<p style="text-align: justify;">भारत में 2.50 लाख हैक्टर भूमि में फूलों की खेती की जाती है और उत्पादन लगभग 2000 मिलियन टन है। वर्ष 1990 के दशक में फूल का व्यापार भी लगभग 12 करोड़ रुपये से बढ़कर 2015 में 1000 करोड़ रुपये का हो गया है। </p> <p style="text-align: justify;">भारत में फ्लोरीकल्चर सेक्टर तेजी से विकसित हो रहा है। भारती फूलों की खेती का मुख्य आधार खुले क्षेत्र में पारंपरिक फूल की बढ़़ती मांग है, जिसके तहत कटे हुए फूलों का उत्पादन दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। वर्तमान में लगभग फूलों की तीस से ज्यादा प्रजातियां फायटोप्लाज्मा रोगों से ग्रसित है, जिनके कारण इनके उत्पादन में काफी कमी आ रही है। </p> <h3 style="text-align: justify;">लक्षण </h3> <p style="text-align: justify;">फूलों की विभिन्न किस्मों में पत्ती के आकार में विकृति एवं कमी और गुच्छों का निर्माण हो जाता है, फूलों के रंगीन भागों और फूलों की पंखुड़ियों में विशेष रूप से हरे भाग हो जाते हैं। एक पफूल के साथ कई और फूलों की कलियों का उत्पादन हो जाता है और फूल बाजारों में बिक्री लायक नहीं रह जाते। भारत में फायटोप्लाज्मा सभी महत्वपूर्ण फूल की फसलों जैसे-गुलाब, गेंदा, चमेली, बोगेनवेलिया, पिटूनिया, फ्रलाक्स, गुड़हल, सदाबहार, गुलदाउदी, एस्टर आदि प्रजातियों को प्रभावित करता है। भारत में मुख्य रूप से फायटोप्लाज्मा फूल की फसलों में विभिन्न प्रकार के लक्षण परिलक्षित करते हैं। इनसे गुलाब में फीलोडी, बढ़े हुए अक्षीय कली विकास, पिटूनिया का फ्लैट तना, चमेली का छोटी पत्ती एवं पीला रोग, गेंदा का बौनापन एवं सपाट तना एवं गुलदाउदी का फीलोडी रोग आदि प्रमुख हैं। </p> <h3 style="text-align: justify;">प्रसार </h3> <p style="text-align: justify;">फूलों की प्रजातियों में फायटोप्लाज्मा रोग पर्णफुदका प्रजाति के कीटों द्वारा फैलता है। </p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <h3>प्रबंधन </h3> <p style="text-align: justify;">फूलों में फायटोप्लाज्मा जनित रोग के लक्षण को प्रारंभिक अवस्था में पहचान करना एवं उनका नियंत्रण इस रोग के प्रबंधन में महत्वपूर्ण है। कीट वेक्टर का नियंत्रण भी इस रोग के संक्रमण की रोकथाम में संभावित समाधान है। एक बार जब पौधे संक्रमित हो जाते हैं, तो रोगजनक को लक्षित करना और नियंत्रण करना मुश्किल होता है, क्योंकि यह रोग खरपतवार वनस्पतियों से भी फैलता है। फूल के खेतों के आसपास समय-समय पर भ्रमण कर खरपतवार नष्ट करने से इस रोग को फैलने से रोकने में मदद मिलती है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccPic.jpg" width="190" height="250" /></p> <p style="text-align: justify;">फूलों की फसलों में टेट्रासाइक्लिन के 60 एवं 80 पी.पी.एस. सान्द्रता का छिड़काव कर प्रेरित लक्षणों में कमी लाई जा सकती है। किसानों और नर्सरी के बीच फायटोप्लाज्मा के बारे में जानकारी की मदद से फायटोप्लाज्मा रोगों को तेजी से प्रसार को रोकने में मदद मिलती है। फूलों के फायटोप्लाज्मा जनित रोगों की रोकथाम के लिए कीटनाशी रसायनों का उपयोग, पर्णफुदकों आदि के नियंत्रणार्थ एक प्रभावी प्रबंधन विधि है। </p> </td> </tr> </tbody> </table> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : गोविन्द प्रताप राव पादप रोगविज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान(खेती पत्रिका), नई दिल्ली-110012</p>