<p style="text-align: justify;">“भारत में जलसंकट एक गंभीर समस्या है। मराठवाड़ा, बुन्देलखंड, राजस्थान समेत देश के कई हिस्सों में सूखा पड़ने की वजह से प्रत्येक वर्ष फसलें चौपट होती हैं। कई जगहों पर पेयजल का भी संकट है। कुल मिलाकर हालात इशारा कर रहे हैं कि आने वाले समय में जलसंकट और विकराल रूप लेगा। देश की बढ़ती आबादी के लिए पेयजल के अलावा बड़ी मात्रा में खेती के लिए पानी की जरूरत है। ऐसे में पानी के बेहतर प्रबंधन की सख्त आवश्यकता है, ताकि भविष्य में पानी के संकट का मुकाबला किया जा सके। सिंचाई में ऐसी पद्धति का इस्तेमाल करना होगा, जिससे पानी का बेहतर-से-बेहतर इस्तेमाल किया जा सके। देश में 60 प्रतिशत खेती बारिश के पानी पर निर्भर है। ऐसा नहीं है कि जलसंकट केवल भारत में ही है। विश्व के 181 देशों में यह संकट है। भारत इस सूची में 41वें स्थान पर है। खेती को अगर बचाना है, तो ऐसे विकल्पों पर विचार करना होगा, जिनमें सिंचाई में पानी की बर्बादी न हो। इस पूरी कवायद में हाइड्रोजेल महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसकी मदद से बारिश के पानी का भंडारण करके तब उपयोग में लाया जा सकता है, जब फसलों को पानी की सख्त जरूरत होती है।"</p> <p style="text-align: justify;">बाइड्रोजेल एक पॉलिमर है, जिसमें होती है। यह पानी में घुलता भी नहीं है। हाइड्रोजेल बायोडिग्रेडेबल होता है। इसके कारण इससे प्रदूषण का खतरा भी नहीं रहता। हाइड्रोजेल के इस्तेमाल से पानी को खेत भंडारित कर रखा जा सकता है। जब फसल को पानी की जरुरत होती है और अधिक समय तक बारिश नहीं होती है, तब हाइड्रोजेल से निकलने वाला पानी फसलों के काम आता है। इसमें चार गुना पानी सोख इसके लेने की क्षमता होती है। एक एकड़ खेत में महज 1 से 2 कि.ग्रा. हाइड्रोजेल ही पर्याप्त है। यह खेत की उर्वरा शक्ति को जरा भी नुकसान नहीं पहुंचाता है और 40 से 50 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी खराब नहीं हाेता है। इसलिए इसका इस्तेमाल ऐसे क्षेत्रों में किया जा सकता है जहां सूखा पड़ता है।</p> <p style="text-align: justify;">हाइड्रोजेल के कण बारिश होने पर या सिंचाई के समय खेत में जाने वाले पानी को सोख लेते हैं। जब बारिश नहीं होती है, तो इनसे खुद-ब-खुद पानी रिसता है, जिससे फसलों को पानी मिल जाता है। यदि फिर बारिश हो, तो हाइड्रोजेल दोबारा पानी को सोख लेता है और जरूरत के अनुसार फिर उसमें से पानी का रिसाव होने लगता है। खेतों में हाइड्रोजेल का एक बार इस्तेमाल किया जाये, तो वह 2 से 5 वर्षों तक काम करता है। इसके बाद ही यह नष्ट होता है। यह नष्ट होने पर खेतों की उर्वरा शक्ति पर कोई नकारात्मक असर नहीं डालता है। </p> <h3 style="text-align: justify;">कैसे काम करता है हाइड्रोजेल</h3> <p style="text-align: justify;">जब मृदा में नमी की मात्रा कम होने लगती है, तब हाइड्रोजेल का कार्य शुरू होता है। यह अपने कुल वजन का 350-400 प्रतिशत ज्यादा पानी अवशोषित कर सकता है। हाइड्रोजेल मृदा में प्रथम इस्तेमाल के बाद 2-5 वर्षों तक के लिए कारगर होता है। यह समय के साथ विघटित भी हो जाता है। इससे मृदा के प्रदूषित होने की भी कोई आशंका नहीं होती है। हाइड्रोजेल 40-50 डिग्री सेल्सियस के तापमान में सुगमता से कार्य करता है। बीज अंकुरण, किसी भी पौधे के प्रारंभिक विकास में सबसे महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। सफल अंकुरण पानी की उपलब्धता पर निर्भर करता है। मुख्य रूप से शुष्क और अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में मृदा की नमी के स्तर को नियमित रूप से बनाये रखना आवश्यक होता है। हाइड्रोजेल मृदा में अपनी जलधारण क्षमता द्वारा, पौधों में जल तनाव की स्थिति को आने से रोकता है तथा लंबे के बाद मुरझान बिंदु (विल्टिंग पॉइंट) तक पहुंचाता है। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC2.jpg" width="169" height="148" /></p> <h3 style="text-align: justify;">प्रयोग</h3> <p style="text-align: justify;">सामान्यतः एक एकड़ के लिए 1.5से 2.0 कि.ग्रा. हाइड्रोजेल के उपयोग की सलाह दी जाती है, लेकिन यह स्थान, मृदा एवं जलवायु पर भी निर्भर करता है। सर्वाेत्तम परिणाम के लिए हाइड्रोजेल को समय बुआई के समय प्रयोग करना चाहिए। यह बेहतर अंकुरण और जड़ फैलाव में मदद करता है। </p> <h3 style="text-align: justify;">उपयोग के लिए कुछ संस्तुतियां</h3> <ul style="text-align: justify;"> <li>हाइड्रोजेल को रेतीली मृदा में 2.5 कि.ग्रा./एकड़, 18 से 20 सें.मी. की गहराई में प्रयोग किया जाना चाहिए।</li> <li>काली मृदा (क्ले) के लिए 2.0-2.5 कि.ग्रा./एकड़, 8-10 सें.मी. की गहराई में हाइड्रोजेल का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।</li> <li>खेत को तैयार करने के बाद 2.0 कि.ग्रा. हाइड्रोजेल को 10-12 कि.ग्रा. महीन सूखी मृदा के साथ अच्छी तरह से मिलाना चाहिए। सम्पूर्ण मिश्रण (मृदा तथा हाइड्रोजेल) को बीज के साथ ही खेतों में डालना चाहिए। इससे अच्छे परिणाम मिलने की संभावना बढ़ जाती है।</li> <li>नर्सरी पौधों में 2-5 ग्राम हाइड्रोजेल को । वर्ग मीटर के आकार में 5 सें.मी. मृदा की गहराई पर प्रयोग करना चाहिए।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">हाइड्राेजेल के गुण</h3> <ul style="text-align: justify;"> <li>हाइड्रोजेल के गुण हाइड्रोजेल में अम्लीयता एवं क्षारीयता का अनुपात बराबर होता है, जिससे मृदा में यह उदासीन होता है और कोई हानिकारक प्रतिक्रिया नहीं करता है।</li> <li>यह उच्च तापमान में भी अच्छी तरह से काम करता है। इसलिए राजस्थान और बुंदेलखंड जैसे शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों के लिए बहुत ही उपयोगी है।</li> <li>यह अपनी क्षमता से कई गुना अधिक जल को धारण कर सकता है, जो इसको सूखा, शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों के लिए सबसे ज्यादा उपयोगी बनाता है।</li> <li>यह मृदा के भौतिक गुणों जैसे-छिद्रता, घनत्व, जलधारण क्षमता, मृदा की पारगम्यता तथा निकासी दर आदि को बेहतर बनाता है।</li> <li>हाइड्रोजेल वाष्पीकरण नियंत्रित करके मृदा एवं पौधे में नमी को बचाकर, फसलों की सिंचाई आवश्यकताओं को कम करता है।</li> <li>यह मृदा में जैविक गतिविधियों को भी बढ़ाता है, जिससे जड़ क्षेत्र में ऑक्सीजन की उपलब्धता बढ़ती है।</li> <li>हाइड्रोजेल बीज के अंकुरण की दर में भी सुधार करता है।</li> <li>यह 30-40 प्रतिशत तक सिंचाई जल तथा उर्वरक के उपयोग में भी कमी लाता है। </li> </ul> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), आदित्य कुमार सिंह-वैज्ञानिक, क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केन्द्र, भरारी, झांसी (उत्तर प्रदेश); नरेन्द्र सिंह-एसोसिएट प्रोफेसर, बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, बांदा (उत्तर प्रदेश); और एच.एस. कुशवाहा -प्रोफेसर, महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय, चित्रकूट, सतना (मध्य प्रदेश)</p>