</li> <li>इमिडाक्लोप्रीड का छिड़काव (3 मिली,/10 लीटर पानी) अधिक कारगर होता है।</li> </ul> <p style="text-align: justify;">अंतः फसल का प्रयोग</p> <p style="text-align: justify;">निम्नलिखित अंतः फसल का प्रयोग से मुख्य फसल में कीड़ों के प्रकोप को नियंत्रित किया जा सकता है।</p> <p style="text-align: justify;">गोभी+मटर,धनियाँ, गेंदा का फूल</p> <h3>फलमक्खी का प्रंबधन</h3> <p style="text-align: justify;">चारा बेट का प्रयोग</p> <ul style="text-align: justify;"> <li>एक लीटर पानी में 100 ग्राम गुड या चीनी का घोल में 20 मिली, मालाथियोन 50 ई.सी मिलाते हैं। इस मिश्रण को चौड़ी मुहं वाले बर्तन में रखने से वयस्क मक्खी इसे खाने के लिए आकर्षित होते हैं एवं मारे जाते हैं।</li> <li>दस लीटर पानी में 100 ग्राम चीनी या गुड एवं 10 मिली, मालाथियोन 50 ई.सी के गोल बनाकर छिड़काव करने से वयस्क मक्खी को नियंत्रित किया जाता है।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">घर में कीटनाशी बनाने के तरीके</h3> <ul style="text-align: justify;"> <li>नीम बीज से</li> <li>एक किलोग्राम नीम बीज चूर्ण+30 लीटर पानी</li> <li>रातभर भिंगाने के बाद घांटते हैं।</li> <li>कपड़ा से छानकर 20 ग्राम कपड़े धोने वाले साबुन का घोल मिलाकर छिड़काव करते हैं।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">गोमूत्र</h3> <ul style="text-align: justify;"> <li>5.0 किलोग्रा ताजा गोबर 5.0 लीटर गोमूत्र+5.0 लीटर पानी।</li> <li>चार दिन सड़ने के बाद कपड़ा से छान लेते हैं।</li> <li>छानने के बाद 100 ग्राम चूना मिलाकर 68 लीटर पानी मिलाते हैं।</li> </ul> <h3>खैनी के डंठल से</h3> <ul style="text-align: justify;"> <li>किलोग्राम खैनी के डंठल के चूर्ण+10 लीटर पानी</li> <li>मिश्रण को खौलने के बाद ठंडा करने के लिए आग से नीचे उतार देते हैं।</li> <li>ठंडा होने पर घोल को छान लेते हैं।</li> <li>छाना हुआ घोल में 10 ग्राम साबुन का घोल मिलाते हिन्। इस घोल 85-90 लीटर पानी मिलकर छिड़काव करते हैं।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">हरा मिर्चा+लहसुन से</h3> <ul style="text-align: justify;"> <li>3 किलोग्राम हरा-तीता मिर्चा</li> <li>डंठल अलग कर देते हैं।</li> <li>महीन बनाकर 10 लिटर पानी में मिलाकर रातभर छोड़ देते हैं।</li> <li>आधा किलोग्राम लहसुन+250 मिली. किरासन तेल ( रातभर भींगा रहता है)</li> <li>दोनों घोल अच्छी तरह मिलाकर सुबह में अलग-अलग छान लेते हैं।</li> <li>सुबह में ही एक लीटर पानी में 75 ग्राम साबुन का घोल बनाए हैं।</li> <li>तीनों घोल को एक साथ मिलाकर दो घंटा स्थिर होने के लिए छोड़ देते हैं, उसके बाद पुनः छान लेते हैं।</li> <li>इस घोल में 70 लीटर पानी मिलाने के बाद ही छिड़काव करते हैं।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">जैविक कीटनाशी द्वारा प्रबन्धन</h3> <ul style="text-align: justify;"> <li>बैक्टीरिया से निर्मित-बी.टी.।</li> <li>वायरस से निर्मित-हेलियोकिल</li> <li>नीम से निर्मित-अचूक, निमेरिन</li> </ul> <p style="text-align: justify;"><strong> स्त्रोत एवं सामग्रीदाता : </strong><a class="ext-link-icon" title="अधिक जानकारी के लिए " href="http://sameti.org/" target="_blank" rel="noopener">समेति, कृषि एवं गन्ना विकास विभाग</a>, झारखण्ड सरकार</p> </div>