परिचय अमरुद एक ऐसा फल वृक्ष है जिसमें विपरीत दशाओं के प्रति काफी हद तक सहिष्णुता पायी जाती है। इसकी बागवानी प्राय: सभी प्रकार की मिट्टी में सफलतापूर्वक की जा सकती है। यह दूसरे फल की अपेक्षा अधिक गर्मी और सूखा सहन कर सकता है। अपनी लोकप्रियता और अनुकूलता के कारण इसकी बागवानी पूरे भारत में की जाती है लेकिन अच्छी किस्म के फल और उत्पादन की दृष्टि से उत्तर प्रदेश अपना विशिष्ट स्थान रखता है। जबकि बिहार का दूसरा स्थान है। अमरुद के फल में 1.5 प्रतिशत प्रोटीन, 0.2 प्रतिशत वसा,14.5 प्रतिशत कार्बोहाइट्रेट, 0.8 प्रतिशत लवण और 299 मिलीग्राम प्रति सौ ग्राम फल में विटामिन-सी पाया जाता है। ताजे फल के अतिरिक्त इसके फलों से जेली, चीज और अन्य संरक्षित पदार्थ बहुत अच्छे बनते हैं। विभिन्न प्रकार की भूमि एवं जलवायु के प्रति अनुकूलता, कम व्यय, सरल बागवानी और आंतरिक गुणों के कारण अमरुद की बागवानी की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। यह दिल के मरीज के लिए बहुत ही फायदेमंद है। भूमि और जलवायु अमरुद सभी किस्मों की मिट्टी में भलीभांति पनपता और फलता है लेकिन इसके लिए गहरी बलुई दोमट मिट्टी अधिक उपयुक्त है। अमरुद के फल नये बाढ़ (वृद्धि) पर लगते हैं, इसलिए अधिक नाइट्रोजनयुक्त मिट्टी इसकी बागवानी के लिए अच्छी मानी जाती है। किस्में अमरुद की बहुत-सी किस्में है लेकिन अच्छी उपज और स्वादिष्ट फलों के लिए बिहार राज्य हेतु निम्न किस्मों की सिफारिश की जाती है। इलाहाबादी सफेद सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। सरदार (लखनऊ-49) भी एक अच्छी किस्म है।इसके अतिरिक्त चित्तीदार, हब्सी, बेदाना, हरिझा, लालगूदा तथा केरला नामक स्थानीय किस्में राज्य के कई स्थान पर उगायी जाती है। प्रसारण बीज द्वारा तैयार पौधों के पैतृक गुणों में परिवर्तन हो जाता है। अत: पौधों का प्रसारण वानस्पतिक विधि द्वारा किया जाना चाहिए। बिहार राज्य में गूटी से तैयार पौधे का ही प्रचलन है। गूटी से बने पौधों की वृद्धि अधिक होती है लेकिन पौधे कम मजबूत होते हैं। बरसात के मौसम में लगातार तेज बारिश के साथ आंधी के कारण गूटी से बने पौधे जमीन पर झुक जाते हैं और कभी-कभी गिर भी जाते हैं क्योंकि ऐसे पौधों की जड़ें फाइव्रस (झब्बेदार) होने के कारण भूमि के अंदर कम जाती है। इसलिए जमीन से गिरफ्त कम हो जाती है लेकिन बडिंग, इनाचिंग तथा विनियर ग्राफ्टिंग द्वारा बने पौधों में यह दिक्कत पेश नहीं आती है। इन विधियों से बने पौधों में मूलवृंत का इस्तेमाल होता है जिनकी जड़ें काफी गहराई तक जाती है। पौधा लगाना अप्रैल में जमीन की 2-3 जुताई करके उसे समतल कर दें। खरपतवार इत्यादि जड़ समेत उखाड़कर निकाल दें। फिर मई में 6 x 6 मीटर की दूरी पर 60 x 60 सें.मी. आकार के गढ़े खोदें। सतह पर की मिट्टी एक ओर जमा करें तथा निचली मिट्टी दूसरी ओर जमा करें। मई के अंत में या जून के शुरू में दी जाने वाली खाद की आधी मात्रा सतह वाली मिट्टी में मिलाकर पहले भरें। फिर खाद की आधी मात्रा नीचेवाली मिट्टी में मिलाकर भरें। इसके बाद गढ़ों की अच्छी सिंचाई करें जिससे मिट्टी अच्छी तरह बैठ जाए। मिट्टी भरते समय प्रति गढ़ा 30 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद, 1 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट तथा 2 किलोग्राम लकड़ी की राख मिलावें। चुने हुए अंटा या साटा कलम से बने 1-2 वर्ष के पौधे जून-जुलाई में लगावें। पौधा लगाने का काम संध्या के समय करें। पौधा लगाने के बाद तुरन्त पानी दें और अगर बारिश न हो तो हर 3-4 दिनों पर पानी दें। खाद और उर्वरक अच्छी पैदावार और स्वादिष्ट फलों के लिए पौधों को नियमित खाद और उर्वरक देना आवश्यक है। खाद और उर्वरक की उचित मात्रा देने के समय और सही तरीके से उसका दिया जाना अत्यंत आवश्यक है। आयु के अनुसार अमरुद में प्रति पौधा खाद एवं उर्वरकों की मात्रा देने की सिफारिश नीचे दी गई सारणी में दी जा रही है। अमरुद के लिए खाद एवं उर्वरकों की मात्रा आयु (वर्ष) गोबर की खाद (किलोग्राम) नाइट्रोजन (ग्राम) फास्फोरस (ग्राम) पोटाश (ग्राम) 1-2 10-15 60 30 30 3 20 120 60 60 4 30 180 90 90 5 40 240 120 120 6 50 300 150 150 7 और अधिक 60 360 180 180 नाइट्रोजनधारी उर्वरकों की आधी मात्रा अक्टूबर और आधी मात्रा जून में दी जाती है। फास्फोरस और पोटाशधारी उर्वरकों को अक्टूबर में दिया जाना चाहिए। गोबर की खाद की पूरी मात्रा जून में दी जाती है। इन पदार्थो को तने से थोड़ी दूर छोड़कर अच्छी तरह मिट्टी में मिला देना चाहिए। इसके बाद सिंचाई करना जरूरी है। कुछ इलाके में अमरुद के पौधों में जस्ते की कमी पायी जाती है। इसकी कमी से पत्तियों का आकार छोटा हो जाता है और बाढ़ भी रुक जाती है, टहनियां सूखने लगती हैं, फूल भी कम लगते हैं और लगे हुए फल कटकर सूख जाते हैं। इस कमी को दूर करने के लिए 0.4-0.5% जिंक सल्फेट का छिड़काव नये कल्ले निकलने के बाद वर्ष में दो बार करें। जिंक के प्रभाव से फलों के गुणों में भी सुधार होगा। सधाई और कटाई-छंटाई प्रारम्भ में सधाई पेड़ों को सुंदर और सुदृढ़ आकार प्रदान करने हेतु की जाती है। प्रारम्भ से ही पौधों के नीचे की शाखाओं की छंटनी करते रहना चाहिए और जमीन की सतह से 60 सें.मी. ऊपर की 3-4 शाखाएं रखकर बाकी शाखाओं सहित ऊपरी हिस्सा काटकर निकाल दें। इन्हीं चुनी गई शाखाओं को मुख्य तने का रूप दिया जाता है। प्रत्येक वर्ष फलदार पौधे की सूखी रोगग्रस्त और अत्यंत सघन शाखाएं फलों की तोड़ाई के बाद निकालते रहना चाहिए। सिंचाई पौधों को सिंचाई उनकी वृद्धि एवं उपज के लिए बहुत जरूरी है। सिंचाई मिट्टी एवं पौधों की आयु पर निर्भर करती है। छोट अर्थात नये लगे पौधों के लिए नवम्बर से फरवरी तक एक माह में अंत पर और मार्च से जून तक 15 दिनों के अंतर पर सिंचाई दी जानी चाहिए। पूर्ण विकसित पौधों की अक्टूबर-जनवरी तक 2-3 सिंचाई काफी है। फल लगने वाले पौधों में फूल के समय सिंचाई नहीं करनी चाहिए। हर सिंचाई बाद पौधे के पास के खरपतवार की गुड़ाई करके निकालते रहना चाहिए। गुड़ाई हल्की ही करें क्योंकि अमरुद की जड़ें ऊपरी सतह पर ही होती है। अन्तर्वर्ती फसल खाद और सिंचाई की समुचित व्यवस्था हो तो पपीता, केला तथा सब्जी लगावें। यदि यह व्यवस्था पूरी न हो तो दलहन फसलें लगावें। दलहन फसलों में थोड़ा सिंगल सुपर फास्फेट (25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) देने से अधिक लाभ होगा। अच्छे और अधिक फल लेना अमरुद यहाँ वर्ष में दो बार फल देता है। मुख्यत: मार्च-अप्रैल और जुलाई-अगस्त के फूलों में फल लगते हैं। क्रमश: बरसात और ठंडे मौसम में तैयार होते हैं। बरसात की अपेक्षा सर्दियों के फल स्वादिष्ट और मीठे होते हैं। बरसात के फलों की अपेक्षा जाड़े के मौसम के फलों में कीड़ों और बीमारियों का प्रकोप भी कम होता है जिससे फलों भी भंडारण-आयु की क्षमता भी बढ़ जाती है। अत: बागवानों को केवल जाड़े की ही फसल लेनी चाहिए लेकिन अपने राज्य में आमतौर पर बरसात में ही अधिक फल लिया जाता है। कीट एवं रोग फलमक्खी बरसात में फल के अंदर पिल्लू हो जाते हैं जो फलमक्खी के होते हैं। इसकी रोकथाम के लिए रोगर दवा का 0-05 प्रतिशत घोल का छिड़काव 10 दिनों के अंतर पर नन्हें फलों पर 3-4 बार करें। छिलका खाने वाली इल्ली पौधे के प्रभावित भागों पर काले जाले बन जाते हैं जिनमें इनका मल पदार्थ इक्ट्ठा रहता है। छिलके को खाकर कीड़े की इल्ली तनों और शाखाओं में गहरी सुरंगें बनाती हैं जो प्राय: शाखाओं की जोड़ पर दिखाई पड़ती हैं। इसके नियंत्रण के लिए रुई को पेट्रोल में भिंगोकर छेदों में भर दें। यह कार्य मार्च-अप्रैल में दो बार पर्याप्त है। उकठा रोग यह रोग बहुत भयावह है और एक बार बाग़ में लगने के कुछ वर्षो में पूरा बाग़ ही नष्ट हो जाता है। इस बीमारी के प्रकोप से शाखाओं और टहनियों का एक-एक कर ऊपर से सूखना आरम्भ होता है और वे नीचे तक सूखती चली जाती है। इस बीमारी से बचने हेतु निम्नलिखित उपाय करें। रोगग्रस्त सूखी टहनियों को शीघ्र काटकर निकाल दें। कटाई ऐसी करें कि साथ में 15-20 सें.मी. तक हरी स्वस्थ टहनी का भाग भी कट कर निकल जाए। 20-30 ग्राम बेन्लेट या वैभिस्टीन को 10-15 लीटर पानी में अच्छी तरह घोलकर प्रति पौधे के हिसाब से पौधों की जड़ों के पास डालें। दवा का घोल डालने से पहले पौधों के पास 60 सें.मी. गोलाई में 15 सें.मी. गहरी पट्टी बना लें। वर्ष में चार बार क्रमश: मार्च, जून, सितम्बर और अक्टूबर में यही उपचार दुहरायें। इसके अतिरिक्त 15 ग्राम जिंक सल्फेट और 5 मिली. मेटासिस्ट्रांक्स को 5 लीटर पानी में घोलकर वर्ष में दो बार (मार्च और सितम्बर में) पौधों पर छिड़काव करें। इस प्रकार के रोगग्रस्त पौधों की खाद और हरी खाद की मात्रा अधिक दी जाती है। जहाँ रोग फैला हो, वहाँ बाग़ लगाने से एक माह पहले मिट्टी में नीला तूतिया का 1.0 प्रतिशत घोल मिलाना लाभदायक है। पुराने वृक्षों में भी हर वर्ष मिट्टी में यह दवा दी जाए। फल पर दाग विशेषकर बरसात में फलों पर उठे हुए दाग पड़ जाते हैं। कोसन दवा का घोल (300 ग्राम 100 लीटर पानी में) रोग दिखाई देते ही एक बार और 20 दिनों बाद दूसरी बार छिड़काव करना चाहिए। उपज फूल लगने के लगभग पाँच माह बाद फल पकते हैं। इसकी उपज बाग़ की देखरेख और फल की किस्म पर काफी निर्भर करती है। एक 8-10 वर्ष के पूर्ण विकसित पेड़ से 2.0 से 2.5 क्विंटल फल प्रतिवर्ष प्राप्त किये जा सकते हैं। स्त्रोत: कृषि विभाग, बिहार सरकार