आलू आलू सब्जियों में भारत की एक प्रमुख फसल है तथा देश को खाद्य में आत्म – निर्भर बनाने में आलू का महत्वपूर्ण स्थान है। यह शीतोष्ण क्षेत्र की फसल होते हुए आजकल ऊष्ण कटिबंधीय तथा उपोष्ण कटिबंधी क्षेत्रों में भी सफलतापूर्वक उगायी जा रही है। इसकी खेती के लिए भारत की जलवायु विशेष रूप में उपयुक्त है, इसकी फसल कम समय में ही तैयार हो जाती है। इसकी खेती विभिन्न प्रकार फसल चक्रों के अंतर्गत अपनायी जा सकती है। धान्य फसलों की अपेक्षा इसकी प्रति हेक्टर उपज भी अधिक होती है। भारत में खेती के अंतर्गत आने वाली प्रति 100 हेक्टर भूमि में से केवल 2.5 हेक्टर भूमि पर आलू उगाया जाता है। जबकि योरोपीय देशों में आलू का प्रति 100 हेक्टर में 30.5 हेक्टर भूमि पर आलू की फसल उगायी जाती है। भारत में आलू का प्रति व्यक्ति उपभोग लगभग 3.5 किलोग्राम प्रतिवर्ष है, जबकि कुछ पश्चात् देशों में यह मात्रा 136 किलोग्राम से 200 किलोग्राम तक है। भारत का उपयोग संसार में सबसे कम है, अन्य देशों की अपेक्षा भारत में आलू का क्षेत्रफल बहुत कम है। भारत में आलू की खेती कुल 414 ह़जार हेक्टर क्षेत्रफल में होती है। जिसका उत्पादन 640 हजार टन होता है। १.आहार मूल्य आलू के अंदर विटामिन सी अधिक मात्रा पायी जाती है, साथ ही 450 ग्राम उबले आलू से 200 से 500 यूनिट बी - 1 भी प्राप्त होती है। विटामिन बी – 2 की, 450 ग्राम आलू से उतनी ही मात्रा प्राप्त होती है जितनी कि 450 ग्राम गेहूं, मछली या मांस से प्राप्त होती है। साथ ही साथ इसके अंदर 21 ऐसे खनिज अवयव पाये जाते हैं, इनकी शरीर के लिए आवश्यक होती है। यह क्षारीय माध्यम में होने के कारण ऐसे मनुष्यों के भोजन में विशेष महत्व रखता है जो अम्लता से प्रभावित रहते है। इसके अंदर पोटाशियम की मात्रा कम होने के कारण रक्त दाब को कम करने में सहायक होती है। आलू के कुछ अनिवार्य अमीनो, अम्ल जैसे टिप्टोफेन, ल्यूसीन, आइसोल्यूसीन आदि भी यथेष्ट मात्रा में पाये जाते है जो शरीर के लिए लाभदायक होते है। आलू के आहार मूल्य का विश्लेषण (प्रति 100 ग्राम खाने योग्य भाग में) नमी 7.47 ग्राम विटामिन सी. 17 मि. ग्राम प्रोटीन 1.6 ग्राम फास्फोरस 44 मि. ग्राम वसा 0.1 ग्राम लोहा 0.7 मि. ग्राम खनिज पदार्थ 0.6 ग्राम सोडियम 1.9 मि.ग्राम रेशा 0.4 ग्राम पोटेशियम 247 मि. ग्राम अन्य कार्बोहाइड्रेट 22.6 ग्राम कॉपर 02.0 मि. ग्राम कैलोरीज 97 ग्राम सल्फर 37 मि. ग्राम कैल्शियम 10 मि. ग्राम थियामिन 10 मि. ग्राम मैग्नीशियम 20 मि. ग्राम विटामिन 40 आई.यू. अक्जैलिक अम्ल 20 मि. ग्राम क्लोरिन 0.1 मि. ग्राम निकोटिनिक अम्ल 1.2 मि. ग्राम रिबोफ्लेविन 0.01 मि. ग्राम २.बुवाई की प्रक्रिया भूमि – जैविक पदार्थों से भरपूर हल्की दोमट भूमि आलू की खेती के लिए उपयुक्त है। उन्नत किस्म –अगेती किस्म (80-90 दिनों में तैयार होने वाली) कुफरी चन्द्र्मूखी, कुफरी कुबेर मध्यम किस्म – (100 – 110 दिनों में तैयार होने वाली) कुफरी बहार, कुफरी बादशाह, कुफरी ज्योति, कुफरी लालिमा। पछेती किस्म – (120 इससे अधिक दिनों में तैयार होने वाली) कुफरी सिन्दूरी) बीज दर – 8-12 क्विंटल प्रति एकड़। 20-30 ग्राम से कम वजन का कंद नहीं लगाना चाहिए। आलू बोने का समय – 10 अक्टूबर से 10 नवंबर तक। बोने की दूरी – कतार से कतार – 50 सें. मी. कंद से कंद - 20 सें मी. खाद तथा उर्वरक की मात्रा (प्रति एकड़)- गोबर खाद 80-100 क्विंटल यूरिया 100 किलो सिंगल सुपर फास्फेट 240 किलो म्यूरियेट ऑफ पोटाश 60 किलो यूरिया की आधी मात्रा, फास्फेट एवं पोटाश की पूरी मात्रा आलू लगाते समय दें तथा यूरिया की शेष मात्रा मिट्टी चढाते समय दें। ३.सिंचाई – अंकुरण निकलने के समय तथा आवश्यकतानुसार 10-12 दिनों के अंतर पर सिंचाई करें। लेकिन, आलू खोदने के दो सप्ताह पहले सिंचाई बंद कर दें। ४.पौधा संरक्षण – आलू में दो रोग मुख्यत: प्रधान हैं जिससे फसल को नुकसान होता है। (1) अगेती अंगमारी (2) पिछेती अंगमारी। इसकी रोकथाम के लिए इंडोफिल एम. – 45 (2 ग्राम प्रति लीटर पानी में) का छिड़काव पौधा पर 10-15 दिनों के अंतराल पर करें। आलू की फसल को लाही कीड़े से भी बचाना चाहिए ताकि विषाणु रोग का आक्रमण न हो सकें। इसके लिए रोगर या मेटासिस्टक्स (1.5 से 2 मि. ली. लीटर प्रति लीटर पानी में) का छिड़काव करें। ५.खरपतवार तथा उनका नियंत्रण – कुछ मुख्य खरपतवार, जैसे बथुआ, प्याजी और पत्थरचट्टा आदि आलू की फसल को विशेषत: हानि पहुंचाते है। इनकी रोकथाम के लिए खरपतवार नाशक दवा टोक – ई 25 का 6-8 लीटर या लासो 4 लीटर प्रति हैक्टेयर की दर से अंकुरण से पूर्व छिड़काव करना चाहिए। ६.खुदाई और उपज आलू की फसल आमतौर पर 3 से 4 महीनों में तैयार हो जाती है। परंतु यह किस्मों का निर्भर करता है। जब पौधे पीले पड़ जाएँ तथा डंठल सूखने लगे तो 10 दिन पहले भूमि के ऊपर वाले भाग को काट देना चाहिए। ऐसा करने से आलू का छिलका सख्त तो जाता है और जल्दी खराब नहीं होता। कंदों की खुदाई छोटे पैमाने पर फावड़े और बड़े पैमाने पर बैलों या ट्रैक्टर द्वारा की जाती है। खुदाई के बाद कंदों को उनके आकार के अनुसार पृथक करने के बाद सामान्य तापमान पर छायादार कमरों में लगभग एक सप्ताह तक सूखा लेना चाहिए। पृथक करने के बाद सामान्य तापमान पर छायादार कमरों में लगभग एक सप्ताह तक सूखा लेना चाहिए। इससे कंदों में बाह्य वातावरण के प्रतिकूल प्रभावों को बर्दाश्त करने की क्षमता आ जाती है। आलू की औसत उपज 100-150 क्विंटल प्रति एकड़ है। ७.भंडारण इसमें सड़न तथा गलन की क्रिया वातावरण के कुप्रभाव से शीघ्र होने लगती है। इसलिए इसको सुरक्षित रखने के लिए इसका भंडारण शीतगृह में तुरंत कर देने की आवश्यकता पड़ती है। ऐसा विशेषकर मैदानी भागों में जरूरी होता हैं जहाँ आलू की खुदाई के तुरंत बड तापमान बड़ी तेजी के साथ बढ़ता है। इस परिस्थिति। आलू के में इसका उचित भंडारण न की जाने पर कंदों के सड़ने, सिकुड़ने तथा सूखने के कारण काफी क्षति होती है। आलू के भंडारण का सर्वोतम स्थान शीतगृह है। जिन स्थानों पर शीतगृहों की सुविधा न हो, वहां आलू के देशी भंडारों में रखा जा सकता है। इस तरह के देशी भंडार, घास – फूस की छत वाले तथा ठंडे छायादार स्थानों या वृक्षों के नीचे बनाने चाहिए। भंडार के अंदर लकड़ी के रैक में 20-30 सेंटीमीटर मोटी तहों में रेत से ढक कर आलू रखना चाहिए। दिन के समय भंडार के रोशनदानों को बंद रखना चाहिए, जिससे अंदर का तापमान कम रहे तथा रात को कुछ समय के लिए इन्हें खोल देना चाहिए। आवश्यक्तानुसार समय- समय पर सड़ी गली तथा क्षतिग्रस्त कंदों की छंटाई करते रहना चाहिए। शीतगृहों में तापमान और नमी दोनों का प्रमुख स्थान है। इसके लिए 2-4 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान तथा 75 – 80 प्रतिशत आपेक्षित आर्द्रता की आवश्यकता पड़ती है। बैंगन इसका जन्म स्थान भारत ही है, अत: इसकी खेती प्राचीन समय से ही यहाँ की जाती है। इसकी खेती देश के सभी भागों में की जाती है। १.आहार मूल्य प्राय: यह कहा जाता है की बैंगन का आहार मूल्य कम होता है, लेकिन यह गलत है। निम्न सारणी द्वारा स्पष्ट हो जाता है, इसका आहार मूल्य जातियों के अनुसार होता है। बैंगन का उपयोग मधुमेह रोग में किया जाता है। पोषण विश्लेषण (प्रति 100 ग्राम खाने योग्य भाग में) नमी 92.2 ग्राम लोहा 0.9 मि. ग्राम प्रोटीन 1.4 ग्राम सोडियम 3.0 मि. ग्राम चर्बी 0.3 ग्राम पोटाशियम 0.7 मि. ग्राम खनिज पदार्थ 0.3 ग्राम तांबा 0.17 मि. ग्राम रेशा 1.3 ग्राम सल्फर 44.0 मि. ग्राम अन्य कार्बोहाइड्रेटस 4.0 ग्राम क्लोरिन 52.0 मि. ग्राम कैलोरीज 24.0 ग्राम विटामिन ए 124.0 आई यु. कैल्शियम 18.0 मि. ग्राम थियामिन 0.04 मि. ग्राम मैग्नीशियम 16.0 मि. ग्राम रिबोफ्लेविन 0.11 मि. ग्राम अक्जैलिक अम्ल 18.0 मि. ग्राम निकोटिन एसिड 0.0 मि. ग्राम फास्फोरस 47.0 मि. ग्राम विटामिन सी 12.0 मि. ग्राम २.बुवाई की प्रक्रिया भूमि – जैविक पदार्थों से भरपूर दोमट या बलूई दोमट मिट्टी बैंगन की खेती के लिए उपयुक्त होती है। उन्नत किस्में – पूसा पर्पल लांग, पूसा पर्पल राउंड, पूसा पर्पल कलस्टर, पूसा क्रांति, पूसा अनमोल, अर्का नवनीत, स्वर्ण श्री इत्यादी। बीज दर – 200 – 208 ग्राम प्रति एकड़। लगाने की विधि - बैंगन लगाने के लिए बीज को पौधशाला में छोटी – छोटी क्यारियों में बोकर बिचड़ा तैयार करते हैं। जब ये बिचड़े तैयार हो जाते हैं तो उन्हें तैयार किए गए खेतों में लगाते हैं। पौधशाला में बीज गिराने के समय – 1. सितंबर से जनवरी तक फल लेने के लिए बीज पौधशाला में मध्य जून में बीज बोकर एक माह बाद रोपना चाहिए। 2. मार्च से मई तक फल प्राप्त करने के लिए बीज पौधशाला में नवंबर में बो कर अंत दिसबंर या जनवरी के प्रारंभ में रोपना चाहिए। 3. जून से अगस्त तक फल प्राप्त करने के लिए बीज पौधशाला में अप्रैल माह में बोकर एक माह बाद रोपना चाहिए। पौधा रोपने की दूरी - कतार से कतार - 60 सें. मी. से 75 सें. मी. पौधा से पौधा – 45 से 60 सें. मी. खाद की मात्रा (प्रति एकड़) - गोबर की सड़ी खाद – 80 – 100 क्विंटल यूरिया - 100 किलो सिंगल सुपर फास्फेट – 120 – 160 किलो म्यूरिएट ऑफ पोटाश – 40 किलो गोबर खाद, सिंगल सुपर फस्फेट, म्यूरिएट ऑफ पोटाश की पूरी मात्रा तथा यूरिया की आधी मात्रा खेत की तयारी के समय ही देते हैं। यूरिया की बाकी आधी मात्रा टॉप ड्रेसिंग के रूप में निकाई – गुड़ाई तथा मिट्टी चढ़ाते समय देनी चाहिए। ३.सिंचाई – आवश्यकतानुसार 10-12 दिनों पर सिंचाई करें। पौधा संरक्षण बैंगन को एक कीड़ा ‘शीर्ष एवं फल छेदक’ काफी नुकसान पहूँचाता है। इसकी रोकथाम के लिए सर्वप्रथम आक्रांत भाग (शीर्ष एवं फल) को काटकर तथा एक जगह इकट्ठा कर मिट्टी में दबा देना चाहिए। फिर कारबरिल 50% (2 ग्राम प्रति लीटर पानी में) का छिड़काव 15 दिन के अंतर पर 2-3 बार करें। लाही का यदि प्रकोप हो तो रोगर (1 ½ -2 मी. ली. प्रति लीटर पानी में) का छिड़काव करें। बैंगन में एक बीमारी लगती है जिसे ‘फेमोप्सिस ब्लाइट कहते हैं। इस बीमारी से बैंगन का धड़ तथा फल सड़ने लगता है। इसकी रोकथाम के लिए इंडोफिल एम् – 45 (2-2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में) का छिड़काव करें । मूक्ताकेशी तथा स्वर्ण श्री उखटा प्रतिरोधी किस्में हैं। उपज – 80 – 100 क्विंटल प्रति एकड़। टमाटर टमाटर का विशेष आहार मूल्य होने के कारण यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण संरक्षित खाद्य है तथा साथ ही इसकी खेती सभी जगहों पर की जाती है संसार के अंदर आलू और शकरकंद के बाद टमाटर ही सबसे अधिक पैदा की जाने वाली सब्जी है और डिब्बों में भरें वाली सब्जियों में टमाटर का प्रयोग टमाटर सूप सलाद, आचार, टमाटर कैचप, पूरी तथा चटनी आदि पदार्थों के बनाने में किया जाता है।१.आहार मूल्य टमाटर का आहार मूल्य इस प्रकार है। यह आहार मूल्य जाती एवं वातावरण के अनुसार भिन्न होती है। (प्रति 100 ग्राम खाने योग्य भाग में) नमी 91.3 ग्राम विटामिन सी. 31.0 मि. ग्राम प्रोटीन 1.9 ग्राम कैलोरीज 23.0 मि. ग्राम चर्बी 0.1 ग्राम कैल्शियम 20.0 मि. ग्राम खनिज पदार्थ 0.6 ग्राम मैगनीशियम 15.0 मि. ग्राम रेशा 0.7 ग्राम अक्जैलिक एसिड 2.0 मि. ग्राम अन्य कार्बोहाइड्रेटस 3.5 ग्राम फास्फोरस 35.0 मि. ग्राम सोडियम 45.8 ग्राम लोहा 1.8 मि. ग्राम पोटाशियम 114.0 मि. ग्राम विटामिन ए 32.0 आई. यु तांबा 0.19 मि. ग्राम थियामिन 0.07 मि. ग्राम सल्फर 24.0 मि. ग्राम रिबोफ्लेविन 0.01 मि. ग्राम क्लोरिन 38.0 मि. ग्राम निकोटिन एसिड 0.4 मि. ग्राम २.बुवाई की प्रक्रिया भूमि – टमाटर प्राय: सभी प्रकार की मिट्टी में उगाया जाता है, लेकिन अच्छी पैदावार के लिए जैविक पदार्थों से भरपूर दोमट या बलूई दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है। यदि मिट्टी अधिक अम्लीय है तो चूना देना चाहिए। उन्नत किस्में – पूसा रूबी, पूसा अर्ली ड्वार्फ अर्का आलोक, रोमा मार्गलोब, मुरझा प्रतिरोधी किस्म, अर्का आभा एवं अर्का आलोक हैं। (राँची के पठारी भागों में बरसात के मौसम में भी ‘पूसा रूबी’ की खेती की जाती है।) बीज दर – 200-240 ग्राम प्रति एकड़। लगाने की दूरी – टमाटर के बीज को पौधशाला में छोटी- छोटी क्यारियों में बोकर बिचड़ा तैयार करते हैं तथा जब बिचड़े 4-5 सप्ताह के हो जाते हैं तो उन्हें पहले से तैयार तथा खाद दिए गए खेतों में रोपते हैं। पौधशाला में बीज गिराने के समय अगस्त से नवंबर है। पौधा रोपने की दूरी – 50-60 सें. मी. कतार 45 सें. मी. पौधा खाद की मात्रा (प्रति एकड़) – 1. गोबर की सड़ी खाद 80-100 क्विंटल 2. यूरिया 80 किलो 3. सिंगल सुपर फस्फेट 120 – 160 किलो 4. पोटाश 40 किलो गोबर खाद, सिंगल सुपर फास्फेट, म्यूरिएट ऑफ पोटाश की पूरी मात्रा तथा यूरिया की आधी मात्रा खेत की तैयारी के समय ही दे देते हैं। यूरिया की बाकी आधी मात्रा टॉप ड्रेसिंग के रूप में निकाई – गुड़ाई तथा मिट्टी चढाते समय देनी चाहिए। ३.सिंचाई टमाटर एक बहुत ही सतर्क रूप से सिंचाई चाहने वाली फसल है। इसकी उचित समय पर सिंचाई करना बहुत ही आवश्यकता है। इसमें अधिक सिंचाई तथा कम सिंचाई दोनों ही हानिकारक हैं। इसके लिए यह आवश्यक है कि भूमि में सामान्य नमी सदैव होनी चाहिए। इस प्रकार टमाटर की स्टेक फसल एवं गर्मी की फसल में सिंचाई 7 दिन के अंतर पर आवश्यकतानुसार करनी चाहिए तथा जमीन की फसल एवं जाड़े की फसल के लिए सिंचाई 10 दिन के अंतर पर आवश्यकतानुसार करनी चाहिए। सूखे की स्थिति के तुरंत बाद अधिक पानी से फल फट जाते हैं। अंत: क्रियाएँ – टमाटर जल्दी – जल्दी एवं उथली निकाई - गुड़ाई चाहने वाली फसल है। अत: प्रत्येक सिंचाई के बाद ‘हैंड हो’ के द्वारा भूमि की ऊपरी सतह को भूरभूरी रखना चाहिए। गहरी निकाई-गुड़ाई करने से जड़ों को हानि पहूँचाती है। इस प्रकार भूमि में अच्छी प्रकार से वायु संचार बनाये रखने के लिए पहली गुड़ाई रोपाई के 20-25 दिन बाद तथा दूसरी 40-45 दिन बाद गुड़ाई करके जड़ पर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए। ४.कटाई, छटाई और स्टेकिंग बाजार में टमाटर को शीघ्र उपलब्ध कराने के लिए पौर्धों की कटाई करके एक तने के रूप में करके स्टेक से बांध देते हैं। इसको सहारा देना भी कहते हैं। इससे पौधा अधिक बढ़ता है तथा टमाटर बड़ा तथा अधिक पैदावार मिलती है। कटाई – छटाई के बहुत से तरीके हैं, परंतु मुख्य रूप से एक तने के रूप में ही करते हैं। कटाई तथा स्टेकिंग का खर्च अधिक होने के कारण सभी उत्पादनकर्त्ता इसको अपना नहीं पाते। ५.पौधा संरक्षण टमाटर में कभी – कभी ‘अगेती अंगमारी’ का प्रकोप हो जाता है। इसकी रोकथाम के लिए इंडोफिल एम – 45 (2 से 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में) का छिड़काव करें। कभी - कभी फल छेदक कीड़ा का प्रकोप होता है जो टमाटर के फलों को नुकसान पहूँचाता है। इसकी रोकथाम के लिए इकालक्स या इंडोसल्फान (1 मि. ली. लीटर दवा प्रति लीटर पानी में) का छिडकाव करें। उपज- 20-100 क्विटंल प्रति एकड़। अपने दैनिक आहार में मौसमी फल और सब्जियाँ शामिल करें फल आमतौर पर काफी महंगे समझे जाते हैं लेकिन प्रकृति ने मौसमी फल सब्जियाँ मुहैया की है जो अपने – अपने मौसम में बहुतायत में और उपयुक्त मूल्यों पर उपलब्ध होती है। मौसमी फल और सब्जियाँ न केवल पौष्टिक होती है बल्कि उनमें मौसम की विशेष आवश्यकताओं को पूरा करने की विशेषता होती है। अमरुद, आम, पपीता, केला जैसे पौष्टिक फल अपने मौसम के दौरान काफी सस्ते होते हैं। फूल गोभी फूलगोभी भारतवर्ष की शीतकालीन सब्जियों में से एक प्रमुख सब्जी है जो अधिकतर उत्तरी भारत उगाई जाती है। इसके फूल की सब्जी बनाई जाती है। फूल जब अधिक और बाजार भाव अच्छा होता है, तो इसके फूल को छोटे – छोटे टुकड़ों में काटकर सूखा कर भविष्य में प्रयोग के लिए रख लिया जाता है। इसके फूल का आचार भी बनाया जाता है। यह गोभी या फूलगोभी दोनों नामों से जाना जाता है। १.आहार मूल्य फूलगोभी का आहार मूल्य निम्नलिखित सारणी द्वारा प्रदर्शित हो जाता है। (प्रति 100 ग्राम खाने योग्य भाग में) नमी 90.8 ग्राम विटामिन ए. 51.0 आई. यु प्रोटीन 2.6 ग्राम थियामिन 23.0 मि. ग्राम वसा 0.4 ग्राम रिबोफ्लेविन 0.10 मि. ग्राम खनिज पदार्थ 1.9 ग्राम निकोटिन एसिड 15.0 मि. ग्राम रेशा 1.2 ग्राम विटामिन सी. 2.0 मि. ग्राम अन्य कार्बोहाइड्रेटस 4.0 ग्राम अक्जैलिक एसिड 19.0 मि. ग्राम कैलोरीज 30.0 ग्राम फास्फोरस 1.5 मि. ग्राम कैल्शियम 33.0 मि. ग्राम लोहा 32.0 आई. यु मैगनीशियम 20.0 मि. ग्राम सोडियम 53.0 मि. ग्राम कॉपर 0.05 मि. ग्राम पोटेशियम 113.0 मि. ग्राम २.बुवाई की प्रक्रिया भूमि – फूलगोभी एवं बंधागोभी की खेती के लिए जैविक पदार्थों से भरपूर उपजाऊ हल्की दोमट मिट्टी काफी उपयुक्त होती है। अम्लीय से हल्की क्षारीय दोमट मिट्टी विशेष उपयोग है। फूलगोभी की उन्नत किस्में – ग्रीष्मकालीन – अर्ली कुँआरी, हालीपूर एक्स्ट्रा अर्ली। ( सिर्फ राँची के पठारी भागों के लिए) अगेती – पटना अर्ली, पूसा कतकी, कुँआरी, पूसा दीपाली, अर्ली सिंथेटिक। मध्यम – पूसा कतकी, पूसा दीपाली, इम्प्रूव्ड जापानी, पन्त सूभ्रा। पिछेती – स्नोबोल - 16, पूसा स्नोबोल, डानिया, माघी। फूलगोभी लगाने का समय किस्में बीज गिराने का समय बिचड़े लगाने का समय ग्रीष्मकालीन फरवरी – मार्च मार्च – अप्रैल अगेती किस्म जून – जुलाई जुलाई – अगस्त पछेती किस्म सितंबर – अक्टूबर अक्टूबर – नवंबर बंधागोभी (पत्तागोभी) भारत में शरद ऋतू में उगाई जाने वाली सब्जियों में बंदगोभी का प्रमुख स्थान है। प्राचीन समय में रोमन्स तथा ग्रीक्स द्वारा उगाई जाने वाली सब्जियों में सबसे पुरानी है। इसका जन्म स्थान पश्चिमी यूरोप तथा मेडीटेरेनियम समुद्र का उत्तरी किनारा बताया जाता है। भारतवर्ष में इसकी खेती पिछली कुछ शताब्दियों से शुरू हुई है जो कि यूरोप से आई है। बंधागोभी को सलाद, पकी हुई सब्जी तथा करी के रूप में प्रयोग किया जाता है तथा साथ ही साथ सूखी हुई सब्जियों के रूप में प्रयोग किया जाता है, यह पाचन में सहायक होता है। १.आहार मूल्य बंधा गोभी में खनिज पदार्थ, विटामिन ए, बी-1, बी-2 तथा सी की अधिक मात्रा पायी जाती है। पत्तागोभी का आहार मूल्य इस प्रकार है- (प्रति 100 ग्राम खाने योग्य भाग में) नमी 91.9 ग्राम फास्फोरस 4.4 आई. यु प्रोटीन 2.6 ग्राम लोहा 0.8 मि. ग्राम वसा 0.1 ग्राम सोडियम 14.0 मि. ग्राम खनिज पदार्थ 0.6 ग्राम पोटेशियम 141.0 मि. ग्राम रेशा .10 ग्राम कॉपर 1.08 मि. ग्राम अन्य कार्बोहाइड्रेटस 4.6 ग्राम सल्फर 67.0 मि. ग्राम कैलोरीज 27.0 ग्राम विटामिन ए. 2000.0 आई. यु कैल्शियम 29.0 मि. ग्राम थियामिन 0.06 मि. ग्राम मैगनीशियम 10.0 मि. ग्राम रिबोफ्लेविन 0.03 मि. ग्राम कॉपर 0.05 मि. ग्राम निकोटिन एसिड 0.4 मि. ग्राम विटामिन सी 124.0 मि. ग्राम २.बुवाई की प्रक्रिया बंधागोभी की उन्नत किस्में अगेती: गोल्डन एकड़, प्राइड ऑफ इंडिया, अर्ली ड्रमहेड। पिछेती – लेट ड्रमहेड। बंधागोभी (पत्ता गोभी) लगाने का समय – किस्में बीज गिराने का समय बिचड़े लगाने का समय अगेती किस्में सितंबर – अक्टूबर अक्टूबर – नवंबर पछेती किस्में अक्टूबर नवंबर फूलगोभी एवं बंधागोभी लगाने की विधि – फूलगोभी एवं बंधागोभी लगाने के लिए बीज को पौधशाला में छोटी – छोटी क्यारियों में बोकर बिचड़ा तैयार करते हैं तथा जब ये बिचड़े 4-5 सप्ताह के हो जाते हैं तो इन्हें तैयार किए गए खेतों में लगाते हैं। बिचड़ा रोपने की दूरी (फूलगोभी एवं बंदगोभी) किस्में कतार से कतार पौधा से पौधा ग्रीष्मकालीन किस्में 45 सें. मी. 30 सें. मी. अगेती एवं मध्यम किस्में 45 सें. मी. 45 सें. मी पिछेती 50 सें. मी. 45 सें. मी. खाद एवं उर्वरकों की मात्रा (प्रति एकड़) फूलगोभी एवं बंदगोभी) गोबर खाद 80-100 यूरिया 120 किलो सिंगल सुपर सल्फेट 200 किलो म्यूरिएट ऑफ पोटाश 40 किलो यूरिया का एक भाग, फास्फेट एवं पोटाश की पूरी मात्रा पौधा रोपाई या लगाते समय दें। यूरिया के शेष बचे दो भागों को दो बार में दें। ३.सिंचाई – ग्रीष्मकाल में हर 5-6 दिनों पर सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। अन्य सूखे दिनों में 10-12 दिनों पर सिंचाई देना चाहिए। पौधा संरक्षण – फूलगोभी एवं बंधागोभी में एक कीड़ा जिसका नाम ‘डायमंड बैकमाथ’ है, काफी नुकसान पहुँचाता है। ये कीड़े पत्तियों को खाकर उनमें छेद बना देते हैं तथा फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए निम्नलिखित उपाय करना चाहिए। 1. पौधशाला में कारबोफूरान 3 जी या फ्यूराडान 3 जी को 3 ग्राम प्रति वर्ग मीटर की दर से डालें। 2. पौधा रोपने के 8-10 दिनों के बड पौधों की जड़ों के पास आधा ग्राम कराबोफूरान या फ्यूराडान 3 जी मिट्टी में मिला दें। 3. आवश्यक्तानुसार बाद में सिलकार्ड, एकालाक्स (1 से 1.5 मि. ली. प्रतिलीटर पानी में) का पौधों पर छिड़काव करें। फूलगोभी की दैहिकी विषमताएं 1) ब्राउनिंग – यह बोरोन की कमी के कारण उत्पन्न होता है। इसमें तना खोखला हो जाता है तथा फूल भूरा पड़ जाता है। 10-15 किलो बोरेक्स प्रति हेक्टर के हिसाब से मिट्टी में मिलाने से इसकी रोकथाम की जा सकती है। 2) ह्विपटेल - यह विषमता मालिबडीनम की कमी कारण उत्पन्न होता है। इसमें पत्ती पर्ण पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता तथा सकरी पत्ती की संरचना बन जाती है। इस प्रकार फूल बाजार के लिए नहीं बन जाती है। इस प्रकार फूल बाजार के लिए नहीं बन पाता। इसकी रोकथाम भूमि के चुने का प्रयोग करके जिससे भूमि में अम्लता कम हो जाती है और पी – एच बढ़कर 6.5 तक आ जाती है, की जा सकती है। सोडियम अथवा अमोनियम मालिबडेट 1.5 किलोग्राम रसायन को प्रति हेक्टर भूमि में मिलाने से इसकी रोकथाम की जा सकती है। 3) बटनिंग – पौधों में छोटे- छोटे फूल के बनने को ही बटनिंग कहते हैं। यह नेत्रजन की कमी तथा देर से रोपाई के कारण उत्पन्न होती है तथा साथ ही अधिक दिनों की पौध भी इसके लिए उत्तरदायी होती है। इस विषमता को समय से रोपाई करके तथा उचित मात्रा में खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग करके इसकी रोकथाम की जा सकती है। 4) ब्लाइंडनेस – कभी - कभी ऐसा होता है कि पौधों की शीर्ष कलिका विकसित नहीं हो पाती या टूट जाती है अथवा कीड़ों के द्वारा नष्ट कर दी जाती है। इस प्रकार पौधा बिना फूल के वृद्धि करता है। इसी को ब्लाइंडनेस कहते हैं। इसमें पत्तियाँ बड़ी, गहरे हरे रंग की तथा मोटी हो जाती है। यह तापक्रम के कम होने के कारण भी उत्पन्न हो सकता है। इस प्रकार के पौधों को खेत से निकाल देना चाहिए। 5) रिक्टनेस – फूल के ऊपर पुष्पकलोकाओं के शीघ्र विकास को रिक्टनेस कहते हैं, यह कटाई में देर होने से उत्पन्न होता है। ब्लांनचिंग- फूलगोभी का पूर्ण एवं अच्छा फूल बिल्कुल दूधिया होना चाहिए। इसको प्रपात करने के लिए फूल को सूर्य की रोशनी से बचाना चाहिए। सर्वप्रथम जब फूल निकलते है तो वह अंदर पत्तियों से ढंके रहते है, लेकिन बढ़ने पर वह खुल जाते है, अत: इस समय सूर्य की रोशनी से बचाने के लिए नीचे की पत्तियों को फूल के ऊपर करके इसके सिरों को एक दुसरे से बांध देते हैं। यदि ऐसा करने में असुविधा हो तो नीचे की पत्तियों को तोड़कर इनसे फूल को ढँक देते है। इस क्रिया को ब्लांनचिंग कहते है। फूल को 5 दिन से अधिक नहीं ढंकना चाहिए। उपज – 80-100 क्विंटल प्रति एकड़। भिण्डी सम्पूर्ण भारतवर्ष में भिण्डी की खेती अपने अपरिपक्व फल के लिए की जाती है, जो कि सब्जी के रूप में प्रयोग की जाती है। भिण्डी का सूप तथा स्टियूज भी प्रयोग किया जाता है। इसका फल रेशा सहित कागज उद्योग में काम आता है तथा इसका फल दवाओं के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। इसके बीज को मंजन तथा पीस करके काफी के स्थान पर प्रयोग किया जाता है। इसका जन्म स्थान अफ्रीका बताया जाता है। वहाँ पर इसकी खेती अमेरिका की खोज के पहले सी ही की जाती रही है इसका जन्म स्थान भारत भी माना जाता है, क्योंकी इसका जंगली रूप भी यहाँ पाया जाता है। १.आहार मूल्य भिण्डी का आहार मूल्य इस प्रकार है - (प्रति 100 ग्राम खाने योग्य भाग में) नमी 89.6 ग्राम लोहा 1.5 मि. ग्राम प्रोटीन 1.9 ग्राम सोडियम 6.9 मि. ग्राम वसा 0.2 ग्राम पोटेशियम 103.0 मि. ग्राम खनिज पदार्थ 0.7 ग्राम कॉपर 0.19 मि. ग्राम रेशा 1.2 ग्राम सल्फर 30.0 मि. ग्राम अन्य कार्बोहाइड्रेटस 6.4 ग्राम विटामिन ए. 88.0 आई. यु कैलोरीज 35.0 ग्राम थियामिन 0.07 मि. ग्राम कैल्शियम 66.0 मि. ग्राम रिबोफ्लेविन 0.1 मि. ग्राम मैगनीशियम 43.0 मि. ग्राम निकोटिन एसिड 0.6 मि. ग्राम अक्जैलिक एसिड 8.0 मि. ग्राम विटामिन सी 13.0 मि. ग्राम फास्फोरस 56.0 मि. ग्राम २.बुवाई की प्रक्रिया भूमि – भिण्डी की खेती के लिए हल्की दोमट, मिट्टी उपयुक्त होती है। भिण्डी जल-जमाव बर्दाश्त नहीं करती है। अत: जल निकास उचित प्रबंध होना चाहिए। भिण्डी की खेती दोनों मौसमों में (गर्म फसल तथा बरसाती फसल के रूप में) होती है। उन्नत किस्में – परमानी क्रांति, पूसा सावनी, वैशाली वधु, पंजाब पद्मिनी, अर्का अनामिका, अर्का अभय इत्यादि। बोने का समय – गर्मा फसल : जनवरी – फरवरी बरसाती फसल : जून जुलाई लगाने की विधि – खेत की जुताई कर अच्छी तरह तैयार कर लेते हैं। खेत तैयार करे समय ही खाद तथा उर्वरक देकर मिट्टी में मिला देते हैं। इसके पश्चात छोटी – छोटी क्यारियां बना लेते हैं। तैयार क्यारी की समतल जमीन में भिण्डी के बीज को पंक्तियों में बोते हैं। बीज बोने की दूरी – गर्मा फसल : कतार से कतार : 45 सें. मी. पौध या बीज से बीज : 20 सें. मी. बरसाती फसल : कतार से कतार : 60 सें मी. बीज से बीज : 25- 30 सें. मी. बीज दर (किलो प्रति एकड़) – गर्मा फसल – 7.2-8, बरसाती फसल : 3.2-4 खाद तथा उर्वरक की मात्रा (प्रति एकड़) – गोबर खाद 80-100 क्विंटल यूरिया 80 किलो सिंगल सुपर फास्फेट 120 किलो म्यूरिएट ऑफ पोटाश 40 किलो खेत की तैयारी करते समय, बीज बोने के पहले पूरी गोबर खाद, पूरा सिंगल सुपर फास्फेट, पूरा म्यूरिएट ऑफ पोटाश तथा यूरिया की आधी मात्रा डालें। यूरिया की बाकी आधी मात्रा निकाई – गुड़ाई करते समय दें तथा पौधों की पन्तियों पर मिट्टी चढ़ा दें। ३.सिंचाई – आवश्यकतानुसार 5-7 दिनों पर सिंचाई करें। पौधा संरक्षण भिण्डी फसल को ‘शीर्ष’ एवं ‘फल छेदक’ कीड़ा काफी नुकसान पहूँचाता है। इसकी रोकथाम हेतु आक्रांत टहनियों एवं फलों को चुनकर नष्ट कर दें तथा इंडोसल्फान या एकालक्स (1 मि. ली. प्रति लीटर पानी में) का छिडकाव 15 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए। जैसिड (फूद्का) को भी कीट नाशक दवा से नष्ट कर देना चाहिए अन्यथा ‘येलोवेन भोजैक’ नामक एक जीवाणु रोग का प्रकोप हो जाता हैं। यदि किसी पौधे में यह बीमारी नजर आए तो उसे उखाड़ कर जमीन में गाड़ देना चाहिए। उपज – 60-80 क्विंटल प्रति एकड़। स्रोत : रामकृष्णा मिशन आश्रम, राँची