<div id="MiddleColumn_internal"> <h3>भूमिका <strong> </strong></h3> <p style="text-align: justify;">उद्यान विज्ञान या बागवानी कृषि की मुख्य शाखा है। बागवानी दो शब्दों से बना है। बाग मतलब बगीचा और वानी मतलब कृषि करना या उगाना। फल, फूल तथा <a href="../../../../../../agriculture/crop-production/91d93e930916902921-915947-93293f90f-90592894193690293893f924-91594393793f-924915928940915/90992894d928924-91594393793f-924915928940915/93892c94d91c93f92f94b902-915940-916947924940">सब्जियों की खेती</a> करने को बागवानी कहते हैं।</p> <h3>बागवानी का महत्व<strong> </strong></h3> <ol style="text-align: justify;"> <li><strong>भोजनात्मक महत्व</strong> – मनुष्य केवल अनाज वाली फसलों पर ही आधारित नहीं रह सकता है। उसे भोजन के साथ – साथ फल एवं सब्जियों की आवश्यकता महसूस होती है। फल एवं सब्जी मनुष्य के शरीर की रक्षा बहुत सी बीमारियों से करते हैं। भोजन विशेषज्ञ के अनुसार प्रतिदिन अनाज, दाल, दूध, सब्जी के अतिरिक्त 50-60 ग्राम फल का उपयोग करना चाहिए। फलों एवं सब्जियों में विटामिन, खनिजलवण, कार्बोहाइड्रेट, पैक्टिन, सैल्यूलोज, प्रोटीन, वसा पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं जो शरीर की वृद्धि तथा स्वास्थय संरक्षण के लिए बहुत ही आवश्यक तत्व हैं।</li> <li><strong>मनोरंजनात्मक महत्व</strong> - दिन भर के कठिन परिश्रम के उपरांत मनुष्य को मनोरंजन की आवश्यक होती है। अगर घर के समीप सब्जी या फल का उद्यान है तो निश्चय ही मनुष्य सुख, शांति एवं ताजगी महसूस कर सकता है।</li> <li><strong>विदेशी धन की प्राप्ति</strong> – बहुत सी सब्जियों, फलों को अन्य देशों में बेचकर या निर्यात कर विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सकती है</li> <li><strong>अधिक पैदावार</strong> - अन्य फसलों की बजाय सब्जियों व फलों की उपज लगभग 100-150 क्विंटल प्रति हेक्टर होती है जबकि धान या गेहूं की 50-60 क्विंटल प्रति हेक्टर तक उपज होती है।</li> <li><strong>अधिक कैलोरीज</strong> – फलों एवं सब्जियों से प्रति इकाई अधिक कैलोरीज प्राप्त होती है। अर्थात फूलों एवं सब्जिओं का थोड़ी मात्रा में सेवन से भी अधिक शक्ति प्राप्त होती है।</li> <li><strong>शुद्ध लाभ</strong> – शुद्ध लाभ प्रति इकाई क्षेत्रफल अधिक होता है।</li> <li><strong>उपयोगी वस्तुओं की प्राप्ति</strong> – फल व सब्जी वाले पौधों से इंधन, लकड़ी, व तेल इत्यादि प्राप्त होते हैं। जैसे- आंवला, नारियल से तेल तथा अन्य पौधों से गोंद एवं अंजीर, बेल व नींबू प्रजाति से दवा बनायी जाती है।</li> <li><strong>रोजगार की संभावनायें</strong> – बेकारी की समस्या को हल करने में मदद मिल सकती है। धान्य फसलों की अपेक्षा इसमें अधिक श्रमिकों की आवश्यकता होती है जिससे मजदूरों को अधिक समय तक कार्य मिल सकता है। फल एवं सब्जी परिरक्षण फैक्ट्री या उद्योग की स्थापना से बेकारी की समस्या को हल करने में मदद मिलती है। बागवानी पर आधारित उद्योगों जैसे: जैम, जेली, सॉस, चटनी, केचप, एवं आचार उत्पादन इत्यादि को बढ़ावा मिलता है और स्वरोजगार की संभावनायें बढ़ती हैं।</li> <li><strong>सहायक उद्योगों को प्रोत्साहन</strong> – बागवानी से दूसरे सहायक उद्योगों को प्रोत्साहन मिलता है। सब्जी उत्पादन, फलोत्पादन के लिए विशेष यंत्रों की खपत बढ़ जाती है। फलत: नये कारखानों का निर्माण होता है। साथ ही फलों एवं सब्जियों से बने बहुत से पदार्थ जैसे- जैम, जेली, सॉस, चटनी मार्मलेड, शर्बत, इत्यादि के लिए चीनीमिट्टी, शीशे एवं टिन के जार. मसाले, रासायनिक पदार्थ, पैकिंग सामग्री इत्यादि की आवश्यकता होती है। अत: इन वस्तुओं के निर्माण हेतु प्रोत्साहन मिलता है।</li> <li><strong>उर्वरक शक्ति में वृद्धि </strong>– बागवानी से मृदा (मिट्टी) की उर्वरक शक्ति बढ़ती है। सब्जियों व फलों की पत्तियाँ खेत में सड़कर मिट्टी की उर्वराशक्ति बढ़ाती हैं। जड़ों के अधिक गहराई में जाने से भूमि का विन्यास अच्छा हो जाता है।</li> <li><strong>आय के साधन में बढ़ोतरी</strong> – सब्जियाँ अधिक उपज देने वाली होती है साथ ही इनकी उपज प्रति इकाई क्षेत्रफल अधिक होती है। सब्जियाँ शीघ्र बढ़नेवाली या पैदा होने वाली होती है। कुछ सब्जियाँ ऐसी भी हैं जो धान्य या अन्य अनाजवाली फसलों की अपेक्षा उच्च दर से बेची जाती है। यदि अधिक उत्पादन के समय सस्ती भी बेची जाएँ तो भी अधिक पैदावार के कारण लाभ प्रति इकाई क्षेत्रफल अधिक मिलता है।</li> </ol> <h3>सब्जियों की उपयोगिता <strong> </strong></h3> <p style="text-align: justify;"><img class="image-right" src="https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/agriculture/crop-production/91d93e930916902921-915947-93293f90f-90592894193690293893f924-91594393793f-924915928940915/91d93e93091692394d921-92e947902-93892c94d91c940-915948938947-90991793e92f947902/JharkhandKheti1.jpg" width="179" height="128" /></p> <p style="text-align: justify;">भारत एक कृषि प्रधान देश है जहाँ की लगभग 70% जनता कृषि कार्य करती है। बढ़ती हुईजनसंख्या तथा भूमि की उत्पादन दर कम होने के कारण कभी – कभी भोजन की पूर्ति की समस्या गंभीर रूप धारण कर लेती है। भारत में खाद्य पदार्थों का कम उत्पादन होने का दूसरा कारण यह भी है कि यहाँ अधिकतर लोगों की काम करने की क्षमता कम है क्योंकि वे असंतुलित एवं कम पोषण आहार के ऊपर निर्भर रहते हैं अत: स्वास्थय ठीक न रहने से उनकी कार्य करने की क्षमता भी कम होती है। इस प्रकार स्वस्थ्य जीवन के लिए सन्तुलित एवं पोषक आहार जरूरी है।</p> <p style="text-align: justify;">स्वस्थ एवं उत्पादन राष्ट्र बनाने के लिए खाद्य उत्पादन बढ़ाने के साथ - साथ जनता को सन्तुलित आहार प्रदान कराना भी आवश्यक है। यह कार्य सब्जियों के उत्पादन को बढ़ाने से आसानी से हाल हो सकता है। सब्जियों भोजन का एक भाग ही नहीं, बल्कि ये मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिए पोषक तत्व प्रदान करती हैं। सब्जियों में अधिक मात्रा में विटामिन, खनिज पदार्थ, कार्बोहाइड्रेट तथा प्रोटीन इत्यादि पाये जाते हैं। इस प्रकार जो सब्जियों का उपयोग कम करते हैं या जो इनका उपयोग उचित रूप में नहीं करते हैं, वे खनिज पदार्थ की कमी से उत्पन्न बीमारी के शिकार हो जाते हैं। इसलिए सब्जियों का हमारे भोजन में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। अत: सब्जियों के उत्पादन एवं उपभोग दोनों को बढ़ाने की आवश्यकता है।</p> <h3>प्रति दिन प्रति व्यक्ति सब्जी की उपयोगिता <strong> </strong></h3> <p style="text-align: justify;">भोजन विशेषज्ञों के अनुसार एक व्यक्ति को प्रतिदिन 280 ग्राम सब्जियों का उपभोग करना चाहिए, जिसमें 85 जड़ वाली सब्जियाँ, 85 ग्राम अन्य सब्जियाँ तथा 110 ग्राम पत्ता वाली सब्जियाँ शामिल हैं। भारत जैसे देश में, जहाँ की अधिकतर जनता शाकाहारी है। सब्जियों का महत्व और भी बढ़ जाता है। इतना होते हुए भी हमारे देश में अन्य देशों की तुलना में सब्जियों का उपयोग बहुत ही कम होता है। भारतीय भोजन में धान्य की अधिकता रहती है, जबकि प्रगतिशील देशों में धान्य की अपेक्षा सब्जियों और फलों की अधिकता रहती है। अत: भारतीय भोजन में सब्जियों एवं फलों की अधिकता के लिए इनके उत्पादन के ऊपर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। अधिकतर सब्जियाँ कम अवधि में तैयार हो जाती हैं। अत: एक ही खेत में कई बार सब्जियों की फसलें ले सकते हैं। सब्जियों की खेती मुख्यत: तीन मौसमों – खरीफ, रबी तथा जायद में की जाती है।</p> <p style="text-align: justify;">बिहार के छोटानागपुर क्षेत्र में खाद्यान्नों की समस्या है। ऐसी परिस्थितयों में खाद्यान्न फसलें – धान, गेहूं, मडूवा तथा मकई इत्यादि का उपयोग केवल खाने के लिए काम आता हैं। इस क्षेत्र में सब्जियों की खेती अधिकतर किसान बेचने के लिए करते हैं। इससे इनको नकद रूपया प्राप्त हो जाता है। खाने के लिए कम मात्रा में उपयोग करते हैं। इन सब्जियों को सप्ताहिक स्थानीय बाजारों में बेच देते हैं जहाँ से ये दूर-दूर शहरों जैसे – कलकत्ता. उड़ीसा, बोकारो, टाटा ले जायी जाती हैं। कृषक सब्जियों की बिक्री करके अपने - अपने परिवार का खर्च चलाने के साथ - साथ सब्जियों के उत्पादन को भी बढ़ाने का प्रयास करते हैं। इसके लिए ये प्रसिद्ध बीज कंपनियों जैसे राष्ट्रिय बीज निगम, बिहार राज्य बीज निगम, केन्द्रीय बागवानी परिक्षण केंद्र, राँची (विशेषकर छोटानागपुर हेतु), इंडो अमेरिकन हाइब्रिड सीड्स तथा महाराष्ट्र हाइब्रिड सीड्स कंपनियों के बीजों का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार सब्जियों की अधिकतम पैदावार लेकर अपनी आर्थिक स्थिति सुधारते है।</p> <h3>दैनिक भोजन में पत्तेदार सब्जियों को भी शामिल करना</h3> <p style="text-align: justify;">पालक, चौलाई, हरी मेथी, सहिजन को पत्ती, मूली पत्तों आदि का सामान्यतया समस्त देश में उपभोग किया जाता है। इन पत्तेदार सब्जियों के लाभों को ध्यान रखते हुए अपने दैनिक भोजन में इनको शामिल किया जाना चाहिए।</p> <h3>पत्तेदार हरी सब्जियाँ अत्यधिक पौष्टिक</h3> <p style="text-align: justify;">पत्तेदार हरी सब्जियाँ महत्वपूर्ण खनिजों और विटामिनों का भंडारण होती है और इसलिए इनका वर्गोंकरण संरक्षी खाद्य के रूप में किया गया है। इनमें आयरन, कैल्शियम, विटामिन रा (जैसे कैरोटीन), विटामिन सी और बी कंप्लेक्स समूह के विटामिन विशेषतया रिबोफ्लोविन और फोलिक एसिड प्रचुर मात्रा में जाए जाते है। इन पत्तेदार सब्जियों में कुछ प्रोटीन भी होती है। हालाँकि इनमें प्रोटीन की मात्रा कम होती है। पत्तेदार हरी सब्जियों को अनाज – दाल में मिलाकर इस्तेमाल किया जाए तो भोजन में प्रोटीन की मात्रा अधिक हो जाती है।</p> <h3>छोटानागपुर में सब्जियों की खेती : अनुकूल वातावरण उज्ज्वल भविष्य <strong> </strong></h3> <p style="text-align: justify;">दक्षिणी बिहार का छोटानागपुर क्षेत्र ऊँची - नीची भूमि वाला है। इसमें जगह – जगह नदी – नाला की भरमार है। सिंचाई के साधन के रूप में नदी, नाला, तालाब, कुआँ, उद्वह सिंचाई परियोजना इत्यादि का व्यवहार किया जाता है। छोटानागपुर के इस क्षेत्र में कूल जमीन का मात्र सात प्रतिशत भाग ही सिंचित है। बरसात में बिना सिंचाई के ही सब्जियों की खेती की जाती है। परंतु रबी एवं जायद में सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है जिसकी पूर्ति उपरोक्त सिंचाई साधनों से की जाती है। छोटानागपुर की मिट्टी तथा जलवायु सब्जियों की खेती के लिए बहुत ही उपयुक्त है। बशर्तें इनमें गोबर या कम्पोस्ट खाद का व्यवहार किया जाए। चूंकि छोटानागपुर की मिट्टी अम्लीय है। अत: इसमें चुने का प्रयोग करना जरूरी होता है। यहाँ के कुछ क्षेत्रों में बरसाती आलू की भी खेती की जाती है। विभिन्न मौसम की विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ यहाँ पैदा की जाती है। तापक्रम, वर्षा इत्यादि की अनुकूलता के चलाते यहाँ सब्जियों की खेती सुगमता पूर्वक की जाती है। यहाँ से सुदूर बाजारों में सब्जियाँ भेजी जाती हैं। सब्जियों की खेती का इस क्षेत्र में भविष्य उज्ज्वल है। क्योंकि अधिकतर सब्जियाँ कम समय में ही तैयार हो जाती है जिन्हें बेचकर किसान अच्छी आमदनी प्राप्त कर लेता है। सब्जियों की खेती में नित नयी - नयी किस्मों का प्रयोग हो रहा है। इसमें केन्द्रीय बागवानी परिक्षण केंद्र प्लान्दू का काफी योगदान है। किसानों ने विभिन्न प्रकार की सब्जियों के संकर किस्मों का प्रयोग करना शुरू कर दिया है। यहाँ बिक्री की भी समस्या उतनी जटिल नहीं है। इस प्रकार छोटानागपुर क्षेत्र में सब्जियों की खेती के लिए अनुकूल वातावरण है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>स्रोत : रामकृष्णा मिशन आश्रम, राँची</strong></p> </div>