परिचय भारतीय किसान काफी समय, मृदा की उपजाऊ शक्ति को बनाये रखने के सम्बन्ध में अनभिज्ञ थे| लगभग थे| लगभग 75 वर्ष पहले जब “रायल कमिशन” भारत आया तब उसके द्वारा भारतीय मिट्टियों की उर्वरता क्षति से सम्बन्धित रिपोर्ट तैयार की गयी| ज्ञान्ताव्य है उस समय विश्व के अन्य देशों जैसे यू.के., यू.एस. ए. तथा अर्जेन्टीना का भी मृदा उर्वरता, मृदा उपजाऊ शक्ति एवं फसल उत्पादन स्तर भारत के बराबर था| सीमित संसाधनों के समुचित उपयोग हेतु कृषक एक फसली, द्विफसली कार्यक्रम व विभिन्न फसल चक्र अपना रहे जिससे मृदा का लगातार दोहन हो रहा है जिससे उपस्थित पौधों के वृद्धि के लिए आवश्यक पोषक तत्व नष्ट होते जा रहे हैं| इस क्षतिपूर्ति हेतु विभिन्न तरह के उर्वरकों व खादों का उपयोग किया जाता है| उर्वरकों द्वारा मृदा में सिर्फ आवश्यक पोषक तत्व जैसे नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश, जिक इत्यादि की पूर्ति होती है परन्तु मृदा की संरचना, उसकी जल धारणक्षमता एवं उसमें उपस्थित सूक्ष्मजीवों की रासायनिक क्रियाशीलता बढ़ाने में इनका कोई योगदान नहीं होता| अतः वर्तमान समय में खेती में रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित प्रयोग एवं सीमित उपलब्धता को देखते हुए अन्य पर्याय भी उपयोग में लाना आवश्यक हो गया है| तभी हम खेती की लागत को कमर फसलों की प्रति एकड़ उपज को बढ़ा सकते हैं, साथ ही मिट्टी की उर्वरा शक्ति को भी अगली पीढ़ी के लिए बरक़रार रख सकेंगे| मृदा उर्वरकता एवं उत्पादकता बढ़ाने में हरी खाद का प्रयोग प्राचीन कल से चला आ रहा है बिना सड़े-गले हरे पौधे (दलहनी अथवा अदलहनी अथवा उनके भाग) को जब मृदा की नत्रजन या जीवांश की मात्रा बढ़ाने के लिए खेत में दबाया जाता है तो इस क्रिया को हरीखाद देना कहते हैं| सघन कृषि पद्धति के विकास तथा नगदी फसलों के अंतर्गत क्षेत्रफल बढ़ने के कारण हरी खाद के प्रयोग में निश्चित ही कमी आई लेकिन बढ़ते ऊर्जा संकट, उर्वरकों के मूल्यों में वृद्धि तथा गोबर की खाद एवं अन्य कम्पोस्ट जैसे- कार्बिनक स्रोतों की सीमित आपूर्ति से आज हरी खाद का महत्व और बढ़ गया है| रासायनिक उर्वरकों के पर्याय के रूप में हम जैविक खादों जैसे- गोबर की खाद, कम्पोस्ट हरी खाद आदि को उपयोग कर सकते हैं| इनमें हरी खाद सबसे सरल व अच्छा प्रयोग है| इसमें पशु धन में आई कमी के कारण गोबर की उपलब्धता पर भी हमें निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है| अतः हमे हरी खाद के यथासंभव उपयोग पर गंभीरता से विचार कर क्रियान्वयन करना चाहिए| हरीखाद के लाभ हरीखाद केवल नत्रजन व कार्बनिक पदार्थों का ही साधन नहीं है बल्कि इससे मिट्टी में कई पोषक तत्व भी उपलब्ध होते हैं| एक अध्ययन के अनुसार एक टन ढैंचा के शुष्क पदार्थ द्वारा मृदा में जुटाए जाने वाले पोषक तत्व इस प्रकार है: पोषक तत्व मात्रा किलोग्राम/हैक्टेयर नत्रजन 26.2 फास्फोरस 7.3 पोटाश 17.8 गंधक 1.9 मैग्नीशियम 1.6 कैल्शियम 1.4 जस्ता 25 पी पी एम लोहा 105 पी पी एम तम्बा 7 पी पी एम हरीखाद के प्रयोग से मृदा भुरभुरी, वायु संचार में अच्छी, जल धारण क्षमता में वृद्धि, अम्लीयता/क्षारीयता में सुधार एवं मृदा क्षरण भी कम होता है| हरीखाद के प्रयोग से मृदा में सूक्ष्मजीवों की संख्या एवं क्रियाशीलता बढ़ती है तथा मृदा की उर्वरा शक्ति एवं उत्पादन क्षमता भी बढ़ती है| हरीखाद के प्रयोग से मृदा जनित रोगों में भी कमी आती है| यह खरपतवारों की वृद्धि रोकने मने भी सहायक हैं| इसके प्रयोग से रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम कर बचत कर सकते हैं तथा टिकाऊ खेती भी कर सकते हैं| हरी खाद फसल के आवश्यक गुण फसल ऐसी हो जिसमें शीघ्र वृद्धि की क्षमता जिससे न्यूनतम समय में कार्य पूर्ण हो सके| चयन की गई दलहनी फसल में अधिकतम वायुमंडल नाइट्रोजन का यौगिकीकरण करने की क्षमता होनी चाहिए जिससे जमींन को अधिक से अधिक नत्रजन उपलब्ध हो सके| फसल की वृद्धि होने पर अति शीघ्र, अधिक से अधिक मात्रा में पत्तियां व कोमल शाखाएं निकल सकें जिससे कि प्रति इकाई क्षेत्र से अत्यधिक हरा पदार्थ मिल सकें तथा आसानी से सड़ सके| फसल गहरी जड़ वाली हो जिससे वह जमीन में गहराई तक जाकर अधिक से अधिक पोषक तत्वों को खीच सके| हरी खाद की फसल को सड़ने पर उसमें उपलब्ध सारे पोषक तत्व मिट्टी की ऊपरी सतह पर रह जाते हैं जिनका उपयोग बाद में जाने वाली मुख्य फसल के द्वारा किया जाता है| फसल के वानस्पतिक भाग मुलायम होने चाहिए| फसल की जल व पोषक तत्वों की मांग कम से कम होनी चाहए| फसल जलवायु की विभिन्न परिस्थितियों जैसे अधिक ताप, कम ताप, कम या अधिक वर्षा सहन करने वाली हो| फसल के बीज सस्ती दरों पर उपलब्ध हों फसल विभिन्न प्रकार की मृदाओं में पैदा हिने में समर्थ हो| 10. फसल कई उद्देश्यों की पूर्ति करती हो| चारा, रेषा, फसल की बीज उत्पादन क्षमता अधिक हो| हरी खाद का वर्गीकरण हरी खाद को प्रयोग करने के आधार पर दो वर्गों में बाँटा जा सकता है| उसी स्थान पर उगाई जाने वाली हरी खाद: भारत के अधिकतर क्षेत्र में यह विधि अधिक लोकप्रिय है इसमें जिस खेत में हरी खाद का उपयोग करना है उसी खेत में फसल को उगाकर एक निश्चित समय पश्चात् पाटा चलाकर मिट्टी पलटने वाले हल से जोतकर मिट्टी में सड़ने को छोड़ दिया जाता है| वर्तमान समय में पाटा चलाने व हल से पलटाई करने के बजाय रोटा वेटर का उपयोग करने से खड़ी फसल को मिट्टी में मिला देने से हरे पदार्थ का विघटन शीघ्र व आसानी से हो जाता है| अपने स्थान से दूर उगाई जाने वाली हरी खाद की फसलें: विधि भारत में अधिक प्रचलित नहीं है, परन्तु दक्षिण भारत में हरी खाद की फसल अन्य खेत में उगाई जाती है, और उसे उचित समय पर काटकर जिस खेत में हरी खाद देना रहता है उसमें जोत कर मिला दिया जाता है| इस विधि में जंगलों या अन्य स्थानों पर पेड़ पौधों, झाड़ियों आदि की पत्तियों, टहनियों आदि को इकट्ठा करके खेत में मिला दिया जाता अहि| हरी खाद की फसलें एवं उत्पादन क्षमता प्रमुख हरी खाद की फसलों तथा उनकी उपलब्ध जीवांश एवं उत्पादन क्षमता निम्न सारणी में दी गई है: फसल बुआई बीज दर (किग्रा./हैक्टेयर) हरे पदार्थ की मात्रा (टन/हैक्टेयर) नत्रजन (%) प्राप्त नत्रजन(किग्रा./हैक्टेयर) खरीफ फसलों हेतु सनई अप्रैल-जुलाई 80-100 18-28 0.43 60-100 ढेंचा अप्रैल-जुलाई 80-100 20-25 0.42 84-105 लोबिया अप्रैल-जुलाई 45-55 15-18 0.49 74-88 उड़द जून -जुलाई 20-22 10-12 0.41 40-49 मूंग जून -जुलाई 20-22 8-10 0.48 38-48 ज्वार अप्रैल-जुलाई 30-40 20-25 0.34 68-85 रबी फसलों हेतु सैंजी अक्टूबर-दिसम्बर 25-30 25-30 0.51 120-135 बरसीम अक्टूबर-दिसम्बर 20-30 15-18 0.43 60 मटर अक्टूबर-दिसम्बर 80-100 20-22 0.36 67 उपरोक्त सारणी में दी गई फसलों के अतिरिक्त भी कई फसलों का प्रयोग हरी खाद के लिए किया जाता है जिनमें दलहनी व बिना दलहनी फसलें शामिल हैं| जब हरी खाद के लिए फसल किसी विशेष कारण की वजह से उस खेत में उगाना संभव न हो तो वृक्षों और झाड़ियों की पत्तियों और टहनियों को हरी खाद के लिए उपयोग किया जा सकता है| परन्तु उपरोक्त सभी फसलों में दलहनी फसलें और दलहनी फसलों में सनई व ढैंचा फसलें ही विशेष रूप से हरी खाद के लिए प्रयोग की जाती है| हरी खाद की फसलों का प्रयोग मूख्य फसल के रूप में बोकर लवणीय क्षारीय भूमि के सुधार या बिल्कुल बलुई भूमि के सुधार के लिए भी प्रयोग किया जाता है| हरी खाद की बुवाई का समय हमारे देश में विभिन्न प्रकार की जलवायु पाई जाती है| अतः सभी क्षेत्रों के लिए हरी खाद की फसलों की बुवाई का एक समय निर्धारत नहीं किया जा सकता है| परन्तु फिर भी यह कह सकते हैं कि उपरोक्त सारणी के अनुसार अपने क्षेत्र के लिए अनुकूल फसल का चयन करके, बुबाई वर्षा प्रारंभ होने के तुरन्त बाद कर देनी चाहिए तथा यदि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो तो हरी खाद की बुवाई वर्षा शुरू होने के पूर्व कर देनी चाहिए| हरी खाद के लिए फसल की बुबाई करते समय खेत में पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है| बीज दर हरी खाद वाली फसलों की बुवाई हेतु बीज की मात्रा बीज के आकार पर निर्भर करती है| जिन फसलों के बीज छोटे होते हैं उनमें बीज दर 25-30 किलोग्राम तथा बड़े आकार वाली किस्मों का बीज दर 40-50 किलोग्राम/हैक्टेयर तक पर्याप्त होता है| हरी खाद बोने के समय 80 किलोग्राम नत्रजन 40-60 किलोग्राम/हैक्टेयर सल्फर मृदा में मिला देना चाहिए| इसके बाद जो दूसरी फसल लेनी हो उसमें सल्फर की मात्रा देने की आवश्यकता नहीं होती तथा नत्रजन में भी 50% तक की बचत की जा सकती है| जब फसल की वृद्धि अच्छी हो गई हो तथा फूल आने के पूर्व इसे हल या डिस्क हैरो द्वारा खेत में पलट कर पाटा चला देना चाहिए यदि खेत में 5-6 से.मी. पानी भरा हो तो पलटने व मिट्टी में दबाने में कम मेहनत लगती है| जुताई उसी दिशा में करनी चाहिए जिसमें पौधों के अपघटन में सुविधा होती यदि पौधों को दबाते समय खेत में पानी की कमी हो या देरी से जुताई की जाती है तो पौधों के अपघटन में अधिक समय लगता है| साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि किस इसके बाद लगाई जाने वाली फसल में आधार नत्रजन की मात्रा नहीं दी जानी चाहिये| यह विधि उस खेत में प्रयोग की जाती है जहाँ पानी की प्रचुर की मात्रा हो| यदि पानी की मात्रा पर्याप्त नहीं है तो वहाँ हरीखाद की फसल एक क्षेत्र में उगाकर उसकी पत्तियां व तना दूसरे क्षेत्र में ले जाकर दबाते हैं| हरी खाद देने की विधियाँ हरी खाद की स्थानीय विधि- इस विधि में हरी खाद की फसल की उसी खेत में उगाया जाता है जिसमें हरी खाद का उपयोग करना होता है| यह विधि समुचित वर्षा अथवा सुनिश्चित सिंचाई वाले क्षेत्रों में अपनाई जाती है| इस विधि में फूल आने से पूर्व वानस्पतिक वृद्धिकाल (45-60 दिन) में मिट्टी में पलट दिया जाता है| मिश्रित रूप से बोई गई हरी खाद की फसल को उपयुक्त समय पर जुताई द्वारा खेत में दबा दिया जाता है| हरी पत्तियों की हरी खाद- जलवायु एवं मृदा दशाओं के आधार पर उपयूक्त फसल की चुनाव करना आवश्यक होता है| जलमग्न तथा क्षारीय एवं लवणीय मृदा में ढैंचा तथा सामान्य मृदाओं में सनई एवं ढैंचा दोनों फसलों से अच्छी गुणवत्ता वाली हरी खाद प्राप्त होती है| हरी खाद के प्रयोग के बाद अगली फसल की बुवाई या रोपाई का समय: जिन क्षेत्रों में धान की खेती होती है| वहाँ जलवायु नम तथा तापमान अधिक होने से अपघटन क्रिया तेज होती है| अतः खेत में हरी खाद की फसल की आयु 40-45 दिन से अधिक नहीं होनी चाहिए| समुचित उर्वरक प्रबंधन: कम उर्वरकता वाली मृदाओं में नाइट्रोजनधारी उर्वरकों का प्रयोग उपयोगी होती है, राइजोबियम कल्चर का प्रयोग करने से नाइट्रोजन स्थिरीकरण सहजीवी जीवाणुओं की क्रियाशीलता बढ़ जाती है| हरी खाद बनाने की विधि क्या है? जानें अधिक जानकारी, इस उपयोगी विडियो को देखकर स्रोत: मृदा एवं जल प्रबंधन विभाग, औद्यानिकी एवं वानिकी विश्विद्यालय; सोलन