विदेशी सब्जियाँ यह सभी सब्जियां आप चाहें तो छत पर गमलों में भी लगा सकते हैं। इनमें विटामिन ए, सी के साथ-साथ लौह, मैग्नेशियम, पोटाशियम, जिंक आदि बहुत मात्र में पाए जाते हैं। सबसे पहले प्याज के सम्बन्धी लीक को लेते हैं। यह देखने में हरे प्याज की तरह ही होता है, परन्तु इसका नीचे वाला श्वेत भाग अधिक लम्बा व चपटा होता है। इसका उपयोग सलाद, सूप व सब्जियों के साथ उबाल कर खाने में होता है। प्याज की तरह इसका बीज बोकर फिर पौध अलग क्यारी में लगा कर तैयार किया जाता है। क्यारी में समय-समय पर गुड़ाई करना व खर-पतवार निकालना आवश्यक होता है। ध्यान रहे कि क्यारी एकदम सूखी या एकदम पानी से भरी न रहे। इसका पौध यदि आप थोड़े-थोड़े दिनों के अंतराल में लगाएं तो यह आपको हरे प्याज की भांति दीर्घ अवधि तक ताजा मिलता रहेगा। लैट्यूस किस्में बटरहैड टाईप : बटरणरंच, बिब करिस्प हैड : ग्रेट लेकस आईसबर्ग पत्तेदार : स्लोबोल्ट, रुबी उर्वरण व खाद गोबर की खाद : 10 टन/ है. नत्रजन : 75 कि.ग्रा./है. फास्फोरस : 40 कि.ग्रा./है. पोटाश : 40 कि.ग्रा./है. खेत तैयार करते समय नज़न का एक तिहाई हिस्सा तथा अन्य खादों की सारी मात्रा भूमि में मिला दें। नत्रजन की शेष मात्रा दो भागों में रोपाई के एक-एक महीने प्द्गचात निराई-गुड़ाई के साथ भूमि में मिला दें। बीज की मात्रा : 400-500 ग्रा./है. बुवाई का समय : सितम्बर से नवम्बर रोपाई : पौधों को 45 सें.मी. दूर पंक्तियों में 30 सें.मी. के अन्तराल पर रोपाई करें। सस्य क्रियाएँ : खेत तैयार कर रोपाई से पहले स्टाम्प का 3 लिटर/है. छिड़काव करने से खरपतवार नियंत्रण में सहायता मिलेगी। इसके पश्चात् समय-समय पर निराई-गुड़ाई तथा सिंचाई कर पर्याप्त नमी बनाए रखें। तुड़ाई व उपज : शीर्ष किस्मों में तुड़ाई के समय शीर्ष पर्याप्त आकार के तथा ठोस होने चाहिए और खुले पत्ते वाली किस्मों में तब तुड़ाई करें जब पत्ते किस्म अनुरुप हो जाएँ तथा नरम हों। उपज : 150-200 क्विंटल/है.। बीजोत्पादन : एक या दो बार तोड़ने के पश्चात् फसल बीज उत्पादन के लिए छोड़ दें। दो प्रजातियों के मध्य 20 मीअर का अन्तर रखें। शीर्ष बनाने वाली किस्मों में शीर्ष के ऊपर दो तीन पत्ते हाथ से निकाल देने चाहिए या फिर चाकू से शीर्ष के ऊपर ्क्रॉस बना दें ताकि बीज तना आसानी से अंकुरित हो जाए। फूल एक समय पर न आने के कारण बीज इकट्ठा नहीं पकता। इसलिए लगभग 75 प्रतिशत फूलों के गुच्छे जब सफेद हो तभी कटाई करें तथा धूप में सुखाएँ। भण्डारण से पहले बीज को अच्छी तरह साफ कर लें तथा सुखा लें। बीज उपज : 100-200 कि.ग्रा./है. प्रमुख रोग एवं नियंत्रण रोग लक्षण नियंत्रण भूरा सड़न रोग (बोट्राइटिस साइनेरिया) प्रारंभिक लक्षण बीज एवं पौध गलन के रुप में होता है। उगते हुए पौधे गिरणर नष्ट हो जाते हैं। पुरानी पत्तियों पर जलीय दाग बनते हैं जो पीले हो जाते हैं। खड़ी फसल पर कैप्टन, या थायोफेनेट 2.5 कि.ग्रा. का एक हजार लिटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिडकाव करना चाहिए | मोजेक (लैट्यूस मोजेक वाइरस) पत्तियों पर हरे या पीले रंग के छींटदार दाग दिखाई पड़ते हैं। रोगी पौधे छोटे रह जाते हैं। पत्तियों की शिराएँ पीली हो जाती हैं। मेटासिस्टॉक्स (ऑक्सीमिथाइल डिमिटान) ) या रोगोर (डाइमेथोएट) 1 लिटर या एक हजार लिटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए। कीट प्रकोप एवं प्रबंधन 1. चेपा (एफिड) लैट्यूस में चेपा बहुत नुकसान पहुँचाते हैं। इनके शिशु व वयस्क दोनों ही पौधों से रस चूसते हैं। प्रबंधन 1. लेडी बर्ड भृंग का संरक्षण करें। 2. नीम बीज अर्क (5 प्रतिशत) या एन्डोसल्फान 35 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर या क्विनफॉस 25 ई.सी. 3 मि.लि./लिटर या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. 1 मि.लि./4 लिटर का छिड़काव करें। लीक किस्में : पालम पौष्टिक उर्वरण व खाद गोबर का खाद : 20-25 टन/है. नत्रजन : 150 कि.ग्रा./है. फॉस्फोरस : 75 कि.ग्रा./है. पोटाश : 100 कि.ग्रा./है. आधी नत्रजन तथा अन्य खादें खेत तैयार करते समय भूमि में मिला दें। नत्रजन की शेष मात्रा दो भागों में बांटकर रोपाई के एक-एक महीने पश्चात् निराई-गुड़ाई के साथ डालें। बीज की मात्रा : 5-6 कि.ग्रा./है. बुवाई का समय : अक्तूबर से नवम्बर रोपाई : पौधों की रोपाई 30 सें.मी. की दूरी पर बनाई गई पंक्तियों में 15-20 सें.मी. के अन्तराल पर 10-15 से.मी.गहरी नालियों में करें जो पौधों के बढ़वार के साथ-साथ भरी जानी चाहिए। पौधे का तना 2.5 सें.मी. व्यास का हो जाता है। इसमें प्याज की तरह गांठें नहीं होतीं। सस्य क्रियाएं : रोपाई से डो से तिन दिन पहले जब खेत मे पर्याप्त नमी हो खरपतवार नियंत्न के लिए स्टाम्प का 3 लिटर/हे. की डॉ से छिडकाव करें | निराई-गुड़ाई समय-समय पर करते रहें तथा सिंचाई लगभग 15 दिन के अंतराल पर करें | तुड़ाई व उपज : जब लीक से पौधों के तने 2-3 सें.मी. व्यास के हो जाएँ तो इन्हें उखाड़ लें। ऊपर से 4-5 सें.मी. हरे पत्ते काटकर, पौधों को अक्ष्छी तरह धोकर, हरे प्याज की तरह गांठें बांध कर मंडी में भेजें। यह फसल बुवाई से तुड़ाई तक लगभग 28-30 सप्ताह लेती है। पैदावार औसतन 35-40 टन प्रति हेक्टेयर होती है। बीजोत्पादन : लीक का बीज केवल पर्वजीय क्षेत्रों में ही सम्भव है क्योंकि यह द्विवर्षीय फसल है। बेबीकॉर्न बेबीकॉर्न एक पौष्टिक आहार है। यह प्रोटीन, विटामिन तथा लौह के अतिरिक्त फास्फोरस का उत्तम स्रोत है। बेबीकॉर्न छोटे आकार का एक अनिषेचित भुट्टा है। इसे आमतौर पर बाल निकलने के 1-3 दिन के अंदर पौधे से तोड़ लिया जाता है। उपयुक्त प्रजातियाँ : किस्में : एच.एम. 4, प्रकाश, बी.एल. 42 हिम 129 बुवाई की विधि : बेबीकॉर्न की बुवाई मेड़ों पर करनी चाहिए। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 सें.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 15-20 सें.मी. रखनी चाहिए। बीज दर : 22-25 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर उर्वरण व खाद : सामान्यतः 150-160 कि.ग्रा. नत्रजन, फास्फोरस 60 कि.ग्रा., पोटाश एवं 25 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। साथ ही साथ अधिक पैदावार लेने के लिए 8-10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की खाद का प्रयोग करना चाहिए। उर्वरकों का प्रयोग : नत्रजन की 10 प्रतिशत मात्रा एवं सम्पूर्ण फास्फोरस, पोटाश तथा जिंक सल्फेट को बुवाई के पूर्व खेत में अच्छी तरह मिला दें। नाइट्रोजन की शेष मात्रा का प्रयोग निम्नानुसार करें: 1. 20 प्रतिशत नत्रजन 4 पत्तियों की स्टेज पर 2. 30 प्रतिशत नत्रजन 8 पत्तियों की स्टेज पर 3. 25 प्रतिशत नत्रजन नर मंजरी तोड़ने के पूर्व 4. 15 प्रतिशत नत्रजन नर मंजरी तोड़ने के पश्चात् खरपतवार प्रबंधन : खेत में खरपतवारों के निकलने से पूर्व एट्राजीन नामक खरपतवारनाशी दवा को 1.0 से 1.5 कि.ग्रा. 500 से 600 लिटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों तथा अधिकतर घासों को रोकने में यह प्रभावी उपाय है। आवश्यकतानुसार एक-दो बार खुरपी या कसोले से गुड़ाई करनी चाहिए। इससे शेष खरपतवार भी नष्ट हो जाते हैं तथा मिट॒टी में वायु प्रवाह भी बना रहता हे। सिंचाई : सामान्य रुप से मेड़ों की 2/3 ऊँचाई तक ही पानी देना चाहिए। पानी मेड़ों के ऊपर से न बहे इसका ध्यान रखना चाहिए। मुख्य रुप से सिंचाई की आवश्यकता यंग सीडलिंग (अंकुरण के पश्चात्), पौधों की घुटनों तक की ऊँचाई अवस्था, सिल्क निकलते समय तथा बेबीकॉर्न की तुड़ाई के समय होती है। अतः इन अवस्थाओं पर सिंचाई करनी चाहिए। सिंचाई फसल की मांग के अनुसार तथा वर्षा की स्थिति को ध्यान में रखकर करनी चाहिए। शीतकाल में फसल को पाले से बचाने के लिए भी सिंचाई की आवश्यकता होती है। कीट प्रबंध : खरीफ, रबी तथा बसंत तीनों ही मौसमों में उगाए जाने वाले बेबीकॉर्न का तनाबेधक गुलाबी तना बेधक तथा सोरबन तना मक्खी नुकसान पहुँचाती हैं। तना बेधक की रोकथाम के लिए फसल जमने के 10 दिन व 20 दिन पश्चात् एक या दो बार छिड़काव करें। कार्बोरिल (500 ग्रा.) या 625 मि.लि. इंडोसल्फान (35 ई.सी.) नामक रसायन का 500 लिटर पानी में घोल बनाकर एक हेक्टेयर में छिड़काव करें। डिटेसलिंग (नर मंजरी को निकालना) : बेबीकॉर्न की गुकवत्ता को बनाये रखने हेतु पौधे से नरमंजरी को निकालना चाहिए। मक्का के पौधे की सबसे ऊपरी, पत्ती जिसे प्लेग लीफ कहते हैं, से नरमंजरी निकलते ही उसे तुरंत हटा दें। नरमंजरी को हटाते समय पौधे की पत्तियों को नुकसान न पहुँचे इस बात का ध्यान रखें। तुड़ाई : बेबीकॉर्न की गुल्ली को 2-3 सें.मी. रेशमी कोपलें आने की अवस्था पर तोड़ लेना चाहिए। तोड़ते समय बेबीकॉर्न के ऊपर की पत्तियाँ नहीं हटानी चाहिए। पौधे के निचले भाग में आधी गुल्ली तुड़ाई के लिए पहले तैयार हो जाती है। खरीफ मौसम के दौरान उगाई गई फसल की तुड़ाई प्रतिदिन तथा रबी मौसम के दौरान उगाई गई फसल की तुड़ाई एक दिन छोड़कर करनी चाहिए। तुड़ाई के पश्चात् बेबीकॉर्न का छिलका छायादार एवं खुली जगह में उबारना चाहिए। छिलके रहित बेबीकॉर्न को प्लास्टिक की टोकरियों, थैलों में भरकर प्रसंस्करण इकाइयों में स्थानांतरित कर देना चाहिए। तुड़ाई उपरांत प्रौद्योगिकी कटाई के तुरंत बाद किसी छायादार स्थान में रखें। तुड़ाई उपरांत भुट्टों की छिलाई करें। छंटाई व ग्रेडिंग के बाद प्लास्टिक की क्रेट या थैलियों में पैक / भण्डारित करें। बेबीकॉर्न को 2 प्रतिशत ब्राईन के घोल में टिन या कांच के पात्रों में 1 साल तक रखें। भुट्टों को 3-4 डिग्री से. तापमान व 85-90 प्रतिशत सापेक्ष आर्द्रता पर भण्डारित करें। उपज क्षमता : बेबीकॉर्न की उपज इसकी किस्मों तथा जलवायु पर निर्भर करती है। अच्छी फसल की स्थिति में 65-114 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बिना छिली हुई तथा 11-18 क्विंटल छिली हुई बेबीकॉर्न प्राप्त की जा सकती है। इसके अलावा तुड़ाई के पश्चात् पौधे को हरे चारे के रुप में प्रयोग में लाया जा सकता है। स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार; ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान