परिचय फसलों के पैदावार में वृद्धि के लिए विभाग ने कीड़ों के प्रबंधन के लिए तरह – तरह के प्रयोग किए हैं एवं अनुसंधान में प्रयासरत हैं। झारखंड राज्य में धान, दलहन, मकई, तेलहन, गन्ना इत्यादि प्रमुख फसलें हैं। धान एवं मकई की खेती पूरे राज्य में होती है। वैसे तो अरहर की खेती सभी क्षेत्रों में होता है किन्तु पलामू एवं गढ़वा जिले में सबसे अधिक होता है। गन्ना की खेती संथालपरगना के क्षेत्रों में अधिक होता है। आजकल खेती के प्रति किसानों की जागरूकता बढ़ी हैं किन्तु किसानों को कीड़ों द्वारा नुकसान का सही नहीं हैं प्रशिक्षण, आकाशवाणी, दूरदर्शन, किसना गोष्ठी द्वारा किसानों को समय – समय पर प्रशिक्षित किया जाता है। दीमक एवं नियंत्रण के उपाय दीमक एक ऐसा कीड़ा है जो प्राय: प्रत्येक रबी फसलों को क्षति पहूंचाया हैं, खासकर असिंचित या सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों में अधिक सक्रिया रहता है। खरीफ मौसम में भी जब वर्षा का अभाव हो जाता है तब दीमक का आक्रमण टांड वाले फसलों जैसे, मक्का, मडुआ, अरहर, गोरा धान इत्यादि पर होता है। दीमक प्राय: रात में सक्रिय रहता है। चूंकि वे प्रकाश सहन नहीं कर सकते हैं इसलिए वे जमीन के ऊपर मिट्टी की सुरंग बनाकर उसी में चलते हैं। बोआई के तुरंत बड दीमक का आक्रमण शुरू हो जाता है। ये मिट्टी में पड़े बीज, अंकुरित बीज, नवजात पौधे तथा पौधों की अन्य सभी अवस्थाओं में क्षति पहूँचाने में सक्षम होते हैं। दीमक पौधों की जड़ या तना के आधार भाग को खाकर खोखला कर देते हैं जिसके कारण नवजात पौधे शीघ्र ही सूख जाते हैं एवं बड़े पौधे धीरे – धीरे सूखने लगते हैं। दीमक द्वारा खाई हुए वास्तुयें अनियमित रूप से कटी हुई पायी जाती है। दीमक के द्वारा आक्रांत पौधों को उखाड़ने से दीमक की उपस्थिति एवं उनके द्वारा बनाये गए निशान का पता चलता है। नियंत्रण के उपाय बीजोपचार गेहूं : 1. मि. ली. क्लोरापरिफास 20 ई.सी. या 3.5 मि. ली. इन्डोसल्फान 3 ई. सी. को 50 मि. ली. पानी में घोल तैयार करते हैं जिसमें एक किलोग्राम गेहूं के बीज को उपचारित किया जाता है। जौ एवं अन्य खाद्यान्न बीज 6.0 मि. ली. क्लोरापारिफास 20 ई.सी. या 7.5 मि. ली. इन्डोसल्फान 35 ई. सी. को 20 मि. ली. पानी में मिश्रण तैयार करते हैं जिसमें एक किलोग्राम बीज को उपचारित करते हैं। चना 15.0 मि. ली. क्लोरापरिफास 20 ई. सी. आ 8.5 मि. ली. इन्डोसल्फान 35 ई. सी. को 20 मि. ली. पानी में घोल बनाकर एक किलोग्राम बीज को उपचारित करते हैं। भिण्डी 3.0 ग्राम इमिडाक्लोप्रीड 70 डब्ल्यू. एस. से एक किलोग्राम बीज को उपचारित किया जाता है। मिट्टी का उपचार सड़ा हुआ गोबर एवं करंज की खल्ली का व्यवहार करना चाहिए। मिट्टी में लिल्डेन धुल या मिथाइल पाराथियोन 2% धुल का व्यवहार 10.0 किलो ग्राम प्रति एकड़ की दर से करना चाहिए। खड़ी फसल में उपचार खड़ी फसल में दीमक के आक्रमण होने पर क्लोरोपारीफास 20 ई. सी. के 2.5 मि. ली. जी एक लीटर पानी में घोल बनाकर आक्रांत जगहों पर छिड़काव करना चाहिए। चना का फलीछेदक मादा कीट रात्रि में एक – एक करके 500-1676 अंडे पौधों की पत्तियों, फूलों अथवा फलियों पर देती है। अंडे 4-5 दिन में फूट जाते हैं। नवजात पिल्लू पत्तियों की कोशिकाओं को खुरचकर खाती हैं। पूर्ण विकसित पिल्लू के ऊपरी पृष्ठ हरा होता है तथा मध्य में गहरी मोटी स्लेटी रंग की धारी होती है जो जगह- जगह पर टूटी होती है और पीछे की ओर लंबी पीली धारी होती है। ये तीनों धारियाँ समानांतर होती है। पूर्ण विकसित पिल्लू 35 – 42 मि.मी. लंबी होती है। पिल्लू पौधों के मुलायम भाग, फूल एवं फली की खाती है। फली में पिल्लू का मल भी पाया जाता है। जब पिल्लू बड़ी हो जाती है तब से आधा भाग फली के अंदर और आधा भाग बाहर निकाले हुए खाते देखा जाता है। कीट द्वारा हानि से फली खोखली होकर सूख जाती है। पूर्ण विकसित पिल्लू मिट्टी में 7.5 – 10.0 से. मी. नीचे जाकर एक चिकना कोकून बनाती है और उसी में प्यूपा में बदल जाती है। नियंत्रण के उपाय अंत: फसल जैसे चना के साथ तीसी, गेहूं, जौ, सरसों, धनियाँ (3:1) इत्यादि लगाने से फलीछेदक के प्रकोप को नियंत्रित किया जा सकता है साथ ही साथ परजीवी कीट को बढ़ने में मदद मिलता है। फंदाफसल जैसे गेंदा फूल फलीछेदक को आकर्षित करता है। अत: चना फसल के चारों गेंदा फूल लगाने से फलीछ्देक उसी पर आकर्षित होते हैं। इसमें निरीक्षण की आवश्यकता होती है। आवश्यकतानुसार जैविक कीटनाशी जैसे वायरस एवं बैक्टीरिया युक्त कीटनाशी, नीम युक्त कीटनाशी (अचूक, निम्बेसिडीन) का व्यवहार करना लाभदायक होता है। आवश्यकता होने पर इन्डोसल्फान तरल या क्वीनालफास तरल का छिड़काव (1.0/ली/हे.) पौधों में 50% फूल निकलने पर करना चाहिए। दूसरा छिड़काव 15 दिनों के अंतर पर करना चाहिए। मटर के कीट नियंत्रण के उपाय मटर का तानामक्खी वयस्क कीट काली चमकदार मक्खी होती है। मक्खी पत्ती या तना में छेद करती है एवं 15% छेद में अंडे होते हैं। प्रारंभ में शिशु (मैगट) पत्ती में सुरंग बनाकर आहार प्राप्त करता है और फिर मोटी शिरा से होता हुआ तना में ऊपर और नीचे (भूमि की ओर) सुरंग बनाता है। कुछ पिल्लू जड़ में भी प्रवेश कर जाती है। अधिक प्रकोप होने पर पौधों की पत्तियाँ पीली हो जाती है। पिल्लू सुरंग में ही प्यूपा में परिवर्तित हो जाती है जिसमें से वयस्क मक्खी 9-10 दिन में निकलती हैं। नियंत्रण के उपाय अगात बुआई से बचना चाहिए। 5.0 मि.ली. क्लोरपारीफास 20 ई. सी को 15 मि.ली. पानी में घोल बनाकर एक किलोग्राम बीज को उपचारित कर लगाना चाहिए। बोने वाले कतार में दानेदार कीटनाशी जैसे कारटाप हाइड्रोक्लोराइड 4 जी (10.0 किलोग्र्फाम/एकड़) का व्यवहार करना चाहिए। पर्ण सुरंगक मादा कीट पत्तियों में छेद करके अंडे देती है। नवजात भृंगक इन्हीं सुरंगों में रहकर 5-1`2 दिन में पूर्ण विकसित हो जाता है। सुरंग के पत्तियों में उजली धारियाँ बन जाती है। अधिक प्रकोप होने पर धारियाँ मिलकर एक हो जाती है जिसके कारण पत्तियाँ झुलस जाती है। इसका कीट फरवरी से अप्रैल तक अधिक नुकसान पहूंचाता है। नियंत्रण के उपाय आक्रमण प्रारंभ होते ही या मिथाइल डिमेटोन का छिड़काव (400 मि. ली./एकड़) करना चाहिए। आवश्यकता होने पर 15 दिनों बाद डायमेथोयट तरल का छिड़काव (400 मि. ली./एकड़) करना लाभदायक होता है। मटर का फलीछेदक यह मूसर एवं हरा मटर का मुख्य शत्रु हैं। मादा कीट फूलों, कोमल फलियों पर अलग – अलग या समूह में अंडे देती है। नवजात पिल्लू फूलों को खाती है एवं बाद में फलियों में छेदकर दानों को खाती है। पूर्ण विकसित पिल्लू मिट्टी में 2-4 से. मी. नीचे जाकर प्यूपा में बदल जाती है। कीट के शरीर के पृष्ठ भाग गुलाबी रंग के समान होता है। नियंत्रण का उपाय पौधों में 50% फूल आने पर इन्डोसल्फान तरल या क्वीनालफास तरल का छिड़काव (400/मि. ली./एकड़) करना चाहिए। आवश्यकतानुसार 12 दिनों के बाद नीमयुक्त कीटनाशी का छिड़काव किया जा सकता है। चना के फलीछेदक इस कीट का आक्रमण भी मटर भी की फलियों पर होता है। अत: मात्र के फलीछेदक के नियंत्रण के लिए व्यवहार की गई कीटनाशी से इस कीट का भी नियंत्रण हो जाता है। मटर की नीली तितली इस कीट का आक्रमण मटर के अलावा अरहर, मूंग, उरद, लोबिया, बीन इत्यादि फसलों पर होता है। नवजात पिल्लू प्रारंभ में पत्तियों का खाता है किन्तु बाद में कलियाँ, फूलों एवं कोमल फलियों को क्षति करती है। पिल्लू फलियों में छेदकर दानों को खा जाती है। नियंत्रण – मटर का फलीछेदक जैसा मटर का लाही इसका आक्रमण मटर के अलावा बीन पर भी होता है। लाही का आक्रमण पत्तियों, कोमल भागों, फूलों एवं फलियों पर होता है। सबसे अधिक क्षति पौधों के बढ़ने वाले भागों पर आक्रमण के कारण होता है। अधिक प्रकोप होने पर पौधे पीले हो जाते हैं एवं पौधों की वृद्धि रूक जाती है। लाही का रंग हरा होता है। नियंत्रण के उपाय डायमेथोयट तरल या मिथाइल डिमेटोन तरल का छिड़काव (400 मि.ली./एकड़) करने से लाही को नियंत्रित किया जा सकता है। मसूर के कीट के नियंत्रण के उपाय लाही : इसका आक्रमण मसूर के अलावा चना, मूंगफली, मटर, मूंग, उरद, अरहर इत्यादि फसलों पर होता है। पंखहीन लाही का रंग गहरा भूरा या काला होता है जबकि पंखयुक्त लाही हरापन लिए हुए कला होता है एवं पंख उजला पारदर्शी होता है। निम्फ एवं वयस्क दोनों ही पत्तियों की निचली सतहों पर रहते हैं और पत्तियों का रस चूसते हैं जिसके कारण पौधे कमजोर हो जाते हैं। अधिक प्रकोप होने पर पौधे सूख भी जाती हैं। इस कीट का प्रकोप कोमल भागों एवं फलियों पर भी होता है। यह कीट एक प्रकार द्रव विसर्जित करता है जिसको मधु विन्दु कहते हैं। मधु विन्दु पर फफूंदी का विकास होता है जिसके कारण प्रकाश संश्लेषण क्रिया में बाधा उत्पन्न होती है। नियंत्रण के उपाय डायमेथोयट 30 ई. सी. (रोगर) या मिथाइल डिमटोन 25 ई. सी. (मेटासिस्टॉक्स) का छिड़काव (400 मि. ली./एकड़) लाभदायक होता है। फलीछेदक : मटर के फलीछेदक जैसा सरसों के कीट नियंत्रण के उपाय 1. सरसों की आरा मक्खी : इसका आक्रमण सरसों जाति के फसलों पर होता है। मादा वयस्क का पिछला भाग काफी विकसित एवं आरी जैसा होता है जिससे छेद करके पत्तियों में अंडे देती है। यह अंडे अलग – अलग देती है। नवजात पिल्लू हरे रंग का होता है। पिल्लू 16-18 मि. मी. लंबा होता है। इसके 8 जोड़ी पैर होते हैं। इसका देह के पिछला भाग पर पांच बढ़ता है। उसका रंग गहरा होते जाता है। पिल्लू जैसे - जैसे बढ़ता है उसका रंग गहरा होते जाता है। पूर्ण विकसित पिल्लू 16-18 मि. मी. लंबा होता है। इसके 8 जोड़ी पैर होते हैं । इसका देह के पिछला भाग पर पांच काली धारियाँ होती है। इसके शिशु को ग्रब कहा जाता है। ग्रब नई पत्तियों में छेद कर खाती है फलत: पत्तियों में जाल सा बन जाता है। कभी – कभी प्ररोह की वाह्यात्वचा को खा जाती है जिसके कारण पौधों में फल नहीं बन पाते हैं। इस कीट का ग्रब सूर्यास्त के बाद एवं प्रात: काल में पत्तीयों को खाता है एवं दिन में मिट्टी के ढेलों में छिपा रहता है। बाधा पहूँचाने पर पिल्लू जमीन पर गिर जाती है तथा मरा हुआ जैसा दिखलायी पड़ती है। पूर्ण विकसित पिल्लू जमीन के नीचे 20 -30 मि. मी. गहराई जा जाकर प्यूपा में परिवर्तित हो जाती है। यह पानी रक्षक कोकून में ही प्यूपा में परिवर्तित होता है। नियंत्रण के उपायों पिल्लू (ग्रब) को चुनकर नष्ट कर देना चाहिए। पौधों पर क्वीनालफास 1.5% धुल या मिथाइल पाराथियोन 2% धुल का भुरकाव सुबह में करना चाहिए। डायक्लोरभोस (नूवान) का छिड़काव (500 मि. ली/हे.) लाभदायक होता है। चित्रित वग इसका आक्रमण सरसों जाति की फसलों एवं अन्य साग – सब्जियों के फसलों पर होता है। वयस्क कीट चपटा होता है जिसका रंग चमकीला काला एवं देह पर नारंगी या भूरे रंग के धब्बे पाये जाते हैं। मादा कीट पत्तियों, पत्तियों के डंटल, तना एवं फलियों ओर एक – एक करके अंडे देती है। कभी यह मिट्टी में भी अंडे देती है। इसका निम्फ एवं वयस्क दोनों ही पत्तियों, कोमल भागों एवं फलियों का रस चूसते हैं जिसका कारण पौधे कमजोर हो जाते नहीं और सूखने लगते हैं। पौधों की बढ़वार रूक जाती है। नियंत्रण के उपाय वग को चुनकर नष्ट कर देना चाहिए। क्वीनालफास 25 ई. सी. या इन्डोसल्फान 35 ई.सी का छिड़काव ( एक लीटर/हे.) करना चाहिए। पिस्सू भृंग वयस्क कीट कूड़े के ढेरों में शीतकाल व्यतीत करता है। इसका आक्रमण सरसों जाति के फसलों के अलावा कपास, गेहूं, धन आदि पर होता है। मादा कीट अपने अंडे जमीन में पौधों के नजदीक देता है। इसका ग्रब जड़ को खाती है। भृंग बीज पत्रों एवं छोटे पौधों की पत्तियों को छेद कर खाती है फलत: पत्तियों में छेद ही छेद दिखाई पड़ते हैं। कभी - कभी सम्पूर्ण फसलों का नाश हो जाता है। इसका प्यूपा जमीन में बनता है। नियंत्रण के उपाय चूंकि लाही के वृद्धि के लिए शीतकाल में बादल वाला मौसम सबसे उपयुक्त होता है और यह मौसम प्राय: दिसंबर के अंतिम समाप्त में शुरू होता है। अत: अगत फसल लगाना चाहिए। अक्टूबर की पहली सप्ताह में सरसों की बोआई करने से लाही के आक्रमण से बचा जा सकता है। अगात किस्मों को लगाने से भी लाही के प्रकोप से बचाव होता है। नीम युक्त कीटनाशी या खैनी के डंटल से बना कीटनाशक का व्यवहार करना चाहिए। अधिक प्रकोप होने पर रासायनिक कीटनाशी का व्यवहार करना अनिवार्य है। निम्नलिखित दशा में रासायनिक कीटनाशी जैसे मिथाइल डिमेटोन 25 ई. सी., डायमेथोयट 30 ई. सी. का छिड़काव करना चाहिए। क. जब केंद्रीय प्ररोह के अग्रभाग के 10 से. मी. पर 50-60 लाही मौजूद हो, ख. केन्द्रीय प्ररोह के अग्रभाग के 0.5 – 1.0 से. मी. लाही से ढका हो। ग. जब लाही के प्रकोप 40-50 प्रतिशत हो जाय तब रासायनिक कीटनाशी का व्यवहार करना आवश्यक है। आवश्यकतानुसार दूसरा छिड़काव 15 दिनों के बाद पुन: करें। तीसी के गॉल मिज के नियंत्रण के उपाय तीसी के अलावा इस कीट के आक्रमण अंडी, कॉफ़ी, चाय एवं अन्य जंगली पौधों पर होता है। मादा मक्खी फूलों एवं कोमल हरी कलियों में अंडे देती है। इसका पिल्लू को मैगट कहा जाता है। मैगट कलियों को भीतर ही भीतर खाते रहता है और उनके अंदर का संपूर्ण भाग खा जाता है। पूर्ण विकसित मैगट का रंग गुलाबी होता है जिसकी लंबाई 2.0 मि. मी. होती है। क्षतिग्रस कलियों एवं फूलो में फल नही आते हैं। पूर्ण विकसित मैगट मिट्टी में चला जाता है और वहीं पर कोकून बनाकर प्यूपा में परिवर्तित हो जाती है। नियंत्रण के उपाय कली बनने के समय से ही दो तीन बार छिड़काव करना चाहिए। पहला छिड़काव मिशाइल डिमेटोन 25 ई. सी. (एक ली./हे) से कली बनने के समय करना चाहिए जबकि दूसरा छिड़काव 15 दिनों बाद डायमेथोयट (एक लीटर/ए\हे.) से करना उत्तम होता है। तीसी का सेमीलूपर मादा कीट पत्तियों की निचली सतह पर अलग – अलग अंडे देती है। एक सप्ताह में अंडे से पिल्लू निकलता है। नवजात पिल्लू का रंग हरा होता है जो प्रारंभ में ही पत्तियों को खाना शुरू करती है। पूर्ण विकसित पिल्लू हरा रंग के होता है जिसकी लंबाई 30-35 मि. मी. होती है। पूर्ण विकसित पिल्लू पत्तियों को मोड़कर रेशमी धागों से बांधकर उसी में प्यूपा में बदल जाती है। तीसी के अलावा यह तिल, अरहर, मटर, गोभी, चुकन्दर, बैगन, आलू एवं अन्य जंगली पौधों को खाता है। नियंत्रण के उपाय क्वीनालफा स 1.5% धुल या इन्डोसल्फान 4% धुल का भूरकाव 10 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से करना चाहिए। इन्डोसल्फान 35 ई. सी. या क्वीनालफास 25 ई. सी. का छिड़काव (एक ली/हेक्टर) लाभदायक होता है। धान के कीट के नियंत्रण के उपाय धान के तनाछेदक तनाछेदक के अनेक जातियाँ पायी जाती है जिसमें पीला तनाछेदक प्रमुख है। वयस्क कीट प्राय: रात्रि में बिचरते हैं। नर मादा अपने जीवनकाल में 80-200 तक अंडे देती है। अंडे प्राय: 7-8 दिन में फूट जाते हैं एवं पिल्लू निकल आती है। नवजात पिल्लू कुछ समय तक पट्टी के उत्तकों को खाती है उसके बाद गांठ के पास से तना में छेदकर उसमें प्रवेश कर जाती है और तना के मध्य में रहती है और अंदर की ओर खाती रहती है। अधिक प्रकोप होने पर ऊपर की पत्तियाँ भुरी होकर सूख जाती हैं, किन्तु निचली पत्तियाँ हरी बनी रहती है। इस अवस्था को मृतकेंद्र (डेड हार्ट) कहते हैं इसमें बाली नहीं निकलती है। बाली निकल जाने के बाद कीट के आक्रमण होने पर बाली सूखकर सफेद हो जाती है एवं उसमें दाने भी नहीं बनते हैं। यदि दाने पड़ते भी है तो वे सिकुड़े हुए होते हैं। नियंत्रण धान की रोपाई के पांच दिन पूर्व बिचड़ा में ही दानेदार कीटनाशी जैसे कारटाप हाइड्रोक्लोराइड 4 जी या कार बोफूरान 3 जी या क्लोरपारीफास 10 जी या क्विनालफास 5जी का व्यवहार 1.0 किलोग्राम ए. आई. की दर से करना चाहिए अर्थात कारटाप हाइड्रोक्लोराइड 1.0 किलो ग्राम या कारबोफूरान 12 किलोग्राम या क्लोरोपारीफास 4 किलोग्राम या क्वीनालफास 8 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से व्यवहार करना चाहिए। दानेदार कीटनाशी के व्यवहार के समय बिचड़ा के खेत में 4-5 सें. मी. पानी रहना जरूरी है। आवश्यकता होने पर धान रोपने के 35 एवं 55 दिनों के बाद मिथाइल डिमेटोन का छिड़काव करना चाहिए। धान का साँढ़ा कीट पूर्ण विकसित मक्खी एक मच्छर के समान होती है। वयस्क कीट रात्रि में सक्रिय होते हैं। एक मादा अपने जीवनकाल में 100 से 285 तक अंडे देती है। मादा मक्खी पत्ती के आधार या पर्ण पटल पर पर अंडे देती है। तीन दिन में अंडे फूट जाते हैं। नवजात शिशु पर्णच्छ्दों के बीच नीचे पहूंचकर बढ़वार बिन्दु को खुरच- खुरच कर खाना प्रारंभ कर देता है। शिशु के खाने के प्रतिक्रिया स्वरूप सिलभर शूट का निर्माण होता है जो प्याज की गोल पत्ती के समान दिखाई देता है। ऐसे तनों पर बाली नहीं निकलती है। धान में कल्ले निकलने के समय इस कीट का प्रकोप बढ़ जाता है। नियंत्रण के उपाय तनाछेदक के नियंत्रण के इए व्यवहार की गई कीटनाशी से इस कीट का भी रोकथाम हो जाता है। धान का बभनी मादा कीट पत्ती के निचले भाग में सिरे के पास एक – एक करके अंडे देती हैं ये अंडे धान को पत्तियों के निचले भाग की वाह्यत्वचा के भीर अंशत: धंसे रहते है। अंडे की उपस्थिति एक सफेद दाग से से पहचानी जा सकती है। एक मादा अपने जीवनकाल में 55 से 100 अंडे देती है। अंडों से 4-5 दिनों में शिशु (ग्रब) निकलते हैं। ये शिशु पत्तियों के दोनों सतहों के बीचोंबीच रहकर कोशिकाओं को खाता है जिसके कारण पत्तीओं में उजली धारियाँ बन जाती है। ये धारियाँ विशेष रूप से मध्यशिरा के समानांतर होती है। अधिक प्रकोप होने पर पत्तियाँ सफेद हो जाती है एवं अंतत: गिर जाती है। वयस्क कीट पत्तियों को खुरचकर हरियाली को खा जाते हैं जिसके कारण पत्तियाँ सूखकर गिर जाती है। नियंत्रण : क्लोरोपारीफास 20 ई. सी या क्वीनालफास तरल का छिड़काव करना लाभदायक होता है। धान का बकया कीट वयस्क कीट छोटा होता है जिसका रंग वर्फ जैसे सफेद होता है। कीट का पंख सफेद या हल्के भूरे रंग एवं पीले रंग की धारियों से युक्त होता है। इस कीट का आक्रमण छोटे पौधों खासकर जल्द रोप गए पौधों पर अधिक होता है किन्तु कभी – कभी ये बड़े पौधों को भी हानि पहुंचाते हैं। इस कीट का शिशु अपने शरीर के चारों तरफ पत्तियों को लपेटकर खोल बना लेती है तथा उसी में रहकर पत्तियों को काट – काटकर खाती है। पत्तियों द्वारा बनाया गया खोल (नाली) एवं पत्ती का कटा भाग पानी में तैरता हुआ दिखाई पड़ता है। नवजात शिशु पत्तियों के निचला भाग को खुरचकर खा जाती है एवं ऊपरी भाग वैसा ही लगा रहता है जो कागज के समान दिखाई पड़ती है। नियंत्रण के उपाय आक्रांत खेतों से 4-5 दिनों तक पानी को निकाल देना चाहिए। रस्सी के सहारे शिशु (पिल्लू) द्वारा बनाए गए खोल एवं पिल्लू को गिराकर इकट्ठा करके नष्ट कर देना चाहिए। क्वीनालफास 1.5 प्रतिशत धुल या मिथाइल पाराथियोन 2 प्रतिशत धुल का भूरकाव 10 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से करना चाहिए। धान का गंधीवग वयस्क कीट 1.4 से 1.7 से. मी. लंबा 0.3 से 0.4 सें मी. चौड़ा होता है। इसका रंग हरापन लिए हुए भूरा होता है। इसका शिशु लंबा एवं पीलापन लिए हुए हरा होता है वयस्क दोनों ही पत्तियों का रस चूसते हैं जिसके कारण पत्तियों में पीले धब्बे भूरा लिए हुए दिखाई पड़ते हैं फलत: पत्तियाँ पीली होने लगती है, पौधों की बढ़वार रूक जाती है। बाली में दूध आने पर कीड़े, बाली का रस चूस लेते हैं जिसके कारण दानों में छोटे – छोटे भूरे धब्बे बन जाते हैं। रस चूसने के कारण दाने सिकुड़ जाते हैं। ऐसे दानों को खखरी कहते हैं। नियंत्रण के उपाय गंधी कीट के नियंत्रण के लिए क्वीनालफास 1.5 प्रतिशत धूल या मिथाइल पाराथियोन 2 प्रतिशत धुल का भुरकाव 10 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से करना चाहिए। धान का हरा मधुआ नर कीट के अगले पंख पर गहरे रंग काला धब्बा पाया जाता है। मादा कीट में इस प्रकार के धब्बे नहीं होते हैं और अगला भाग भूरे रंग का होता है। निम्फ एवं वयस्क दोनों ही पत्तियों, कोमल तनों एवं एवं अन्य कोमल भागों से र्स चूसते हैं जिसके कारण पौधे छोटे एवं पीले हो जाते हैं। नियंत्रण के उपाय मिथाइल डिमेटोन तरल का छिड़काव (1.0 मि. ली./ ली. पानी) करने से कीड़ों का नियंत्रण होता है। इमिडाक्लोरोपरिड का छिड़काव (3 मि. ली./10 ली. पानी) प्रभावकारी होता है। भूरा मधुआ यह कीट गहरे भूरे रंग का होता है। मादा कीट पट्टी के मध्य शिरा के पास खुरचकर या पट्टी के पर्णच्छद को खुरचकर अंडे देती है। यह 200 – 350 तक अंडे देती है। अनुकूल वातावरण में अंडे 5-8 दिन में फूटते हैं। यह कीट पौधे के तने से रस चूसते हैं फलत: फ्लोएम एवं जाइलम को नुकसान होता है। ताने के बीच के पिथ को खाने से पत्तियाँ सूखी हुई एवं भुरी हो जाती है। फसलें प्राय: गोलाकार सकती में सूख जाती है है जिसको हौपार वर्न कहते हैं। नियंत्रण के उपाय इमिडाक्लोपरिड का छिड़काव (3 मि. ली./ली. पानी) करने से भूरा मधुआ को नियंत्रित किया जा सकता है। सैनिक कीट कल्ले आने की अवस्था में सैनिक कीट का शिशु झुंड में आक्रमण करता है इसको आरोहक कटवी में नाम से भी पुकारते हैं। कल्ले की अवस्था में शिशु शाखा को काट देता है। इस कीट का आक्रमण अधिकतर टांड भूमि वाले फसलों पर या वैसे खेतों में होता है जिसमें पानी का जमाव नहीं होता है। इसका आक्रमण प्राय: रात में ही होता है और दिन में पौधों के बीच या ढेलों में छिपा रहता है। नियंत्रण के उपाय डायक्लोरोभोस 5 मि. ली. एवं 10 लीटर पानी के मिश्रण तैयार पर छिड़काव करने से लाभ होता है। अरहर के कीट नियंत्रण के उपाय पलम मौथ इस कीट का आक्रमण अरहर, सेम, कुलथी इत्यादि पर होता है। मादा कीट कोमल भागों से जैसे छोटी पत्तियाँ, छोटी फलियाँ, फूल की कलियाँ पर एक – एक करके अंडे देती है। इन अंडों में 3-5 दिन में शिशु निकलता है जिसका रंग हरा – भूरा होता है। इसका शिशु प्रारंभ में पत्तियों को खाता है तथा बाद में फली को छेदकर बीजों को खा जाता है। पूर्ण विकसित पिल्लू फली के बाहर निकलर प्यूपा में बदल जाती है यह प्यूपा फली की सतह पर पाया जाता है। फली मक्खी मादा कीट फली में छेदकर अंडे देती है। 3-4 दिनों में अंडे फूटने पर शिशु (मैगट) निकलता है जो अपने को रेशमी धागों से चिपका लेता है और उसे ही खुरच- खुरच कर खाता है। बाद में मैगट (शिशु) सुरंग बनाकर खाता है। मैगट सुरंग में मल भर देता है। यह फली के अंदर प्रवेश करके बीज को खाता है। पूर्ण विकसित मैगट बीज से बाहर निकलकर फली में एक छेद के पास ही प्यूपा में परिवर्तित हो जाता है। इसका मैगट तने में छेद करके उसको भी क्षति करता है। फली वग प्रौढ़ वग लगभग 20 मि. ली. लंबा होता है। एक सप्ताह में अंडे से शिशु (निम्फ) निकल आते हैं। नवजात निम्फ कुछ - कुछ लाल रंग का होता है। अंतिम एवं पांचवें निर्मोचन के बाद वग का रंग भूरा हो जाता है। वयस्क एवं निम्फ दोनों ही पत्तियों, कोमल तने एवं पुष्प की कलिकाओं का रस चूसते हैं किन्तु इसका आक्रमण मुख्यरूप से फलियों पर होता है। जिसके कारण फलियों पर हल्के रंग के धब्बे बन जाते हैं। अधिक प्रकोप होने पर फलियाँ सिकुड़ जाती है, दाने का विकास नहीं हो पाता है। पट्टी एवं प्ररोह मोड़ कीट (यूकोस्मा क्रिटिका) मादा कीट पत्तियों के निचले सतह में अंडे देती है। एक सप्ताह में अंडे फूटने के बाद पिल्लू पत्तियों की बाह्यत्वचा को खुरचकर खाती है किन्तु बाद में पत्तियों को मोड़कर उसी में रहकर पत्तियों को खाती है। चित्तीदार फलीबेधक (मारूका) पूर्ण विकसित पिल्लू 2 सें. मी. लंबी होती है। इसका शिशु पुष्पगुच्छा, कली एवं पत्तियों को खाकर बर्बाद कर देती है। प्रारंभिक अवस्था में पिल्लू कोल पत्तियों को जाला में बांधकर पत्तियों को खुरचकर खाती है। जब पौधे में पुष्पगुच्छा खिलते हैं तो उन्हें भी जाला में बांधकर खाती है। जब कलियाँ निकलती हैं तो कलियाँ को भी जाला में लपेटकर कलियाँ के अंदर प्रवेश कर जाती है। फलियाँ बनने पर पिल्लू फली में प्रवेश कर दानों को खा जाती है। क्षतिग्रस्त फली सिकुड़ जाती है तथा सूखकर काली हो जाती है। नियंत्रण के उपाय प्रयोगों के आधार पर यह सबित हो चुका है कि अरहर फसल में दो या तीन बार छिड़काव करने से अधिक फायदा होता है। दो या तीन छिड़काव करने से भी प्रकार के छेदक कीड़ों से फसलों को बचाया जा सकता है। पहला छिड़काव फसलों में 50 प्रतिशत फूल निकलने पर एवं दूसरा छिड़काव 15 दिनों के बाद करना चाहिए। आवश्यकता होने पर तीसरा छिड़काव 15 दिनों के बाद करना चाहिए। आवश्यकता होने पर तीसरा छिड़काव 15 दिनों के बाद करना लाभदायक होता है। पहला छिड़काव इन्डोसल्फान तरल (एक ली. पानी में 2 मि. ली.) या क्लोरपारीफास 20 ई. सी. (एक ली. पानी में 2 मि. ली.) से करना चाहिए। दूसरा छिड़काव मिथाइल डिमेटोन (एक ली. पानी में 1.0 मि. ली. कीटनाशी) से करना चाहिए। आवश्यकता होने पर तीसरा छिड़काव ट्रायजोफास तरल (एक ली. पानी में 1.0 मि. ली. कीटनाशी) से करना लाभदायक होता है। मूंग एवं उरद के कीड़े नियंत्रण के उपाय भुआ पिल्लू : मध्य आकार का पंतगा हल्का भूरे रंग का पीलापन लिए होता है जो रात्रि में प्रकाश की ओर उड़ता है। वयस्क कीट के पंखों पर काले - काले धब्बे होते हैं। इसके उदर का ऊपरी हिस्सा लाल रंग का होता है जिसके ऊपर छोटे – छोटे काले धब्बे पाए जाते हैं। इसमें बहुत छोटे – छोटे बाल होते हैं पूर्ण विकसित पिल्लू करीब 38 से 40 सें. मि. मी. लंबी होती है। इसका शरीर पीले नारंगी तथा भूरे रंग के बाल से ढंके होते हैं। मादा कीट झुंड में अंडा देती है। नवजात शिशु झुंड में पत्तियों की निचली सतह पर रहकर हरियाली को चाट जाते हैं जिसके कारण पत्तियों की उपरी सतह कागज के समान दिखलाई पड़ती है एवं केवल शिराओं का जाल ही रह जाता है। बड़ा होने पर पिल्लू इधर- उधर बिखर जाते हैं और पौधों की पत्तियों को क्षति पहूँचाती हैं। इसका पिल्लू रबी में लगाए गए नवजात परुधों को कभी- कभी पूरी तरह से नष्ट कर देती है। नियंत्रण के उपाय प्रारंभिक अवस्था में ही भुआ पिल्लू से ग्रसित पत्तियों को जमा करके मिट्टी में दबा देना चाहिए। भुआ पिल्लू की प्रारंभिक अवस्था को डायक्लोरभोस (डी. डी. भी. पी.) तरल को पानी में घोल बनाकर (10 ली. पानी में + 5 मि. ली. कीटनाशी +5.0 मि. ली टीपोल) छिड़काव करना चाहिए। सफेद मक्खी यह कीट 1.0 से 1.5 मि. मी लंबा होता है इसका शरीर का रंग पीला होता है। इनके दो जोड़ी सफेद पंख होते हैं एवं पिछले पंख काफी लंबे होते हैं। मादा कीट पत्तियों की निचली सतह पर अंडे देती है। 3-4 दिन में अंडों से निम्फ निकलते ही पत्तियों का रस चूसना प्रारंभ कर देता है। निम्फ कोमल तनों का भी रस चूसता है जिसके कारण पौधे कमजोर होकर सूखने लगते हैं। पत्तियों का आकार बेढंगा हो जाता है। यह कीट फसलों पर मधुविन्दु का विसर्जन करता है जिस पर काला फफूंद का विकास हो जाता है फलत: प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में बाधा उत्पन्न हो जाती है। यह कीट मूंग एवं उड़द में वायरस रोग (मोजेक) फैलाता है। नियंत्रण के उपाय नीमयुक्त कीटनाशी जैसे अचूक, निम्बेसीडीन (2 मि. ली. / लीटर पानी) का छिड़काव करना चाहिए। नीम तेल (1.0%) का छिड़काव भी लाभदायक होता है। मिथाइल डिमेटोन तरल (1.0 मि. ली./ली. पानी) का छिड़काव भी कामयाब होता है। हरा मधुआ वयस्क कीट 3.0 मि. मी. लंबा होता है। इसके पंखों पर छोटे काले धब्बे होते हैं। सिर पर दो काले धब्बे होतें हैं। निम्फ एवं वयस्क दोनों ही पत्तियों का रस चूसते हैं जिसके कारण पत्तियाँ सिकुड़ जाती है। पत्तियों का रंग पीला हो जाता है एवं बाद में भुरी होकर सूख जाती है। पत्तियाँ कप की तरह नीचे की ओर मूड़ कर सूख जाती है और जमीन पर गिर जाती है। यह कीट पत्तियों के चूसते समय विषैल पदार्थ छोड़ती है जिसका असर पत्तियों पर होता है। नियंत्रण के उपाय क. श्वेत मक्खी के नियंत्रण के लिए व्यवहार की गई कीटनाशी से इस कीट का भी नियंत्रण हो जाता है। ख. इमिडा क्लोप्रिड (टाटामिडा) के छिड़काव (3.0 मि. ली./ली. पानी) करने से इस कीट के प्रकोप से बचा जा सकता है। सेमिलूपर पूर्ण विकसित पिल्लू (लारवा) 30-35 मि. मी. लम्बी होती है, जिसका रंग हल्का पीलापन लिए हुए हरा होता है। पिल्लू के छूने से यह लूप बनाता है और नीचे गिर जाता है। इसका पिल्लू पत्तियों को खाती है। अधिक आक्रमण होने पर सम्पूर्ण पत्तियाँ विकृत हो जाती है। कभी कभी तो पूरी पत्तियों को खा जाती है और केवल शिराएँ ही बच जाती है। कभी – कभी पिल्लू कोमल प्ररोह एवं कलि को भी नुकसान करती है। नियंत्रण के उपाय इंडोसल्फान या क्लोरपारीफास तरल का छिड़काव (1.0 मि. ली./ली. पानी) लाभदायक होता है। डायक्लोरभास (नूभान 100 ई.सी.) का छिड़काव (500 मि. ली./हे.) प्रभावकारी होता है। लाही लाही प्राय: 2 मि. मी. लम्बे एवं गोलाकार होते हैं। इनके मुखांग चुभाने एवं चूसने वाले होते हैं। इसका निम्फ एवं वयस्क दोनों ही कोमल पत्तियों, प्ररोहें, फूलों एवं फलियों का रस चूसते हैं जिसके कारण पौधे कमजोर हो जाते हैं, पौधे पीले हो जाते हैं एवं पौधों की वृद्धि भी रूक जाती है। नियंत्रण के उपाय क. मिथाइल डिमेटोन तरल का छिड़काव (400 मि. ली./एकड़) लाभदायक होता है। ख. नीमयुक्त कीटनाशी जैसे अचूक या निम्बेसिडीन का छिड़काव (2.0 मि. ली./ली. पानी) करना चाहिए। मक्का के कीट तना बेधक वयस्क कीट हल्का पीलापन लिए हुए भूरे रंग का होता है। मादा कीट पत्तियों के गुच्छों में अंडे देती है। नवजात पिल्लू पत्तियों को खुरच-खुरचकर खाती है। और बाद में पत्तियों में छोटे – छोटे गोल छेद कर देती है। इसके बाद पिल्लू तना में प्रवेश कर तना को खाना शुरू कर देती है। पूर्ण विकसित पिल्लू हल्के भूरे एवं मटमैले रंग का होता है जिसका सिर काला होता है। पिल्लू की पीठ पर लंबी – लंबी चार धारियां होती है। पूर्ण विकिसत पिल्लू 2.5 सें. मी. लंबी होती है। पूर्ण विकसित पिल्लू तना के अंदर ही प्यूपा में परिवर्तित हो जाती है। यह कीड़ा मार्च से नवम्बर तक सक्रिय रहता है। यह कीट शीतकाल में मक्का के ठूंठ, बांस, सरकंडा आदि में जविन व्यतीत करता है। यदि कीट का आक्रमण अंकुरण के बाद ही होती है तो पौधों में ऊपर की पत्तियाँ यानि मध्य कलिका को मृतकेंद्र कहते हैं। यदि कीट का आक्रमण पौधा के बड़े होने पर होता है तो पौधा कमजोर हो जाता है एवं तेज हवा के चलने से पौधे गांठ से ही टूट जाते हैं। नियंत्रण के उपाय क. कीट ग्रसित पौधों को उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए। ख. दो तीन सप्ताह पुराने पौधों के ऊपरी चक्र में दानेदार कीटनाशी जैसे कारबोफूरान 3 जी या कारटाप हाइड्रोक्लोराइड 4 जी या क्लोरापारीफास 10 जी का 15 दाना डालना चाहिए। दानेदार कीटनाशी के अभाव में इंडोसल्फान 4% धुल या क्वीनालफास 2% धुल का 5 से 7.5 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से पत्तियों की ऊपरी चक्र से भुरकाव करना चाहिए। मूंगफली के हानिकारक कीट पर्ण सुरंगक मादा कीट पत्तियों के दबे हुए भाग में एक - एक कर अंडे देती है। 3-4 दिनों में अंडों से शिशु निकलते हैं जो पत्तियों में सुरंग बनाना प्रारंभ कर देता है फलत: पत्तियों पर सफेद धारियाँ बंद जाती है। अधिक प्रकोप होने पर पत्तियाँ बिल्कुल झिल्लीदार हो जाती है। सूखे स्थानों में इस कीट का प्रकोप बढ़ जाता है। नियंत्रण के उपाय डायमेथोयट तरल (800 मि. ली./हे.) या मिथाइल डिमेटोन तरल (एक लीटर/हे.) का छिड़काव करना चाहिए। मूंगफली का तनाबोधक इस कीट को रत्नभृंग के नाम से भी पुकारा जाता है। इसके शरीर पर धारीदार धात्विक चमक होती है तथा गहरा भूरा रंग का होता है। मादा भृंग रंग का होता है। मादा भृंग तने के आधार पर अंडे देती हैं। इन अंडों से प्राय: 3-5 दिन में शिशु (भृंगक) निकलते हैं। यह सफेद रंग का होता है। इसका शरीर का अगला भाग चौड़ा एवं पिछला भाग नुकीला होता है। नवजात भृंगक तने में छेद करके अंदर घुस जाता है एवं उसे भीतर ही भीतर खाते रहता है। कभी – कभी भृंगक तना से नीचे की तरफ खाना शुरू करता है जिसके करण तने में सुरंग बन जाती है फलत: पौधा सूखा जाता है। नियंत्रण के उपाय क. नियंत्रण के दानों को क्लोरपारीफास 20 ई.सी. में बिजोपचारित (12.5 मि. ली./किलोग्राम केरनल) करके लगाने से दीमक, सफेद भृंगक एवं तना वेधक के प्रकोप को नियंत्रित किया जा सकता है। ख. लिन्डेन धुल का व्यवहार (10.0 किलोग्राम/एकड़) बुनाई के पहले करने से भी दीमक, सफेद भृंगक एवं तना वेधक की क्षति को नियंत्रित किया जा सकता है। तिल के हानिकारक कीट नियंत्रण के उपाय तिल का कैपसूल वेधक कीट वयस्क कीट माध्यम आकार का होता है। इसका अगला पंख लाल पीले रंग का होता है एवं उनपर लाग रंग के टेढ़े निशान होते हैं। मादा कीट 150 अंडे देती है। अंडे अलग - अलग पौधे के कोमल भागों में देती है। नवजात पिल्लू पत्तियों की वाह्य त्वचा को खाती है तहत बड में कई पत्तियों को बांधकर उनको खाती है। पिल्लू कोमल तनों को भी खाती है। फली बन जाने पर कीट का लार्वा (शिशु) फली में छेदकर बीज को खाता है। नियंत्रण के उपाय इन्डोसल्फान 35 ई. सी. या क्वीनालफास तरल का छिड़काव (1.0 लीटर/हे.) करना चाहिए। तिल का हॉक मौथ वयस्क कीट का शरीर बड़ा होता है। पंख का रंग लाली लिए हुए भूरा होता है। इनके प्रत्येक पंख पर एक पीले रंग का धब्बा देता है। वयस्क कीट मधुमक्खी के छत्ते से शहद चूसता है। इसका शिशु पत्तियों को खाता है। कभी – कभी सम्पूर्ण पत्तियों को खा जाता है। नियंत्रण के उपाय कैपसूल बेधक कीट के नियंत्रण के लिए अपनायी गई कीटनाशी से इस कीट का नियंत्रण हो जाता है। तिल का गॉल मिज वयस्क कीट मच्छर के समान होता है जो लाल रंग का होता है। मादा मक्खी कलियों, फूलों अथवा कैपसूल में अंडे देती है। इनके अंडे 4-5 दिन में फूटते हैं जिससे सफेद रंग का मैगट (पिल्लू) निकलता है। मैगट फूलों को खाता है और कलियों में विकृति उत्पन्न करता है जिसके कारण गॉल का विकास होता है। इस प्रकार फसल में फूल एवं फल नहीं बन पाते हैं। नियंत्रण के उपाय मिथाइल डिमेटोन तरल का छिड़काव (1.0 ली./हे.) करने से कीट को नियंत्रित किया जा सकता है। गन्ना के कीट नियंत्रण के उपाय गन्ने के अलावा यह कीट मक्का, ज्वार, बाजरा, गेहूं, जौ, जई और सूडान घास पर भी आक्रमण करता है। कीट का निम्फ एवं वयस्क दोनों ही पत्तियों की निचली सतहों से रस चूसते हैं जिसके कारण पत्तियाँ पीली हो जाती है है एवं बाद में सिकुड़ जाती है। अधिक प्रकोप होने पर ईख सूख जाती है एवं मर भी जाती है। कीट एक लसलसा द्रव विसर्जित करता है जिसको मधु विन्दु कहते हैं। यह तरह के दृश्य को दूर से ही देखे जा सकता हैं। पत्तियों पर काला फफूंद के विकास हो जाने से प्रकाश संश्लेषन की क्रिया में रूकावट पैदा हो जाती है फलत: पौधे कमजोर हो जाते हैं एवं रस शर्करा अंश की कमी भी जो जाती है। पूर्ण विकसित निम्फ पीला होता है जिसकी लंबाई 10 -15 मि. मी. होती है जिसके शरीर के पिछला किनारा से उजला रंग के धागे के समान के आकार के दो गुदप्रवर्ध निकल आते हैं। उस खेत के पास से गुजरने पर हल्की आवाज महसूस किया जा सकता है जहाँ कीड़ों का प्रकोप सबसे अधिक होता है। नियंत्रण के उपाय क. जिन पत्तियों पर अंडे हो उनको जमाकर नष्ट कर देना चाहिए। ख. खूँटी फसल नहीं लेना चाहिए। ग. निम्नलिखित कीटनाशी का व्यवहार करने से पायरिला के प्रकोप को नियंत्रित किया जा सकता है। आर्थिक क्षति का स्तर 3-5 निम्फ या वयस्क प्रति पट्टी होता है। क) अप्रैल से जून इमिडाक्लोप्रिड का छिड़काव (3 मि. ली./10 ली. पानी) करने से कीड़ों के प्रकोप को नियंत्रित किया जा सकता है। ख) अगस्त से अक्टूबर उपयुक्त कीटनाशी का व्यवहार करना लाभदायक होता है। आवश्यकतानुसार नीमयुक्त कीटनाशी जैसे अचूक, निम्बेसिडीन, निमेरिन (2 मि. ली./लीटर पानी) का व्यवहार करना बहुत जरूरी है। गन्ना का अगोला बेधक ईख के अलावे इसका आक्रमण सरकंडा एवं कुछ अन्य घास पर होता है। इस कीट का पतंगा सफेद रंग का होता है। पूर्ण विकसित पिल्लू की लंबाई 25-30 मि. मी. होती है। कीट मार्च से नवंबर तक सक्रिय राहत है। पतंगा रात में सक्रिय होते हैं एवं दिन में इधर- उधर छिपे रहते हैं मादा पतंगा पत्तियों के निचले सतहों में झुंड में अंडे देती है। इस कीट में चार या पांच पीढ़ियों एक साल में होती है। शुरू के दो पीढ़ियों के पिल्लू ही छोटे पौधों को क्षति पहुँचाते हैं। नवजात पिल्लू पत्तियों को मोटी शिराओं में छेदकर सुरंग बनाती है जहाँ से भोजन प्राप्त करता है। यह पिल्लू नीचे की पर छेदता हुआ बीच की पत्ती में घोस जाती है एवं बढवार विन्दु एवं कोमल भागों को खा जाती है। फलत: बीच की पत्तियाँ सूख जाती है जो लाल रंग की हो जाती है एवं पौधों की बढ़वार रूक जाती हैं। ऐसी सूखी पत्तियों को ‘डेड हार्ट’ कहते हैं। पौधे के मृत भाग को तोड़ने से एक प्रकार की दुर्गन्ध निकलती है जिससे हानि के अनुमान का पता चलता है यदि पौधों में गांठ बन जाने के उपरांत आक्रमण होता है तो वर्धन कली समाप्त हो जाती है और पिल्लू तीन चार गांठों तक घुस जाती है, फलत: यहाँ के अलग-बगल की ऑंखें अंकुरित हो जाती है जिसके कारण ऊपरी भाग गुच्छेदार हो जाता है जिसे ‘बंची टॉप’ कहते हैं। इसके आक्रमण से उपज एवं चीनी में भारी कमी हो जाती है। पूर्ण विकसित पिल्लू रेशम का कोकून बनाकर गन्ने के अंदर ही प्यूपा में बदल जारी हैं। जहां से 7-9 दिन से पंतगा निकलता है। नियंत्रण के उपाय क. अंडों की समूह को जमाकर नष्ट कर देना चाहिए। ख. गन्ने को जमीन के नजदीक से काटना चाहिए। ग. मध्य फरवरी के पहले से गन्ने के सिर (अग्र भाग) को काटकर नष्ट कर देना चाहिए क्योंकी शीतकाल में पिल्लू सूशूप्तावस्था में रहती है। घ. जून की अंतिम सप्ताह या जुलाई के प्रथम सप्ताह में गन्ने के पौधों के आधार भाग में कर्बोफूरन 3 जी का व्यवहार 30 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से करना चाहिए। दानेदार कीटनाशी के व्यवहार करने के बाद पौधों के चारों तरफ हल्की मिट्टी चढ़ाकर हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। गन्ने का मूलबेधक इसका आक्रमण बनचरी, ज्वार एवं सरकंडे पर भी होता है। मादा कीट रात्रि के समय पत्तियों के निचले सतहों एवं तनों पर अंडे देती है। कभी-कभी मादा कीट अपने अंडे मिट्टी के ढेलों पर देती है। ये अंडे प्राय: अप्रैल के अंतिम सप्ताह या मई के प्रथम सप्ताह में दिए जाते हैं। नवजात पिल्लू पत्तियों एवं तनों के सहारे आधार की ओर पहूँचती है जहाँ कोमल भाग ढूँढकर उसमें छेद बनाना प्रारंभ करती है और तना के अंदर ही अंदर खाती है। इस प्रकार के भी का तना खोखला हो जाता है जिसके फलस्वरूप केन्द्रीय पर्णचक्र सूख जाता हैं जिसे मृत केंद्र (डेट हार्ट) कहते हैं। इस मृत केंद्र को आसानी से नहीं खींचा जा सकता है जैसा कि अगोले बेधक में होता है। इसका पिल्लू प्राय: गन्ने के निचले भाग में होती है जो कभी- कभी गन्ने को खींचने से बाहर आ जाता है। इसकी क्षति 6-7 सप्ताह तक चलती रहती है, इसके बाद यह पूर्ण रूप से विकसित हो जाती है। पूर्ण विकसित पिल्लू जमीन की सतह से ऊपर आकर ताने के अंदर छेद बनाती है किन्तु पिल्लू बाहर नहीं निकलती है बल्कि उस छेद को रसदार पदार्थ से बंद कर देती है एवं अंदर में ही प्यूपा के रूप में परिवर्तित हो जाती है। प्यूपा के समय पूरा होने पर पतंगा उसी छेद से बाहर निकलता है। नियंत्रण के उपाय क. फसल की कटाई के बाद खेतों की गहरी जुताई करनी चाहिए एवं ठूठों को एकत्रित करके जला देना चाहिए ताकि छिपी हुई पिल्लू नष्ट हो जाय। ख. मृत केंद्र युक्त पौधों को जड़ सहित नष्ट कर देना चाहिए। ग. गन्ना बोते समय लिन्डेन धुल या क्लोरपारीफॉस 1.5% धुल का व्यवहार 10 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से करना चाहिए। घ. पतंगों को पकड़ने के लिए प्रकाश पाश का प्रयोग करना चाहिए। ङ. क्लोरपारीफॉस 20 ई. सी. के पानी में घोल बनाकर (2.5 मि. ली./लीटर पानी) झरना द्वारा नाली में बिछाई गई गेड़ियों में छिड़क आकर गेड़ियों को शीघ्र ही मिट्टी से ढंक देना चाहिए। यदि यह उपचार प्रारंभ में न किया गया हो तथा खड़ी फसल में कीट की समस्या प्रारंभ हो गई हो तो उपयुक्त मिश्रण (2.5 मि. ली./लीटर पानी) के घोल से पौधों के पास पटाकर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए। गन्ना प्ररोह (शूट) वेधक गन्ने के अतिरिक्त इसका आक्रमण मक्का, बाजरा, सरकंडा एवं बरू आदि घासों पर होता है। कीट मार्च से नवंबर तक सक्रिय होता है। पूर्ण विकसित पिल्लू 20-25 मि. मी.लंबी होती है। इसके शारीर पर पांच हल्के इन्द्र्धनूष रंग की लंबी धारियाँ होती है। पूर्ण विकसित पिल्लू फरवरी महीना प्यूपा में परिवर्तित होती है एवं मार्च में वयस्क कीट किए रूप में निकल आता है। पतंगा रात्रि में सक्रिय होते है। मादा पतंगे पत्तियों के निचले सतहों में अंडे देती है। इन कीड़ों का आक्रमण नवजात पौर्धों पर जिनमें गांठें नहीं बनी होती, अप्रैल से जून माह तक होता है। नवजात पिल्लू पौधे के आधार पर प्ररोह में छेद कर अंदर चली जाती है एवं भीतरी भाग को खाते रहती है जिसके फलस्वरूप पहले बीच की पत्ती (केन्द्रीय पर्ण चक्र) सूख जाती है जिसे ‘मृत केंद्र’ कहता हैं, अंत में पूरा का पूरा पौधा सूख जाता है। गन्ने में गांठ बन जाने के आड़ आक्रमण होने पर ‘मृत केंद्र’ नहीं बनता है एवं क्षति कुछ गांठ तक ही सीमित रहती है। इस कीट द्वारा हानि को बाहर से निम्न आधारों पर आंका जा सकता है। क. प्रथम पर्णच्छेद के भीतरी भाग में हानि के चिन्ह ख. तने में छेदों की उपस्थिति ग. ‘मृत केंद्र को खींचने से बुरी गंध निकलना। प्यूपा बनने के पीला पिल्लू एक छोटा सा छिद्र बनाती है जिसके द्वारा पतंगा बाहर निकलता है। नियंत्रण के उपाय मूल बेधक के नियंत्रण के लिए अपनायी गई उपाय से इस कीट को भी नियंत्रित किया जा सकता है। इसके अलावे दानेदार कीटनाशी क्लोरपारीफास 10 जी के 10 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर के गाभा में ईख रोपने के 30 एवं 60 दिनों के बाद व्यवहार करने से कीड़ों के आतंक को रोका जा सकता है। गन्ने का वृंत (स्टाल्क) वेधक इस कीट के नियंत्रण के लिए काइलो ओरिसिलिया है कपूर ने 1907 में इसे कैलोट्रीय वंश में रखा। यह कीट गन्ना के अलावा जानसन घास, धान, गेहूं, ओट एवं बरू (बाजरा) जाति के फसलों पर आक्रमण करता है। इसका कीट सालों भर पाया जाता है किन्तु मार्च से अक्टूबर तक सक्रिय होता है। पूर्ण विकसित पिल्लू शीतकाल ईख या खूटियों पर बिताता है किन्तु यह शीत – निष्क्रिय अवस्था में नहीं रहती है। यह कीट गन्ना के लिए हानिकारक होता है। कभी- कभी यह कीट जनवरी में प्यूप में परिवर्तित हो जाता है एवं फरवरी के प्रारंभ में पतंगा निकल आता है। मादा पतंगा पर्णच्छद या को खुरचकर खाती है और बाद में छिलका में गोल छेद बनाकर पोरियों में प्रवेश करके भीतरी भाग को खा जाती हैं जिसके फलस्वरूप नये छोटे पौधों में मृत केंद्र बन जाता है। पूर्ण विकसित पिल्लू पोरियों के अंदर ही प्यूपा में परिवर्तित हो जाती है। प्यूपा में परिवर्तित होने के पहले पिल्लू निकास द्वार बनाती है है जिसके द्वारा ही पतंगा बाहर निकलता है। एक साल में 5-6 पीढियां पायी जाती है। इस कीट का आक्रमण उन स्थानों पर सबसे अधिक होता है जिस खेत में पानी भरा रहता है या जहाँ फसलें जमीन पर गिर जाती है फसलों में नाइट्रोजन की खाद अधिक दिया गया हो। नियंत्रण के उपाय क. सर्वप्रथम खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए। ख. खेतों के खर – पतवार एवं जड़ों या ठूठों को जमाकर जला देना चाहिए। ग. गन्ने के टुकड़ों को क्लोरपारीफास 20 ई.सी. के घोल (2.0 मि. ली./ लीटर पानी) में डूबोकर बोने से कीड़ों को रोकथाम हो जाती है। घ. कीट ग्रसित पौधों को उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए। ङ. खूँटी फसल को नहीं उगाना चाहिए। च. इन्डोसल्फान 35 ई. सी. का घोल बनाकर (2.0 लीटर/हेक्टर) कम से कम दो बार छिड़काव करना चाहिए। पहला छिड़काव जून के अंत या जूलाई के प्रथम सप्ताह में तथा दूसरा अगस्त के मध्य में करना आवश्यक है। यदि आक्रमण अगस्त के बाद भी बढ़ता जाने पड़े तो तीसरा छिड़काव सितंबर के मध्य तक अवश्य कर देना चाहिए। इन उपायों से शीर्षबेधक (टॉप बोरर) का भी नियंत्रण हो जाता है। गन्ने की सफेद मक्खी वयस्क मक्खी छूटा (3.0 मि. मी.) एवं कोमल होता है जिसका पंख सफेद होता है उन पर सफेद चूर्ण जैसा पाया जाता है। कीट का शिशु जो छोटे काले रंग के होते हैं। तथा बाद में शिशु के शरीर पर सफेद मोम की परत जम जाती है। इस कीट की वृद्धि शीत ऋतू को छोड़कर सालों भर होती रहती है। अंडो से एक सप्ताह में शिशु (निम्फ) निकलते हैं। इस कीट का शिशु (निम्फ) ही पत्तीयों का रस चूसते हैं निम्फ का मूखांग बेधन एवं चूषण दोनों प्रकार के होते हैं। नवजात शिशु हल्के पीले रंग के होते हैं जो पत्तियों में अपने मूखांग चुभाकर रस चूसते हैं जिसके कारण पत्तियाँ हल्के पीले रंग बदल जाती हैं एवं धीरे – धीरे सूखने लगती है। पौधे कमजोर जो जाते हैं। कीट मधुरस का विसर्जन करता है जिसके ऊपर काले रंग के फूफून्द का विकास हो जाता है फलत: पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण क्रिया में रूकावट पैदा होती है। इस कीट का आक्रमण बाढ़ के क्षेत्रों में अधिक होता है तथा खूँटी फसल में भी अधिक होता है। ईख के अलावा इसका आक्रमण सरकंडा पर होता है। नियंत्रण के उपाय निचले पत्तियों पर कीड़ों के प्यूपेरियां होते हैं जिसको करके नष्ट कर देना चाहिए। खूँटी फसल नहीं लेना चाहिए। यदि श्वेतमक्खी का आक्रमण हो जाता है तो निम्नलिखित कीटनाशी में से बदल – बदल कर छिड़काव करना चाहिए। अगस्त से अक्टूबर के बीच दो – तीन बार छिड़काव आवश्यकतानुसार करना चाहिए। मिथाइल डीमेटोन (मेटासिस्टॉक्स) (एक लीटर/हे.) या इमिडाक्लोप्रिड (टाटामिडा) का छिड़काव (3-4 मि. ली./10 ली. पानी) करना लाभदायक होता है। गन्ना का चूर्णीवग (मिली वग) इसका आक्रमण ईख के अलावा जंगली पौधों पर भी होता है। इस कीट की वृद्धि सालों भर होता है। मादा अधिक संख्या में अंडे कुछ – कुछ देती के बाद देती है। अंडों से कुछ ही घंटों में नवजात शिशु (निम्फ) निकल आते हैं। निम्फ का रंग गुलाबी होता है एवं ये सक्रिय अधिक होते हैं। निम्फ कुछ ही क्षणों में पूरे खेत में फ़ैल जाते हैं एवं ये सक्रिय अधिक होते हैं। अनुकूल भोजन (पौधे) के मिलते ही निम्फ गन्ने के निचली पोरियों (गांठो) पर स्थित पर्णच्छेद के अंदर चिपक जाती है। पर्णच्छद के हटाने से कीड़ों का समूह दिखाई पड़ता है। निम्फ एवं पंखरहित मादा पत्तियों एवं गन्ने का रस चूसती है। यह कीट अपने मुख से एक प्रकार का मधु विन्दु का स्राव करती है जिसपर फफूंदी विकसित हो जाती है जिसे कज्जली फफूंद कहते हैं । गन्ने का मौजेक रोग इसी कीट के द्वारा फैलता है। पंखरहित मादा का रंग गुलाबी होता है एवं शरीर गोल होता है। इसका शरीर खंडों में विभाजित होता है एवं पूरा शरीर सफेद चूर्ण से ढंका होता है। नर कीट सुस्त होते हैं जिसको केवल एक जोड़ी पंख होते हैं। नर कीट कुछ समय के लिए ही जीवित होते हैं एवं इसका काम माता से केवल मिलन होता है। नवजात निम्फ छोटे पौधों के निचली गांठों के पास ही रहती है किन्तु नवजात शिशु ऊपरी गांठे तक पहुँच जाते हैं निम्फ तेजी से रस चूसते हैं एवं 2-3 सप्ताह में वयस्क कीट में बदल जाते हैं। गर्मियों में इनकी जिन्दगी एक महीना के अंदर पूरी हो जाती हैं। इस प्रकार एक साल में अनेक पीढियाँ दिखाई पड़ती हैं। पूर्ण विकसित मादा करीब 3 मि. मी. चौड़ी होती है। चार – पांच महीने पुराने ईख की फसलों पर इसकी उपस्थिति होती है एवं फसलों की कटाई तक उपस्थिति बरकरार रहती है। सूखेग्रस्त क्षेत्रों में पाये जाने वाले गन्नों पर इसका आक्रमण अधिक होता है किन्तु जिस गन्ने का पर्णच्छद मजबूती से चिपके रहते हैं उस पर इस कीट का आक्रमण नगण्य होता है। नियंत्रण के उपाय क. सन्तुलित उर्वरक का प्रयोग कराना चाहिए। ख. आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहना चाहिए। ग. मिथाइल डिमेटोन का छिड़काव (1.0 ली./ हे.) करना लाभदायक होता है। गन्ना का काला वग वयस्क कीट का रंग काला होता है जिसकी लंबाई 6-7 मि. मी. होती हैं। इनके पंखों पर उजले धब्बे होते हैं। इस कीट का निम्फ छोटे होते हैं किन्तु वयस्क कीट के समान ही होते हैं। इस कीट की वृद्धि सालों भर होता है। गर्मियों में मादा कीट पर्णच्छेद के भीतर या कोमल पत्तियों के निचले सतहों पर गुच्छे में अंडे देती है। नवजात शिशु (निम्फ) एवं वयस्क दोनों ही छोटे पौधों के केन्द्रीय पत्तियों का रस चूसते हैं जिसके करण पत्तियों का रंग पीले हो जाते हैं ये कीट बढ़ते हुए पौधों के पर्णच्छेद के भीतर रहकर रस चूसते हैं। ये कीट गन्ने के उन किस्मों को अधिक पसंद करता है जिसका पर्णच्छेद चौड़ा एवं ढीला – ढाला होता है। मादा कीट शीत ऋतु में अंडे जमीन में देती हैं जिससे बसंत ऋतु में शिशु निकलते हैं। इस तरह मार्च – अप्रैल में नवजात निम्फ निकलते हैं। इस कीट का प्रकोप गन्ना के खूँटियों पर अधिक होता है तथा मई – जून का महीना अनुकूल होता है। इसका आक्रमण गन्ना के अलावा धान, मकई एवं अन्य घासों पर होता है। नियंत्रण के उपाय क. खूँटी फसल को नहीं लेना चाहिए। ख. अधिक प्रकोप होने पर क्लोरपारीफास 20 ई. सी. का छिड़काव (1.0 ली./हे.) खासकर ऊपरी चक्र की पत्तियों पर करना चाहिए। चूर्णीवग का नियंत्रण के लिए व्यवहार की गई कीटनाशी से इस कीट का भी नियंत्रण हो जाता है। स्त्रोत एवं सामग्रीदाता : समेति, झारखण्ड तथा कृषि गन्ना विकास विभाग , झारखण्ड सरकार सरसों में कीट और रोग प्रबंधन