मृदा में उपस्थित पोषक तत्वों का कम या अधिक होना उनकी उपलब्धता पर प्रभाव डालता है पोषक तत्वों की उपलब्धता एक दूसरे को प्रभावित करती है अतः यह अत्यंत आवश्यक है की संतुलित मात्रा मे पोषक तत्वों की उपलब्धता हो यह पादप के विकास व वृद्धि के लिये यह अत्यंत आवश्यक होती है । पौधे अपनी आवशयकता के लिये पोषक तत्व- मृदा, वायुमंडल, उर्वरक एवं खाद से प्राप्त करते है। पौधे के सम्पूर्ण विकास हेतु पौधों को 17 तत्वों कि आवशयकता होती है किसी भी पोषक तत्वों को आवश्यक तभी कहा जा सकता है । जब उसकी उपस्थिति नहीं होने पर मैं पादप अपना जीवन चक्र व वृद्धी पूरा नहीं कर सकता हो एवं उसका पादप मैं कोई विकल्प ना हो प्राथमिक पोषक तत्वों, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश आते है इनकी आवश्यकता अधिक मात्र मैं होती है । द्वितीयक पोषक तत्वों में कैल्सियम, मैग्नीशियम, सल्फर और सूक्ष्म पोषक तत्वों में लोहा, तांबा, जस्ता, मैंग्नीज, बोरान, मालिब्डेनम, क्लोरीन व निकिल आते है। पौधों में पोषक तत्वों कि उपलब्धता उचित नहीं होने पर पोधों में इनकी कमी हो जाती है जो की नई या पुरानी पत्तियों या अपस्थ कलिका पर दिखाई देते है ,ये पत्तियों की अवस्था पर भी निर्भर करते हैं एवं विभिन्न रंग के भी हो सकते हैं । नत्रजन : नत्रजन के प्रमुख कार्य एवं कमी के लक्षणनाइट्रोजन पौधों की वृद्धि एवं विकास में सहायक है । नाइट्रोजन से प्रोटीन बनती है जो जीव द्रव्य का अभिन्न अंग है तथा पर्ण हरित के निर्माण में भी भाग लेती है ।यह वानस्पतिक वृद्धि को भी बढ़ा देता है । यह पौधों को गहरा हरा रंग प्रदान करता है । अनाज तथा चारे वाली फसलों में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाता है । इस तत्व की कमी पुरानी पत्तियों पर पाय़ी जाती है। यह तत्व गतिशील है अतः इसकी कमी से पुरानी व निचली पत्तियों पर पीलापन "V" के आकर में पट्टी के शीर्ष पर दिखाई देता है ।पौधे की वृद्धि रुक जाती हैं और परिपक्वता शीघ्र आ जाती हैं जिसके कारण उपज कम प्राप्त होती है । फास्फोरस: फॉस्फोरस के प्रमुख कार्य एवं कमी के लक्षणफॉस्फोरस की उपस्थिति में कोशिका विभाजन शीघ्र होता है। यह न्यूक्लिक अम्ल, फास्फोलिपिड्स व फाइटीन के निर्माण में सहायक है। यह प्रकाश संश्लेषण में सहायक है।यह कोशिका की झिल्ली, क्लोरोप्लास्ट तथा माइटोकान्ड्रिया का मुख्य अवयव है। फास्फोरस मिलने से पौधों में बीज स्वस्थ पैदा होता है , फास्फोरस के प्रयोग से जड़ें तेजी से विकसित तथा सुद्दढ़ होती हैं । पौधों में खड़े रहने की क्षमता बढ़ती है इससे फल शीघ्र आते हैं, फल जल्दीबनते है व दाने शीघ्र पकते हैं। यह नत्रजन के उपयोग में सहायक है तथा फलीदार पौधों में इसकी उपस्थिति से जड़ों की ग्रंथियों का विकास अच्छा होता है । यह तत्व पौधों में गतिशील है ।अतः इसकी कमी पुरानी पत्तियों पर देखी जा सकती है।इसकी कमी से पत्तियों की नोक व किनारों पर लाल-हरा अथवा बेंगनी रंग की धारियां दिखने लगती है , पोधों में कम वृद्धि होती है ,जड़ फैलाव भी कम होता है एवं दाने पिचके हुए रह जाते है । पोटाश: पोटाश (पोटैशियम )के प्रमुख कार्य एवं कमी के लक्षणयह जड़ों को मजबूत बनाता है एवं सूखने से बचाता है। फसल में कीट व रोग प्रतिरोधकता बढ़ाता है। पौधे को गिरने से बचाता है। स्टार्च व शक्कर के संचरण में मदद करता है। पौधों में प्रोटीन के निर्माण में सहायक है। अनाज के दानों में चमक पैदा करता है। फसलो की गुणवत्ता में वृद्धि करता है । आलू व अन्य सब्जियों के स्वाद में वृद्धि करता है । सब्जियों के पकने के गुण को सुधारता है । मृदा में नत्रजन के कुप्रभाव को दूर करता है। इस तत्व की कमी के लक्षण पुरानी पत्तियों पर दिखाई देते है ।इसकी कमी के कारण पत्तियों के किनारे पीले पड़ जाते है और कुछ समय बाद झुलसे हुए नज़र आने लगते है ।इसकी कमी से पोधों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है । पौधों में फसल गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ता हैं । आलू की फसल में कन्द का आकर छोटा हो जाता हैं ,टमाटर की फसल में इसकी कमी से तना कठोर हो जाता हैं व पत्तियों में पीतल जैसा रंग दिखाई देने लगता है । सरसों वर्गीय फसलों में इसकी कमी से पतियाँ किनारे से झुलसी हुई दिखाई देती है । कैल्शियम : कैल्सियम के प्रमुख कार्य एवं कमी के लक्षणयह गुणसूत्र का संरचनात्मक अवयव है। दलहनी फसलों में प्रोटीन निर्माण के लिए आवश्यक है। यह तत्व तम्बाकू, आलू व मूँगफली के लिए अधिक लाभकारी है। यह पौधों में कार्बोहाइड्रेट संचालन में सहायक है। इसकी कमी से उत्तक में परिगलन होने लगता है व शीर्ष कलिका मरने लगती है। नयी कोमल पत्तियां छोटी होने लगती हैं व रंग पीला पड़ जाता है। टमाटर की पौध में इसकी कमी से “ब्लॉसम एंड रोट ”नामक बीमारी हो जाती है जिसके कारण फल ख़राब हो जाते हैं। पत्तागोभी में इसकी कमी से " टिप ब्राउनिंग " नाम का रोग हो जाता है व गाजर में खोखलापन आ जाता है । मैग्नीशियम : मैग्नीशियम के प्रमुख कार्य एवं कमी के लक्षण क्रोमोसोम, पोलीराइबोसोम तथा क्लोरोफिल का अनिवार्य अंग है। पौधों के अन्दर कार्बोहाइड्रेट संचालन में सहायक है। पौधों में प्रोटीन, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट तथा वसा के निर्माण मे सहायक है। चारे की फसलों के लिए महत्वपूर्ण है।इस तत्व की कमी से पत्तियाँ आकार में छोटी तथा ऊपर की ओर मुड़ी हुई दिखाई पड़ती हैं।दलहनी फसलों में पत्तियो की मुख्य नसों के बीच की जगह का पीला पड़ना मैग्नीशियम के कमी के लक्षण है । गंधक: गन्धक (सल्फर) के प्रमुख कार्य एवं कमी के लक्षणयह अमीनो अम्ल, प्रोटीन (सिसटीन व मैथिओनिन), वसा, तेल एव विटामिन्स के निर्माण में सहायक है।विटामिन्स (थाइमीन व बायोटिन), ग्लूटेथियान एवं एन्जाइम के निर्माण में भी सहायक है। तिलहनी फसलों में तेल की प्रतिशत मात्रा बढ़ाता है। यह सरसों, प्याज व लहसुन की फसल के लिये आवश्यक है। तम्बाकू की पैदावार 15-30 प्रतिशत तक बढ़ती है। इस तत्व की कमी का प्रभाव नयी पत्तियों पर पड़ता है ।इसकी कमी से नयी पत्तियों का रंग पीला पड़ने लगता है, तिलहनी फसले इसकी कमी से आधिक प्रभावित होती है । लोहा ( आयरन): लोहा (आयरन) के प्रमुख कार्य एवं कमी के लक्षण क्लोरोफिल एवं प्रोटीन निर्माण में सहायक है। लोहा साइटोक्रोम्स, फैरीडोक्सीन व हीमोग्लोबिन का मुख्य अवयव है। यह पौधों की कोशिकाओं में विभिन्न ऑक्सीकरण-अवकरण क्रियाओं मे उत्प्रेरक का कार्य करता है।यह श्वसन क्रिया में आक्सीजन के वाहक का भी कार्य करता है। इस तत्व की कमी से नई पत्तियां प्रभावित होती हैं। जिसके कारण शिराओं का मध्य भाग पीला होने लगता है अत्यधिक कमी हो जाने पर पत्तियां हल्के सफ़ेद रंग की तरह हो जाती हैं व कागज़ की तरह पतली दिखने लगती हैं। मूंगफली की फसल में अधिक कैल्शियम होने की कारण इस तत्व की कमी हो जाती हैं, जिसके कारण हरिद्रोग "क्लोरोसिस"हो जाता हैं । जस्ता: जस्ता (जिंक) के प्रमुख कार्य एवं कमी के लक्षणजस्ता कैरोटीन व प्रोटीन संश्लेषण में सहायक है। हार्मोन्स के जैविक संश्लेषण में सहायक है। यह एन्जाइम (जैसे-सिस्टीन, इनोलेज, डाइसल्फाइडेज आदि) की क्रियाशीलता बढ़ाने में सहायक है एवं क्लोरोफिल के निर्माण में उत्प्रेरक का कार्य करता है। इसकी कमी से पुरानी पत्तियां प्रभावित होती है ।इसकी कमी से पुरानी पत्तियों पर पीले धब्बे बन जाते हैं, व शिराओं के दोनों ओर रंगहीन पट्टी दिखाई देने लगती है और शीर्ष पर पत्तियां झुरमुट हो जाती है। इसकी कमी होने से पत्तियों पर लाल धब्बे बन जाते है व नय़ी पत्तियों कि मध्य शिरा पीले रंग की हो जाती हैं। जस्ता (जिंक) की कमी से धान के पौधों में खैरा रोग होता है, जिसके परिणाम स्वरूप इसकी पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और बाद में ये कत्थई रंग की हो जाती हैं। मैंगनीज़ : मैंगनीज के प्रमुख कार्य एवं कमी के लक्षणयहप्रकाश संश्लेषण में सहायक होता है।क्लोरोफिल, कार्बोहाइड्रेट व मैंगनीज नाइट्रेट के स्वांगीकरण में सहायक है।पौधों में ऑक्सीकरण-अवकरण क्रियाओं में उत्प्रेरक का कार्य करता है। पौधों की पत्तियों पर मृत उतको के धब्बे दिखाई पड़ते हैं।इसकी कमी से नयी पत्तियों पर प्रभाव पड़ता हैं। शिराएँ भूरी हो जाती हैं तथा शुरू में पत्तियां हल्की पीली पड़कर भूरी होने लगती हैं। मटर की फसल में मैंगनीज़ तत्व की कमी के कारण मार्श धब्बे बन जाते है ।नीम्बू प्रजाति के पौधों में मैंगनीज़ की कमी के कारण पतियों के मध्य का रंग धीरे धीरे हल्का पड़ जाता है यह लक्षण पूर्ण विकसित पत्तियों पर स्पष्ट दिखाई देता है । ताँबा ताँबा (कॉपर ) के कार्य एवं कमी के लक्षण यह ऑक्सीकरण-अवकरण क्रिया को नियमितता प्रदान करता है। अनेक एन्जाइमों की क्रियाशीलता बढ़ाता है। कवक रोगो के नियंत्रण में सहायक है।इसकी कमी से फलों के अंदर रस का निर्माण कम होना। नीबू जाति के फलों में लाल-भूरे धब्बे अनियमित आकार के दिखाई देते हैं।अधिक कमी के कारण अनाज एवं दाल वाली फसलों में रिक्लेमेशन नामक बीमारी हो जाती है। बोरोन : बोरान के कार्य एवं कमी के लक्षण पौधों में शर्करा के संचालन मे सहायक है। परागण एवं प्रजनन क्रियाओ में सहायक है। दलहनी फसलों की जड़ ग्रन्थियों के विकास में सहायक है।यह पौधों में कैल्शियम एवं पोटैशियम के अनुपात को नियंत्रित करता है। यह डी.एन.ए., आर.एन.ए., ए.टी.पी. पेक्टिन व प्रोटीन के संश्लेषण में सहायक है इसकी कमी से नयी पत्तियां गुच्छे का रूप लेने लगती हैं ,डंठल ,तना व फल इसकी कमी के कारण फटने लगते हैं । पौधे की ऊपरी बढ़वार का रूकना, इन्टरनोड की लम्बाई का कम होना। बोरोन की कमी होने पर मूंगफली की फलियां खाली रह जाती हैं। बोरान की कमी से चुकन्दर में हर्टराट, फूल गोभी मे ब्राउनिंग या खोखला तना एवं तम्बाखू में टाप- सिकनेस नामक बीमारी का लगना। मोलिब्डेनम : मालिब्डेनम के कार्य एवं कमी के लक्षण मोलिब्डेनम एन्जाइम नाइट्रेट रिडक्टेज एवं नाइट्रोजिनेज का मुख्य भाग है।यह दलहनी फसलों में नत्रजन स्थिरीकरण, नाइट्रेट एसीमिलेशन व कार्बोहाइड्रेट मेटाबालिज्म क्रियाओ में सहायक है। पौधों में विटामिन-सी व शर्करा के संश्लेषण में सहायक है।मोलिब्डेनम की कमी होने से पुरानी पत्तियां किनारे पर अलग अलग जगह से झुलस जाती हैं तथा मुड़कर कटोरी के आकर की हो जाती हैं। नीबू जाति के पौधो में मालिब्डेनम की कमी से पत्तियों मे पीला धब्बा रोग होता है। इसकी कमी से फूल गोभी में व्हिपटेल एवं मूली मे प्याले की तरह रचनायें बन जाती हैं। स्त्रोत: आकांक्षा सिकरवार ,योगेश सिकनिया, विमल शुक्ला,डा राहुल मिश्र ,सीमा भरद्वाज भा. कृ. अ. प. - भारतीय मृदा विज्ञान संसथान ,भोपाल