परिचय आँवला का उत्पत्ति-स्थान भारतवर्ष ही है, जिसे यहाँ पुराने जमाने से ही उगाया जाता है। आँवले को प्राय: लोग ‘औरा’ भी कहते हैं। यह एक सम उष्णकटिबन्धीय फल वृक्ष है जो जाड़ा तथा गर्मी दोनों मौसम को सहन करता है। इसके बढ़ाव के लिए वर्षा जरूरी है, लेकिन पौधे की जड़ों में पानी नहीं लगना चाहिए। इसके पौधे हिमालय की तराई से दक्षिण भारत के पहाड़ी इलाकों में जंगली रूप में मिलता है। दक्षिण भारत, उत्तर प्रदेश तथा बिहार राज्यों के कुछ भागों में इसकी बागवानी रुप में की जाती है, परन्तु ये बाग़ भी प्राय: छोटे-छोटे ही है। मिट्टी आँवला की खेती प्राय: सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, पर अधिक बलुई मिट्टी इसके लिए उपयुक्त नहीं है। सबसे अच्छी खेती इसकी दोमट मिट्टी में होती है। इसे ऊसर भूमि में भी उगाया जा सकता है जिसका पी.एच. 7.5 से 9.0 तक हो। पथरीली मिट्टी में भी इसे भलीभांति उपजते पाया गया है। इसे सूखे तथा नम दोनों प्रकार के क्षेत्रों में पैदा किया जा सकता है। लू या पाले का पेड़ पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। वृक्ष-आकार आँवला वृक्ष काफी बड़ा होता है और इसके पत्ते बहुत ही छोटे-छोटे होते हैं जो उपशाखाओं पर इस प्रकार लगे रहते हैं कि प्रत्येक उपशाखा एक संयुक्त पत्ती की तरह दिखाई पड़ती है। इसकी डालियों में भी फूल लगते हैं, जिनमें फल लगते हैं। इनकी पत्तियों में भी फूल लगते हैं और फल के रूप में बदलते हैं। गुण आँवला का फल विटामिन ‘सी’ का सर्वोत्तम और प्राकृतिक स्रोत है। इसमें विटामिन ‘सी’ नष्ट नहीं होता। इसमें पाया जाने वाला विटामिन ‘सी’ हमारी त्वचा, नेत्र ज्योति, केश, फेफड़ा और कान्ति के लिए बहुत उपयोगी होता है। शरीर को युवा और शक्तिशाली बनाये रखने के लिए यह बेजोड़ फल है। शुरू में यह फल कसैला होता है, परन्तु शरदऋतु के अंत में जब यह ठीक से पक जाता है तो इसका कसैलापन काफी कम हो जाता है और यह सेवन योग्य हो जाता है। यह भूख बढ़ाने वाला, रक्तशोधक, स्मरण शक्ति, पौरुषबल और ओज की वृद्धि करके मस्तिष्क एवं ह्रदय को बल देता है तथा वायु बढ़ाता है। पौध की तैयारी आँवले के पौधों को बीज तथा कलम दोनों विधियों द्वारा तैयार किया जाता है। पहले आँवले का प्रवर्धन भेंट कलम द्वारा ही किया जाता था। परन्तु, भेंट कलम द्वारा तैयार पौधे कमजोर होते हैं तथा खेत में लगाने पर काफी भर जाते हैं। अत: सबसे अच्छी विधि ‘चश्मा’ है। जून माह में चश्मा लगाने पर काफी अधिक सफलता मिलती है। ‘शील्ड चश्मा’ सबसे अधिक अच्छा पाया गया है। इसके लिए बीजू पौधे एक साल का या लगभग दो साल पुराना लेते हैं। बीजू पेड़ों को ऊपर काट देते हैं, फिर जो नया प्ररोह निकलता है, उसपर अच्छे आँवले किस्म से कली लेकर चश्मा चढ़ाकर बांध देते हैं। कली निकालते समय यह ध्यान रखें कि कली वैसे पौधे तथा शाखा से लें जिनमें मादा फूलों की संख्या अधिक निकलती हो। अन्यथा तैयार पौधों में भविष्य में फूल-फल लगने में कमी हो जाती है या एकदम नहीं लगते। कलम तैयार होने के पश्चात दूसरे वर्ष इन्हें बागवानी हेतु लगा सकते हैं। फलन बीज पौधों में फल देर से आते हैं जबकि कलम किये गये पौधों को लगाने के लगभग 4 -5 वर्षो में थोड़े-बहुत फल लगने आरम्भ होते हैं तथा 10-11 वर्षो बाद पूर्ण रुप से फल लगने आरम्भ हो जाते हैं। बसंत ऋतु के समय पेड़ों में नयी वृद्धि के साथ फूल आने प्रारम्भ हो जाते हैं। इसके फूल दो प्रकार के (1) नर और (2) मादा होते हैं। नर फूलों की संख्या बहुत अधिक होती है तथा मादा फूलों की संख्या बहुत कम। इसमें हवा तथा मधुमक्खी द्वारा परागण होता है। बनारसी किस्म में 12 से 18 प्रतिशत ही परागण होता है। अत: इसे बढ़ाने हेतु बाग़ में मधुमक्खी पालन करने से परागण बढ़ जायेंगे तथा प्रति पेड़ फलों की संख्या बढ़ाई जा सकती है। फल सेट होने के बाद भ्रूण अगस्त तक प्रसुप्त अवस्था में रहता है, अत: अगस्त तक फल पेड़ पर दिखलाई नहीं पड़ते। जब अगस्त में भ्रूण की वृद्धि होती है तो फल भी बढ़ने लगते हैं और जनवरी-फरवरी में तैयार हो जाते हैं। पौध लगाना अन्य फल वृक्षों की तरह इसके लिए भी 1 मीटर व्यास वाला गोलाकार 1 मीटर गहरा गड्ढा बनाकर खाद आदि डालकर इसके कलम पौधों को लगाते हैं। बागवानी में पौधे की दूरी 10 मीटर रखते हैं। इसकी रोपाई का उत्तम समय जुलाई-अगस्त है। इसे फरवरी माह में भी लगा सकते हैं। खाद एवं उर्वरक आँवला पौधा को लगाने से एक-दो माह पहले प्रत्येक गड्ढे में 40 किलो गोबर की सड़ी खाद, 10 किलो सड़ी पत्ती की खाद और एक किलो अण्डों का खल्ली-चूर मिट्टी में मिलाकर गड्ढा को भर देना चाहिए। फिर आँवला पौधे को अगस्त-सितम्बर में लगाते समय 100 ग्राम बी.एच.सी. पाउडर प्रति गड्ढे में मिलाते हुए पौधे लगायें। पौधों की ठीक बीचो-बीच गड्ढे में लगाना चाहिए तथा मिट्टी को अच्छी तरह दबाकर सिंचाई कर दें। आँवले के प्रत्येक पौधे को 10 किलोग्राम सड़े गोबर की खाद, 100 ग्राम नाइट्रोजन, 50 ग्राम फास्फोरस तथा 75 ग्राम पोटाश डालें। अगले वर्ष यह मात्रा दुगुनी कर डालें। इसी तरह प्रत्येक अगले वर्ष इसकी मात्रा तीनगुनी-चारगुनी करते जायें। इस प्रकार खाद एवं उर्वरक की यह मात्रा पौधे की आयु के साथ-साथ बढ़ती जाती है और पौधे को 10 वर्ष तक खाद की मात्रा इसी अनुपात में पहले वर्ष की अपेक्षा 10 गुनी हो जायेगी। 10 वर्ष पश्चात उतनी ही खाद की मात्रा देते रहें जितनी 10 वर्ष में दी गई है। गोबर की खाद और फास्फोरस की पूरी मात्रा तथा नाइट्रोजन और पोटाश की आधी मात्रा जून-जुलाई में दें तथा नेत्रजन के आधी एवं पोटाश की आधी मात्रा नवम्बर-दिसम्बर में दें। अच्छे फलन हेतु फूल आने से पहले प्रति पेड़ 3-4 किलो सुपर फास्फेट डालने से फल लगने में वृद्धि होती है। सिंचाई पौधे लगाने के बाद तुरन्त सिंचाई कर दें। उसके बाद आवश्यकतानुसार 7-15 दिनों के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए। जाड़ा और गर्मी में पानी पटाने का पूरा इंतजाम रखना चाहिए ताकि पौधे सूखने न पायें। आँवला बाग़ में अन्तर्वर्ती खेती आँवला को बागवानी के आरम्भ के 5-7 वर्षो तक दलहनी फसल उगाना लाभदायक है। ऊसर भूमि में आरम्भ में ढैंचा या सनई की बुआई करके उसे हरी खाद के रूप में जमीन में गाड़ देना काफी लाभप्रद होता है। किस्में आँवला की उत्तम किस्मों का कोई वैज्ञानिक वर्गीकरण नहीं किया जा सकता है। इसके उत्तम किस्मों में बनारसी, चकिया, फ्रांसिस या हाथीझूल, कृष्णा, कंचन और नरेन्द्र आँवला-7 है। बनारसी: यह आँवले की प्रसिद्ध अगेती किस्म है। इसके पौधों की सीधी बढ़वार होती है। फलों का आकार बड़ा 50-60 ग्राम प्रतिफल, सतह चिकना हल्के पीले रंग का होता है। मादा फूलों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है। अत: प्रति पेड़ काफी कम फल पकड़ते हैं। विटामिन ‘सी’ की मात्रा सर्वाधिक पायी जाती है। इसके फलों से व्यवसायिक स्तर पर मुरब्बा बनाया जाता है। इसके अधिकांश फल फट जाते हैं, जिस कारण इस किस्म को व्यवसायिक रोपण हेतु अनुशंसा नहीं की जाती है। चकाइया: यह देर से पकने वाली किस्म है। इसके वृक्षों का फैलाव अधिक होता है। फल अपेक्षाकृत मध्य आकार के चपटे 30-40 ग्राम प्रतिफल का होता है। फल हरे रंग को चिकनी सतह वाले रसेदार होते हैं। गूदा रेशेदार तथा सख्त होता है। मादा फूलों की संख्या अधिक होने के कारण फलन अच्छा होता है तथा फल शाखा से मजबूती से जुड़े रहते हैं, जिस कारण प्रारम्भिक अवस्था में गिरते नहीं हैं। मध्यम भंडारण क्षमता होने के कारण अंचार तथा अन्य उत्पादनों के लिए उपयुक्त होता है। इस किस्म में क्षय व्याधि का प्रकोप नहीं होता है। इन्हीं सब गुणों के कारण इसकी व्यावसायिक बागवानी की अनुशंसा की जाती है। फ्रांसिस (हाथीझूल): इस किस्म के पौधों की शाखाएं तथा पत्तियाँ नीचे की ओर झुकी रहती हैं। यह मध्यम उत्पादन क्षमता एवं मध्यम समय में तैयार होने वाली किस्म है। इसके फलों का आकार मध्यम से बड़ा अंडाकार होता है, जिनके प्रति फल का वजन 40-50 ग्राम होता है। इनकी सतह चिकनी, हल्के हरे पीले रंग के मुलायम गूदे के तथा लगभग रेशाहीन होते हैं। मादा फूलों की संख्या अपेक्षाकृत मध्यम होती है। फलों की भंडारण – क्षमता भी मध्यम होती है। इसके फलों में क्षय व्याधि का प्रकोप पाया जाता है। अत: मुरब्बा बनाने हेतु यह किस्म अच्छी नहीं होती है। इनमें सुहागे की कमी के कारण इनके फल काले पड़ने लगे तो 0.6% सुहागा (बोरेक्स) का छिड़काव 10-12 दिनों के अंतर पर 2-3 बार कर देना चाहिए। कृष्णा: यह किस्म बनारसी जाती के बीजू पौधों से चयन की गई है। यह भी अगेती किस्म है। इसके फल औसतन बड़े आकार के, करीब 45 ग्रा.प्रतिफल होते हैं। फलों की सतह चिकनी तथा हल्के पीले रंग की होती है तथा प्रकाश वाले हिस्से केफ्लों पर हल्के लाल या गुलाबी रंग के धब्बे पाये जाते हैं। गूदा लगभग रेशाहीन, सख्त एवं अर्द्धपारदर्शक होता है। इसकी भंडारण –क्षमता अच्छी होती है। अत: मुरब्बा हेतु यह एक सर्वोत्तम किस्म है। मादा फूलों की संख्या भी औसतन बनारसी से अधिक होती है जिस कारण मध्यम उत्पादन क्षमता वाली होती है। इस किस्म की व्यावसायिक आगवानी हेतु अनुशंसा की जाती है। कंचन: यह चकइया के बीजू पौधों से चयनित किस्म है। इसके पौधों का फैलाव अधिक होता है तथा मादा फूलों की संख्या अधिक होने के कारण फसल अच्छी होती है। फल मध्यम आकार के छोटे होते हैं। जिनकी सतह चिकनी एवं हल्के पली रंग की होती है। गूदा रेशायुक्त कठोर होने के कारण उत्पादों केलिए एक उपयुक्त किस्म है। नरेन्द्र आँवला-7: यह हाथीझूल किस्म के बीजू पौधा से चयनित एक उत्तम किस्म है। पौधों की बढ़वार सीधी होती है। मादा फूलों की संख्या सर्वाधिक होने के कारण इस किस्म की उत्पादन-क्षमता काफी अच्छी होती है। फलों का आकार मध्यम से बड़ा करीब 45-50 ग्राम प्रति फल होता है जिसकी सतह चिकनी तथा पीली रंग के होती है। गूदा रेशाहीन व मुलायम होता है। मध्यम भंडारण – क्षमता होने के कारण मुरब्बा बनाने के लिए यह एक उपयुक्त किस्म है। रोपण के बाद 3-4 वर्षो में फल देने लगता है। बागवानी के लिए यह एक उत्तम किस्म है जिसे नरेन्द्रदेव कृषि विश्वविद्यालय, फैजाबाद से विकसित की गई है। फलों की तोड़ाई एवं उपज: आँवला फल यों तो चटनी, अंचार आदि के लिए अक्टूबर-नवम्बर से ही टूटने शुरू हो जाते हैं। परन्तु, मुख्यत: इनको तोड़ाई दिसम्बर-जनवरी में परिपक्व होने पर ही करते हैं। तोड़ने के लिए जालीनुमा डालिया झोले लगे लग्गी को उपयोग करना चाहिए, अन्यथा फल चोट खाकर हो जाते हैं तथा मुरब्बे लायक नहीं रहते और उन्हें अधिक समय तक नहीं रखा जा सकता। 10 से 12 वर्ष की आयु वाले विकसित पौधों से लगभग 2 या 3 क्विंटल फल प्राप्त होते हैं। प्रति हेक्टेयर औसतन 20-25 क्विंटल उपज प्राप्त होती है। उपयोग: इसके फल मुरब्बे और अंचार के रूप तथा जैम बनाकर ही उपयोग किये जाते हैं। बीजू फल पौधे के फलों का च्यवनप्राश बनाने में उपयोग किये जाते हैं। फल सुखाकर कई दवाओं की बीमारियों के लिए बहुत ही लाभप्रद होता है। आँवला केश तेल बनाने तथा सरबाल धुलाई में भी काम आता है। अंचार के अतिरिक्त ताजे फलों से चटनी बनायी जाती है। रोग-व्याधि: आँवला के पौधों को सबसे अधिक हानि धड़छेदक कीड़ों तनों तथा डालियों में छेद कर देते हैं जिसके फलस्वरूप वृक्ष की वृद्धि रुक जाती है तथा पैदावार बहुत कम हो जाती है और कुछ समय पश्चात पेड़ सूख जाते हैं। अत: ज्योंही वृक्ष में मुराछापन नजर आये, इसकी खोज करें। कीड़े जहाँ से भीतर घुसे होंगे, वहाँ कुछ लकड़ी की भूसी नजर आयेगी। उसमें लोहा की पतली कमानी घुसाकर छेद बना देना चाहिए फिर तारपीन तेल में रुई भिंगोकर कमानी से सहारे भीतर घुसा देना चाहिए जिससे कीड़े मर जायेंगे। इसके बाद वृक्ष में अधिक खाद आदि डालकर सिंचाई करने से लाभ होता है तथा वृक्ष की हालत अच्छी हो जाती है। अगर आँवला फलों में उत्तक क्षय व्याधि आदि के कारण काले धब्बे पड़ने लगें तो 0.6 प्रतिशत सुहागा (बोरेक्स) का छिड़काव 10-12 दिनों के अंतर से 2-3 बार कर देने से काले धब्बे पड़ने बंद हो जाते हैं। स्त्रोत: कृषि विभाग, बिहार सरकार