परिचय शुष्क क्षेत्रों में फलोत्पादन की सबसे बड़ी समस्या जल की कमी है। ऐसी दशा में वार्षिक फसलों की तुलना में फल वृक्ष को कम जल की आवश्यकता होती है। कम सिंचित क्षेत्रों में बेल की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। आज के संदर्भ में जब भारतीय जनता औषधीय फलों के प्रति अधिक जागरूक हो गयी है तथा बेल के फलों के लिए अधिक मूल्य देने को तैयार है, इसकी बागवानी बहुत लाभप्रद हो गयी है। अत: इसकी बागवानी को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, ताकि आगे भी अच्छा फल प्राप्त होते रहे। भूमि बेल एक बहुत ही सहनशील वृक्ष है। इसे इसी भी प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है, परन्तु जल निकासयुक्त बलुई दोमट भूमि इसकी खेती के लिए अधिक उपयुक्त है। समस्याग्रस्त क्षेत्रों-ऊसर, बंजर, कंकरीली, खादर, बीहड़ भूमि में भी इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। वैसे तो बेल की खेती के लिए 6-8 पी.एच मान वाली भूमि अधिक उपयुक्त होती है। भूमि में पी.एच मान 8.5 बेल की व्यावसायिक खेती की जा सकती है। जलवायु बेल एक उपोष्ण जलवायु का पौधा है, फिर भी इसे उष्ण, शुष्क और अर्द्धशुष्क जलवायु में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। इसकी बागवानी 1200 मीटर ऊँचाई तक और 7-46 डिग्री सेल्सियस तापक्रम तक सफलतापूर्वक की जा सकती है। इसके पेड़ की टहनियों पर कांटे पाये जाते हैं और मई-जून की गर्मी के समय इसकी पत्तियाँ झड़ जाती है, जिससे पौधों में शुष्क और अर्द्धशुष्क जलवायु को सहन करने की क्षमता बढ़ जाती है। उन्नत किस्में बेल में अत्यंत जैवविधिता पाई जाती है तथा इसके आंकलन की आवश्यकता है। नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय और गोविन्द बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय द्वारा चयनित किस्मों के कारण पूर्व में विकसित किस्मों, जैसे – सिवान, देवरिया, बड़ा कागजी, इटावा, चकिया, मिर्जापुरी, कागजी गोण्डा आदि के रोपण की सिफारिश अब नहीं की जा रही है। कुछ प्रमुख नवीनतम उन्नत किस्मों का संक्षिप्त विवरण निम्न है। नरेन्द्र बेल 5 इस किस्म के पौधे कम ऊँचाई वाले (3-5 मी.) और अधिक फैलाव लिये होते हैं। फल चपटे सिरे वाले मध्यम आकार के, मीठे स्वाद होते हैं। फलों का औसत वजन 1-1.5 किलो ग्राम तक होता है तथा फलों का छिलका पतला होता है। गूदे में रेशे और बीज की मात्रा काफी कम पायी जाती है। पेड़ों से औसत उपज 70-80 किलोग्राम प्रति वृक्ष तक प्राप्त की जाती है। पंत शिवानी इस किस्म के पेड़ ऊपर की तरफ बढ़ने वाले और अधिक फैलाव लिये जाते हैं। फल चपटे सिरे वाले, मध्यम आकार के, मीठे स्वाद होते हैं। फल अंडाकार लम्बे, औसत वजन 1.2-2.0 किलोग्राम छिलका मध्यम पतला, गूदा अधिक (70-75 प्रतिशत), रेशा कम, अच्छी मिठास वाला और स्वादिष्ट होता है। फलों की भंडारण क्षमता अच्छी होती है तथा पेड़ों की औसत उपज 50-60 किलोग्राम वृक्ष तक पायी जाती है। पंत अर्पणा यह एक बौनी और विरल वाली किस्म है, जिसकी शाखाएं नीचे की तरफ लटकती रहती है। पत्तियाँ बड़ी, गहरे रंग की और नाशपाती की तरह होती है। पेड़ों पर कांटे कम पाये जाते हैं तथा फल जल्दी और उपज अच्छी होती है। फल गोलाकार और 0.6 से 0.8 किलोग्राम औसत भार के और पतले छिलके वाले होते है। पकने पर फलों का रंग हल्का होता है। इसमें बीज, लिसलिसा पदार्थ, खटास व रेशा कम पाया जाता है। लिसलिसा पदार्थ व बीज अलग थैलियों में बंद होता है, जिसे आसानी से अलग किया जा सकता है। अत: यह किस्म परिरक्षण के लिए ज्यादा उपयुक्त सिद्ध हो सकती है। फलों का गूदा मध्यम मीठा (टी.एस.एस. 35-40 ब्रिक्स), स्वादिष्ट और सुवासयुक्त होता है। पंत उर्वशी इस किस्म के पेड़ घने और लम्बे होते हैं। यह एक मध्यम समय में पकने वाली किस्म है। फलों का आकार अंडाकार तथा प्रति फल भार 1.6 किलोग्राम तक होता है। छिलका मध्यम पतला, गूदा मीठा स्वादिष्ट और सुवासयुक्त होता है। फलों में गूदे की मात्रा 68.5 प्रतिशत और रेशे की मात्रा कम पायी जाती है। पंत सुजाता इस किस्म के पेड़ मध्यम आकार के घने और फैलने वाले होते हैं। यह शीघ्र फल देने वाली और मध्यम समय में पकने वाली किस्म है। फल गोल लेकिन दोनों सिरे चपटे होते हैं। फलों का औसत भार 1.14 किलोग्राम छिलका पतला और हल्के पीले रंग वाला, रेशा कम होता है। फलों में गूदे की मात्रा 77.8 प्रतिशत तक पायी जाती है। पेड़ों की औसत उपज 45-50 किलोग्राम प्रति वृक्ष तक पायी जाती है। सी.आई.एस.एच.बी. 1 इस किस्म के पौधे मध्यम ऊँचाई वाले कम फैलाव लिये होते हैं। फल, आकार में अंडाकार, लम्बाई 15-17 सेंमी. और व्यास 39-40 सेंमी. तथा अधिक मिठासयुक्त होते हैं। फलों का औसत वजन (0.8-1.2) तक पाया जाता है। फलों का छिलका पतला (0.10-0.12 सेंमी.) होता है। फलों में रेशे और बीज की मात्रा कम पायी जाती है और औसत उपज 50-60 किलोग्राम प्रति वृक्ष तक हो जाती है। सी.आई.एस.एच.बी. 2 इस किस्म के पौधे कम ऊँचाई वाले और कम फैलाव लिये होते हैं। फल, आकार में बड़े, लम्बाई तक पाया जाता है। फल अधिक मिठासयुक्त और पतले छिलके वाले होते हैं। फलों में रेशा और बीज की मात्रा काफी कम होती है। इस किस्म के पौधों की उपज 40-50 किलोग्राम वृक्ष तक पायी जाती है। प्रवर्द्धन बेल के पौधे मुख्य रूप से बीज द्वारा तैयार किये जाते हैं। बीजों की बुआई फलों से निकालने के तुरन्त बाद 15-20 सेंमी. ऊँचाई वाली 1.10 मीटर की बनी बीज शैयया (सीड बैड) में 1-2 सेंमी. की गहराई पर कर देनी चाहिए। बुआई का उत्तम समय मई-जून होता है। व्यावसायिक स्तर पर बेल की खेती के लिए पौधों को चश्मा विधि से तैयार करना चाहिए। चश्मा की विभिन्न विधियों में पैबंदी चश्मा विधि जून-जुलाई में चढ़ाने से 80-90 प्रतिशत तक सफलता प्राप्त की जा सकती है और सांकुर शाख की वृद्धि भी अच्छी होती है। कालिका को 1-2 वर्ष पुराने बेल के बीजू पौधे पर ध्रुवता को ध्यान में रखते हुए चढ़ाना चाहिए। जब कालिका ठीक प्रकार से फुटाव ले ले तो मूलवृंत को कालिका के ऊपर से काट देना चाहिए। पॉली और नेट हाउस की सहायता से कोमल शाखाओं का चयन करते है। इस विधि में क्लेफ्ट या वेज विधि से ग्राफ्टिंग करके 80-90 प्रतिशत तक सफलता प्राप्त की जा सकती है। इस विधि से सफलता प्राप्त करने के लिए पॉली हाउस में 28.2 डिग्री सेल्सियस तापमान, 70-75 प्रतिशत आर्द्रता और फुहारे का अंतराल रखना उचित है। गड्ढे की तैयारी तथा पौध रोपण बेल के पेड़ों की रोपाई 6-8 मीटर की दूरी पर मृदा उर्वरता के अनुसार करनी चाहिए। रोपण के लिए जुलाई-अगस्त अच्छा पाया गया है। पौध लगाने के एक माह पूर्व 6-8 मीटर के अंतर पर 75 से 100 घन सेंटीमीटर के गड्ढे तैयार कर लेते हैं। यदि जमीन में कंकड़ की तह हो तो उसे निकाल देना चाहिए। इन गड्ढों को 20-30 दिनों तक खुला छोड़कर 3-4 टोकरी गोबर की सड़ी खाद गड्ढे की ऊपरी आधी मिट्टी में मिलाना चाहिए। ऊसर भूमि में प्रति गड्ढे के हिसाब से 20-25 किलोग्राम बालू तथा पी.एच मान के अनुसार 5-8 किलोग्राम जिप्सम/पाइराइट भी मिला कर 6-8 इंच ऊँचाई तक गड्ढों को भर देना चाहिए। इन्हीं तैयार गड्ढों में जुलाई-अगस्त में पौध रोपण करना चाहिए। पौधे लगाने के बाद हल्की सिंचाई करना उपयुक्त होता है। शुष्क और अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में जहाँ सिंचाई की समुचित व्यवस्था न हो वहाँ स्वस्थाने बाग़ स्थापन विधि को प्रोत्साहित करना चाहिए। शिखर रोपण विधि यह देखा गया है कि बीजू/देशी पौधे बहुतायत में पाये जाते हैं जिनके फल छोटे आकार के और कम गुणवत्ता वाले होते हैं। ऐसे पौधों को उन्नत किस्मों में बदलने के लिए शिखर रोपण करना चाहिए। इसके लिए पेड़ की मोटी शाखाओं को जमीन से उचित ऊँचाई (2.5-3.0 मी.) पर मार्च में शिखर से काटकर उस हिस्से को गीली मिट्टी और टाट से ढक देते हैं। जब इन कटे हुए भागों से नई शाखाएं निकल कर कलम बाँधने योग्य हो जाएं तो उन पर जून-जुलाई में कलिकायन कर दिया जाता है। जब कलिकाएँ अच्छी तरह से फुटाव ले लेती है तो पुरानी शाखाओं को ऊपर से काट दिया जाता है। इस प्रकार के पौधों में तीसरे वर्ष से उपज प्राप्त होने लगती है। खाद एवं उर्वरक पौधों की अच्छी बढ़वार, अधिक फल और पेड़ों को स्वस्थ रखने के लिए प्रत्येक पौधे में 5 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद, 50 ग्राम नाइट्रोजन, 25 ग्राम फ़ॉस्फोरस और 50 ग्राम पोटाश की मात्रा प्रति वर्ष प्रति वृक्ष डालनी चाहिए। खाद और उर्वरक की यह मात्रा दस वर्ष तक इसी अनुपात में बढ़ाते रहना चाहिए। इस प्रकार 10 वर्ष या उससे अधिक आयु वाले वृक्ष को 500 ग्राम नाइट्रोजन 250 ग्राम फ़ॉस्फोरस और 500 ग्राम पोटाश के अतिरिक्त 50 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद डालना उत्तम होता है। ऊसर भूमि में उगाये गये पौधे में प्राय: जस्ते की कमी के लक्षण दिखाई देते हैं। अत: ऐसे पेड़ों में 250 ग्राम जिंक सल्फेट प्रति पौधे के हिसाब से उर्वरकों के साथ डालना चाहिए या 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट का पर्णीय छिड़काव जुलाई, अक्टूबर व दिसम्बर में करना चाहिए। खाद और उर्वरकों की पूरी मात्रा जून-जुलाई में डालनी चाहिए। जिन बागों में फलों के फटने की समस्या हो उनमें खाद और उर्वरकों के साथ 100 ग्राम/वृक्ष बोरेक्स (सुहागा) का प्रयोग करना चाहिए। सिंचाई नये पौधों को स्थापित करे कि एक-दो वर्ष सिंचाई की अत्याधिक आवश्यकता पड़ती है। स्थापित पौधे बिना सिंचाई के भी अच्छी तरह से रह सकते हैं। गर्मियों में बेल का पौधा अपनी पत्तियाँ गिरा कर सुषुतावस्था में चला जाता है इसके अलावा इसमें पुष्पण तथा फल वृद्धि बरसात के मौसम से शुरू होकर जाड़े के समय तक होती है। इस तरह यह सूखे को सहन कर लेता है। सिंचाई की सुविधा होने पर मई-जून में नई पत्तियाँ आने के बाद दो सिंचाई 20-30 दिनों के अंतराल पर कर देनी चाहिए। पौधों की सधाई, छंटाई और अंत: फसलें पौधों की सधाई, सुधरी प्ररोह विधि से करना उत्तम पाया जाता है। सधाई का कार्य शुरू के 4-5 वर्षों में करना चाहिए। मुख्य तने को 75 सेंमी. तक अकेला रखना चाहिए। इसके बाद 4-6 मुख्य शाखाएं चारों दिशाओं में बढ़ने देनी चाहिए। बेल के पेड़ों में विशेष सधाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है परन्तु सूखी, कीड़ों और बीमारियों से ग्रसित टहनियों को समय-समय पर निकालते रहना चाहिए। शुरू के वर्षों में नये पौधों के बीच खाली जगह का प्रयोग अंत: फसल लेते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि ऐसी फसलें नहीं लेनी चाहिए जिन्हें पानी की अधिक आवश्यकता हो और वह मुख्य फसल को प्रभावित करें। इसके अलावा ऊसर भूमि में लगाये गये बागों में सनई, ढैंचा की फसलें लगा कर उन्हें वर्षा ऋतु में पलट देने से भूमि की दशा में भी सुधार किया जा सकता है। रोग और कीट: रोग बेल का कैंकर यह रोग जैन्थोमोनस विल्वी बैक्टीरिया द्वारा होता है। प्रभावित भागों पर पानीदार धब्बे बनते हैं जो बाद में बढ़ कर भूरे रंग के हो जाते हैं। बाद में पूर्व प्रभावित भाग का उत्तक गिर जाता है और पत्तियों पर छिद्र बन जाते हैं। इस रोग की रोकथाम के लिए स्ट्रेप्टोसाइक्लिन सल्फेट (200 पी.पी.एम.) को पानी में घोल कर 15 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए। छोटे फलों का गिरना इस रोग का प्रकोप फ्यूजेरियमनामक फफूंद द्वारा होता है। इस रोग में बेल के छोटे फल (2-3 इंच व्यास वाले) गिरते हैं। पहले डंठल वाले छोर पर फ्यूजेरियन फफूंद का संक्रमण होता है तथा एक भूरा छोटा घेरा फल के ऊपरी हिस्से पर विकसित होता है। डंठल और फल के बीच फफूंद विकसित होने से जुड़ाव कमजोर हो जाता है और फल गिर जाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए जब फल छोटे हों, कार्बेन्डाजिम (0.1 प्रतिशत) का दो छिड़काव 15 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए। डाई बैक इस रोग का प्रकोप लेसिया डिप्लोडिया नामक फफूंद द्वारा होता है। इस रोग में पौधों की टहनियां ऊपर से नीचे की तरफ सूखने लगती है। टहनियों और पत्तियों पर भूरे धब्बे नजर आते हैं और पत्तियाँ गिर जाती है। इस रोग के नियंत्रण के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (0.3 प्रतिशत) का दो छिड़काव सूखी टहनियों को छांट कर 15 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए। फलों का गिरना/आंतरिक विगलन बेल के बड़े फल अप्रैल-मई बहुतायत में गिरते हैं। गिरे बेलों में आंतरिक विगलन के लक्षण पाये जाते हैं। साथ बाह्य त्वचा में फटन भी पायी जाती है। इस रोग के नियंत्रण के लिए 300 ग्राम बोरेक्स प्रति वृक्ष का प्रयोग करना चाहिए। साथ जब फल छोटे आकार के हों तो एक प्रतिशत बोरेक्स का दो बार छिड़काव 15 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए। फलों का सड़ना बेल के ऐसे फल जिन्हें तोड़ते समय गिरने से फलों की बाह्य त्वचा में हल्की फटन हो जाती है, वे फल तेजी से सड़ जाते हैं। ऐसे फलों में एस्परजिलस फफूंद फल के अंदर विकसित होती है तथा अंदर का गूदा अधिक मुलायम तथा तीक्ष्ण गंध वाला हो जाता है। इसके नियंत्रण के लिए फलों को सावधानी से तोड़ना चाहिए, जिससे फल जमीन पर न गिरें और फलों की त्वचा पर फटन न होने पाये साथ ही ऐसे फल मृदा के संपर्क में नहीं आने चाहिए। पत्तियों पर काले धब्बे बेल की पत्तियाँ पर दोनों सतहों पर काले धब्बे बनते हैं, जिनका आकार आमतौर पर 2.3 मि.मी. का होता है। इन धब्बों पर काली फफूंदी नजर आती है, जिसे आइसेरेआप्सिस कहते हैं। इसके रोकथाम के लिए बैविस्टीन (0.1 प्रतिशत) या डाईफोलेटान (0.2 प्रतिशत) का छिड़काव करना चाहिए। कीट बेल को बहुत कम नुकसान पहुँचाते हैं। पर्ण सुरर्गी और पर्ण भक्षी झल्लीं थोड़ा नुकसान पहुंचाती है। यह पेड़ की पत्तियों को काटकर नुकसान पहुंचाती है। इन कीटों की रोकथाम के लिए 0.1 प्रतिशत) या थायोडॉन (0.1 प्रतिशत) का छिड़काव सप्ताह के अंतराल पर करना चाहिए। फलों की तुड़ाई और उपज फल अप्रैल-मई में तोड़ने योग्य हो जाते हैं। जब फलों का रंग गहरे हरे रंग से बदल कर पीला हरा होने लगे तो फलों की तुड़ाई 2 सेंमी. डंठल के साथ करनी चाहिए। तोड़ते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि फल जमीन पर न गिरने पायें। इससे फलों की त्वचा चटक जाती है, जिससे भंडारण के समय चटके हुए भाग से सडन चटके हुए भाग से सडन आरंभ हो जाती है। कलमी पौधों में 3-4 वर्षों में फल प्रारंभ हो जाती है, जबकि बीजू पेड़ 7-8 वर्ष में फल देते हैं। प्रति वृक्ष फलों की संख्या वृक्ष के आकार के साथ बढ़ती रहती है। 10-15 वर्ष के पूर्ण विकसित वृक्ष से 100-150 फल प्राप्त किये जा सकते हैं। स्त्रोत एवं सामग्रीदाता: कृषि विभाग, बिहार सरकार