परिचय सब्जियों मे शिमला मिर्च की खेती का एक महत्वपूर्ण स्थान है। इसको ग्रीन पेपर, स्वीट पेपर, बेल पेपर आदि विभिन्न नामो से जाना जाता है। आकार एवं तीखापन मे यह मिर्च से भिन्न होता है। इसके फल गुदादार, मांसल, मोटा, घण्टी नुमा कही से उभरा तो कही से नीचे दबा हुआ होता है। शिमला मिर्च की लगभग सभी किस्मो मे तीखापन अत्यंत कम या नही के बराबर पाया जाता है। इसमे मुख्य रूप से विटामिन ए तथा सी की मात्रा अधिक होती है। इसलिये इसको सब्जी के रूप मे उपयोग किया जाता है। यदि किसान इसकी खेती उन्नत व वैज्ञानिक तरीके से करे तो अधिक उत्पादन एवं आय प्राप्त कर सकता है। मिर्च बहुत ही उपयोगी फसल है इसको हरी खाने के रूप में मसाले तथा अचार के रूप में प्रयोग करते है, इसकी खेती जायद एवं खरीफ दोनों फसलो में की जाती हैI किस्में : पूसा ज्वाला, पूसा सदाबहार पंत सी-1 व पंजाब लाल शिमला मिर्च : कैलिफोर्निया वंडर, एलो व्रडर, किंग आफ नार्थ, बुलनोज, अर्का मोहिनी, अर्का गौरव, अर्का बसंत व पूसा दीप्ति (संकर) जलवायु : गर्म मौसम की फसल है। इसलिए मैदानी क्षेत्रों में गर्मी व वर्षा के मौसम में खेती की जाती है। बीज अंकुरण के लिए 16-20 डिग्री से., पौधे के बढ़वार के लिए 21-27 डिग्री से. तथा फल विकास व परिपक्वता के लिए 30 डिग्री से. तापमान उपयुक्त है। भूमि : बलुई बुमट व बुमट मिट॒टी जिसका पी.एच. मान 5.6 से 6.8 हो उपयुक्त होती है। खेत में इसकी खेती से पहले मिर्च या शिमला मिर्च व किसी सोलनेसी कुल की सब्जी फसल की खेती न की गई हो। बीज की मात्रा : मिर्च के लिए 1000 से 1200 ग्राम व शिमला मिर्च के लिए 600 से 800 ग्राम बीज की मात्रा पर्याप्त है। बुवाई का समय : मैदानी क्षेत्रों में मिर्च के लिए खरीफ के मौसम में बुवाई का समय जून-जुलाई तथा बसंत के मौसम में फरवरी-मार्च तक होता है। शिमला मिर्च के लिए बुवाई उक्टूबर व रोपाई दिसम्बर-जनवरी माह में उपयुक्त है। रोपाई : रोपाई की दूरी किस्म पर निर्भर करती है। सामान्यतः पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 से.मी. व पौध से पौध की दूरी 45 से.मी. पर्याप्त है। खाद व उर्वरण : खेत की तैयारी के समय प्रति हेक्टेयर 50 कि.ग्राम लत्रजन, 100 कि.ग्रा. फास्फोरस व 100 कि.ग्रा. पोटाश डालें तथा रोपाई के 30-35 दिन बाद खड़ी फसल 50 कि.ग्रा. नत्रजन प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें। खरपतवार नियंत्रण : मिर्च व शिमला मिर्च में दो से तीन दिन बार निराई व गुड़ाई करनी चाहिए तथा रासायनिक खरपतवार नियंत्रण हेतू रोपाई से पहले 1.2 लिटर पेंडामेथिलिन या स्टाम्प के घोल का प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। तुड़ाई : फलों के पूर्ण रुप से विकसित होने पर ही उनकी तुड़ाई करें। फल तुड़ाई का कार्य सुबह या शाम के समय करें। इस बात का ध्यान रखें कि तुड़ाई के समय पौधे की शाखाओं की कोई हानि न हो। तुड़ाई उपरांत प्रौद्योगिकी मिर्च जब फलों का रंग लाल होना शुरु हो जाए तो तुड़ाई करें। सूर्य की धूप में 10-15 दिन तक सुखाकर थैलों में पैक करें। 0 - 10 डिग्री से. तापमान व 90.-95 प्रतिशत सापेक्ष आर्द्रता पर 50 दिन तक भंण्डारित करें। शिमला मिर्च फलों में आकर्षक लाल, हरा या पीला रंग आने पर तुड़ाई करें। श्रेणीकरण के बाद, गत्ते के डिब्बों में पैक करके बाजार भेजें या 0 से 10 डिग्री से. तापमान व 85-90 प्रतिशत आर्द्रता पर 50-60 दिनों तक भण्डारित करें। उपज : शिमला मिर्च की सामान्य प्रजाति में औसत फल उपज 180 से 250क्विंटल/हेक्टेयर तथा संकर किस्मों की उपज 250-350 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। हरी मिर्च की पैदावार 90-110 क्विंटल/हेक्टेयर तथा सूखी मिर्च की उपज 20-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। बीजोत्पादन : मिर्च व शिमला मिर्च के आधार बीज के लिए बीज उत्पादन हेतू 400 मीटर प्रमाणित बीज के लिए 200 मीटर की पृथक्करण दूरी रखें। खेत चुनाव में ध्यान रखें कि जल निकासी की उचित व्यवस्था हो। अवांछित पौधों को कम से कम तीन बार निकालें। पहली बार फूल आने से पहले, दूसरी बार फूल आने पर तथा तीसरी बार फल आने के बाद फल के आकार व रंग के आधार पर अवांछित पौधों को निकाल दें। फलों की तुड़ाई उनके लाल रंग विकसित होने के बाद करें तथा धाूप में सुखाकर बीज को अलग कर लें। भंडारण के समय बीज में नमी की मात्रा 8 प्रतिशत तक होनी चाहिए। बीज को नमी रहित स्थान पर बर्तन में भंडारित करें। बीज उपज : मिर्च 200-300 कि.ग्रा. तथा शिमला मिर्च 50-100 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर प्रमुख रोग एवं नियंत्रण रोग का कारण लक्षण नियंत्रण शयामावर्ण तथा फल विगलन (एन्थ्रेक्नोज और फ्रूट रॉट) प्रारंभ में पौधों की शाखाओं का ऊपरी भाग सूखने लगता है और रोग ऊपर से नीचे की तरफ बढ़ता है। रोगी शाखाओ की पत्तियाँ गिरने लगती हैं। फलों के ऊपर रोग के लक्षण छोटे-छोटे, काले और गोलधब्बों के रुप में दिखाई पड़ते हैं। ये धब्बे फल की लम्बाई में किनारों पर गहरे रंग के होते हैं। फल सड़ने लगता है। कैप्टान या ब्लाइटक्स- 5.0 (2.0 ग्राम/लिटर पानी) रोपाई के बाद खेत में रोग प्रकट होने पर छिड़काव करें। कीट प्रकोप एवं प्रबंधन 1. सफेद मक्खी (व्हाइट फ्लाई) इस कीट के शिशु व वयस्क दोनों पत्तों से रस चूसकर पौधों को हानि पहुँचाते हैं। कीड़ों के मधु बिन्दु पर काली फंफूद (माल्ड) आने से पौधों का प्रकाश संशलेषक कम हो जाता है। यह कीट मिर्च का वायरस जनित 'पत्ती मरोड़क' रोग भी फैलाता है। प्रबंधन रोपाई से पहले पौधों की जड़ों को आधे घंटे के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. 1 मि. लिटर/3 लिटर के घोल में डुबोएँ। नर्सरी को 40 मैश की नाइलोन जाली (नेट) से ढंक कर रखें। 3. नीम बीज अर्क (6 प्रतिशत) या नीम तेल 5 मि.लि./लिटर या डाइमेथोएट 30 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर या मिथइल डेमिटोन 30 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर छिड़कें। 2. मिर्च थ्रिप्स इस कीट के भी शिशु वयस्क दोनों ही पौधों के कोमल हिस्सों से रस चूसते हैं जिससे पत्ते सिकुड़ जाते हैं। यह कीट वायरस जनित पत्ती मरोड़क रोग भी फैलाता है। इस कीट की रोकथाम के लिए इन्डोसल्फान 35 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर या कार्बेरिल 50 डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/लिटर या डायमेथेएट 30 ई.सी. 2 मि.लि./लि. का छिड़काव करें। 3. फल छेदक (टोमैटो फ्रूट बोरर) फल छेदक की इल्लियाँ फलों को छेदकर नुकसान पहुँचाती है। प्रबंधन इस कीड़े की निगरानी के लिए 5 फीरोमोन टै्रप प्रति हेक्टेयर इस्तेमाल करें। एच.ए.एन.पी.बी. 250 एल.ई./हैक्टेया या बी.टी. 2 ग्राम/लिटर या नीम बीज अर्क (5 प्रतिशत) या एमामेक्टिन बैन्जोएट 5 एस.जी. 1 ग्राम/2 लिटर या स्पिनोसेड 45 एस.सी. 1 मि.लि./4 लिटर का छिड़काव करें। 4. तम्बाकू की इल्ली (टोबैको कैटरपिल्लर) इस कीट की इल्लियाँ पौधों की पत्तियों व अन्य कोमल भागों को नुकसान पहुँचाती हैं। प्रबंधन इल्लियों के झुंड को इकट्ठा कर भूमि में दबा देती है। इस कीड़े की निगरानी के लिए 5 फीरोमोन टै्रप प्रति हेक्टेयर इस्तेमाल करें। बी.टी. 2 ग्राम/लिटर या नीम बीज अर्क (5 प्रतिशत) या इन्डोसल्फान 2 मि.लि./लिटर या स्पिनोसेड 45 एस.सी. 1 मि.लि./4 लिटर या इन्डोवसाकाई 1 मि.लि./2 लिटर का छिड़काव करें। स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार; ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान