संस्तुत प्रजातियाँ राज्य प्रजातियाँ आन्ध्र प्रदेश लक्ष्मी,एलआरजी 41, एलआरजी 38, डब्ल्यू आर जी 53, डब्ल्यू आर जी 65 बिहार बहार, पूसा 9, एनडीए 1 छतीसगढ़ राजीव लोचन, एम. ए. 3 गुजरात जी. टी. 100, जी. टी. 101, बानस, बी.डी.एन. 2, बी. एस. एम. आर. 853 हरियाणा पारस, पूसा 992, यू. पी. ए. एस. 120 कर्नाटक बी. आर. जी. 1, बी. आर. जी. 2 टी. एस. 3 आर, डब्ल्यू. आर. पी. 1, आशा (आईसीपीएल 87119) & मारूति (आईसीपी 8863) मध्य प्रदेश जे. के. एम. 189, टी.जी.टी. 501, जे. के. एम्. 7, और टीटी 401 नागालैंड यू. पी. ए. एस. 120, पूसा 992, ए. एल. 201 पंजाब ए. एल. 201, पी. ए. यू. 881, पूसा 992, यू. पी. ए. एस. 120 राजस्थान यू. पी. ए. एस. 120, पूसा 992, वी. एल. ए. 1 और पी. ए. 291 उत्तरप्रदेश बहार, एन. डी. ए. 1, एन. डी. ए. 2, अमर, एम. ए. 6, एम. ए. एल. 13, और यू. पी. ए. एस. 120 उत्तराखंड वी. एल. ए. 1, पी. ए. 291, तमिलनाडु सी. ओ. 6, सी. ओ. आर. जी. 9701, वैबन 3 त्रिपुरा पूसा 992 झारखंड बहार, आशा (आई.सी.पी.एल 87119), एम. ए. 3 महाराष्ट्र बी. डी. एन 771, बी.एस.एम.आर. 736, बी.एस.एम.आर. 853, बी. डी.एन. 708, बी. डी.एन. 708, बी. डी.एन. 2, विपुला, ए.के.टी. 8811, पी. के. वी. तारा (टी.ए.टी. 9629) समेकित नाशी जीव प्रबंधन बुवाई से पहले गर्मियों में भूमि की गहरी जुताई करनी चाहिए जिससे भूमि के अंदर उपस्थित कीटों के कोषकों व रोग जनित बीजाणुओं को नष्ट किया जा सके। बीज को ट्राईकोडर्मा व राइजोबियम से उपचारित कर बुवाई करनी चाहिए। बुवाई के समय प्रदेशीय संस्तुत बहुरोग व कीट प्रतिरोधी प्रजातियों के बीजों के साथ समय से तथा पंक्ति वध (उत्तर – दक्षिण)बुवाई करनी चाहिए। उपयुक्त फसल चक्र के साथ ही खेती करनी चाहिए। ज्वार, मक्का या अरहर आदि के साथ अंत: फसल पद्धति से खेती करनी चाहिए। मित्र कीटों के संरक्षण के लिए सूरजमुखी, माजरा, ज्वार, सोयाबीन तथा कपास के साथ अंत: फसल लेनी चाहिए। फली छेदक के समुचित निगरानी के लिए किनारों पर गेंदा की फसल उगानी चाहिए। संतुलित व संस्तुत मात्रा में खाद व पानी उपयोग करना चाहिए। वनस्पति और पुष्पीकरण के समय हानिकारक कीटों व पादप रोगों की सही जानकारी के लिए तथा उन्हें समय से नियंत्रण करने के लिए खेतों का समय – समय पर निरिक्षण करना चाहिए। खेतों में फेरोमोन ट्रैप 5/ हे. की दर लगाने चाहिए। 4 – 5 वयस्क पतंगे प्रतिदिन आने या एक सुंडी प्रति पौधे मिलने पर संस्तुत कीटनाशकों का छिड़काव करना चाहिए। रात के समय खेतों में प्रकाश प्रपन्ज या पैट्रोमेक्स लैम्प लगाकर वयस्क कीटों को आसानी से नष्ट किया जा सकता है तथा एफिड के लिए पीले चिपचिपा ट्रैप का उपयोग कर कीट को नियंत्रित किया जा सकता है। फसल में उपस्थित रोग ग्रस्त पौधों, कीटों के अण्डों तथा सूंडियों से लदे पौधों को नष्ट कर देना चाहिए। ब्लीस्टर भृंग तथा इसके जैसे अन्य कीटों तथा बग्स को सुबह के समय हाथ से पकड़कर नष्ट किया जा सकता है। कीट भक्षी पक्षियों जैसे घरेलू चिड़िया (गौरैया), जंगली कबूतर, ड्रोंगो आदि के बैठने के लिए T आकार की खूँटियाँ (अंडे) 20 – 25 प्रति हे. की दर से खेत में लगानी चाहिए। सभी प्रकार के कीटों की संख्या आर्थिक क्षति स्थिति तक पहुँचने पर संस्तुत कीटनाशकों का प्रयोग करना चाहिए। सर्वप्रथम जैविक – कीटनाशकों जैसे – बीटी, एन पीवी ट्राईकोडर्मा/स्यूडोमोनास, नीम आधारित कीटनाशक एवं कम दूषकरी कीटनाशकों का उपयोग करना चाहिए तथा भंडारण के समय कीटनाशकों का उपयोग कम से कम व आपात स्थिति में ही करना चाहिए। फली के पकने व सूखने के तुरंत बाद फसल को काट लेना चाहिए। भंडारण करते समय भंडारण के ऊपर व तली में नीम की पत्तियाँ तथा बीज के साथ कुछ अक्रिया पदार्थ जैसे – नीम बीज चूर्ण, चना, रेट आदि मिला देना चाहिए। 10. परभक्षी कीट जैसे व ड्रैगन फ्लाई एवं कीटभक्षी पक्षी जैसे – घरेलू चिड़ियाँ (गौरिया), जंगली कबूतर, ड्रोंगो व अन्य कीटभक्षी पक्षियों का संरक्षण करना चाहिए। स्त्रोत: राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन अनुसंधान केंद्र, नई दिल्ली