<h3 style="text-align: justify;">फफूंद के द्वारा</h3> <p style="text-align: justify;">यह रोग मुख्य रूप से गुजरात, राजस्थान, हरियाणा व महाराष्ट्र में पाया जाता है। फसल में क्षति की मात्रा, रोग फैलाव व फसल की अवस्था पर निर्भर करती है। यह रोग ईरीसाईफी क्रुसीफिरेरम नामक फफूंद द्वारा होता है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccpic.jpg" width="260" height="190" /></p> <h3 style="text-align: justify;">लक्षण</h3> <p style="text-align: justify;">यह रोग पौधों की निचली पत्तियों के दोनों ओर मटमैले सफेद रंग के धब्बे के रूप में प्रकट होता है, बाद में ये धब्बे तने व फलियों पर भी बनते हैं। अनुकूल वातावरण में धीरे-धीरे धब्बे बढ़ते जाते हैं और आपस में मिलकर पौधे को सम्पूर्ण रूप से ढक लेते हैं। बाद में खड़ियानुमा चूर्ण फैल जाता है। ग्रसित पौधों की वृद्धि रुकने से वे बौने रह जाते हैं और उन पर फलियां कम बनती हैं। ग्रसित फलियों में बीज सिकुड़े, छोटे व सीमित मात्रा में केवल आधार भाग पर ही बनते हैं, जबकि ऊपर का हिस्सा मुड़ा हुआव खाली रहता है। ग्रसित भागों पर बिखरी हुई या झुंड में छोटी-छोटी काली सी संरचनाएं (क्लीस्टोथिसिया) पायी जाती हैं। ये अगले वर्ष रोग प्रसार का कारण बनती हैं।</p> <p style="text-align: justify;">रोग विकास</p> <p style="text-align: justify;">यह रोग क्लीस्टोथिसिया द्वारा पौधों के अवशेषों के साथ खेत में रहकर चिरस्थायी रहता है। यह प्राथमिक निवेशद्रव्य का काम करता है। बेमौसम परपोषी पौधे भी कवक जाल के रूप में प्राथमिक निवेशद्रव्य उपलब्ध करवाते हैं। प्राथमिक संक्रमण एस्कस बीजाणुओं द्वारा होता है। ये अनुकूल वातावरण में मृदा के पास पत्तियों पर सर्वप्रथम संक्रमण करते हैं। द्वितीय संक्रमण प्राथमिक संक्रमण से बने कोनिडिया द्वारा होता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">अनुकूल जलवायु</h3> <p style="text-align: justify;">रोग का प्रकोप शुष्क मौसम में अत्यधिक होता है। उच्च तापमान (15<sup>0</sup> -28<sup>0</sup> सेल्सियस), निम्न आर्द्रता (60 प्रतिशत से कम आर्द्रता), बहुत कम/नगण्य वर्षा एवं थोड़ी पवन वेग आदि रोग फैलाव के लिए महत्वपूर्ण कारक हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">रोग प्रबंधन</h3> <p style="text-align: justify;">फसल की बुआई समय से करें। रोगग्रसित फसल अवशेषों को मृदा में गाड़कर नष्ट कर दें। बुआई के लिए गंधकयुक्त उर्वरकों का ही प्रयोग करना चाहिए। घुलनशील गंधक (0.2 प्रतिशत) या डाईनोकेप (0.1 प्रतिशत) की वांछित मात्रा का घोल बनाकर रोग के प्रारंभ होते ही छिड़काव करें। आवश्यकता पड़ने पर 15 दिनों के बाद पुनः छिड़काव करें।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), पूसा रोड, नई दिल्ली।</p>