नकिमा, जिसका वानस्पतिक नाम तुपिस्ता कर्लाकी है, ऐस्पेरागेसी कुल का एक बहुवर्षीय शाक है। यह पौधा अधिक आर्द्रता वाले घने जंगलों में उगता है। विश्वभर में इसकी लगभग 27 प्रजातियां हैं, जो मुख्यतः भारत व अन्य दक्षिण एशियाई देशों (चीन, बंगलादेश, नेपाल तथा भूटान आदि देशों) में पायी जाती हैं। भारत में पायी जाने वाली कुल 9 प्रजातियों में से 6 प्रजातियां केवल सिक्किम, मेघालय, असोम, अरुणाचल प्रदेश, उत्तरी बंगाल तथा नागालैंड के कुछ भागों में पायी जाती हैं। इनमें से दो प्रजातियों, तुपिस्ता कर्लाकी व तुपिस्ता न्यूटान्स, को शाक तथा औषधि के रूप में उपयोग में लाया जाता है। नकिमा की उत्पत्ति भारत, बर्मा, भूटान, लाओस, थाईलैंड तथा मलेशिया में हुई मानी जाती है। सिक्किम के जंगलों में यह अत्यधिक मात्रा में उगता है, जहां पर स्थानीय निवासियों द्वारा इसकी खेती भी की जा रही है। इसके पुष्पगुच्छों का उपयोग सब्जी/शाक तथा औषधि के रूप में समस्त सिक्किम, उत्तरी बंगाल के पहाड़ी भाग तथा कुछ अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों में बहुतायत में किया जा रहा है। इसके पुष्पगुच्छों में ऑक्सीकरण को कम करने व मेटाबोलिज्म (चयापचय क्रियाएं) को सुदृढ़ करने का गुण विद्यमान है तथा इनमें पोषक तत्व एवं खनिज पदार्थ भी प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। सिक्किम राज्य में नकिमा को औषधीय व पौष्टिक गुणों से भरपूर होने के कारण बहुतायत में उपयोग किया जाता है। इसके साथ ही यह सिक्किम के किसानों की आमदनी का एक मुख्य स्त्रोत भी है। सामान्यतः इसके पुष्पगुच्छ यहां के जनजातीय हाटों एवं दार्जिलिंग व केलिमंपोंग के बाजारों में बिकते हुए देखे जा सकते हैं। स्थानीय निवासी जैसे कि लेपचा, भूटिया, लिंबू, बंगाली, गोरखा और नेपाली आदि लोग इसकी खेती करते हैं। ये लोग नकिमा के पुष्पगुच्छों को 100-150 रुपये प्रति कि.ग्रा. की दर से बेचते हैं। बाजार में उपलब्धता कम होने के कारण कभी-कभी इसका दाम 400 रुपये प्रति कि.ग्रा. तक भी बढ़ जाता है। पुष्पगुच्छ स्वाद में लगभग करेले जैसा कड़वा होता है। इन पुष्पगुच्छों को सामान्य तापमान पर एक सप्ताह तक संग्रहित किया जा सकता है। इनकी गुणवत्ता भी लंबे समय तक बनी रहती है, जिस कारण पुष्पगुच्छ ताजे रहते हैं तथा बिक्री भाव में भी किसी प्रकार की कमी नहीं आती है। वानस्पतिक परिचय नकिमा एक बहुवर्षीय, सदा हरी-भरी रहने वाली शाक है। यह समुद्र तल से 1800-3000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पायी जाती है। इस पौधे की ऊंचाई 1-1.5 मीटर तक होती है, लेकिन कभी-कभी इसकी ऊंचाई 1.8 मीटर तक भी पहुंच जाती है। पत्तियां सामान्यतः 1.5 मीटर लंबी तथा 10-12 सें.मी. चौड़ी होती हैं, जोकि हमेशा हरी-भरी रहती हैं।। इसके पुष्पगुच्छ पौधे में मूल भाग से निकलते हैं।। ये अति सुन्दर, सफेद पीले व कभी-कभी हल्के गुलाबी रंग के होते हैं और आपस में एक दूसरे से चिपके हुए रहते हैं।। पुष्पगुच्छों की लंबाई लगभग 10-15 सें.मी. तक होती है, जिस पर लगभग 20-40 तक पुष्प लगे होते हैं। नकिमा की जड़ें राइजोमेंटस, पतली एवं जमीन पर फैलने वाली होती हैं।। इसके फल गोलाकार होते हैं, जिनमें सामान्यतः 1-2 बीज होते हैं। खेती की विधि एवं पैदावार इसकी खेती के लिये प्रचुर मात्रा वाली कम्पोस्ट खादयुक्त मृदा की आवश्यकता होती है। अतः गोबर अथवा सड़ी-गली पत्तियों से तैयार खाद मृदा में मिली होनी चाहिये। इसके साथ ही मृदा में आवश्यक तत्वों की मात्रा भी परिपूर्ण होनी चाहिये। नकिमा की खेती के लिए गर्म व अधिक आर्द्रता वाली जलवायु उपयुक्त मानी जाती है, ताकि पौधा अच्छी तरह फल-फूल सके। नकिमा का पौधा जंगलों में भी उगता है अतः इसके क्लिम्पस (छोटे व नये पौधे) को जंगलों से लाकर मानसून के आगमन से ठीक पहले मृदा में रोपित किया जाता है, ताकि पौधा अच्छी बढ़वार प्राप्त कर सके। इसकी अच्छी पैदावार के लिए पौधे से पौधे की दूरी 1-2 मीटर रखना उचित माना जाता है। इस तरह यह पौधा एक वर्ष का होने पर ही पुष्पगुच्छों का उत्पादन आरंभ करने में सक्षम हो जाता है। एक पौधे से वर्षभर में लगभग 1-1.5 कि.ग्रा. पुष्पगुच्छों की पैदावार हो जाती है। यह एक बहुवर्षीय पौधा है। अतः इसके पुराने क्लिम्पस की छंटाई करके पुराने व सूखे पौधों को हटाना आवश्यक हातेा है, जिससे नये पौधों को अच्छी प्रकार से फलने-फूलने का अवसर मिल सके। पौधों पर पुष्पगुच्छ आने का सही समय अगस्त से अक्तूबर के मध्य तक होता है। इसी समय इनको पौधों से अलग करके बाजार में बेचा जाता है तथा सब्जी के लिए उपयोग में लाया जाता है। जननद्रव्य संकलन एवं संग्रहण राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, नई दिल्ली द्वारा नकिमा के जननद्रव्यों के नमूनों का संकलन सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और उत्तरी बंगाल के पहाड़ी क्षेत्रों से कर ब्यूरो के क्षेत्राीय केन्द्र उमियम, शिलौंग, मेघालय के फील्ड जीन बैंक में संरक्षित किया गया है। सारणी 1. नकिमा के सूखे पुष्पगुच्छों के चूर्ण में आवश्यक तत्वों की मात्रा तत्वों के नाम तत्वों की मात्रा (मि.ग्रा./100 ग्राम में) आवश्यक तत्व पोटेशियम 561.61 कैल्शियम 11.30 मैग्नीशियम 86.82 फास्फाेरस 110.88 लाेहा 42.33 मैंगनीज 26.24 जस्ता 2.38 तांबा 52.63 माॅलिब्डेनियम 2.70 गैर जरुरी तत्व सोडियम 19.0 कोबाल्ट 0.52 सिल्वर 0.27 बेरीलियम 0.10 बिस्मुथ 0.17 सिसियम 0.17 गेलियम 3.11 लिथियम 1.612 उपयोग औषधि के रूप में औषधि के रूप में स्थानीय जनजातीय मान्यता के अनुसार नकिमा के ताजे पुष्पगुच्छों को भाजी अथवा सूप के रूप में सेवन करने से उच्च रक्तचाप ठीक हो जाता है। उदर विकार व बदन दर्द में भी इसका सेवन लाभदायक है। इसके पुष्पगुच्छों को अच्छी तरह से सुखाकर चूर्ण बनाया जाता है, जिसे पानी के साथ सेवन करने से शुगर एवं उच्च रक्तचाप रोग ठीक हो जाते हैं। नकिमा की जड़ों का क्वाथ मूत्राशय, अनिद्रा, कब्ज एवं आमवात जैसे रोगों में लाभदायक होता है। इसकी जड़ों का उपयोग विषाक्त भोजन खाने पर किया जाता है। पुष्पगुच्छों का निरन्तर सेवन करने से भूख में भी वृद्धि होती है तथा शरीर रोगमुक्त रहता है। खाद्यान्न के रूप में भाजी तैयार करने के लिए नकिमा के पुष्पगुच्छों को अच्छी तरह से पानी से साफ कर दिया जाता है तथा थोड़ा सा नमक मिलाकर उबालते हैं। इसे तेल में फ्राई कर चावल अथवा रोटी के साथ खाया जाता है। इसके पुष्पगुच्छों को अच्छी तरह से सुखाकर सब्जी के अभाव के समय अन्य सब्जियों के साथ या अकेले ही भाजी बनाकर खाया जाता है। पुष्पगुच्छों का सूप बनाकर पिया जाता है। उत्तर-पूर्वी राज्यों में नकिमा के पुष्पगुच्छों को चावल व दाल के साथ पकाकर खाने का प्रचलन है। इसका सेवन एक सप्ताह में दो वक्त भोजन के साथ 4-6 सप्ताह तक किया जाना अच्छा समझा जाता है। पुष्पगुच्छों से अचार भी तैयार किया जाता है। पौष्टिक तत्वों की उपलब्धता नकिमा के पुष्पगुच्छों में कुछ महत्वपूर्ण रासायनिक तत्व जैसे कि फेरूलिक अम्ल, प्रोटोकटेच्यूइक अम्ल, पी-हाइड्रकसीबेन्जोइक अम्लऋ 1-फिनाईलालाईन आदि प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं।। ये शरीर को कई रोगों से बचाने में मददगार होते हैं।। इसके पुष्पगुच्छ सिक्किम, दार्जिलिंग, कलिंमपोंग व मेघालय में रहने वाले कुछ जनजातीय लोगों की बहुत पसंदीदा सब्जी है। इसका सेवन वे उपलब्धता के समय पर अधिक मात्रा में करते हैं। पौधे की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए इसकी खेती भी की जाती है। यहां के निवासियों की मान्यता है कि नकिमा के सेवन से शरीर निरोग एवं चुस्त रहता है तथा साथ-साथ यह पाचन क्षमता को भी बढ़ाता है। इसके पुष्पगुच्छों में पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। भावी संभावनाएं पौष्टिक गुणवत्ता के कारण इस फसल की खेती से भविष्य में आपार संभावनाएं उजागर होती हैं। बदलती जलवायु के कारण बहुत सी फसलों के विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। इसके साथ ही पौष्टिक तत्वों की पूर्ति के लिए पौष्टिकता से भरपूर खाद्यान्नों को भी तलाशना आवश्यक हो गया है। अतः नकिमा को सब्जी के लिए अन्य अनुकूल जगहों में उगाने की ओर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। औषधीय गुणों का भण्डार होने के कारण इसको औषधि उत्पादन में भी उपयोग में लाया जा सकता है। इसकी ऐसी प्रजातियां विकसित करने की भी जरूरत है, जो कि कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगायी जा सकें। जनसंख्या विस्फोट को देखते हुए खाद्यान्न की आपूर्ति के लिए नये-नये पौधे खोजने की प्रक्रिया में यह पौधा काफी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। स्त्राेत : फल-फूल पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), रनबीर सिंह राठी, कैलाश चन्द्र भट्ट, के. प्रदीप’ और सुधीर पाल अहलावत ’भाकृअनुप-राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, पूसा, नई दिल्ली-110012