परिचय चना दलहन की तीसरी प्रमुख फसल है जिसका विश्व के कुल उत्पादन का लगभग 65 प्रतिशत भारत में होता है। भारत में यह 30 प्रतिशत से अधिक क्षेत्रफल में उगाया जाता है। दलहन के अंतर्गत कुल उत्पादन में चने का योगदान 38 प्रतिशत है (विश्व खाद्य संगठन, 2001)। चने में नाशीजीव मुख्यता कीटों द्वारा भारी छति पहुंचाती है क्योंकि कीटों के पंख होते हैं जिससे वह के जगह से दूसरी नई जगह पलायन करते हैं तथा प्रतिक्रिया करने के लिए बहुत कम समय देते हैं। सामान्य मौसम में चने में फली बेधक से 10 – 95 प्रतिशत तक नुकसान आका गया है। वास्तविक समय कीटों की स्थिति के बारे में जानकारी की कमी उचित उत्पादन तथा सुरक्षा तकनीकियों का अभाव चने के उत्पादन में मुख्य बाधा हैं। इन कारणों से समेकित नाशीजीव प्रबंधन (आई पी एम) जू अवधारण पर अधिक बल दिया जाता हैं। चने में समेकित नाशीजीवों प्रबंधन (आईपीएम) उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्यों के साथ राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत ए 3 पी लागू किया गया। अनंतपुर में चना खरीफ 2015 के दौरान 75015 हेक्टेयर में उगाया गया था। वह ताडिपत्रि, पेद्दापप्पूर, पुतलूरू, येल्लानुरू, पेडावडूगूर, याडिकि, उरावकोंडा, वज्राकारूर, विडापनकल, गूंतकल , वेलुगूप्पा, कनेकल, और बोमनाहल की काली मिट्टी में उगाया जाता है। अनंतपुर जिले में बंगाल चना की सामान्य उत्पादकता प्रति हेक्टेयर 12 क्विंटल है। कीट और रोग कम उत्पादकता के लिए मुख्य कारक हैं। कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), अनंतपुर के किसानों की भागीदारी और केन्द्रों की पीला बड़े पैमाने पर समेकित नाशीजीव कीट प्रबंधन (आईपीएम) के कार्यान्वयन के द्वारा काबुली चने के उत्पादन में हाल के वर्षों में वृद्धि हुई थी। डैक परियोजना द्वारा ताडिपत्रि निर्वाचन क्षेत्र के कोंडापल्ली और येल्लानुर मंडल की पथापल्ली, दो गांवों में आईपीएम का क्रियान्वयन किया गया। कीट निगरानी के आंकड़ों के अनुसार प्रबंधन के तरीकों के समय और रासायनिक कीटनाशकों के न्यूनतम इस्तेमाल पर जोर देने के साथ पंजीकृत किसानों को महत्वपूर्ण पौध संरक्षण उत्पादक सामग्री सिफारिश के अनुसार प्रयोग हेतु प्रदान की गई। आधारभूत जानकारी चने के खेती सिंचित एवं असिंचित दोनों परिस्थितियों में की जाती है। पिछले कुछ दशकों में सिंचाई की अतिरिक्त सुविधाओं के कारण धान और गेहूं की फसलों ने चने के कृषि योग्य क्षेत्रों को प्रतिस्थापित किया है। धान और गेहूं फसल चक्र के कारण इन खेतों की उर्वरकता में कमी आई है। साथ ही साथ धन की फसल के बाद चने की फसल बोने पर, चने की बुवाई देर से होती है, जिससे की फली छेदक कीटों तथा शुष्क मूल विगलन इत्यादि का प्रकोप अधिक होता है इसलिए समेकित नाशीजीव प्रबंधन के द्वारा पौध संरक्षण के उपायों को अपनाकर मिट्टी की उत्पादकता बढ़ाने या बनाये रखने के साथ –साथ कीटों एवं रोगों के संक्रमण से बचाया जा सकता है। ताकि फसलों की कम से कम आर्थिक क्षति हो। अत: समेकित नाशीजीव प्रबंधन एक सर्वश्रेष्ठ विधि है, जिसमें पारंपरिक जैविक, यांत्रिक एवं रासयनिक नाशीजीवानाशकों का प्रयोग इस प्रकार से किया जाता है कि नाशीजीवों का प्रकोप फसल में कम से कम हो और पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचे और आर्थिक दृष्टि से स्वीकार्य हो। इस प्रणाली में सभी युक्तियों का उपयोग सामूहिक रूप से सही हिसाब से फसलों को नशीजीवों से बचाने के लिए होता है और ये ध्यान दिया जाता है कि रासायनिक दवाओं का कम से कम एवं अत्यंत आवश्यकता पड़ने पर ही उपयोग किया जाये। तकनीक का प्रभाव विवरण आईपीएम क्षेत्र गैर – आईपीएम क्षेत्र बीजोपचार राइजोबियम, पीएसबी और ट्राईकोडर्मा द्वारा उपचारित अनुपचारित कीटों/ रोगों का प्रकोप स्पोडोपटेरा एक्सिगूवा (प्रतिशत प्रकोप) 4 13 ह्लिकोवेर्पा आर्मिजेरा (प्रतिशत प्रकोप) 2 11 विल्ट (प्रतिशत प्रकोप) 3.2 5.4 जड़ गलन (प्रतिशत प्रकोप) 2.6 6.7 सूखी जड़ सड़न (प्रतिशत प्रकोप) 3.8 7.5 लाभप्रद कीट प्रति वर्ग मीटर 3 – 6 ड्रैगन मक्खी का अवलोकन किया गया 3 – 6 ड्रैगन मक्खी का अवलोकन किया गया कीटनाशकों का प्रयोग नीम तेल 5 मिली/ली. की दर से, क्लोरानट्रिनिप्रोल 18.5 एस सी @ 0 .3 मिली/ली. की दर से प्रोफेनोफोस 2 मिली/ली. एसिफेट 1.5 ग्रा/ली. फ्लूबेनाडामाइड 0.4 मिली/ली. क्लोरानट्रिनिप्रोल 0.4 मिली/ली. की दर से उच्चतम औसत उपज (कु/हे.) 20 13 निम्नतम औसत उपज (कु/हे.) 15 11 औसत उपज (कु./हे.) 17.5 12 कुल लाभ (रू.) 87500 60000 पौध संरक्षण की लागत (रू.) 2000 4200 अन्य लागत (रू.) 15000 15500 कुल लागत (रू.) 17000 19700 शुद्ध लाभ (रू.) 72500 40300 लाभ लागत अनुपात (रू.) 5.14 3.04 आईपीएम रणनीतियां स्वच्छ अभियान राइजोबियम एवं और ट्राईकोडर्मा के साथ बीजोपचार। बुवाई के समय 100 ग्रा. ज्वार का मिश्रण। धनिया, सरसों, ज्वार की मिश्रित फसल २ सीमा पक्तियों के रूप में प्रयोग। पक्षी के ठिकाने @ 25/ हेक्टेयर का प्रयोग। फेरोमोन जाल @ 5/हेक्टेयर का प्रयोग। इल्ली के प्रारंभिक चरण में 5 प्रतिशत एनएसकेई अथवा नीम तेल का प्रयोग करें। हेलिकोवर्पा सुंडी के प्रांरभिक चरणों में एचए एनपीवी 250 एल ई का प्रयोग। आर्थिक स्तर पार करने पर हेलिकोवर्पा आरमीजेरा के लिए क्यूनालफास 25 ईसी का छिड़काव। इस परियोजना द्वारा समेकित नाशीजीव प्रबंधन के बारे में किसानों के बीच जागरूकता पैदा की गई। चने की पैदावार में वृद्धि से किसानों को लाभ हुआ है। तथा जिसके परिणामस्वरुप पौध संरक्षण की लागत में व्यवहार्य पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित प्रबंधन संभव हु आ। चनें में स्थायी और प्रभावी कीट प्रबंधन के लिए अग्रणी आईपीएम प्रथाओं को किसानों द्वारा लागू करने के लिए प्रयास किए गये थे। लेखन: ओ. पी. शर्मा, वी. लक्ष्मी रेड्डी, वी. राजप्पा एवं एम. रेड्डी स्त्रोत: राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन अनुसंधान केंद्र