वायरस या विषाणु रोग फफूंद तथा जीवाणु रोगजनकों की भांति वायरस भी सेब फसल को प्रभावित करता है। अधिकतर वायरस प्रणालीगत तरीके से पौधों के अंदर विद्यमान रहते हैं, जिससे वे अगली पीढ़ी में भी क्लोनल विधि द्वारा चले जाते हैं। इस प्रकार वे पीढ़ी दर पीढ़ी नुकसान करते हैं। कुछ वायरस गुप्त संक्रमण करते हैं, जोकि पौधों की वृद्धि, ताकत, गुणवत्ता तथा फल उत्पादन को कम कर देते हैं। हिमाचल में सेब फसल को प्रभावित करने वाले मुख्य वायरस ऐप्पल मोजैक, ऐप्पल क्लोरोटिक लीपफ धब्बे, स्टेम पीटिंग, स्टेम ग्रुविंग, लिटल लीफ हैं। लक्षण विषाणु रोग के लक्षण, पौधों पर मुख्य पत्तियों हरे रंग का छिटकना तथा पीला होना, पत्तियों का आकार छोटा होना, पौधों में बौनापन होना, अधिक कलियां खिलना, जिससे फूल और फलों का कम लगना इत्यादि के रूप में दिखाई देते हैं। वायरस संचरण सेब में वायरस संचरण मुख्य रूप से रोगग्रस्त कलमों से होता है। इसकी सहायता से भी वायरस पीढ़ी दर पीढ़ी फैलते रहते हैं। प्रबंधन ये रोग रोगी पौधों की कलम लगाने से होते हैं। इसलिए स्वस्थ पौधे ही बगीचों में लगाएं। किसी भी विषाणु रोग के लक्षण पौधों पर देखें तो उन्हें उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए। सेब में फसल तुड़ाई के बाद के रोग सेब फसल में तुड़ाई के बाद के रोग आर्थिक रूप से बहुत नुकसान करते हैं। हिमाचल में ये रोग लगभग 10 से 25 प्रतिशत नुकसान पैदा करते हैं। फल तुड़ाई से पहले वृक्षों पर या फलों के भंडारण के समय फल पर नीला, भूरा गुलाबी, काला सड़न, अस्वाद सड़न तथा दूसरे सड़न रोग हो जाते हैं। क्रमानुसार पैनीसीलियम एक्सपैन्सम, मोनीलीनिया फ्रक्टीजीना, ट्राइकोथिसियम रोजियम, बाट्रीयोस्फेइरिया क्वरकम, ग्लोमेरैला सिंगुलैटा तथा रहाइजोपस सटोलोनीफर व बाट्रयोस्फेरिया डौथिडिया जैसी फफूंद की प्रजातियों द्वारा उत्पन्न होते हैं। प्रबंधन संक्रमित या सड़े हुए फलों को निकालकर नष्ट कर दें। कैप्टॉन (800 ग्राम) या कार्बेंडाजिम (100 ग्राम) या मन्कोजैब (600 ग्राम) का घोल 200 लीटर पानी में बनाकर दो छिड़काव 15 दिनों के अंतराल पर करें। अंतिम छिड़काव फल तुड़ाई के 20 दिनों पूर्व तक हो जाना चाहिए। इस प्रकार के छिड़काव पफल सड़न रोग रोकते हैं और पफल भंडारण के समय भी फलों को सुरक्षा देते हैं। इसके साथ ही भंडारण क्षमता को बढ़ाते हैं। फल तोड़ने पैकिंग और ग्रेडिंग के समय फलों को कोई खरोंच न पहुंचाएं। फलों को सीधी धूप पड़ने से बचाना चाहिए। स्त्राेत : सतीश कुमार शर्मा, जोगिन्दर सिंह, जे.एन. शर्मा और अंजू शर्मा, डा. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी, सोलन (हिमाचल प्रदेश), खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर)।