परिचय चने की खेती सिंचित एवं असिंचित दोनों परिस्थितियों में की जाती है। पिछले दो दशकों में सिंचाई की अतिरिक्त सुविधाओं के कारण धान और गेहूं की फसलों ने चने की कृषि योग्य क्षेत्रों को प्रतिस्थापित किया है। धान और गेहूं फसल चक्र के कारण इन खेतों की उर्वरकता में कमी आई है, साथ ही साथ जहाँ पर धान की खेती के बाद चने की फसल बोने पर चने की बुवाई देर से होती है, जिससे कि तना छेदक कीटों तथा शुष्क मूल विगलन इत्यादि का प्रकोप अधिक होते है, इसलिए समेकित नाशीजीव प्रबंधन के द्वारा पौधा संरक्षण के उपायों को अपना कर मिट्टी की उत्पदकता बढ़ाने या बनाये रखने के साथ – साथ कीटों एवं रोगों के संक्रमण से बचाया जा स्कटर है ताकि फसलों का कम से कम आर्थिक क्षति हों। अत: समेकित नाशीजीव प्रबंधन एक सर्वश्रेष्ठ विधि है, जिसमें पारंपारिक, यांत्रिक, जैविक एवं रासायनिक नाशीजीवानाशकों का प्रयोग इस प्रकार से किया जाता है की नाशीजीवों का प्रकोप फसलों में कम से कम हो, और पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचे और आर्थिक दृष्टि से स्वीकार्य हों। इस प्रणाली में सभी युक्तियों को सामूहिक रूप से सही क्रमवार के हिसाब से फसलों को नाशीजीवों से बचाने के लिए होता है और ये ध्यान दिया जाता है कि रासायनिक दवाओं का कम से कम एवं अत्यंत आवश्यकता पड़ने पर ही उपयोग किया जाए। परंपरागत विधि बुवाई के पहले पिछली फसल के अवशेषों को खेतों से इकट्ठा करके नष्ट कर देना चाहिए। गर्मी के मौसम में खेतों की गहरी जुताई करने से बीज एवं मिट्टीजनित रोगों के संक्रामण से बीज एवं कीटों के लार्वा, प्यूपा एवं निम्फ नष्ट हो जाते हैं। यदि सम्भव हो तो उन खेतों में जहाँ रोगों का संक्रमण अधिक पाया जाता है वहां 3 वर्षों तक चने की खेती नहीं करनी चाहिए। गोबर की खाद (कम्पोस्ट) 5 टन/हे. की दर से प्रयोग करने पर उकठा, स्तंभ मूल एवं शुष्क मूल विगलन इत्यादि में कमी आती है। बुवाई अक्टूबर से पहले या नवंबर का प्रथम सप्ताह तक करने से बहुत सारे रोग एवं फली छेदक कीटों के संक्रामण से बचा जा सकता है। जिन क्षेत्रों में स्तंभन रोग एवं अल्टरनेरिया ब्लाईट का प्रकोप ज्यादा हो वहाँ पर बुवाई देर से करनी चाहिए। फली छेदक के नियंत्रण में खरपतवार जैसे कि वीसिया सटाइवा को ट्रैप फसल एवं सूचक के रूप में प्रयोग किया जाता है तथा मेलिलोटस अल्वा को फली नुकसान अल्वा को फली नुकसान को कम करने में किया जाता है। फसल घनत्व कम रहने से फली छेदक तथा ग्रे मोल्ड का प्रकोप कम होता है। अलसी और धनिया के साथ अंत: फसलीकरण से फली भेदक के प्रकोप में कमी आती है साथ – साथ भारी मात्रा में सूंडियों का परजीवीकारन होता है। इसके अलावा चना + धनिया (2:2), चना + गेंदा (6:2), चना + तीसी (6:2), चना + सरसों (6:2) एवं चना + अलसी/ कुसूम (4:2) की अंत: फसल करनी चाहिए। प्रतिरोधी/सहिष्णुता प्रजतियां का प्रयोग करें। प्रतिरोधी/सहिष्णुता प्रजतियां उकठा एवं फली भेदक शुष्क मूल विगलन उकठा एवं काला जड़ गलन स्तंभन रोग आईसीसीवी 7 (केवल फली छेदक), जेजी 130, जेजी 332, जेजी 77, जेजी 74, जेएससी 6 एव आर एस जी 8889 पूसा 372, आईसीसीवी – 10, आईसीसीवी – 37, सद्भवाना एवं जे. जी – 130 जेजी 11 । जे जी 16, (एस.ए. के. आई 9516), एच सी 9 एवं उदय। यांत्रिक प्रबंधन फली भेदक कीट की निगरानी हेतु 5 फेरोमोन ट्रैप/हेक्टेयर का प्रयोग करना चाहिए। फेरोमोन ट्रैप में 4 – 5 नर पतंगे/ट्रैप/रात्रि आ जाने पर सामान्यत: 14 दिन पश्चात् कीट की संख्या आर्थिक हानि स्तर तक पहुँच जाती है। हेलिकोवेरपा कीट के संदर्भ में संख्या आर्थिक हानि स्तर 1 सुंडी प्रति 1.5 मी. फसल लाइन है या 5 प्रतिशत ग्रसित फली या 8-10 मौथ/ट्रैप/लगातार 3 रात्रि तक। इस कीट का नियंत्रण कीट के आर्थिक हानि स्तर पर पहुँचतें ही तुरंत कर देना चाहिए अन्यथा कीट की संख्या आर्थिक हानि स्तर से अधिक हो जाने पर कीट नियंत्रण की लागत अत्यधिक हो सकती है। अत: जैसे ही आर्थिक हानि स्तर आता है उसी समय कीट नियंत्रण की विधियाँ अपनाना लाभकारी होता है। नियंत्रण फसल की निगरानी करने से उकठा एवं सड़न से प्रभावित पौधों का पता प्रारंभिक अवस्था में ही लग जाता है, जिससे समय पर सही रासायनिक दवाओं के प्रयोग हेतु चुनाव में आसानी रहती है तथा मित्रकीट की संख्या का स्तर भी सही बना रहता है। पक्षियों को आकर्षित करने के लिए T आकार के 3 – 5 फीट लंबे 20 खूँटी/हेक्टेयर लगाने चाहिए, जिससे कीटभक्षी पक्षियों को शिकार करने में सहायता पहुंचे। कुछ कीट भक्षी पक्षी बूबूलक्स इबीस, एक्रीडोथेरस ट्रिस्टिस, पेशन डोमेष्टिक्स, सिटेकुला क्रमेरी इत्यादि हैं। जैविक कीट प्रबंधन चने के रोगों के रोकथाम के लिए सूक्ष्मजीवीय जीवनाशक जैसे ट्राईकोडर्मा एवं सूडोमोनास का उपयोग बीजोपचार के लिए करना चाहिए। खेतों में एनपीवी, बीटी का प्रयोग करें। एचएएनपीवी/250 एल/ ई/हे. (1x109 पीओबी) अकेले या टिनोपाल (0.1 प्रतिशत पराबैंगनी किरणों के प्रभाव को रोकने के लिए) उपयोग करना चाहिए। अन्य समय के अपेक्षा शाम के समय में छिड़काव करने से अधिक प्रभावी होता है। बीटी फार्मूलेशन का 1.0 – 1.5 किलो ग्राम/ हे. के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए। इस फसल में प्राकृतिक शत्रु का अध्ययन मुख्यत: हेलिकोवर्पा पर केन्द्रित है। अंडा पारासिटाइड ट्राईकोग्रमा इस फसल पर अम्ल की उपस्थिति के कारण नहीं मिलते हैं। कैम्पोलेटिस क्लोरिडी, यूसेलाटोनिया ब्रायेनी और कारसेलिया इलोटा के साथ जैव नियंत्रण में सीमित सफलता प्राप्त हुई है। खेतों में एनवीपी एवं बीटी हेलिकोवर्पा के नियंत्रण में कारगार पाए गये हैं। रासायनिक नियंत्रण वर्तमान में रासायनिक दवाओं का उपयोग नाशीजीव कीट एवं रोगों से ग्रसित पौधों को बचाने के लिए किया जा रहा है। हमारे देश में कुछ प्रदेशों में रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग हो रहा है जिसकी आवश्यकता नहीं है। इससे न केवल नाशीजीव कीट एवं रोगों के प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है बल्कि इसका बुरा असर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में हमारे देश से होने वाले चने के निर्यात पर पड़ता है आवश्यकता पड़ने पर ही रासायनिक दवाओं का प्रयोग करना चाहिए और हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि एक ही रासायनिक दवाओं का प्रयोग करना चाहिए और हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि एक ही रासायनिक दवा के बार- बार उपयोग के बजाय दवाओं के बदल – बदल कर विभिन्न तरह गुणों वाली दवाओं का प्रयोग करना चाहिए। यदि आर्थिक दृष्टि से संभव हो तो नये एवं प्रभावकारी कीटनाशकों का उपयोग करना चाहिए। कीटनाशकों के कई समूह प्रमुख कीटों के खिलाफ कीटनाशकों का संयोजन प्रभावी पाए गये हैं। प्रतिरोधी उत्पन्नता, पुनरुत्थान और द्वितीयक प्रकोपों के कारण कीटनाशकों का संयोजन प्रभावी पाया गया है, विशेषकर नीम पर आधारित कीटनाशकों, जैविक कीटनाशकों जैसे बीटी और एनपीवी का सम्मिलित प्रभाव होता है। हालाँकि उनके विवेकहीन उपयोगों से उनके प्रभाव को कम कर दिया है। इमामेकटीन 0.02 प्रतिशत के हिसाब पहली बार फूल खिलने के प्रारंभिक अवस्था में और दूसरी बार 15 दिनों के पश्चात् छिड़काव से फली छेदक का प्रकोप रूक जाता है। इसके अलावा साइप्रमेथ्रिन या क्लोरपाइरिफ़ास या फेनबेलरेट का भी प्रयोग कर सकते हैं। पादप रोग रोग कारक फफूंद नाशकों फफूंद नाशकों की मात्रा उकठारोग कार्बेन्डाजिम 50 WP या कार्बोक्सिन 75 WP + थिरम बीज शोधन @ 1.0 + 2 ग्रा./कि. ग्रा. ट्राईकोडर्मा विरिडी 4-10 ग्रा./कि. ग्रा. कार्बेन्डाजिम .0 ग्रा./कि. ग्रा. शुष्क – मूलविगलन कार्बेन्डाजिम 50 WP या कार्बोक्सिन 75 WP + थिरम बीज शोधन @ 1.0-2.0 ग्रा./कि. ग्रा. ट्राईकोडर्मा विरिडी 4-10 ग्रा./कि. ग्रा. कार्बेन्डाजिम 1.0 ग्रा./कि. ग्रा. स्तंभ मूल संधि विगलन कार्बोक्सिन बीज शोधन @ 2 – 3 ग्रा./ कि. ग्रा. ट्राईकोडर्मा विरिडी 4-10 ग्रा./ कि.ग्रा. एस्कोकाईट ब्लाईट थिरम 75 WP या ट्राईडेमार्फ़ 80 EC अथवा कैप्टान 50 WP बीज शोधन @ 3.0 या 3 मिली/कि. ग्रा. कैप्टान 50 WP या मैन्कोजेब 45 WP छिड़काव @ 2.0 ग्रा./ली. करें धूसर फफूंद कार्बेन्डाजिम थिरम 80 WP बीज शोधन @ 1.0 2 ग्रा./किग्रा कार्बेन्डाजिम 50 WP @ 3 ग्रा./किग्रा एर्पोडियान 50 WP बीज शोधन @ 4.0 ग्रा./किग्रा मैन्कोजेब 80 WP छिड़काव @ 3.0 ग्रा./ली. करें स्तंभन रोग मालथियान 50 EC छिड़काव @ 2.0 मिली/ली. करें ट्राईजोफौस 40 EC @ 2.0 मिली/ली. करें अल्टरनेरिया ब्लाईट थिरम 75 WP या कार्बेन्डाजिम 50 WP बीज शोधन @ 3.0 ग्रा./कि.ग्रा. मैन्कोजेब 45 WP या थिरम 75 WP छिड़काव @ 2.0 ग्रा./ली.करें रस्ट मैन्कोजेब 45 WP या बेलिटोन 50 WP छिड़काव @ 2.0 ग्रा./ली. करें कार्बेन्डाजिम 50 WP छिड़काव @ 1.0 ग्रा./ली. करें स्तंभ गलन कार्बेन्डाजिम 50 WP + थिरम 75 WP बीज शोधन @ 1.0 + 1.0 ग्रा./कि. ग्रा. काला जड़ गलन थिरम 75 WP + कार्बेन्डाजिम 50 WP बीज शोधन @ 1.0 + 1.0 ग्रा./कि. ग्रा. ट्राईकोडर्मा विरिडी 4 – 10 ग्रा/किग्रा फाईलोडी डाईमिथोट 30 EC या मोनोक्रो. टोफास छिड़काव @ 2.5 मिली/ली. @ 1.5 मिली/ली. हानिकारक कीट कीट का नाम संस्तुत कीटनाशक संस्तुत मात्र चना फली भेदक एचएएनपीवी + 1 प्रतिशत टिनोपोल 250 एल. ई. नीम के बीज का सत 50 ग्रा./ली. नीम का तेल 20 मिली/ली. इमामेक्टीन बेनजोएट 0.2 ग्रा./ली. फेनिट्रोथियान 1.0 मिली/ली. मालाथियान 1.0 मिली/ली. रेनेक्सिपीर 0.15 मिली/ली. डाईफ्लूरोबेन्जूरान 2.0 ग्रा./ली. दीमक एवं क्लोरापायरीफास मिट्टीशोधन 2.0 मिली/ली. क्लोरापायरीफास बीज शोधन 2.0 मिली/कि. ग्रा. सेमीलूपर डाईक्लोरावास 1.0 मिली/ली. एफिड एन एस के ई 50 ग्रा./ली. नीम का तेल 20 0.2 मिली/ली. डाइमिथोएट 1.7 मिली/ली. इमिडाक्लोप्रिड 0.2 मिली/ली. गांठ – जड़ सूत्रकृमी कार्बोसल्फान बीज शोधन @ 4.0 मिली/कि. ग्रा. प्रोफिनोफास @ 2.0 मिली/कि. ग्रा. पेसिलोमाइसिस लीलासिनस 0.2 ग्राम/ली. दाल भृंग मालाथियान 3 ली/ 100 वर्गमीटर बीज भण्डारण सरसों का तेल या नीम का तेल + सक्रिय चारकोल भण्डारण बीज के साथ मिलावें @ 10 मिली/कि. ग्रा. + 10 ग्रा./कि. ग्रा. राज्य प्रजातियाँ आन्ध्र प्रदेश भारती (आइसीसीवी 10), जेजी 11, फुलेजी 95311 (के) एमएन के 1. असम जेजी 73, उदय (केपिजी 59), के डब्ल्यू आर 108, पूसा 372 बिहार पूसा 372 पूसा 256, पूसा काबुली 1003, उदय, के डब्लू आर 108, गुजरात ग्राम 4, आरयू 52 छत्तीसगढ़ जेजी 315, जेजी 16, विजय, वैभव, जवाहर ग्राम काबुली 1, बीजी 372, पूसा 391, बीजी 072 आईसीसीवी 10 गुजरात पूसा 372, पूसा 391, विश्वास, जेजी 16, विकास, विजय, विशाल धारवाड़ प्रगति, गुजरात ग्राम 1, गुजरात ग्राम 2, जवाहर ग्राम काबुली 1, आईपीसी के 2009-29, आईपीसी के 2004 – 29. हरियाणा डीसीपी 92-3, हरियाणा चना 1, हरियाणा काबुली चना 1, पूसा 372, पूसा 362, पीबीजी 1, उदय, करनाल चना 1, सम्राट, वरदान, जीपीएफ 2, चमत्कार, आरएसजी 888, हरियाणा काबुली चना 2, बीजीएम 547, फूलेजी 9425-9 हिमाचल प्रदेश पीबीजी 1, डीसीपी 92 – 3, सम्राट (GNG 469), बीजीएम 549, फूलेजी 9425 – 9 जम्मू और कश्मीर डीसीपी 92-3, सम्राट (GNG 469), पीबीजी 1, पूसा चमत्कार (बीजी 1053), बीजीएम 547, फूलेजी 9425 – 9 झारखण्ड पूसा 372, पूसा 256, पूसा काबुली 1003, उदय, के डब्लू आर 108, गुजरात ग्राम 4 कर्नाटक जेजी 11, अन्नेगिरी 1, चाफा, भारती (आईसीसीवी 10) फूलेजी 9531, स्वेता (आईसीसीवी 2), एमएन के 1. महाराष्ट्र पूसा 372, विजय, जेजी 16, विशाल, पूसा 391, विश्वास (फूले जी 5), धारवाड़ प्रगति, विकास, फुले जी 12, जवाहर ग्राम काबुली 1 विहार, केएके 2 बीजीडी 128 (के), आईपीसी के 2002 – 29, आई.पीसीके 2004-29, फूलेजी 0517, पेकेवी काबुली 4 मध्य प्रदेश जे जी 74, जे जी 315, जे जी 322 पूसा 391, विश्वास (फूलेजी 5), विजय, विशाल, जे जी 16, जेजी 130 जेजीजी 1, जवाहर ग्राम काबुली 1, बीजीडी 128 (के), आईपीसके 2002 – 29, आईपीसी के 2004 – 29 (के) पेके वीं काबुली 4. मणिपुर जे जी 74, पूसा 372, बीजी 253 मेघालय जे जी 74, पूसा 372, बीजी 256 ओड़िसा पूसा 391, जे जी 11, फूलेजी 95311 आईसीसीवी 10 पंजाब पूसा 256, पीबीजी 5, हरियाणा चना 1, डीसीपी 92 – 3 पूसा 392, पूसा 329, पूसा 362, सम्राट 469, वरदान, जीपीएफ 2, पूसा चमत्कार (बीजी 1053), आरएसजी 888, फूलेजी 9425 – 9, जीएन जी 15481, आलोक (केजीड 1168), पी. बी. जी. – 3 आरएस, जी 963, राजास, आर. एस. जी. 931. राजस्थान हरियाणा चना 1, डीसीपी 92 – 3 पूसा 372, पूसा 329, पूसा 329 उदय, सम्राट 469, जीपीएफ 2, पूसा चमत्कार (बीजी 1053), आरएसजी 888, आलोक (केजीड 1168), विश्वास, बीजीडी 28, जीएन जी 1581, आरएसजी 963, राजास, आर.एस.जी 931, जी. एन. जी. 143, पी. बी. जी. 1, जी. एन. जी. 663. तमिलनाडु आईसीसीवी 10, पूसा 372, बीजी 256 उत्तर प्रदेश डीसीपी 92-3, केडब्लूआर 108, पूसा 256 पूसा 372 वरदान, जेजी 315, उदय, अलोक (केजीडी 1168), विश्वास, पूसा 391, सम्राट (GNG 469) जीपीएफ 2, विजय, पूसा काबुली 1003, गुजरात ग्रान 4, उत्तराखंड पन्त जी 186, डीसीपी 92-3, सम्राट, केडब्लूआर 108, पूसा चमत्कार (बीजी 1053), बीजीएम 547, फूलेजी 9425 – 9 पश्चिम बंगाल जेजी 74, गुजरात ग्राम – 4, केडब्लूआर 108, पूसा 256, महामाया 1, महामाया 2 स्त्रोत: राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन अनुसंधान केंद्र, नई दिल्ली