परिचय वर्तमान में आम एवं लीची का उत्पादन एवं प्रति वृक्ष उत्पादकता, वृक्षों की क्षमता के अनुरूप नहीं है। जिसके कई कारण हैं। जैसे लीची एवं आम के अंतर्गत क्षेत्र विस्तार का धीमा दर, उन्नत तकनीकों के अपनत्व एवं कार्यान्वयन के प्रति उत्पादकों की उदासीनता, बागों में उचित प्रबंधन का अभाव, कीड़े एवं बीमारियों का सामूहिक नियंत्रण नहीं होने के साथ-साथ पुराने बागों के अंतर्गत सार्थक रूप में बढ़ता क्षेत्र आदि मुख्य हैं। जीर्णोधार क्या है? पुराने वृक्षों का जीर्णोधार का तात्पर्य है कि वांछित प्रक्रियाओं को अपनाकर फिर से युवावस्था के गुणों को सृजित करना है। पुराने वृक्षों की वांछित कटाई-छटाई करके नये कल्लों का वृजन करना ताकि उनपर ओजपूर्ण फलन आ सके। जीर्णोधार की प्रक्रिया से वैज्ञानिक तरीके से पौधों की डाली, क्षत्रक एवं फलन देने वाली शाखाओं का विकास कराया जाता है और कृतिक वृक्षों की कम से कम दो वर्षो तक गहन देखरेख करके तीसरे वर्ष में फल देने योग्य बना दिया जाता है। ऐसे वृक्षों को जीर्णोधार प्रक्रिया द्वारा पुन: फलत में आकर कम से कम खर्च में गुणवत्तायुक्त पैदावार प्राप्त किया जा सकता है। जीर्णोधार क्यों आवश्यक? हमारे राज्य में आम एवं लीची के अंतर्गत पुराने एवं अनुत्पादक बागों का बढ़ता क्षेत्र सोच का विषय बन गया है। साधारणतया रोपण के बाद लीची के पौधे में फलन 5-6 साल बाद हो जाता है और व्यवसायिक रूप से महत्वपूर्ण अवधि 11-30 साल तक होती है। इस अवधि में भी कटाई-छंटाई एवं सधाई के अलावें पोषण, सिंचाई और कीट बीमारी का दक्षतापूर्ण प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है अन्यथा इस अवधि में भी क्षमता के अनुरूप व्यवसायिक स्तर पर गुणवत्तायुक्त उत्पादन नहीं मिलता है साथ ही वृक्षों में वृद्धावस्था की झलक आने लगती है और आर्थिक रूप से अनुपयोगी होने लगते हैं। इसके अलावा अन्य फल वृक्षों की भांति लीची वृक्ष भी एक निश्चित आयु (35-40 वर्ष) के बाद कम उपज देने लगते हैं। पुराने बागों के फलों का आकार छोटा हो जाना, साथ ही इसके अधिक ऊँचाई पर लगने के कारण तुड़ाई में समस्या होना सघन क्षेत्र के कारण कीड़े एवं बीमारियों का प्रकोप अधिक होना, फलों का अत्यधिक झरना और गुणवत्ता युक्त उत्पादन में भारी कमी आदि कई समस्याओं के कारण, लीची एवं आम की बागवानी में उत्पादकों को आर्थिक हानि का सामना करना पड़ता है। आमतौर पर 35-40 वर्षो के बाद आम एवं लीची के वृक्ष काफी ऊँचे घने हो जाते हैं और लम्बी शाखायें बढ़कर दूसरे वृक्षों को छूने लगती है जिसके कारण सूर्य का प्रकाश वृक्षों के पर्णीय भागों में पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पाता है, प्रकाश संश्लेषण की क्रिया कम हो जाती है, उम्रवार क्षेत्र की अपेक्षा फलन क्षेत्र कम हो जाता है एवं गुणवत्ताहीन उत्पादन की प्रतिशत मात्रा बढ़ जाती है। फलस्वरूप पुराने बाग़ के आर्थिक रूप से अनुत्पादक और अनुपयोगी हो जाने के कारण बागवानों को इनको काटकर हटाने के अलावा और कोई दूसरा विकल्प सामने नजर नहीं आता है। पुराने बागों को हटाकर फिर से नये बाग़ लगाना एक दीर्घकालीन एवं खर्चीला विकल्प होगा जबकि विभिन्न अध्ययनों के आधार पर यह प्रमाणित किया जा चुका है कि जीर्णोधार की उचित वैज्ञानिक पहलुओं को अपनाकर लीची के पुराने अनुत्पादक बागानों को गुणवत्ता युक्त अधिक उत्पादन करने की स्थिति में लाया जा सकता है और आर्थिक एवं परिस्थिति के दृष्टिकोण से जीर्णोधार की अपनायी गयी तकनीक नि:संदेह लीची बागवानों के लिए प्रभावी एवं लाभकारी होगा और उत्पादन वृद्धि की तरह एक कारगर कदम होगा। लीची के बागों का जीर्णोधार बागों का चुनाव प्राय: यह देखा गया है कि 10 मी. पौधे से पौधे और 10 मी. कतार से कतार की दूरी पर लगाए गए लीची के बगीचे लगभग 35-40 वर्षो में घने हो जाते हैं और ऐसे पेड़ों के नीचे की पत्तियाँ विहीन लम्बी-लम्बी शाखाएँ व डालियों की अधिकता हो जाती है जिनमें ऊपर की भाग में ही कुछ पत्तियाँ और मंजर लगते हैं तथा ऊपर की ओर वृक्षों का क्षत्रक आपस में मिलकर सघन आच्छादन बना लेते हैं जिससे वृक्ष के क्षत्रक के अंदर सूर्य का प्रकाश तथा वायु का संचारण में बाधा पड़ती है। परिणामस्वरूप कीड़ों एवं बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है तथा उत्पादन भी कम हो जाता है। ऐसे वृक्षों वाले बागानों का चुनाव करते हैं, बागवानों से मिलकर जीर्णोधार की प्रक्रिया एवं तकनीकी पहलुओं को बताते हुए उन्हें बगीचे की जीर्णोधार करने के लिए राजी किया जाता है। वृक्षों की कटाई जीर्णोधार करने के लिए पौधों की चुनी हुई शाखाओं को जमीन से 2-3 मी. की ऊँचाई पर चोक या सफेद पेंट से चिन्हित कर देते हैं। कटाई के लिए शाखाओं को चुनते समय यह ध्यान रखते हैं कि नीचे से चारों दिशाओं की ओर जाती या फैलती शाखाओं का ही चुनाव किया जाय। पौधों के बीच की तथा रोगग्रस्त व आड़ी-तिरछी शाखाओं को उनके निकलने के स्थान से ही काट दें। शाखाओं को तेज धार वाली आरी या मशीन चलित ‘प्रुनिंग सॉ’ की सहायता से अगस्त-सितम्बर माह में काटते हैं। कटाई के समय पहले शाखाओं को चिन्हित स्थान पर सावधानी से कटाई करते हैं ताकि कटाई के समय या कटाई के बाद शाखाओं के फटने की संभावना नहीं रहे या छिलके-छाल छुटने की समस्या न उत्पन्न हो। इसके लिए चिन्हित स्थान पर गोई में चारों तरफ हल्की कटाई द्वारा चौरा या घाव बना लेते हैं तत्पश्चात ऊपर से पूरी शाखा काट लेते हैं। यदि शाखा बहुत लम्बी हो तो ऊपर से दो-तीन भागों में काटकर ही चिन्हित स्थान पर कटाई करते हैं जीर्णोधार के लिए बड़े बागों में वृक्षों की कटाई एकान्तर में या आधे भाग में एक वर्ष एवं शेष बचे आधे भाग में दो वर्ष बाद करें तो बागवानों को ज्यादा आर्थिक क्षति नहीं होती है और संतोष भी बना रहता है। कटाई के तुरन्त बाद कटे भाग पर फफूंदनाशक दवा (कॉपर आक्सीक्लोराइड) को अंडी के तेल या पानी में मिलाकर पेस्ट कर देते हैं। कटाई के बाद पौधों के तनों में धरातल से 5-6 फीट की ऊँचाई तक चूना एवं तृतीया का घोल बनाकर पुताई कर देते हैं। समय जीर्णोधार उचित समय पर ही वांछित प्रक्रियाओं को अपनाते हुए सावधानीपूर्वक करना चाहिए, नहीं तो काटे गये वृक्षों के सूखने का भय बढ़ जाता है। विभिन्न परीक्षणों के आधार पर बिहार में जीर्णोधार का उचित समय अगस्त माह पाया गया है। जबकि यह प्रक्रिया जुलाई के अंतिम सप्ताह से लेकर सितम्बर माह के मध्य तक की जा सकती है। खाद एवं उर्वरक कटाई के बाद पौधों के चारों तरफ थाला बना दें तथा उनमें निकाई-गुड़ाई करके समय-समय पर सिंचाई कर दें। मानसून के शुरुआत में ही प्रत्येक पौधे को 1 किग्रा. यूरिया, 2 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 1 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश, 200 जिंक सल्फेट तथा 50 किलोग्राम अच्छी सड़ी गोबर की खाद को अच्छी तरह मिलाकर नाली विधि द्वारा दें। इस विधि में खाद देने के लिए पौधों के उम्र के अनुसार तनों से 1.5 से 2.5 मीटर की दूरी पर 30-40 सें.मी. गहरी एवं इतना ही चौड़ा वलय/नाली बनाएं और इस नाली के गोलाई में बराबर मात्रा में डालकर एवं अच्छी तरह मिलाकर निकाली गयी मिट्टी से ढककर बाहर की तरफ ऊँची गोलाई बना दें। विरलीकरण यह पाया गया है कि शाही प्रभेद के वृक्षों में जीर्णोधार हेतु कटाई करने के बाद 30 से 40 दिनों के बाद एवं चाईना प्रभेद के वृक्षों में 50 से 60 दिनों बाद ही सुसुप्त कलियों से नये-नये कल्ले निकलने लगते हैं। इन छांटे हुए शाखाओं पर निकले सघन कल्लों का वांछित विरलीकरण आवश्यक है। अन्यथा जल व पोषक तत्वों के लिए परस्पर स्पर्धा के कारण स्वस्थ कल्लों का विकास नहीं हो पाता है। साथ ही पर्णीय क्षेत्र झड़नुमा हो जाता है जो फलन के लिए उपयुक्त नहीं होता है। अत: आवश्यकतानुसार प्रत्येक डाली में ऊपर की ओर कोण बनाती हुई कुछ स्वस्थ कल्लों को छोड़कर बाकी सभी नयी कल्लों को सिकेटियर या तेज धार वाली चाक़ू की सहायता से काटकर हटा दिया जाता है। क्षत्रक निर्माण हेतु वांछित कल्लों के विकास के क्रम में भी यह ध्यान आवश्यक है कि क्षत्रक सघन न हो और उसमें पर्याप्त मात्रा में धूप व रोशनी का आवागमन होता रहे। सिंचाई जीर्णोधार किये गये वृक्षों की सिंचाई आवश्यक है अन्यथा वृक्ष के सूखने का डर बना रहता है। खाद एवं उर्वरकों के देने के बाद खेत में नमी की अवस्था को बरकरार रखने के लिए सिंचाई तुरन्त करनी चाहिए। आवश्यकतानुसार गर्मियों में 8-10 दिन के अंतराल पर एवं सर्दियों में 15-16 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए। इससे नवसृजित कल्लों के सूखने का भी भय नहीं रहता है एवं वृक्ष के क्षत्रक के विकास एवं बढ़वार में तेजी आती है। अन्तर्वर्ती फसलों की खेती के दौरान भी की गयी सिंचाई में इन वृक्षों को काफी लाभ मिलता है। अप्रैल से जून माह तक गर्मियों में नमी की अवस्था को ज्यादा दिन बरकरार रखने हेतु या सिंचाई का अंतराल बढ़ाने हेतु मल्चिंग/पलवार की प्रक्रिया अपनाना लाभप्रद है। मल्चिंग हेतु काली पोलीथीन, सूखे घास, खरपतवार, सूखे पत्ते एवं पुवाल के परत का उपयोग किया जा सकता है। अन्तर्वती फसलें जीर्णोधार के पश्चात नये बाग़ की तरह बगीचे की जमीन का खाली भाग में मौसमानुसार वर्ष भर तरह-तरह के अर्न्तफसल लेकर भी खाली जमीन का सदुपयोग के साथ-साथ अतिरिक्त लाभ भी कमाया जा सकता है और बगीचे की मिट्टी का भी सुधार होता है। अर्न्तवर्ती फसलों में मुख्य रूप में गर्मियों में मूंग, उरद, कुल्थी, मक्का, कद्दुवर्गीय सब्जी तथा रबी के मौसम में तोरिया, मटर, आलू, सरसों, राई आदि फसलों की खेती की जा सकती है। कीट एवं बीमारी की रोकथाम यह एक महत्वपूर्ण पहलू है। जैसा कि पहले बताया गया है कि शाखाओं के कटे भाग पर कटाई के तुरन्त बाद ताम्रयुक्त फफूंदनाशी या स्वनिर्मित बोर्डो मिश्रण का लेप देना चाहिए। विरलीकरण के उपरांत भी बोर्डो मिश्रण का छिड़काव लाभप्रद होता है। इसमें लगने वाले तना/धड़ छेदक कीट की रोकथाम के लिए कीट द्वारा बनाये गये विष्टायुक्त ज्ल्लों को साफ़ करके, छिद्र/सुराख को खोजकर उसमें लोहे की पतली तीली डालकर कीड़ों को खुरच कर नष्ट करते हैं, फिर डीजल/किरासन तेल या नुभान नामक कीटनाशी दवा को रुई के छोटे टुकडें में भिंगोने के उपरांत छिद्र में ठूसकर बाहर से गीली मिट्टी से सील बंद कर देते हैं। पत्तियों पर लगने वाले कीड़ों के लिए कोई भी कीटनाशक दवा जैसे की मोनोसिल/साइपरमेथ्रीन/कर्बारिल (2 मि.ली. /लीटर) या अल्फामेथ्रीन (1 मि.ली./लीटर) नामक दवा का छिड़काव 10-12 दिन के अंतराल पर फरवरी-मार्च माह एवं अगस्त-सितम्बर माह में करना आवश्यक होता है। लीची माइट नामक कीड़े के प्रकोप से पत्तियाँ मोटी, लेदरी होकर सिकुड़ जाती है और पत्तियाँ गुच्छानुमा आकार का बनने लगती है। इसके लिए आक्रान्त पत्तियों को डाली तोड़कर नष्ट कर देते हैं एवं डाइकोफोल या कर्नल-एस या ओमाइट नामक दवा का (4 मि.ली./लीटर) घोल बनाकर दो-तीन छिड़काव फरवरी-मार्च माह एवं अगस्त-सितम्बर माह में 7-10 दिन के अंतराल पर करते हैं। पत्तियों पर धब्बें पर भी धब्बें एवं बड़े दाग के दिखने पर ताम्रयुक्त फफूंदनाशक जैसे कि कॉपर-ऑक्सीक्लोराइड, ब्लाईटाक्स, ब्लू कॉपर या बोर्डो मिश्रण (2 ग्रा./ली.) का छिड़काव लाभप्रद होता है। कटाई के बाद एवं फिर हरेक वर्ष अगस्त-सितम्बर माह में वृक्षों के तनों पर धरातल से 5-6 फीट की ऊँचाई तक बोर्डो मिश्रण ( चूना-तूतीया) के घोल से पुताई करना बहुत ही आवश्यक है। उपज जीर्णोधार हेतु कृन्तन के दो वर्ष बाद वृक्षों में अच्छी वानस्पतिक वृद्धि के साथ वांछित क्षत्रक तैयार हो जाता है और नये स्वस्थ कल्लों के साथ पूर्ण क्षत्रक के विकसित होने पर वृक्षों को पुनर्युवन प्राप्त हो जाता है। इसके साथ ही उपयुक्त एवं समसामयिक देखभाल व प्रबंधन करते रहने से इन वृक्षों में दो वर्षो के उपरांत पुष्पन एवं फलन आ जाते हैं। तीसरे वर्ष औसतन 25-30 किग्रा. प्रति वृक्ष की दर से उपज मिलने लगता है और प्रतिवर्ष उत्पादन में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ जीर्णोधार किये गये पुराने एवं अनुत्पादक बागान भी पुन: व्यवसायिक स्तर का उत्पादन देने के कारण आर्थिक रूप से लाभदायक हो जाते हैं। जीर्णोधार तकनीक से संबंधित सभी खर्चों का ब्यौरा रखने पर यह पाया गया है कि श्रम, खाद एवं उर्वरक, सिंचाई व निराई-गुड़ाई के साथ-साथ कीट एवं रोग प्रबंधन पर तीन वर्षो के आधार पर औसतन 135-140 रूपये प्रति वृक्ष प्रति वर्ष का खर्च आता है। परन्तु अन्तवर्ती फसल का व्यौरा शामिल करने पर यह खर्च बहुत ही कम (85-65 रु./वृक्ष) हो जाता है। जीर्णोधार हेतु वृक्षों की कटाई के बाद निकले लकड़ी को बेचकर भी बागवानों को अच्छी आमदनी हो जाती है। आम के बागों का जीर्णोधार कटाई-छंटाई पुराने, घने एवं आर्थिक दृष्टि से अनुपयोगी वृक्षों की सभी अवांछित शाखाओं को पहले चिन्हित कर लेते हैं फिर दिसम्बर माह में चिन्हित शाखाओं को भूमि सतह से लगभग 4 से 5 मीटर की ऊँचाई पर आरी से कटाई करते हैं। कटाई के लिए शक्ति चालित आरी अधिक उपयुक्त है। सूखी, रोग ग्रसित एवं पेड़ों के बीच की घनी शाखाओं को काटकर निकाल देते हैं। पर्णीय क्षेत्र के विकास के लिए पेड़ पर मात्र 3 से 4 कृन्तित शाखायें ही रखते हैं। जीर्णोधार हेतु बाग़ के वृक्षों की कटाई एक साथ अथवा एकान्तर पंक्तियों में करते हैं। कृन्तन करते समय यह सावधानी अवश्य रखनी चाहिए कि शाखायें अनावश्यक रूप से निचले भाग से फट न जाये। अत: पहले आरी से नीचे की तरफ लगभग 15-20 सें.मी. कटाई कर, फिर टहनी के ऊपरी भाग से कृन्तन करते हैं। कृन्तन के तुरन्त बाद 1 किग्रा. फफूंदीनाशक दवा (कॉपर ऑक्सीक्लोराइड), 250 ग्राम अंडी का तेल एवं उचित मात्रा में पानी मिलाकर तैयार किया गया लेप शाखाओं के कटे हुए भाग पर लगाते हैं ताकि सूक्ष्म जीवाणुओं तथा रोगों का संक्रमण न हो सके। ताजे गाय के गोबर का लेप भी प्रभावी पाया गया है। इसके बाद फरवरी माह के मध्य में वृक्षों के तनों के पास थाले एवं सिंचाई की नालियां अवश्य बना देनी चाहिए। अंत: फसल कटाई-छंटाई के बाद कृन्तित वृक्षों के दोनों तरफ काफी खुली जगह हो जाती है, जिसमें अंत: फसल लेकर अतिरिक्त आमदनी अर्जित की जा सकती है। जायद में तोरई, लौकी, खीरा, लोबिया और रबी के मौसम में फूलगोभी, आलू पतागोभी, गेंदा इत्यादि फसलें प्रारम्भिक पाँच वर्ष तक लेना लाभदायक पाया गया है। इस प्रकार की लकड़ियों की बिक्री व बाग में अंत: फसलें लेकर अर्जित आमदनी से प्रारम्भिक क्षति पूर्ति की जा सकती है। पोषण एवं जल प्रबंधन कटाई के बाद वृक्षों में 2.5 किग्रा. यूरिया, 3.00 किग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट एवं 1.5 किग्रा. म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रति वृक्ष की दर से थाले में प्रयोग करते हैं। इन खादों में सिंगल सुपर फास्फेट एवं म्यूरेट ऑफ़ पोटाश की पूरी मात्रा और यूरिया की आधी मात्रा फरवरी के अंत में थालों में डालते हैं। तत्पश्चात जून माह के अंत में शेष यूरिया की आधी मात्रा देते हैं। इसके अतिरिक्त जुलाई के प्रथम सप्ताह में 120 किग्रा. सड़ी गोबर की खाद प्रति वृक्ष डालना लाभदायक होता है। उपरोक्त उर्वरकों की मात्रा प्रतिवर्ष दी जाने की संस्तुति की जाती है। उर्वरक डालने के पूर्व थालों की अच्छी प्रकार से निराई-गुड़ाई अवश्य करनी चाहिए। वृक्षों की सिंचाई मध्य मार्च से मानसून आने तक 10-12 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए ताकि शाखों की वृद्धि अच्छी हो सके और नव-सृजित कल्ले नमी के अभाव में सूखने न पाये। अप्रैल से जून माह तक नमी को संचित रखने के लिए आम या केला की पत्ती, सूखी घास अथवा पुआल थालों मी बिछाना (मल्चिंग) चाहिए। सृजित कल्लों का विरलीकरण दिसम्बर महीने में हुए कृन्तन के लगभग तीन-चार माह उपरांत (मार्च-अप्रैल) इन छांटे गए शाखाओं पर बाहुल्यता में नये कल्ले निकलते हैं, जिनका वांछित विरलीकरण आवश्यक है। स्वस्थ कल्लों युक्त खुले पर्णीय क्षेत्र के विकास के लिए शाखाओं के विकास के लिए शाखाओं के बाहरी ओर 8-10 स्वस्थ कल्ले प्रति शाख रखकर शेष अवांछित कल्लों को जून एवं अगस्त में हटा दिया जाता है। इस विरलीकरण के उपरांत फफूंदनाशक दवा कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (3 ग्राम प्रति लीटर पानी में) के घोल का छिड़काव करना आवश्यक है। इससे पत्तियों पर लगने वाले रोगों से बचाव होता है। अक्टूबर माह में 2 प्रतिशत यूरिया के घोल का पर्णीय छिड़काव प्ररोहों के समुचित विकास हेतु लाभदायक होता है। फलों को गिरने से कैसे रोकें? आम के फूल एवं फल अपने जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में गिरते हैं, जिससे बागवानों को बहुत अधिक आर्थिक हानि होती है। पेड़ में बौरों की तुलना में फल बहुत ही कम लगते हैं। अधिकांश फूल खिलते ही गिर जाते हैं और फल नहीं बन पाते हैं। बहुत से फूल परागण से बंचित रह जाते हैं और वे झड़ जाते हैं। परागण के बाद जो फल बनते हैं, उनमें से भी बहुत से फल गिर जाते हैं। मुख्यत: फलों के गिरने की तीन अवस्थाएं हैं। प्रथम – फलों का बहुत ही छोटी अवस्था में गिरना, द्वितीय – पूर्ण फल बनने के बाद गिरना और तृतीय – मई में गिरना। बड़ी अवस्था में फल गिरने से बागवान को अधिक हानि होती है। फलों के गिरने के बहुत से कारण हैं जिनमें भ्रूण तथा बीजाणु का पतन, पोषण की कमी, वातावरण का प्रभाव, पानी की कमी तथा हार्मोन का असंतुलन (जिसमें एबसिसिक अम्ल का अधिक बनना एवं ऑक्सिन का कम बनना) मुख्य हैं। फलों को गिरने से रोकने के लिए निम्न उपायों को अपनाएँ। फल बनने के उपरांत बगीचे की सिंचाई कर देनी चाहिए। इससे काफी हद तक छोटे फलों का गिरना रुक जाता है। इसके अतिरिक्त फलों को गिरने से रोकने के लिए 20 पी.पी.एम. नेफ्थलीन एसिटिक एसिड या 1 मिली, प्लेनोफिक्स एक गैलन (4.5 लीटर) में घोलकर आम के मटर के दाने इ अवस्था में होने पर छिड़काव कर देना चाहिए। इसमें टीपाल स्टीकर मिलाना लाभप्रद होता है। स्त्रोत: कृषि विभाग, बिहार सरकार