मोल्डी कोर व कोर रॉट रोग मोल्डी कोर व कोर रॉट रोग, हिमाचल प्रदेश में आर्थिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण रोग के तौर पर उभरकर सामने आया है। यह रोग संयुक्त रूप से बहुत सारी फफूंदों के प्रभाव से पनपता है और यह सेब उत्पादन को सीधे नुकसान पहुंचाता है। लक्षण फलों के ऊपर इस रोग के लक्षण प्रायः जून से फल तोड़ने के पहले तक दिखाई देते हैं। कई बार जुलाई-अगस्त में भी इसका भारी प्रकोप होता है। इस रोग के मुख्य लक्षण ग्रसित फलों में बीजों के साथ लगने वाले भाग में लगी फफूंद की वृद्धि के रूप में पाये जाते हैं। इनका संक्रमण बाद में फलों के 'कोर' के साथ लगते गूदे में फैलकर शुष्क या तर संगलन पैदा करता है। इस रोग से संक्रमित फलों की बढ़ोतरी रुक जाती है, जिससे वे आकार में छोटे व विकृत होना शुरू हो जाते हैं। रोगी फलों में स्वस्थ फलों की अपेक्षा जल्दी व अधिक रंग आता है तथा वे वृक्षों से तुड़ाई से पूर्व ही असामयिक रूप से गिरना शुरू हो जाते हैं। रोगग्रस्त फलों को काटकर देखने पर कोर (बीज के इर्द-गिर्द) भाग में काली, गुलाबी या भूरा फफूंद की वृद्धि व सड़न दिखाई देता है। बाहर से देखने में फल स्वस्थ लगते हैं परंतु बीच से ये सड़े होते हैं तथा इन फलों के गूदे में भी कड़वाहट होती है। कई बार रोगग्रस्त फल भंडारण में भी सड़ जाते हैं। प्रबंधन बगीचों में रोगी फलों, सूखी टहनियों व पत्तियों को इकट्ठा कर नष्ट करना चाहिए। इससे रोगजनक फफूंदों की संख्या में कमी आती है। इस रोग की रोकथाम के लिए सेब के बगीचों में साफ-सफाई का ध्यान रखें व वृक्षों की उचित ढंग से कांट-छांट करें। इससे बगीचे में अच्छी सूर्य की रोशनी रहती है तथा हवा का भी उचित प्रवाह हो पाता है। वृक्षों की गुलाबी कली अवस्था पर कार्बेंडाजिम 100 ग्राम + मैन्कोजैब 500 ग्राम या कोम्बीप्रोडक्ट 500 ग्राम या डाइफैनकोनाजोल 30 मि.ली. या प्रोपीनैव 600 ग्राम का प्रति 200 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। पंखुड़ीपात से मटर के दाने की अवस्था पर हैक्साकोनाजोल 100 मि.ली. या डाइफैनकोनाजोल 30 मि.ली. या साइपरोकोनाजोल 100 मि.ली. का प्रति 200 लीटर पानी में डालकर छिड़काव करें। अखरोट की अवस्था पर डोडीन 150 ग्राम या मैन्कोजैब 600 ग्राम या मैटीराम/पोलीराम 400 ग्राम या प्रोपीनैब 600 ग्राम नामक फफूंदनाशकों का प्रति 200 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। फल तुड़ाई के बाद कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 600 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। अनुमोदित खादों का संतुलित प्रयोग व समयानुसार उचित सिंचाई करने से इस रोग का संक्रमण कम होता है। जैविक प्रबंधन में अखरोट के पत्तों, पहाड़ी नीम (मीलिया एजाडीरकै-दरेक) के बीज, आंवला के फलों के रस का छिड़काव (10 प्रतिशत) गुलाबी कली, पंखुड़ी पात-मटर व फल विकास अवस्था पर छिड़काव भी इस रोग के नियंत्रण में सहायक सिद्ध हुआ है। ऊपर अलंकृत जैविकों का गौमूत्र में (डीकॉकसन) मिश्रण करके तथा 7 दिनों तक रखने के बाद छानकर प्रयोग भी रोग नियंत्रण के लिए प्रभावी पाया गया है। लायकन लायकन एल्गी तथा फफूंद का सहजीवी संघ है, जो कि धरती पर पाए जाने वाली सफल प्रजातियों में से एक है। दूसरे अन्य वृक्षों की भान्ति लायकन सेब के वृक्षों में मौजूद रहते हैं और उनकी वृद्धि एवं विकास पर प्रभाव डालते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि लायकन न केवल स्वयं बल्कि बहुत सारे जीवाणु, फफूंद तथा वायरस को अपने थैलस के ऊपर स्थान देता है। ये किसी न किसी रूप से वृक्षों की वृद्धि रोकते हैं। सेब को प्रभावित करने वाला सबसे हानिकारक वायरस एपल मोजेक वायरस भी लायकन के थैलस के ऊपर दर्ज किया गया है, जो कि निश्चित रूप से सेब में पौधों को प्रभावित कर सकता है। लक्षण फफूंद तथा शैवाल दोनों का मिश्रण संयुक्त रूप से टहनियों तथा तनों पर सफेद हरे भूरे रंग की वृद्धि के रूप में उभरता है। लायकन एसिड बनाते हैं। ये एसिड लायकन के नीचे मौजूद सतह को क्षय पहुंचाते हैं। प्रबंधन सुषुप्तावस्था में रोगग्रस्त टहनियों एवं तनों को एक प्रतिशत कॉस्टिक सोडा (2 कि.ग्रा. ग्राम प्रति 200 लीटर पानी) के बने घोल में बोरी के टुकड़े को भिगोकर प्रभावित हुई टहनियों पर रगड़ें। कैंकर और सैंजोस्केल के लिए किए गए छिड़काव भी इस समस्या को कम करते हैं। स्त्रोत : सतीश कुमार शर्मा, जोगिन्दर सिंह, जे.एन. शर्मा और अंजू शर्मा डा. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी, सोलन (हिमाचल प्रदेश),खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर)।