परिचय जो किसान भाई केला की खेती करना चाहते हैं उन्हें उत्तक सवंर्धित केला की खेती करनी चाहिए। इस प्रकार का केला अधिक उपज देने वाला एवं गुणवत्ता युक्त प्रजाति या पौधे के चयन करके उसके वानस्पतिक अंग जैसे उत्तक लेकर नियंत्रित दशाओं में प्रयोगशाला में व्यावसायिक स्तर पर तैयार किया जाता है। सर्वप्रथम उन वांछित लक्षणों की पहचान करते हैं यथा अधिक उपज बड़े आकार की पौध, मिठास,रोग एवं कीट का कम असर, अधिक भंडारण क्षमता आदि। ऐसे तमाम वांछित लक्षणों को दिमाग में रखकर पौधे का चयन किया जाता है और यदि ऐसा सर्वगुण सम्पन्न पौध मिल गया तो इसके शरीर से उत्तक निकाल कर प्रयोगशाला में लाखों की तादाद में पौधे तैयार कर लिये जाते हैं। इन्हीं पौधों को प्रयोगशाला से निकाल कर थोड़ा कठोर बनाया जाता है और किसानों को रोपण हेतु वितरित कर दिया जाता है। स्पष्ट है कि तरह तैयार पौधे खेत से ली गयी पुत्तियों से उत्तम होते हैं। उत्तक संवर्धित केला उपज एवं गुणवत्ता के अलावा जो सबसे बड़ी विशेषता है वह समरूपता पौधे का विकास एक सामान होता है। निश्चित समय पर घौद आती है साथ ही फलियों का आकार एक साथ होता है। ऐसी खूबियाँ पुत्तियों से रोपित केला में नहीं मिलती। अत: किसान भाई उत्तक संवर्धित केला की खेती करें। खेती करने में जिन बातों का ध्यान रखना है वह निम्नलिखित है – जलवायु केला के लिए घनघोर वर्षा तथा वायु में अधिक नमी वाली जलवायु सर्वोत्तम है। जो कि दक्षिण भारत में पायी जाती है। जहाँ ऋतुएँ स्पष्ट होती हैं जैसे – बिहार, उत्तर प्रदेश में भी केला एक लाभदायक फसल है। अधिक पाला फसल को नुकसान पहुँचाता है। इसी प्रकार गर्म हवा तथा जल भराव जैसी स्थिति भी हानिप्रद होती है। उक्त परिस्थितियों का प्रबंधन करके केला की खेती की जा सकती है। मिट्टी गहरी दोमट, जीवांशयुक्त जिसमें पानी ठहरता हो उत्तम है। हल्की दोमट एवं बलुई दोमट मिट्टी भी केला की खेती के काम लायी जा सकती है। खेत समतल तथा जल निकास का अच्छा प्रबंध हो। सामान्यत: हल्की अम्लीय मृदा (6-6.5 पी.एच.) उत्तम होती है। परन्तु हल्की क्षारीय मृदा में भी पैदावार अच्छी होती है। खेती की तैयारी किसान भाई कम से कम एक बार 20 सें.मी. गहरी जुताई अवश्य करें, खरपतवार निकाले व समतल करें। जीवांश खाद जैसे – कम्पोस्ट, गोबर की खाद, अंतिम जुताई के समय खेत में बिखेर कर मिला दें। उन्नतशील प्रजातियाँ हरीछाल, महालक्ष्मी, ग्रेंडनेन, रोबस्टा, ड्वार्फ कैवेंडिस, पूवन, रसथाली, नेंड्रान, कर्पूरवल्ली, नेयपूवन आदि उन्नतशील प्रजातियाँ है। उत्तक संवर्धित केला इन्हीं प्रजातियों में से चुनाव करके खरीदें। पौधों की पालीथीन को सावधानीपूर्वक काट कर अलग कर दें। जिससे पिण्डी न टूटने पाये। खेत में 60 x 60 x 60 सें.मी. आकर के गड्ढे खोदें यह कार्य 15 मई से 15 जुलाई तक अवश्य कर लें। गड्ढे को 3 किग्रा. गोबर की खाद + 250 ग्राम नीम की खली + 10 ग्राम फोरेट 10 जी + 10 ग्राम थीमेट का मिश्रण भर दें। इन भरे हुए गड्ढों में प्रजाति के अनुसार 1.8 x 1-5 मी. की दूरी पर पौध रोपित करें। रोपण के एक सप्ताह बाद जीवाणु संक्रमण के बचाने हेतु स्ट्रेप्टोसाइक्लीन 500 मिग्रा. प्रति ली. पानी का छिड़काव करें। खाद एवं उर्वरक प्रति पौधा 200 ग्राम नत्रजन, 60-100 ग्राम फास्फोरस एवं 250-300 ग्राम पोटाश की तत्व के रूप में संस्तुति की गयी है। जिसको कई भागों में बांटकर निम्न तालिकानुसार पौधे की वृद्धिकाल के दौरान करना चाहिए। अवरोध परत पौधे के नीचे पुआल या गन्ने की पत्तियों की 8-10 सें.मी. परत बिछा दें या पलवार को काम लें। नर फूल के गुच्छे व पुत्तियों को निकालें। समय-समय पर मुख्य पौधे के बगल से निकली पुत्तियों का निकाले रहें तथा जब घौद आ जाये तो नीचे का नर पुष्प गुच्छ चाक़ू से काट कर अलग कर दें। साथ ही पौधे को बांस आदि से सहारा दें जिससे कि हवा में गिरने न पाये। क्र.सं. उर्वरक प्रयोग का समय प्रति पौधे उर्वरक की मात्रा (ग्राम में) यूरिया अमोनिया साल्फेट सुपर फास्फेट म्यूरेट ऑफ़ पोटाश जिंक साल्फेट मैंग्निशियम 1 रोपण के 30 दिन बाद 62 140 125 105 - - 2 रोपण के 75 दिन बाद 62 140 125 - 25 25 3 रोपण के 125 दिन बाद 62 140 125 - - - 4 रोपण के 165 दिन बाद 62 140 125 105 - - 5 रोपण के 210 दिन बाद 62 140 - - - - 6 रोपण के 255 दिन बाद 62 140 - 105 - - 7 रोपण के 300 दिन बाद 62 140 - 105 - - योग 434 980 500 420 25 25 उपज औसतन एक घौद 40-70 किलोग्राम की प्राप्त होगी। प्रति हेक्टेयर पौधों के हिसाब से उपज की गणना कर सकते हैं। जैसे ही फलियाँ गोलाई लेने लगे एवं रंग हल्का हो तेज धारदार चाक़ू से घौद को काट लें। एकीकृत कीट प्रबंधन केले में मुख्य रूप से बीटल, घुन व रसचूसक कीटों का प्रकोप होता है। इस हेतु खेत की सफाई रखें। सूखी पत्तियों को काटते रहें, नमी बनाये रखें। क्वीनालफास 2 मिली/लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। जमीन में फोरेट 10 जी मिलायें और पत्तियों के गोफें में 4-5 दाने डाल दें। एकीकृत रोग प्रबंधन केला में पर्णचित्ती रोग श्यामवर्ण, तनागलन व उक्ठा रोग प्रमुख रूप से लगते हैं। इस हेतु खेत की सफाई करें। जल निकास व्यवस्था करें। भूमि का शोधन करें। समय-समय पर फफूंद नाशी दवा जैसे कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 3 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें। स्त्रोत: कृषि विभाग, बिहार सरकार