भारत में बदलती कृषि क्रियाएं जैसे अधिक सिंचाई, अनियंत्रित रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग, संरक्षण क्रियाएं (जल संग्रहण) और राई-सरसों फसल के क्षेत्रफल में बढ़ोतरी से विभिन्न प्रकार के रोगों जैसे-तना गलन, सफेद रोली, मृदुरोमिल आसिता, काला धब्बा या झुलसा रोग, चूर्णिल आसिता आदि का प्रकोप बढ़ने से उत्पादन में कमी आई है। इस प्रजाति की फसलें रबी मौसम में उगाई जाने वाली मुख्य तिलहनी फसलें हैं। देश में यह लगभग 60.5 लाख हैक्टर क्षेत्र में उगाई जाती हैं व इनसे 73.82 लाख टन उत्पादन होता है। राई-सरसों के तहत लगभग 30.7 प्रतिशत क्षेत्र वर्षा आधारित खेती के अधीन है। भारतीय सरसों (ब्रासिका जूनसिया) की खेती मुख्य रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और गुजरात राज्यों में की जाती है, जो 81.5 प्रतिशत क्षेत्र और 87.5 प्रतिशत उत्पादन में योगदान करते हैं। लगभग पिछले एक दशक में इन फसलों के उत्पादन व उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, पर विश्व की तुलना में अभी भी हमारी उत्पादकता काफी पिछड़ी हुई है। इन फसलों पर लगने वाले रोग काफी मात्रा में पैदावार को घटाते हैं। पिछले कुछ वर्षों से तना गलन रोग उग्र रूप धारण करके सरसों उत्पादन की मुख्य समस्या बन गया है। इनको समय पर समुचित प्रबंधन से नियंत्रित कर उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। तिलहनी फसलों में राई-सरसों का मुख्य स्थान है। ये फसलें विभिन्न रोगों के प्रकोप से प्रभावित रहती हैं। इनके मुख्य रोगों में सफेद रोली, मृदुरोमिल आसिता, झुलसा, तना गलन एवं चूर्णिल आसिता आदि हैं। सफेद रोली या श्वेत किट्ट रोग सफेद रोली रोग एल्बूगो कैन्डीडा नामक फफूंद से होता है। यह रोग उत्तरी भारत में राई-सरसों के सभी क्षेत्रों में फैलता है। इसका प्रकोप अधिक होने पर स्टेगेहैड बनने से उपज में 37 प्रतिशत तक हानि पहुंचती है। लक्षण इस रोग में नवंबर में जब तापमान 180 से 200 सेल्सियस के आसपास रहता है तो बुआई के 35 दिनों बाद पौधे की पत्तियों की निचली सतह पर 1-2 मि.मी. व्यास के स्वच्छ व सफेद रंग के छोटे-छोटे फफोले बनते हैं। रोग की उग्रता बढ़ने के साथ-साथ ये आपस में मिलकर अनियमित आकार ग्रहण करते हैं। इन फफोलों के ठीक ऊपर पत्तियों की ऊपरी सतह पर गहरे भूरे कत्थई रंग के धब्बे दिखने लगते हैं। पूर्ण विकसित हो जाने पर फफोले फट जाते हैं और सफेद भूरे चूर्ण के रूप में बीजाणु धानियां फैल जाती हैं। तना व फलियों पर भी फफोले बन जाते हैं और इसके प्रभाव से उत्पन्न आंशिक व पूर्ण नपुसंकता के कारण बीज नहीं बन पाते। इस फूली हुई संरचना को बारहसिंघा (स्टेगहैड) कहते हैं। तने में सूजन काफी लंबाई तक हो जाने के कारण तना झुक जाता है। रोग विकास ये रोग निषिक्तांडों द्वारा लंबे समय तक बने रहते हैं जो पौध अवशेषों अथवा बीज के साथ भूमि में पड़े रहते हैं। कुछ बहुवर्षीय खरपतवार भी प्राथमिक निवेश द्रव्य उपलब्ध करवाने में सहायक होते हैं। फसल पर निषिक्तांड अंकुरित होकर चल बीजाणुओं को जन्म देते हं ैआरै बीजपत्राीय पत्तियों/निचली पत्तियों पर प्राथमिक संक्रमण करती हैं ताकि बीजाणुधारियों का निर्माण हो। इनके द्वारा चल बीजाणुओं (द्वितीयक निवेश द्रव्य) का जन्म होता है, जो कि नये संक्रमण करते हुए रोग को तीव्र गति से पैफलाते हैं। अनुकूल जलवायु नम (75 प्रतिशत से अधिक आर्द्रता), ठंडी (50-120 सेल्सियस तापमान) व बदलीयुक्त (2-6 घंटे धूप) जलवायु इस रोग के पैफलाव के लिए अति उपयुक्त है। रोग प्रबंधन समय से बुआई (10-25 अक्टूबर के बीच) करें। स्वस्थ व प्रमाणित बीज का उपयोग करें। रोगग्रसित फसल अवशेषों को जलाकर या गाड़कर नष्ट कर दें। खरपतवार से फसल को सापफ रखें। मेटालेक्जिल (एप्रॉन 35 एसडी) से बीजोपचार 6 ग्राम दवा प्रति कि.ग्राम. बीज की दर से उपचारित करने से बीज द्वारा रोग पनपने से रोका जा सकता है। फसल पर रोग के लक्षण दिखते ही मैंकोजेब/रिडोमिल एमजेड 72 डब्ल्यू.पी. फफूंदीनाशक के 0.25 प्रतिशत घोल का छिड़काव बुआई के 40 व 70 दिनों उपरांत करने से सफेद रोली से बचा जा सकता है। अधिकतम तीन छिड़काव ही आर्थिक दृष्टिकोण से उचित होती हैं। फसल की सिंचाई आवश्यकता से अधिक न करें। तना गलन रोग भारत में सर्वप्रथम पूसा, बिहार में श्वेत तना विगलन रोग देखा गया था। अब उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, असोम, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश में भी यह रोग उग्र रूप धारण करता देखा जा रहा है। सरसों की फसल पर यह रोग विश्व के अन्य देशों जैसे-कनाडा, चीन, जापान, डेनमार्क, स्वीडन, जर्मनी, फ्रांस, फिनलैंड व ब्राजील में भी देखा जा सकता है। इस रोग से उपज में 40 प्रतिशत तक नुकसान होता है। लक्षण रोग के लक्षण तना, पत्तियों व फलियों पर देखा जा सकते हैं। लक्षण के आधार पर इसे श्वेत तना विगलन, श्वेत अंगमारी, तना कैंकर इत्यादि नाम दिए गए हैं। रोग के आरंभिक लक्षण पौधे के तने पर ठीक जमीन की सतह से थोड़ा ऊपर जलासिक्त धब्बों के रूप में प्रकट होते हैं। बाद में ये धब्बे श्वेत हो जाते हैं। वे रूई जैसी कवक से ढके होते हैं। रोग की अधिकता में रूई जैसी कवक की वृद्धि तनों की लंबाई के साथ-साथ फैल जाती है व अंततः पूरे तने को ग्रसित कर लेती है। ऐसी अवस्था में पौधे मुरझाकर सूख जाते हैं। खेत में रोगग्रस्त पौधे अलग से ही दिखाई पड़ते हैं, क्योंकि वे समय से पहले ही सूख जाते हैं। रोगग्रस्त तने भुरभुरे से होते हैं व प्रायः बिखरकर टूट जाते हैं। पत्तियों, टहनियों व फलियों पर भी सफेद अंगमारी के लक्षण दिखाई पड़ते हैं। यदि रोगग्रस्त मृत तने को फोड़कर देखा जाए तो उसमें बहुत सारे काले रंग के गोल या अनियमित आकार वाले स्केलेरोशिया दिखाई देते हैं, जिनका व्यास 2 से 12 मि.मी. तक हो सकता है। जब फसल को काटा जाता है तो रोगग्रस्त ऊतकों से बहुत से स्केलेरोशिया जमीन पर गिर जाते हैं या बीज के साथ मिल जाते हैं। यह रोग स्केलेरोटिनिया स्कलेरोटियोरम नाम कवक द्वारा पनपता है। यह रोगजनक मृदोढ़ है व इसके स्केलेरोशिया प्राथमिक निवेशद्रव्य का कार्य करते हैं। स्केलेरोशिया दो विधियों द्वारा अंकुरित हो सकते हैं। पहली विधि में उनसे सीधा सफेद कवकजाल निकलता है और पौधों को संक्रमित करता है। साधारणतः सरसों की फसल पर इस प्रकार का संक्रमण कम पाया जाता है। अधिकतर स्केलेरोशिया अंकुरित होकर एक प्याले के समान एपोथिशियम बनाते हैं। एक स्केलेरोशिया से कई एपोथिशियम बनते हैं। प्रत्येक एपोथिशियम से बहुत सारे एस्कोबीजाणु वायु द्वारा विस्तारित होते हैं। इन एस्कोबीजाणुओं के पौधों के तने या अन्य भागों से गिरने से रोग संक्रमण होता है। एस्कोबीजाणुओं के अंकुरण के बाद कवक जाल पौधों की कोशिका भित्ति का एंजाइम प्रक्रिया द्वारा नष्ट करके पौधों के ऊतकों को कवक के पहुंचने से पहले ही मृत कर देता है। जमीन की ऊपरी सतह से अधिक नमी व वातावरण में ठंडक इस रोग को पनपने व फैलाने में सहायक होते हैं। जिन खेतों में लगातार सरसों की फसल उगाई जाती है वहां पर स्केलेरोशिया का उत्पादन व अंकुरण अधिक होता है। सरसों के पफूलों से गिरी पंखुड़ियां एस्कोबीजाणुओं को अंकुरित करने में मदद करती हैं। अधिक नाइट्रोजन उर्वरक मिलने पर भी रोग के लिए पौधों की ग्रहणशीलता में बढ़ोतरी होती है। रोकथाम के उपाय स्वस्थ व स्केलेरोशियारहित बीज का प्रयोग करें। बिजाई से पूर्व बीज को अच्छी तरह जांच लें कि उसमें रोगजनक के स्केलेरोशिया न हों। यदि हों तो उन्हें अलग करके नष्ट कर दें व साफ बीज का ही प्रयोग करें। सभी प्रभावित पौधों के अवशेषों को एकत्रिात करके नष्ट कर दें, ताकि स्केलेरोशिया नहीं बचें। लंबा फसलचक्र अपनाने से भी रोग को रोकने में मदद मिल सकती है। खेत में गर्मियों में गहरी जुताई करने से स्केलेरोशिया जमीन में दब जाते हैं व अधिक प्रकाश न मिलने के कारण उनका अंकुरण नहीं हो पाता है। खेत में धान की खेती करने से भी स्केलेरोशिया नष्ट हो सकते हैं। ज्यादा घनी फसल न रखें। पौधों की कतारों में पर्याप्त दूरी रखने से भी रोग में कमी लाई जा सकती है। फसल पर रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखने पर बेनोमिल (0.2 प्रतिशत) या बाविस्टिन (0.05 प्रतिशत) कवकनाशक दवाई के घोल का छिड़काव पौधों पर करें। ध्यान रखें कि छिड़काव रोग पनपने से पहले ही किया जाए व पौधों के सभी भागों पर हो जाए। ज्यादातर रोग फसल पर फूल आने के बाद ही पनपते हैं। इसलिए जब फसल में 25-30 प्रतिशत फूल आ जायें, उस समय एक छिड़काव कर दें। रोग प्रबंधन अन्य रोगजनकों की तुलना में यह रोगजनक एक सर्वभक्षी है। यह 500 से भी अधिक पौधों की प्रजातियों पर संक्रमण की क्षमता रखता है। ऐसे रोगजनक के लिए रोगरोधी किस्में तैयार करना अत्यंत कठिन कार्य है। हाल ही में चीन ने सरसों की ऐसी किस्में विकसित की हैं, जिनके पफूलों में पंखुड़ियां नहीं हैं व ऐसी किस्मों में 80 प्रतिशत तक कम रोग देखा गया है। उपरोक्त वर्णित उपाय करने से रोग की रोकथाम की जा सकती है। स्त्राेत : प्रभु दयाल मीना, लक्ष्मण प्रसाद, पंकज शर्मा' और प्रमोद कुमार रायभाकृअनुप-सरसों अनुसंधान निदेशालय, सोवर,भरतपुर-321303 (राजस्थान) भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली