परिचय लहसुन एक बहुत ही उपयोगी मसाला फसल है। इसकी पत्तियों की चटनी पकौड़ा, कोफ्ता, सलाद आदि बनाने में उपयोग किया जाता है। इसके जड़ों का उपयोग विभिन्न शाकाहारी तथा मांसाहारी व्यंजनों के बनाने में होता है। मसाले और आधार के रूप में इसका ज्यादा प्रयोग किया जाता है। पोषण की दृष्टि से लहसुन काफी धनी होता है। यह कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और फास्फोरस का मुख्य स्रोत है तथा इसमें एस्कार्बिक अम्ल (विटामिन सी) बहुत अधिक मात्रा में पाई जाती है। लहसुन पाचन क्रिया को ठीक करके भोजन पचाने में सहायक होता है। एक अध्ययन के अनुसार लहसुन रक्त में कालेस्ट्राल को कम करता है। इसके सेवन से रक्त में शर्करा की मात्रा में कमी आती है। परन्तु अधिक सेवन करने से खून की कमी हो जाती है। किस्में राष्ट्रीय बागवानी अनूसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान नासिक द्वारा लहसून की विकसित की गई पांच किस्मों का चयन किया जा सकता है। यमुना सफ़ेद 1 (जी-1) - इस किस्म के कंद बड़े (3.5 – 40 से. मी. व्यास) आकार के होते हैं। कंद ठोस त्वचा चाँदी की तरह सफेद, गुदा क्रीम के रंग का एवं जड़ें बड़े होते हैं। एक कंद में (पोटी) 20-25 जड़े होते हैं। यमुना सफ़ेद 2 (जी-50) - इस किस्म के लहसुन के कंद ठोस त्वचा सफेद एवं गुदा क्रीम रंग का होता है। कंद का आकार बड़ा (4.0 – 4.5 से. मी. व्यास) एवं प्रत्येक कंद में 20-25 जड़ें होते हैं। यमुना सफ़ेद 3 (जी-282) - इनका शल्क कंद ठोस, त्वचा सफेद, एवं गुदा क्रीम रंग का होता है। यह बुआई के 165 -170 दिनों बाद तैयार हो जाती है। इस पर बैंगनी धब्बा रोग या झुलसा रोग का प्रकोप कम होता है। यमुना सफ़ेद 4 (जी-323) - इसके शल्क कंद बड़े आकार के (व्यास 5.87 से. मी.) सफेद रंग के एवं ठोस होते हैं। जड़ें 1.04 – 1.05 से. मी. मोटे होते हैं और प्रत्येक जड़ें का बजन 2.5- 2.8 ग्राम होता है। एक कंद में 15-18 जब पाये जाते हैं। यह किस्म लगाने के 140-150 दिनों बाद तैयार हो जाती है। वीएल लहसुन 2 - यह पर्वतीय क्षेत्रों के लिए ज्यादा उपयुक्त है। यह शल्क कंद बड़े, हल्का सफेद, बैंगनी रंग मिश्रित तथा 10-12 जड़ें वले होटी हैं। शल्क कंद का व्यास 5-7 से. मी. होता है। जड़ें क्रीम रंग के होते हैं और प्रत्येक जड़ें का वजन 4.5 – 5 ग्राम होता है। इसके अलावे यमुना सफेद- 4 (जी. 323) जी. 1. एवं एग्रिफाऊनड सफेद (जी . 41) उन्नत प्रभेद है। बुआई 200-250 क्विंटल कम्पोस्ट या 40-50 क्विंटल वर्मी कंपोस्ट प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई से पूर्व खेत में अच्छी तरह बिखेर कर जुताई कर मिला देते है। यह कम बुआई के 20-25 दिन पूर्व करते हैं। तीन – चार जुताई कर एवं हरेक जुताई के बाद पाटा चलाकर खेत की मिट्टी को हल्की एवं भूरभूरी बना ली जाती है। लहसुन के बुआई का समय अक्टूबर से नवंबर माह तक किया जाता है। बीज दर 300- 500 किलोग्राम जड़ें प्रति हेक्टेयर की दर से लगाते हैं। बुआई के 24 घंटे पूर्व जड़ों को थीरम 2.5 ग्राम या बेबिस्टीन 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम जबा बीज दर से उपचारित कर देने से बीज रोग रहित हो जाता है। (उपचारित बीजों को भोजन में व्यवहार नहीं करें) कतार से कतार 15 से. मी. एवं पौधों से पौधों की दूरी 10 से. मी. रखनी चाहिए। खाद एवं उर्वरक 120 किलोग्राम नत्रजन, 80 किलोग्राम स्फूर एवं नत्रजन की आधी मात्रा, स्फुर एवं पोटाश की पूरी तरह पोटाश मात्रा आधारीय रूप से खेत की तैयारी के समय डाल देते हैं। शेष नत्रजन के 35 दिनों बाद एवं आधा 65 दिनों बाद उपरिवेशन के रूप में डाल देते हैं। यदि गंधक रहित उर्वरक का उपयोग किया गया हो तो 30-40 किलोग्राम गंधक उर्वरक प्रति हेक्टेयर की दर से आधारीय रूप में अवश्य डालनी चाहिए। यदि क्यारियों में जिंक की कमी हो तब 25 किलो जिंक सल्फेट या 16 किलो मोनो जिंक प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की तैयारी के समय अवश्य डाल देनी चाहिए। खड़ी फसल में यदि सुक्ष्म पोषक तत्वों के कमी के लक्षण दिखे तब मल्टीप्लेक्स सुक्ष्म पोषक तत्व का 1.5 – 2.0 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 40-50 दिनों बाद (बुआई के) 600 – 800 लीटर पानी में घोलकर अवश्य छिडकाव कर दें। खेत को खरपतवार से मुक्त रखे इसके लिए आवश्यकतानुसार दो निकाई- गुडाई क्रमश: 20-25 एवं 50-75 दिनों बाद करें, इससे फसल की बढवार अच्छी होगी। यदि खेत में खरपतवार का प्रकोप ज्यादा हो तब बुआई के आठ दिन पूर्व पार्टी खेत में अच्छी नमी की दशा में 2.5 लीटर से 3.5 लीटर ग्लाईफोसेट नमक खरपतवार नाशी का 600-800 लीटर पानी में घोलकर करें। खड़ी फसल में खरपतवार का प्रकोप तरगासुपर नमक त्श्नानाशी का बुआई के 15-20 दिनों बाद 2-2.5 मिली लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। इससे तृण नियंत्रण में मदद मिलेगा। सिंचाई एवं अन्य क्रियाएं सिंचाई – पहली सिंचाई – बुआई के तुरंत बाद करनी चाहिए। बाद की सिंचाईयां 10-15 दिनों के अन्तराल पर हवा के वेग, मिट्टी के प्रकार एवं मौसमानूकूल आवश्यकतानुसार करनी चाहिए। जब पौधों के वृद्धि कारक और जड़ों के बिकास का समय होता है। उस समय क्यारियों में नमी की कमी नहीं होनी चाहिए। अन्यथा कंदों की बढ़वार रूक जाती है। खुदाई के कुछ दिन पूर्व सिंचाई रोक दी जाती है। जिससे पोटी के जड़ें अच्छी तरह सूख जाए ताकि भंडारण अच्छी तरह से हो सके। कीट कीटों में प्राय: थ्रिप्स (चूरदा) का प्रकोप एवं हर पिल्लू का प्रकोप होने पर पानी में प्रोफेनोफास एक मिली लीटर या कार्बोसल्फान दो मिली लीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर स्टीकर मिलाकर 15 दिनों के अन्तराल पर 2-3 छिड़काव करने से दोनों रोगों कीटों का नियंत्रण हो जाता है। रोगों में प्राय: दो बैंगनी धब्बा एवं स्टेमिफीलियम झुलसा का प्रकोप पाया जाता है। इन दोनों रोगों से बचाव हेतु बीज उपचार कार्बेडाजिम से अवश्य करनी चाहिए। खड़ी फसल में प्रकोप होने क्लोरोथैलोनीम 2 ग्राम अथवा साफ नमक दवा का 1.5 ड़ों के अन्तराल पर दो बार छिड़काव करनी चाहिए। क्यारियों में जब पौधों की पत्तियाँ पीली पड़ जाती है और वे सूखने लगे जब क्यारियों का पतबन बंद कर देनी चाहिए। शीर्ष से 2-2.5 से. मी. भाग छोड़कर पत्तियाँ या डंठल को कंद रखते है। फर्श पर नमी नहीं रहनी चाहिए। सूखाए गए लहसुन कंदों की छटाई करके हवादार स्थान में रखना चाहिए। स्त्रोत एवं सामग्रीदाता: कृषि विभाग, बिहार सरकार