मक्का बिहार भारत का प्रमुख मक्का उत्पादक राज्य है । इसकी खेती हमारे यहाँ खरीफ रबी एवं गरमा सभी मौसमों में की जाती है।हमारे यहाँ रबी मक्के की खेती वृहत पैमाने पर सिंचित अवस्था में मुख्यतः दियारा एवं टाल क्षेत्रों में की जाती है । खेत की तैयारी मक्का की बोआई के लिये एक-दो गहरी जुताई करके पाटा चला देना चाहिए जिससे की खेत ढेले रहित एवं मिट्टी भूरभूरी हो जाय। बोआई से पहले प्रति हेक्टेयर 10-15 टन गोबर की सडी़ खाद या कम्पोस्ट का व्यवहार करें । उन्नत प्रभेद मौसम प्रभेद परिपक्वता अवधि (दिन) उपज क्षमता (क्वि0/हे0) दानों का रंग खरीफ 25 मई से 15 जून संकर शक्तिमान-1 शक्तिमान-2 पूसा अगात संकर मक्का-3 गंगा-11 संकुल सुआन देवकी 110-115 110-115 85-90 100-110 85-90 100-110 60-65 65-70 40-45 45-50 40-45 45-50 सफेद सफेद पीला नारंगी पीला पीला सफेद रबी 15 अक्टूबर से 20 नवम्बर संकर शक्तिमान-1 शक्तिमान-2 शक्तिमान-3 शक्तिमान-4 राजेन्द्र संकर मक्का -1 राजेन्द्र संकर मक्का -2 गंगा-11 संकुल सुआन देवकी लक्ष्मी 150-155 145-150 150-155 150-155 155-160 155-160 150-160 145-150 155-160 150-155 75-80 80-85 85-90 95-100 65-70 65-70 60-65 55-60 65-70 60-65 सफेद सफेद नारंगी पीला नारंगी पीला पीला सफेद नारंगी पीला पीला सफेद सफेद बासंती एवं गरमा 15 फरवरी से 20 अप्रैल संकर शक्तिमान-1 शक्तिमान-2 गंगा-11 संकुल सुआन देवकी 105-110 105-110 100-105 145-150 155-160 70-80 60-70 50-55 50-55 55-60 सफेद पीला पीला पीला सफेद बीज दर 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीजोपचार बुआई से पूर्व बीज को फफूंदनाशक दवा कैप्टान, थीरम या वैेविस्टीन 2-2.5 ग्राम प्रति कि0 ग्रा0 बीज की दर से अवश्य उपचारित करें । बोआई की दूरी खरीफ फसल - 60 सें.मी. कतार से कतार और 20 सें.मी. पौधा से पौधा रबी फसल - 75 सें.मी. कतार से कतार और 25 सें.मी. पौधा से पौधा बासंती एवं गरमा- 60 सें.मी..कतार से कतार और 20 सें.मी. पौधा से पौधा बीज बोने की गहराई 3 से 5 से. मी. (रबी - 4 से 5 सेंमी.) उर्वरक की मात्रा (किलोग्राम/हे0 पोषक तत्व) उर्वरक बोने के समय घुटने भर के पौधे होने पर धनवाल निकलने के समय खरीफ नेत्रजन 30 40 30 स्फुर 60 - - पोटाश 40 - - रबी नेत्रजन 40 40 40 स्फुर 75 - - पोटाश 50 - - बसंतकालीन एवं गरमा नेत्रजन 40 40 स्फुर 40 - पोटाश 30 - रबी में दूसरी किस्त 50-60 दिनों के उपरान्त दें। खरीफ तथा बसंतकालीन एवं गरमा प्रभेदों के लिए दूसरी किस्त 35-40 दिनों के उपरान्त व्यवहार करें। जिंक सल्फेट का व्यवहार तीन साल में एक बार 20-25 किलोग्राम/हे0 की दर से करें । सिंचाई व जल प्रबंधन रबी एवं गरमा - 5 से 6 सिंचाई । मोचा निकलने से दाना बनने तक खेत में पर्याप्त नमी का रहना अत्यन्त आवश्यक है। खरीफ में सिंचाई की आवश्यकता प्रायः नहीं पड़ती है बल्कि जल निकास का प्रबंध अत्यंत आवश्यक है। सूखा पड़ने पर दानों में दूध बनते समय नमी के लिए सिचाई अवश्य करें । मक्का के साथ मिश्रित खेती रबी मक्का + आलू , मक्का + मूली, मक्का + मटर। खरीफ मक्का + झिंगन, मक्का + उड़द, मक्का + लोबिया, मक्का + अरहर । कटनी रबी मौसम में मोचा निकलने के 50 से 55 दिनों एवं खरीफ और गरमा मौसम में 35-40 दिनों बाद भुट्टे परिपक्व हो जाने पर कटनी कर लें। क्वालिटी प्रोटीन मक्का क्वालिटी प्रोटीन मक्का के लिये अनुशंसित प्रभेद- शक्तिमान-1, शक्तिमान-2, शक्तिमान-3, शक्तिमान-4 आदि हैं जिनसे प्रोटीन की माँग को पूरा किया जा सकता है। प्रोटीन कुपोषण, पौषणिक रक्ताल्पता, आत्यन्तिक क्षति, वृद्धि में होनेवाली बाधा आदि से बचने हेतु तथा इनके निदान हेतु प्रोटीन की जरूरत को महसुस करते हुये प्रत्येक व्यक्ति को क्वालिटी प्रोटीन उपलब्ध कराना अनिवार्य है। इनमें भी शिशुओं, स्कूल जाने वाले बच्चों, गर्भवती महिलाओं और वृद्ध लोगों के लिए प्रोटीन की उपलब्धता पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। क्वालिटी प्रोटीन मक्का में उच्च मात्रा में लाईसिन और ट्रीप्टोफेन होता है। इसमें ल्यूसीन और आईसोल्यूसीन कम मात्रा में होता है। सम्पूर्ण रूप से संतुलित अमीनो अम्ल संरचना वाले क्वालिटी प्रोटीन मक्का का खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिए सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया जा सकता है। इस उत्पाद का ग्रामीण उद्य़मशीलता के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है । राज्य के कृषि विश्वविद्यालय द्वारा कई प्रकार के उत्पाद विकसित किये गये हैं जो बालाहार, स्वास्थ्यवर्धक उत्पाद, पौष्टिक नाश्ता, सुविधाजनक भोजन ओैर विशेष भोजन के रूप में जाने जाते है। बालाहार छः माह के बच्चों की पोषणिक आवश्यकता को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है क्योंकि इस उम्र के बाद केवल माँ का दूध ही शिशुओं के लिये प्रर्याप्त नहीं होता है। बच्चों, गर्भवती महिलाओं और वृद्ध व्यक्तियों के लिये विशेष रूप से स्वास्थ्य वर्धक मिश्रण, लड्डू ,टॉफी, चॉकलेट सहित कई प्रकार के स्वास्थवर्धक उत्पाद तैयार किये गये है। बीमारी की परिस्थिति में कुछ विशेष भोजन की आवश्यकता होती है। ऐसे भोजन में कुछ पोषक तत्वों की अधिक मात्रा एवं कुछ की कम मात्रा में आवश्यकता होती है। इसके लिये उच्च तथा निम्न क्वालिटी प्रोटीन उत्पाद बनाये गये है जो संतुलित पोषक तत्व उपलब्ध कराने के साथ-साथ अपेक्षाकृत सस्ते भी हैं । मक्का के प्रमुख कीट एवं रोग तथा प्रबंधन प्रमुख कीट रोग तथा प्रबंधन कजरा कीट इस कीट के पिल्लू लम्बा, काला भूरा रंग का होता है, जो देखने में मुलायम एवं चिकना होता है। पिल्लु नये पौधों को जमीन की सतह से काटकर गिरा देता है। कीट दिन में मिट्टी के दरार में छिपे रहते है तथा रात में बाहर निकलकर पौधों को काटते हैं। प्रबंधन बीजोपचार कर बीज की बुआई करें। खड़ी फसल में आक्रमण होने पर खेत में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर खर-पत्वार का ढेर बना दें एवं सबेरे इसमें छिपे हुए कीट को नष्ट कर दें। क्लोरपायरीफॉस 20 प्रतिशत तरल का 4 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से घोल बनाकर फसल के जड़ पर छिड़काव करें। धड़ छेदक (स्टेम बोरर ) चिल्लो पारतेल्लुस वयस्क कीट गुलाबी रंग के मध्यम आकार का होता है, जिसके पंखों पर गहरी-भूरी लम्बवत धारियाँ होती है। पिल्लू तना में छेदकर भीतर के मुलायम भाग को खाता है जिससे गभ्भा सूख जाता हैं और पौधे मर जाते हैं। प्रबंधन 1. खेत की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करना चाहिए। 2. खेत को खर-पत्वार से मुक्त रखना चाहिए। 3. खेत में वर्ड पर्चर की व्यवस्था करनी चाहिए। 4. खेत में प्रकाशफंदा का प्रयोग करें I 5. कार्बाफ्यूरान 3 जी या फोरेट 10 जी दानेदार कीटनाशी का 4-5 दाने प्रति गभ्भा की दर से व्यवहार करें अथवा इमीडाक्लोरप्रिड 17.8 एस0एल0 1 मिलीलीटर प्रति 3 लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें। भुट्टा छिद्रक (हेलिकोवेर्पा अर्मिगेरा ) इसके वयस्क कीट पीले भूरे रंग का होता है, जिसके पिछले पंख पर काले रंग की पट्टी होती है। पिल्लू भुट्टे में प्रवेश कर दाने को खाता है। प्रबंधन फसल में उपस्थित मित्र कीटों का संरक्षण करें । खेत में बर्ड पर्चर का व्यवहार करें। प्रति हेक्टेयर 10-15 फेरोमोन ट्रेप खेत में लगायें। प्रकाश फंदा को लगाकर कीटों को नष्ट करें । 5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में नीम आधरित दवा का घोल बनाकर छिड़काव करें। नुभान (डाइक्लोरोभॉस) 0.5 से 1 मिलीलीटर का प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें। पत्रलांछन (झूलसा) लीफ ब्लाइट मेडिस में अंडाकार, पीले भूरे रंग के धब्बे पत्तियों पर बनते हैं जबकि टर्सिकम में हरे भूरे रंग के नाव के आकार के धब्बे बनते हैं। बाद में ये धब्बे आपस में मिलकर सारी पत्ती को झुलसा देती है। प्रबंधन फसल चक्र अपनाएं । खेत को खर-पत्वार से मुक्त रखें। कार्वेन्डाजीम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से अथवा थीरम 2 ग्राम प्रति किग्रा0 बीज की दर से बीजोपचार कर ही बुआई करें। मैन्कोजेब 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण का 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें। जीवाणु जनित तना सड़न(बैक्टीरियल स्टेम रोट) पौधे के नीचे से दूसरा या तीसरा अन्तर गाँठ मुलायम एवं बदरंग हो जाता है। ज्यादा आक्रान्त हो जाने पर पौधे वहीं से टूटकर गिर जाते हैं। आक्रांत भाग से सड़न की गंध आती है। प्रबंधन 1. खेत को खर-पत्वार से मुक्त रखें। 2. खेत में जल निकास की उत्तम व्यवस्था करें। 3. ब्लीचिंग पाउडर 12 किलोग्राम प्रति हेक्टयर की दर से आक्रांत भाग पर छिड़काव करें I हरदा (त्नेज) पत्तियों पर छोटे-छोटे गोल पीले रंग के फफोले बनते हैं जो फटकर पौधे को क्षति पहुँचाते हैं। प्रबंधन फसल चक्र अपनाये। खेत को साफ-सुथरा रखें। मैन्कोजेब 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण का 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें। तुलासिता रोग (डोव्नी मिल्ड्यू) पत्तियों में धारीनुमा धब्बे बनते हैं। बाद में पत्तियाँ मुरझाकर सूख जाती है ,क्रिया बंद जाती है। प्रबंधन 1. फसल चक्र अपनाये। 2. खेत को साफ-सुथरा रखें। 3. मैन्कोजेब 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण का 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें। स्रोत व सामग्रीदाता: कृषि विभाग, बिहार सरकार मक्का फसल का प्रबंधन