सभी किसानों के लिए फायदेमंद संरक्षित क्षेती, संरक्षित वातावरण में कृषि विकास व रोजगार की दिशा में एक ऐसी तकनीक है, जिससे अब लघु व सीमान्त किसान भी आय दोगुनी करके सुनहरे भविष्य का सपना देख सकते हैं। यह उन क्षेत्रों के किसानों के लिए विशेषकर उपयोगी है, जहां पानी की कमी है। अतिवृष्टि या ओले, आवारा पशुओं व बंदरों आदि की समस्याएं कृषि विकास में बाधा बन रही हैं। इसके द्वारा सब्जी उत्पादन खुले उत्पादन से न केवल 5 से 6 गुना तक अधिक होता है, बल्कि उत्पादों की गुणवत्ता अति उत्तम होती है। इसके अलावा समय पर नर्सरी तैयार की जा सकती है, जिससे पॉलीहाउस के बाहर भी सब्जियों एवं फूलों का क्षेत्रफल बढ़ाया जा सकता है। वातावरण को नियंत्रित करना बेमासैमी सब्जियों एवं फूलों की अधिकतम उत्पादकता लेने तथा उनकी गुणवत्ता बनाये रखने के लिए पॉलीथीन का प्रयोग किया जाता है। यह एक ढांचे के ऊपर पॉलीथीन, जो कि पारदर्शी एवं सूर्य की पराबैंगनी किरणों के प्रति प्रतिरोधी होती है, से ढककर अंदर से सूक्ष्म वातावरण को पूरी तरह से या आंशिक रूप से नियंत्रित कर तैयार किया जाता है। इस तरह के ढांचे को पॉलीहाउस या संरक्षित गृह कहते हैं। संरक्षित गृह का तापमान पॉलीथीन के कारण 50-100 सेल्सियस बढ़ जाता है। इस तापमान को गर्मी एवं सर्दी में अनेक तरीके से नियंत्रित कर सकते हैं। संरक्षित गृह के अंदर हम एक वर्ष में तीन से चार सब्जी वाली फसलें उगा सकते हैं। क्योंकि इसके अंदर के वातावरण को फसल के अनुसार नियंत्रित किया जा सकता है। संरक्षित वातावरण में खेती करने से गुणवत्तायुक्त पैदावार ली जा सकती है। ट्रेंच तकनीक यह तकनीक बहुत पुरानी है एवं सस्ती भी है। ट्रेंच तकनीक द्वारा सब्जियों का उत्पादन अधिक ठंडे प्रदेशों में किया जाता है। इस विधि में चार कक्ष जमीन के अंदर बनाये जाते हैं। प्रत्येक कक्ष का आकार 6×4×1.5 मीटर होता है। जमीन की सतह को पॉलीथीन की चादर से ढक देते हैं, ताकि इनको सुरक्षित रखा जा सके। इसके निर्माण के लिए अधिक विशेषज्ञता की आवश्यकता नहीं होती है। इसका रखरखाव भी बहुत सरल है। इसके निर्माण में लागत बहुत कम लगती है। संरक्षित खेती में यह विधि बहुत सस्ती एवं टिकाऊ है। इस तकनीक द्वारा निर्मित कक्ष में ऊर्जा एवं ताप की खपत बहुत कम होती है। तेज हवाएं इसको किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुंचाती हैं, जिसके फलस्वरूप इसकी पॉलीथीन अधिक समय तक चलती है। यह संरक्षित संरचना ठंडे क्षेत्रों के लिए अनुमोदित की गई है। इस ट्रेंच संरचना के द्वारा सब्जियों की पौध अगेती एवं पहले तैयार हो जाती है। इसके द्वारा किसानों को पौधशाला से ही पर्याप्त आय हो जाती है। निर्माण खर्च संरक्षित वातावरण में रोग एवं नाशीजीवों का प्रभावी नियंत्रण भी संभव है। विपरीत मौसम (अत्यधिक पाला, कोहरा, ओला, वर्षा, ठंडी एवं गर्म हवा आदि) से फसलों का बचाव किया जा सकता है। पॉलीहाउस के अंदर बीजों का अंकुरण व जमाव शीघ्र होता है और सब्जियों की पौध एवं फूल शीघ्र तैयार होते हैं। यह तकनीक ग्रामीण महिलाओं एवं बेरोजगार युवकों के लिए स्वरोजगार का भी सुअवसर प्रदान करती है एवं किसानों की आय को भी दोगुनी करती है। संरक्षित वातावरण में खेती एक पूंजी सघन व्यवसाय है जिसमें आरम्भिक पूंजी की बहुत आवश्यकता होती है। हालांकि 80 से 85 प्रतिशत अनुदान दिया जाता है, फिर भी किसानों को काफी आरम्भिक व कार्यकारी पूंजी की आवश्यकता रहती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार 250 वर्ग मीटर पॉलीहाउस के लिए सब्सिडी के अलावा लगभग 42 हजार रुपये (85 प्रतिशत सब्सिडी से 56 हजार रुपये)(80 प्रतिशत सब्सिडी) आरम्भिक पूंजी तथा 16 से 20 हजार रुपये कार्यकारी पूंजी के रूप में खर्च करने पड़ते हैं। अतः उत्पादन मूल्य संवर्धन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है। यहां पर उत्पादन का मूल्य ही सम्भावित आय व लाभ का द्योतक है। इसलिए उत्पादन के साथ मण्डी पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। किसान अपने क्षेत्र की जलवायु के अनुसार नगदी फसल को अपनाकर सीमित भूमि से उत्पादकता में वृद्धि करके अपनी आय को धीरे-धीरे दोगुनी कर सकते हैं। संरक्षित खेती के लाभ बेमौसम में सब्जियां एवं फूल उगाकर भरपूर लाभ। गुणवत्तायुक्त उत्पादन किया जा सकता है। गुणवत्ता के आधार पर पॉलीहाउस में उगने वाली सब्जियों एवं फूलों का आकार सुडौल, नियमित, आदर्श प्रकृति का तथा एक समान होते हैं। इससे ग्रेडिंग व पैकिंग में काफी सुविधा होती है। इसके साथ-साथ उत्पादों के रंग में ज्यादा चमक व आकर्षण होता है। संरक्षित खेती में सब्जी एवं फूल उगाकर विभिन्न प्रकार के बायोटिक (रोगों एवं कीड़े-मकोड़े) एवं एबायोटिक (वातावरणीय कारक जैसे वर्षा, तेज धूप, प्रकाश अतिवृष्टि इत्यादि) कारकों से फसल को बचाया जा सकता है। यह खुले वातावरण में संभव नहीं है। वर्षभर (लंबे समय तक) भरपूर पैदावार प्राप्त की जा सकती है। सामान्य की अपेक्षा 5-10 गुना अधिक सब्जियों एवं पफूलों की पैदावार प्राप्त की ्र्र जा सकती है। इस प्रकार प्रति इकाई क्षेत्र से अधिक पैदावार मिल सकती है। गुणवत्तायुक्त रसायनों के अवशेष से मुक्त सब्जियां एवं फूल उत्पादित करने का एकमात्र विकल्प है। उच्च मानक की सब्जियों एवं फूलों की खेती करके अधिक आमदनी प्राप्त की जा सकती है। पौधों के विकास के लिए उपयुक्त वातावरण 24 घंटे उपलब्ध कराया जा सकता है। लागत का सही प्रयोग एवं बचत (पानी की 30-70 प्रतिशत बचत एवं उर्वरक का 40-60 प्रतिशत) का उपयुक्त माध्यम है। पॉलीहाउस तकनीक का प्रयोग नर्सरी में पौध पैदा करने में भी कर सकते हैं। सब्जियों एवं फूलों की नर्सरी से पौधों को बेचकर आय बढ़ा सकते हैं। आर्थिक दृष्टि से वही फसलें उगाई जानी चाहिए, जिनमें कम समय में ज्यादा से ज्यादा आय अर्जित की जा सके। भंडारण क्षमता पारंपरिक उत्पादों की अपेक्षा अधिक होती है।विशेषज्ञों के अनुसार सुडौल छिलका होने से इन फसलों के उत्पाद में संक्रमण भी कम होता है। किसान, जैविक तकनीक का प्रयोग करके अपने उत्पाद को अधिक मूल्य पर बेचकर आय को बढ़ा सकते हैं। पौधों की अनुकूल वृद्धि संरक्षित खेती के अंतर्गत पौधों को ऐसा वातावरण प्रदान किया जाता है, जिसमें पौधे आसानी से बढ़ सकें एवं जीवित रह सकें। पौधों को तापमान, आर्द्रता, नमी, प्रकाश इत्यादि को उनकी आवश्यकतानुसार प्रदान करना संरक्षित खेती कहलाता है। पौधों की बढ़वार के लिए अनुकूल वातावरण देने की तकनीक इसमें निहित है। संरक्षित खेती में प्लास्टिक के उपयोग द्वारा या कांच का घर बनाकर अधिक मूल्य देने वाली या अल्प प्रचलित सब्जियों को उगाकर इनका उत्पादन एवं उत्पादकता ज्यादा प्राप्त करके आय को दोगुना किया जाता है। बदलते परिवेश, बढ़ती आबादी, घटते संसाधन, सिमटती भूमि के कारण भारत अपनी अपार जनसंख्या के उत्तम स्वास्थ्य के लिए 300 ग्राम गुणवत्तायुक्त व रसायनों की विषाक्तता से मुक्त सब्जियां प्रतिदिन उपलब्ध करवाने में असमर्थ है। विभिन्न प्रकार के कारक (बायोटिक एवं एबायोटिक) से प्रभावित साग-सब्जियां लम्बी अवधि तक (वर्षभर) आवश्यकतानुसार उत्पादन देने में असमर्थ होती हैं। इसलिए गुणवत्तायुक्त, आवश्यक मात्रा में सब्जियों एवं पफलों की पैदावार बढ़ाने के लिए आज संरक्षित खेती करना अत्यन्त आवश्यक है। संरक्षित खेती में पौधों की बढ़वार के लिए उपयुक्त वातावरण, वर्षभर उत्पादन, निर्यात योग्य उत्पादन, प्रति इकाई क्षेत्र में अत्यधिक उत्पादन, पौध लगाने के लिए उत्तम व्यवस्था, कीट-रोग तथा खरपतवार का उचित प्रबंध आदि सम्मिलित होते हैं। क्या है संरक्षित खेती संरक्षित वातावरण में खेती की तकनीक 200 वर्षों से अधिक पुरानी है एवं इसका प्रयोग यूरोप में बहुतायत से होता आ रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के समय से इस तकनीक का प्रयोग हो रहा है। युद्ध के समय ग्रीनहाउस तकनीक का उद्भव हुआ था। वर्तमान में 90 प्रतिशत नये ग्रीनहाउस का निर्माण अल्ट्रा वायलेट स्टेबिलाइज्ड पॉलीथीन की चादर से किया जाता है। भारत में यह तकनीकी अपनी प्रारम्भिक अवस्था में है। पर्वतीय कृषि की विधि मैदानी क्षेत्रों से अलग होती है, जिसका मुख्य कारण वातावरण के साथ-साथ अन्य कारक का अलग होना होता है। इसी को ध्यान में रखकर पर्वतीय क्षेत्रों में पॉलीहाउस की तकनीक को अपनाया गया है। इसमें तापमान, आर्द्रता, सूर्य का प्रकाश एवं हवा का आगमन फसलों की आवश्यकता अनुसार परिवर्तन करके फसलों की उत्पादकता के साथ-साथ गुणवत्ता भी बढ़ा सकते हैं। इस प्रकार इस तकनीकी का उपयोग करके वर्षभर बेमौसमी सब्जियों का उत्पादन आसानी से कर सकते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में सर्दियों के मौसम में तापमान इतना कम हो जाता है कि पौधों की बढ़वार रुक जाती है। इन्हीं पौधों को अगर संरक्षित वातावरण में उगाया जाता है तो इसमें पौधों की बढ़वार संतोषजनक रहती है। इस प्रकार यह तकनीक पर्वतीय कृषि विकास को अधिक मजबूत बनाने में कारगर सिद्ध हो रही है। सारणी-1 ट्रेंच तकनीक द्वारा उत्पादन का कार्यकाल ऋतु सब्जियां अंतराल सर्दी पालक 15 जनवरी से 15 अप्रैल पौधशाला में पौधे तैयार करना सब्जियां एवं एकवर्षीय फूल 1 अप्रैल से 1 मई सब्जियां कद्दूवर्गीय सब्जियां, टमाटर, पालक जून से नवम्बर सारणी 2. लो-टनल द्वारा उत्पादन का कार्यकाल ऋतु सब्जियां अंतराल सर्दी लहसुन पौधशाला में पौधे तैयार करना सब्जियां 15 अप्रैल से 15 मई सब्जियां कद्दूवर्गीय जुलाई से नवम्बर सारणी 3. चाइनीज टाइप पाॅलीहाउस में उत्पादन का कार्यकाल ऋतु सब्जियां अंतराल सर्दी पालक, पत्तागोभी, चायनीज कैबेज, लेट्यूस, केला 15 दिसम्बर से 15 अप्रैल पौधशाला में पौधे तैयार करना सब्जियां एवं वार्षिक फूल 1 अप्रैल से 1 मई सब्जियां रंगीन शिमला मिर्च (लाल, पीली, नारंगी) मई से नवम्बर पॉलीहाउस की योजना एवं निर्माण पॉलीहाउस का निर्माण करने से पूर्व निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए। इस बात का निर्णय कर लें कि कौन से पौधे इसमें उगाने हैं, वर्ष में पॉलीहाउस का प्रयोग कब करना है एवं उत्पादित फसलों को कहां पर बेचेंगे। यह भी चयन करेंगे कि किस प्रारूप का पॉलीहाउस बनाना है। स्थान का चयन करना भी संरक्षित खेती का एक मुख्य पहलू है। छायायुक्त स्थान की अपेक्षा अच्छी धूप वाले क्षेत्र का चुनाव करें। ठंडे बर्फीले क्षेत्रों में ऐसी जगह का चयन करें जिसमें पॉलीहाउस की उत्तर दिशा की तरपफ घर की दीवार हो (चायनीज टाईप पॉलीहाउस) जो कि सौर ऊर्जा को दिन में संरक्षित करके रात को प्रेषित करे। पॉलीहाउस कितने क्षेत्र में बनाना है,यह इस बात पर निर्भर करेगा कि उसमें कितनी मात्रा में फसल उगानी है। ढकने के लिए पराबैंगनी किरण स्थायीकृत शीट का चयन करें। निर्माण सामग्री का चयन करके हूपस बनाएं तथा उचित दूरी पर सीमेंट तथा रेत का मिश्रण बनाकर दबाकर रिज लाइन के साथ बांध दें। आखिर में प्रयुक्त होने वाली फ्रेम को हूपस के साथ कस कर बांध दें। इसके बाद सीमेंट के साथ भूमि में गाड़ दें। इसकी संरचना को परख लें तथा नोकीले जोड़ को समतल करें एवं प्लास्टिक शीट से ढक दें। कवरिंग शीट को कसकर फ्रेम के आखिर में पेंच तथा स्ट्रिप से बांध दें ताकि यह हवा से क्षतिग्रस्त न हो। बची हुई शीट को जमीन में दबा दें। पॉलीहाउस के ऊपर छायादार जाली के सही संचालन के लिए पहली और आखिरी छोर पर मोटी प्लास्टिक शीट या रिबन का प्रयोग करें। सामान्यतया पॉलीहाउस पूर्व दिशा में बनाएं, परन्तु अधिक हवा वाले क्षेत्रों में पॉलीहाउस हवा की दिशा के समानान्तर बनाएं। आदर्श पॉलीहाउस का निमार्ण करें जिसमें दोहरा दरवाजा, साइड वेंटीलेशन, पर्याप्त टॉप वेन्टीलेशन, टपक विधि द्वारा सिंचाई, फॉगर या मिस्टर, 50 मैश यू.वी. स्टैब्लाइज्ड नाईलॉन की जाली व बाहर या अंदर से 50 प्रतिशत यू.वी. स्टैब्लाइज्ड छायादार जाले आदि घटक होते हैं। यदि किसान उपरोक्त घटकों का प्रयोग पॉलीहाउस निर्माण में सुनिश्चित करें तो अधिकतऱ समस्याओं का निदान आसानी से कर सकते हैं। संरक्षित खेती के अंतर्गत विभिन्न संरचना संरक्षित खेती के अंतर्गत वातावरण को नियंत्रित करने वाले कारक के आधार पर संरक्षित वातावरण कई प्रकार के होते हैं, जिनका विस्तृत वर्णन निम्नलिखित हैः ग्रीनहाउस/पॉलीहाउस(फाइटोटॉनिक प्रकार) इस प्रकार के ग्रीनहाउस में विभिन्न वातावरणीय कारक जैसे तापमान, आर्द्रता, वायु संचार, प्रकाश इत्यादि को नियंत्रित करने के लिए स्वचालित उपकरण लगे होते हैं। इनका नियंत्रण कम्यूटर द्वारा किया जाता है। इसके अलावा इसमें उगाये गये पौधों की बढ़वार एवं फूलने एवं फलने की कार्यिकी को नापने के लिए भी यंत्र लगे रहते हैं। इस तरह के पॉलीहाउस बहुत महंगे होते हैं। अतः इसमें निर्यात के लिए उगाई जाने वाली फसलों जैसे अल्प प्रचलित एवं कीमती सब्जियों एवं फूलों को ही उगाया जाता है ताकि किसानों की कुल लागत तुलना में अच्छी आय प्राप्त हो सके। यह संरक्षित विधि अपेक्षाकृत अधिक महंगी होती है परन्तु इसमें कुछ बातें ध्यान में रखें तो निश्चित रूप से ही थोड़े समय बाद आय बढ़ने लगती है। कुछ समय बाद किसान की लागत निकल आती है एवं समय बीतने के साथ आय भी बढ़ने लगती है। इजरायली टाइप पॉलीहाउस इस प्रकार के पॉलीहाउस को साधारण जी.आई. पाइप के ऊपर अल्ट्रावायलेट स्टेबिलाइज्ड पॉलीथीन (80 गज) की चादर से बनाया जाता है। वायुसंचार के लिए एग्जास्ट फैन लगाया जाता है। इसके साथ ही पैड एवं फैन सिस्टम का भी प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार के पॉलीहाउस हमारे देश में जाड़े की सब्जियों को उगाने के लिए उपयुक्त हैं। इसमें तापमान 5-70 सेल्सियस तक नियंत्रित किया जा सकता है। शेडनेट हाउस-इस प्रकार के ढांचे का प्रयोग अधिक तापमान को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। इसमें ग्रीष्म ऋतु में टमाटर और शिमला मिर्च की खेती करके किसान बेमौसमी सब्जियां एवं फूल उगाकर अपनी आय दोगुनी कर सकते हैं। पलवार (पॉलीथीन मल्च) खेत में पॉलीथीन का प्रयोग पलवार के रूप में करते हैं। तापमान नियंत्रित करने के साथ, जमीन की सतह से पानी को उड़ने से बचाने (वाष्पोत्सर्जन), खरपतवार नियंत्रण, कीड़े-मकोड़ों से बचाव और पौधों को मृदा में पाये जाने वाले जीवाणु रोगों से बचाया जाता है। खेत में पलवार के प्रयोग से किसान अपनी लागत में कमी ला सकते हैं एवं गुणवत्ता के साथ उपज बढ़ाकर अपनी आय भी बढ़ा सकते हैं। चायनीज टाइप पॉलीहाउस चायनीज टाईप पॉलीहाउस का आकार 100×20 फीट होता है। इस प्रकार के पॉलीहाउस का व्यावसायिक स्तर पर उपयोग मुख्य रूप से लद्दाख क्षेत्र में किया जाता है। यह पॉलीहाउस जाड़े के महीने में सब्जी उत्पादन के लिए उपयुक्त है। जाड़े के मौसम में इस तरह के पॉलीहाउस के पालक की 20 कटिंग ले सकते हैं। इसके अलावा पत्तागोभी के हेड 800-2000 ग्राम भार के फरवरी के अंत तक तैयार कर सकते हैं। शिमला मिर्च की भी खेती कर सकते हैं। इस प्रकार के पॉलीहाउस में सब्जियों की पौध भी तैयार हो सकती है। परिणामस्वरूप किसान अपनी आय में बढ़ोतरी कर सकते हैं। सारणी-3 में इस प्रकार की संरचना में खेती करने के समय का वर्णन दिया है। प्लास्टिक लो-टनल तकनीक प्लास्टिक लो-टनल तकनीक के द्वारा ऑफ सीजन सब्जियों का उत्पादन करके किसान बाजार में वर्षभर सब्जियों को उपलब्ध कर सकते हैं। इस प्रकार सब्जियों को अच्छी कीमत पर बेचकर अच्छी आय प्राप्त कर सकते हैं। यह तकनीक सस्ती एवं कम खर्चीली है। लो-टनल के द्वारा खेती करने के बहुत लाभ हैं-जैसे प्रतिकूल वातावरण में यह फसल को सुरक्षा प्रदान करता है एवं साथ ही इन फसलों को 20-25 दिनों पहले तैयार होने में मदद करता है। फलस्वरूप किसान की फसल मुख्य समय से पहले बाजार में उपलब्ध हो जाती है और उचित मूल्य मिलता है। लो-टनल तकनीक द्वारा पौधशाला में पौधे स्वस्थ एवं अगेती (पहले) तैयार हो जाते हैं। इस विधि द्वारा किसानों ने समर स्क्वैश में उत्पादन दोगुना किया है एवं अधिक लाभ कमाया है। स्त्रोत : खेती पत्रिका, भारतीय अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), लेखक: प्रदीप कुमार सिंह' शेर-ए-कश्मीर कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कश्मीर, शालीमार, श्रीनगर (जम्मू और कश्मीर)।