<h3 style="text-align: justify;">पूर्व और वर्तमान स्थिति</h3> <p style="text-align: justify;">पहले किसानों द्वारा जल के संग्रहण के लिए कुएं के पास ही एक संग्रहण तालाब बनाया जाता था, जिससे रहट इत्यादि का उपयोग कर बाद में फसलों की सिंचाई गुरुत्वाकर्षण के द्वारा की जाती थी। सामान्यतः ये कुएं व जलसंग्रहण तालाब खेत के उच्चतम स्थान पर स्थित होते थे। इनसे सभी दिशाओं में गुरुत्वाकर्षण के द्वारा सिंचाई के लिए जल प्रवाहित करने में सुविधा होती थी। बाद के वर्षों में नलकूपों का निर्माण किया जाने लगा, क्योंकि बिजली की आपूर्ति से पम्प द्वारा भूजल का उपयोग संभव हो सका। इस समय मशीनों के उपयोग से नये-नये खेतों में भी फसलें उगाई जाने लगीं और सिंचाई जल की मात्रा में काफी वृद्धि हुई। हालांकि देश के कई हिस्सों में बड़े-बड़े बांधों व नहरों के जल से काफी बड़े हिस्से में सिंचाई प्रारंभ हुई। परंतु कई क्षेत्रों में बांधों का निर्माण संभव न होने के कारण किसानों द्वारा सिंचाई जल के लिए नलकूपों का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जाने लगा। इस कारण लगातार गिरते भूजल स्तर से कुओं और जलसंग्रहण तालाबों की प्रासंगिकता, खासतौर से मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में, लगभग समाप्त हो गई। आज ज्यादातर किसानों के यहां ये कुएं व जलसंग्रहण तालाब नहीं पाए जाते हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccpic1.jpg" width="320" height="200" /></p> <p style="text-align: justify;">मृदा एवं जल के बिना खेती की कल्पना भी नहीं की जा सकती और इन दोनों के संरक्षण व संग्रहण के लिए किसानों द्वारा भगीरथी प्रयास किए जाते रहे हैं। राजे-महाराजे भी अपने-अपने प्रदेशों में बड़े-बड़े तालाबों का निर्माण किया करते थे, जिनसे कृषि कार्य के लिए सिंचाई जल प्रदान किया जाता था। इसी प्रकार बाद के वर्षों में कुओं का निर्माण किया जाने लगा। किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर सिंचाई के लिए पारंपरिक पद्धतियों, मुख्यतः पशुओं की सहायता से रहट इत्यादि चलाकर जल का उत्सर्जन कर सिंचाई प्रारंभ की गई। </p> <h3 style="text-align: justify;">पारंपरिक जल संग रहण तालाब का परिवर्तित रूप </h3> <p style="text-align: justify;">तालाब आज भी मौजूद हैं, परंतु इनका रूप बदल गया है। आज कई किसान तालाब बना चुके हैं या बनवा रहे हैं किंतु उनका स्थान पारंपरिक जलसंग्रहण तालाब से अलग है। आज जो तालाब बनाये जा रहे हैं व खेत के निम्नतम स्थान पर बनाये जाते हैं। इससे वर्षाकाल के दौरान खेतों से बहने वाले जल अपवाह को संग्रहित करने का प्रयास किया जाता है और यह जलसंग्रहण प्राकृतिक तरीके से ही तालाब में हो जाता है। पूर्व में पशुओं व मानव श्रम का उपयोग कर कुओं से पारंपरिक पद्धतियों द्वारा जल उत्सर्जन कर जलसंग्रहण तालाब में एकत्रित किया जाता था। इसमें समय व श्रम की आवश्यकता होती थी, परंतु अब प्राकृतिक तरीके से ही बिना किसी श्रम व समय के जलसंग्रहित किया जाता है। इन कार्यों के लिए किसानों को प्रेरित करने कृषि महाविद्यालय, कृषि विभाग, सरकारी एजेंसियां व गैर-सरकारी संस्थाएं कार्यरत हैं। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccpic2.jpg" width="300" height="190" /></p> <p style="text-align: justify;">पिछले कुछ वर्षों में यह अनुभव किया गया कि वर्षाकाल के दौरान जलसंग्रहण तालाब के निर्माण के बावजूद काफी बड़ी मात्रा में जलअपवाह खेतों से तालाब भरने के बाद भी व्यर्थ चला जाता है। इसके साथ ही गांव के ज्यादातर हिस्सों में प्रारंभ की गयी खेती और नलकूपों के उपयोग से अक्सर फसलों में नलकूपों से कम मात्रा में जल मिलने के कारण एक या दो सिंचाई की कमी महसूस की गयी। अतः कुछ किसानों द्वारा कृषि महाविद्यालय, इंदौर के सहयोग से इस समस्या का समाधान निकालने का प्रयास किया गया। इन किसानों ने अपने खेतों के निम्नतम स्थान पर वर्षा जल संग्रहण करने के लिए तालाब का निर्माण किया। इसके साथ ही अतिरिक्त सिंचाई जल प्राप्त करने के लिए खेत के उच्चतम स्तर पर (जो कि पारंपरिक जलसंग्रहण तालाबों व कुओं का स्थान हुआ करता था) एक सीमेन्ट की ऊंची टंकी का निर्माण भी किया गया। इस प्रकार यह पारंपरिक जल वितरण प्रणाली का आधुनिक रूप प्रतीत होता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">वर्षा के दौरान तालाब में एकत्रित जल</h3> <p style="text-align: justify;">अपवाह को पम्प द्वारा सीमेन्ट की टंकी में भर देते हैं। बाद की वर्षा में होने वाले जल अपवाह से इस तालाब को पुनः भर लेते हैं। इस प्रकार इन किसानों के पास जलसंग्रहण के रूप में दो सतही जलस्रोत हो जाते हैं। इस सीमेन्ट की टंकी में गुरुत्वाकर्षण की मदद से सिंचाई देने की व्यवस्था की जाती है। </p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <h4>सफलता गाथा </h4> <p style="text-align: justify;">कृषि महाविद्यालय, इंदौर के विशेषज्ञों द्वारा समय- समय पर किसानों के खेतों का भ्रमण कर उनकी समस्याओं का निराकरण लगातार किया जाता रहा है। अच्छी किस्मों के अतिरिक्त सिंचाई जल की उपलब्धता आज किसानों की महती आवश्यकता है। वर्षाजल और भूजल के समन्वित उपयोग से सिंचाई जल की कमी को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे ही एक प्रयास में ग्राम हरसौला में तीन किसानों द्वारा अपने खेतों में ऊंचे स्थान पर ऊंचा तालाब बनवाया गया है। इसके लिए पोकलेन मशीन का उपयोग किया गया और खोदी गई मिट्‌टी के उपयोग से तालाब की पालों का निर्माण किया गया। इस प्रकार खोदी गई मिट्‌टी के उपयोग से जलसंग्रहण तालाब निर्मित हुआ। श्री लोकेंद्र सिंह के तालाब का आकार 58×45 मीटर ऊपरी हिस्से पर है व 7 मीटर गहरा है। इसका मात्रा 2.75 मीटर भाग जमीन के नीचे व बाकी जमीन के ऊपर है। एचडीपीई शीट का उपयोग कर रिसन को रोककर, जल संचयन करने योग्य बनाया गया है। इससे वर्षाकाल के दौरान स्टॉप डैम की सहायता से नाले में रोका गया, पास के कुएं व नलकूपों के माध्यम से 13900 घन मीटर पानी संग्रहित किया जाता है। इसका उपयोग सालभर विभिन्न फसलों, पफलों व सब्जियों को उगाने में किया जाता है। इसी प्रकार एक अन्य कृषक श्री योगेंद्र जी द्वारा खेत के सबसे उच्चतम स्तर पर जमीन से ऊपर एक जलसंग्रहण तालाब बनाया गया है। एक और प्रयास पहाड़ी से लगे हुए खेत में श्री सुलेजी के द्वारा जलसंग्रहण तालाब, जिसका आकार 60×55 मीटर तथा 7.30 मीटर गहरा है, बनाकर उसे एचडीपीई शीट से आच्छादित कर रिसन रोक जलसंग्रहण भी किया जा रहा है। इस तालाब में 19200 घन मीटर पानी संग्रहित किया जाता है। इस संग्रहित जल से सालभर सोयाबीन, गेहूं, चना, आलू, प्याज, गोभी, हल्दी और अरहर इत्यादि बहुफसलों को उगाया जा रहा है। हम देख सकते हैं कि भूमि के बेकार पड़े हिस्से का वैकल्पिक उपयोग कर उसे जलसंग्रहण करने योग्य किस प्रकार बनाया गया है। इसके उपयोग से भरपूर लाभ प्राप्त किया जा रहा है।</p> </td> </tr> </tbody> </table> <h3 style="text-align: justify;">जलसंग्रहण का परिवर्तित रूप </h3> <p style="text-align: justify;">सिंचाई जल की मात्रा बढ़ने से किसान ज्यादा उत्पादन देने वाली फसलों को खेत में उगाना प्रारंभ करते हैं। इसमें पहले व नलकूप का उपयोग करते हैं व बाद में संग्रहित जल का उपयोग सिंचाई के लिए करते हैं। जब नलकूपों से पर्याप्त जल प्राप्त होना बंद हो जाता है, उस समय खाली जलसंग्रहण तालाबों व सीमेन्ट की टंकी को लगातार कई दिनों तक भरा जाता है। फिर इस संग्रहित जल का खेतों में सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है। इस प्रकार हम यहां देख सकते हैं कि पारंपरिक पद्धति के अनुसार ही कुओं के स्थान पर नलकूपों से जल निकालकर इसे संग्रहित कर उपयोग में लाया जाता है। इसमें पशुओं व मानव श्रम के स्थान पर पम्प का उपयोग होता है। अतः यह पद्धति भी पारंपरिक पद्धति का ही एक नवीन रूप है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccpic3.jpg" width="190" height="250" /></p> <h3 style="text-align: justify;">भूमि का वैकल्पिक उपयोग</h3> <p style="text-align: justify;">तालाब निर्माण के लिए भूमि के वर्गीकरण के आधार पर भूमि का उपयोग करने के लिए वैज्ञानिक लगातार सलाह देते रहते हैं। यूएसडीए वर्गीकरण के आधार पर पहले चार वर्ग खेती के लिए उपयुक्त व अगले चार वर्ग खेती के लिए अनुपयुक्त पाये गए हैं। मालवा क्षेत्र में काफी पहाड़ियां पायी जाती हैं, परंतु इसमें लगातार अपरदन होने के कारण ये वनस्पतिरहित होती हैं और इनमें काली मिट्‌टी की कमी पाई जाती है। खासतौर से पहाड़ी व नजदीक की भूमि में मृदा कम होने के कारण पारंपरिक फसलों का उत्पादन संभव नहीं है। अतः इस भूमि का वैकल्पिक उपयोग आवश्यक है। ऐसे कई स्थानों का उपयोग जल रिसन तालाब बनाकर किया जाता है। किसानों के खेतों पर भी यह प्रयास किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य पहाड़ी से तेजी से बहने वाले जल को रोककर उसे जमीन में रिसाकर भूजल स्तर को उठाना है। इसको साथ ही पहाड़ी से बहने वाले जल अपवाह की गति को कम कर निचले खेतों में होने वाली फसल व मृदा उर्वरता की क्षति को कम करना है। अतः इन क्षेत्रों में पहाड़ी के निकट के क्षेत्रों का वैकल्पिक उपयोग रिसन तालाब बनाने के रूप में किया जा सकता है। यहां पर मिट्‌टी व जल संग्रहण न होने के कारण किसी भी प्रकार की वनस्पति का उगना प्राकृतिक रूप से संभव नहीं है। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccpic4.jpg" width="250" height="190" /></p> <p style="text-align: justify;">कृषि महाविद्यालय, इंदौर में सन्‌ 1990 से ऐसे उपायों व सामग्रियों पर अनुसंधान किया गया जिनसे इस संग्रहित जल के रिसाव को रोका जा सके। इस महाविद्यालय द्वारा एक एचडीपीई शीट का उपयोग कर तालाब में वर्षाजल को संग्रहित करने का तरीका खोजा गया है। कृषि महाविद्यालय प्रक्षेत्र में ही ऐसे तीन तालाबों का निर्माण किया गया है। इसमें एक तालाब में एचडीपीई शीट लगाकर वर्षा जल संग्रहित कर उसका उपयोग खरीपफ व रबी फसलों के दौरान किया जा रहा है। इसके साथ ही अन्य दो तालाबों का उपयोग रिसन तालाब के रूप में कर भूजल बढ़ाने के साथ-साथ निचले खेतों में होने वाले नुकसान को रोका गया है। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/pic7.jpg" width="360" height="315" /></p> <p style="text-align: justify;">अन्य किसानों द्वारा लगातार इन क्षेत्रों का भ्रमण कर अपने स्थान पर इसे किस प्रकार प्रयोग किया जाए, इस पर प्रयास किए जा रहे हैं। ये सभी किसान एक सफल प्रयास के उदाहरण बन गए हैं। कृषकों और वैज्ञानिकों का समन्वित प्रयास क्षेत्र की बड़ी समस्या का समाधान प्राप्त करने की दिशा में बढ़ रहा है।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : दीपक हरि रानडे, मोहन लाल जादव, ओम प्रकाश गिरोठिया और दुष्यंत विजय भगत अखिल भारतीय शुष्क खेती परियोजना, राजमाता विजया राजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय परिसर कृषि महाविद्यालय इंदौर-452001 (मध्यप्रदेश), खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर)। </p>