<div id="MiddleColumn_internal"> <h3 style="text-align: justify; "><span>भूमिका</span></h3> <p style="text-align: justify; ">ग्लैडियोलस फूल अपनी सुन्दरता, डंठल में फूलों का एक-एक करके खिलना, विभिन्न आकार-प्रकार<img class="image-right" src="https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/agriculture/crop-production/92c93f93993e930-93093e91c94d92f-92e947902-91594393793f-92a94d93092393e932940/92c93f93993e930-92e947902-92b94293294b902-915940-93594891c94d91e93e92893f915-916947924940/glad.jpg" /> एवं रंगों तथा फूलदान में अधिक समय में तक सही दशा में रहने के कारण मुख्य स्थान रहता है। व्यावसायिक दृष्टि से इसे कटे फूल उत्पादन हेतु उगाया जाता है, परन्तु उद्यान को सुंदर बनाने के लिए क्यारियों एवं गमलों में भी इसे लगाया जाता है। कटे फूल को गुलदस्ता, मेज सज्जा एवं भीतरी सज्जा के लिए मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है।</p> <p style="text-align: justify; ">ग्लैडियोलस की मुख्य रूप से दो तरह की किस्में होती है, एक बड़े फूलों वाली तथा दूसरी छोटे फूलों वाली बटर फ्लाई बहुत से किस्मों में फूल के बीच का भाग जिसे ब्लाच कहते हैं। दूसरे रंग का होता है जिससे इसकी सुन्दरता बढ़ जाती है।</p> <h3 style="text-align: justify; "><span>मुख्य किस्में</span></h3> <p style="text-align: justify; "><strong>व्यावसायिक रूप से उत्पादन हेतु: </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify; ">फ्रेंडशिप व्हाइट, फेंडशिप पिंक, वाटरमेलन पिंक, लिली आसक्र, जैकसन, विस-विस, युरोविजन।</p> <p style="text-align: justify; "><strong>भारत में विकसित प्रमुख किस्में: </strong><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify; ">आरती, अप्सरा, अग्नि रेखा, सपना, शोभा, शोभा, सुचित्रा, मोहनी, मनोहर, मयूर, मुक्ता, मनीषा, मनहार।</p> <h3 style="text-align: justify; "><span>प्रवर्धन</span></h3> <p style="text-align: justify; ">ग्लैडियोलस का प्रवर्धन कन्द से होता है। कन्द लगभग 3-4 सेमी, व्यास का होना चाहिए। लट्टूनुमा आकार वाले कन्द चिपटे कन्द की अपेक्षा उत्तम पाया गया है। एक कन्द से कई छोटे-छोटे कन्द जिन्हें कार्मल कहते हैं, तैयार होते हैं। परन्तु ये इतने छोटे होते हैं, जो कि रोपने योग्य नहीं रहते हैं। अतः इन्हें 2-3 बार रोपाई करनी पड़ती है उसके बाद ही सही आकार के कन्द प्राप्त हो पाते हैं। कन्द रोपण का उपयुक्त समय सितम्बर एवं अक्तूबर माह है। खुदाई के बाद कन्द लगभग तीन माह तक सुष्प्ताव्स्था में रहते हैं। अतः सुष्प्ताव्स्था में इनकी रोपाई न करें अन्यथा इनका अंकुरण नहीं होगा। रोपाई करने के पहले भूरे रंग के बाहरी छिलके को हटकर 0.2% कैप्टान या 0.1% बेनलेट के घोल में 30 मिनट तक उपचारित करने के बाद ही कंदों की रोपाई करनी चाहिए। उत्तम होगा यदि कंदों की अकुरित कराके रोपाई करें। इसके लिए कन्द को अँधेरे एवं गर्म स्थान पर बालू भरे ट्रे में लगाकर रखना चाहिए। बालू को नम बनाए रखें तथा ट्रे को पोलीथिन से ढँक दें। व्यावसायिक खेती हेतु कंदों को 20-30 x15-20 या 25 x15 सेमी. की दुरी पर 5-10 सेंमी. गहराई पर रोपाई करें। प्रदर्शनी हेतु स्पाइक तैयार करने के लिए बड़े आकार के कन्द (50-7.5 सेंमी. व्यास के) को 30 x20 सेमी. पर रोपना चाहिए। यदि कन्द की रोपाई 20-25 दिन के अतराल पर कई बार में की जाय तो स्पाइक लगातार अधिक समय तक मिलती रहती है।</p> <h3 style="text-align: justify; "><span>खाद एवं उर्वरक</span></h3> <p style="text-align: justify; ">ग्लैडियोलस को अच्छी उपज प्राप्त करने हेतु प्रति वर्ग मीटर भूमि में 2.0-2.5 किग्रा. कम्पोस्ट, 15-30 ग्राम नाइट्रोजन, 10-15 ग्राम फास्फोरस व 15-20 ग्राम पोटाश देना चाहिए। कम्पोस्ट, फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नाइट्रोजन की चौथाई मात्रा रोपाई के समय देनी चाहिए, जबकि शेष नाइट्रोजन की मात्रा को तीन बार में बराबर-बराबर मात्रा में प्रथम पौधे में 3-4 पत्तियाँ आने पर, दूसरी बार स्पाइक निकलते समय तथा अंतिम बार जब फूल निकलना समाप्त हो जाए। अंतिम बार नाइट्रोजन की मात्रा क्द्नों की सही वृद्धि के लिए देते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify; "><span>अन्य क्रियाएँ</span></h3> <p style="text-align: justify; ">खेत को खरपतवार से मुक्त रखें साथ ही जड़ पर दो बार मिट्टी चढाएं एक तो तीन-चार पत्ती की अवस्था पर दूसरे बार जब स्पाइक निकलने लगे एवं आवश्कतानुसार सिंचाई करें। मुख्य रूप से स्पाइक निकलते समय नमी की कमी नहीं होने चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify; "><span>पौधे को सहारा देना</span></h3> <p style="text-align: justify; ">जब स्पाइक (फूल की डंठल) निकलने लगे उसी समय बांस की फट्ठी का पौधों से स्पाइक न तो टेढ़ी-मेढ़ी हो सके न ही जमीन की तरफ झुके या गिरे।</p> <h3 style="text-align: justify; "><span>स्पाइक की कटाई</span></h3> <p style="text-align: justify; ">सबसे नीचे वाले फूल का रंग दिखाई देते ही तेज चाक़ू या स्कैटियर की मदद से स्पाइक कांटने के तुरंत बाद पानीयुक्त बाल्टी में स्पाइक को रखें।</p> <h3 style="text-align: justify; "><span>फूलदान के स्पाइक सजाना</span></h3> <p style="text-align: justify; ">फूलदान को साफ करने के बाद उसमें स्वच्छ पानी भरकर स्पाइक को सजाएं। दूसरे दिन से रोजाना या एक दिन के अंतराल पर स्पाइक को नीचे से 1.5 सेमी. कांटते रहें तथा पानी बदलकर साफ पानी भर दें अनुकूल दशा में स्पाइक के सभी फूल धीरे-धीरे खिल जाते हैं तथा कम से कम एक हफ्ते तक आसानी से फूलदान में रखा जा सकता है।</p> <h3 style="text-align: justify; "><span>कन्द की खुदाई एवं भंडारण</span></h3> <p style="text-align: justify; ">यदि पौधे से स्पाइक को नहीं काटा जाता है और उसे क्यारी या गमले में ही सुन्दरता प्रदान करने के लिए पुर्णतः खिलने देते हैं तो यह ध्यान रखें कि पौधे पर बीज न बनने पाए अन्यथा कन्द को नुकसान पंहुचाता है। जब पत्ती पीले रंग की हो जाए एवं सुखना शुरू करे तो कन्द एवं कारमेल को खुरपी की सहायता से खुदाई करें। कन्द को खोदने के बाद 0.2% बाविस्टीन/कैप्टान या 0.1% बेनलेट घोल से 30 मिनट तक उपचारित करके छायादार स्थान पर 2-3 सप्ताह तक सुखाकर लकड़ी की पेटी या जूट के बैग में रखकर हवादार एवं ठंड कमरे में भंडारित करें। यदि कोल्ड स्टोरेज में 40 सेमी. पर भंडारित किया जाए तो यह सर्वोत्तम होगा।</p> <h3 style="text-align: justify; "><span>कीड़े एवं बीमारियाँ</span></h3> <p style="text-align: justify; ">ग्लैडियोलस को थ्रिप्स कीड़ा से ज्यादा नुकसान होता है इसके लिए 0.3% सेविन या 0.1% मालाथियान या 0.15% नुवाक्रांन के घोल को छिड़काव 15-20 दिन के अंतराल पर करें। भंडारण के समय भी कभी-कभी ये कीड़े कन्द को क्षति पहुंचाते हैं। अतः भंडारण के समय भी आवश्यकतानुसार 2-3 छिड़काव करना लाभदायक है।</p> <p style="text-align: justify; ">ग्लैडियोलस में मुख्य रूप से भूमि जनित दो बीमारियाँ स्ट्रोमोनियम ग्लैडियोली और फ्यूजेरियम आम्सीस्पोरम का साधारनतया प्रभाव पाया जाता है। इसके प्रभाव के कन्द सड़ जाते है। इस बीमारी से बचाव के लिए बीमारी रहित केंद्र का चुनाव करें तथा कन्द को रोपने के पहले 0.2% कैप्टान से यह गर्म पानी में 48 से 30 मीटर तक उपचारित करना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify; ">खड़ी फसल में बीमारी से बचाव हेतु 0.25% इंडोफिल एम-45 का छिड़काव करें।</p> <p style="text-align: justify; "><strong>उपज</strong></p> <p style="text-align: justify; ">उचित फसल प्रंबधन से एक हेक्त्तेयर क्षेत्रफल से लगभग 2-25 लाख पुष्प डंठल प्राप्त की जा सकती है।</p> <p style="text-align: justify; "><strong> स्त्रोत: </strong><a class="ext-link-icon" href="http://www.horticulture.bih.nic.in/" target="_blank" title="अधिक जानकारी के लिए ">राज्य बागवानी मिशन </a>, बिहार सरकार</p> </div>