गन्ना फसल विभिन्न प्रकार की उर्वराशक्ति और भौतिक गुणों वाली मृदा एवं मौसम में उगायी जाती है। इसलिए इसे मौसम में आने वाले परिवर्तनों का सामना करना पड़ता है। इन उतार-चढ़ाव के कारणों पर ध्यान देने पर स्पष्ट होता है कि प्राकृतिक विपदा जैसे-मौसम, जलवायु एवं रोग और कीटों के प्रकोप आदि की भूमिका महत्वपूर्ण है। गन्ने की फसल 9 से 22 महीनों तक खेत में रहती है। गन्ने में शीघ्र ग्राह्य शर्करा की प्रचुर मात्रा पायी जाती है, जिसके कारण अनेक जीवाणु गन्ने की ओर आकर्षित होते हैं। बुआई से काटने तक गन्ने में अनेक रोगों का प्रकोप पाया जाता है। गन्ने में लगभग 120 प्रकार के रोग लगते हैं, परंतु इनमें से लगभग एक दर्जन रोग गन्ने को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे करोड़ों रुपये की राजस्व की क्षति होती है। ये रोग फफूंद, जीवाणु, विषाणु, सूत्राकृमि एवं माइकोप्लाज्मा आदि कारकों द्वारा पैदा होते हैं। गन्ने के रोगों को मुखयतया दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम वे रोग जिनका संचारण बीजू गन्ने द्वारा होता है तथा दूसरे वे जो बीज द्वारा संचारित नहीं होते। देश के एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में बीज के वृहद मात्रा में स्थानांतरण के कारण गन्ने के अनेक रोग अनभिज्ञता में देश के नये-नये क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं। आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रोग जो कि प्रदेश में हानि पहुंचाते हैं, उनके बारे में विस्तृत जानकारी लेख में दी गई है। कंडुआ (स्मट) रोगकारक इस रोग का कारक अस्टीलेगो सिटेमीनिया-फफूंद है, जो बीज के रूप में मृदा में जीवित रह सकता है। यह रोग मुख्य रूप से रोगी फसल की जड़ों और बीज द्वारा फैलता है। गन्ने की फसल पर यह रोग निम्नलिखित कारणों से फैलता हैः रोगी फसल का बीज लेना। बीज के लिए काम में आने वाले गन्ने की आखों पर फफूंदी का होना। रोगी फसल की पेड़ी लेना। गन्ने का कंडुआ रोग दुनिया में केवल ऑस्ट्रेलिया और फिजी को छोड़कर लगभग सभी गन्ना उत्पादक देशों में पाया जाता है। भारत के लगभग सभी गन्ना उगाने वाले प्रदेशों में इस रोग का प्रकोप पाया जाता है। इस रोग की सूचना भारत में सर्वप्रथम वर्ष 1906 में बिहार से मिली थी। मध्य प्रदेश में यह रोग गन्ने में पश्चिमी क्षेत्रों से अधिक आता है और फसल को प्रभावित करता है। रोग फैलने का समय इस रोग का प्रकोप पूरे वर्ष दिखाई पड़ता है, परंतु इसकी प्रचण्डता वर्ष में दो बार अधिक देखने को मिलती है। रोग का प्रथम चक्र मई-जून के महीनों में पाया जाता हैं, जब वातावरण शुष्क तथा तापमान अधिक होता है। अक्टूबर-नवंबर में इसका द्वितीय चक्र आता है। क्षति करने का तरीका एवं लक्षण गन्ने में कंडुआ का संक्रमण दो प्रकार से होता हैः सर्वांगी (प्राथमिक) सक्रंमित पौधा या पिछली रोग ग्रसित फसल से फैलता है। चाबुकनुमा भाग से रोगाणु उड़कर स्वस्थ गन्ने पर पड़कर पौधे को संक्रमित कर देते हैं। खड़े गन्ने की आंखों पर इस फफूंद के बीजाणु के पड़ते ही संक्रमण की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। बीजाणु अंकुरित होकर आंख के पास से गन्ने में अंदर के ऊतकों में प्रवेश करते हैं। आंख के सुषुप्तावस्था में रहने के कारण रोगकारी फफूंद बीजाणु भी सुषुप्त हो जाता है। आंखों के अंकुरित होते ही यह नये पौधे में बढ़ना शुरू हो जाता है। मृदा में पड़े हुए बीजाणुओं से संक्रमण की आशंका कम होती है। रोगी पौधे के सिर से काले रंग का चाबुक के आकार का भाग निकलता है। इस चाबुक जैसे भाग को शुरू में एक चमकीली सफेद झिल्ली ढंके रहती है। इसमें काले रंग का चूर्ण भरा रहता है और यह काला चूर्ण ही कंडुआ रागे पैदा करने वाली फफूंद के बीजाणु होते हैं। इसके बाद यह झिल्ली फट जाती है और चूर्ण बिखर कर हवा द्वारा अन्य पौधों पर पहुंच जाता है और उनको ग्रसित करता है। रोगी गन्ने पर नीचे अनेक शाखायें (घास जैसी) निकल सकती हैं, पत्तियां छोटी कम चौड़ी और दूर-दूर रहती हैं। इन्हीं शाखाओं के सिरे से काले चाबुक जैसी झाड़ियां निकलती हैं। कभी-कभी मुख्य तने पर चाबुक नहीं बनता है, लेकिन उसमें से निकले हुए कल्लों पर चाबुक बनते हैं। विषाणुओं से फैलने वाले रोग गन्ने की फसल में विषाणुओं द्वारा निम्न प्रमुख रोग फैलते हैं: मोजेक रोग कारक यह रोग विषाणुओं द्वारा (एससीएमबी) फैलता है। माहूं कीट इन विषाणुओं के संवाहक होते हैं। यह विषाणु 500 से 580 सेल्सियस तक तापमान सह लेता है एवं इस तापमान पर 1-2 दिनों तक क्रियाशील रहता है। इन गुणों के आधार पर उसके अनेक विभेदों में भिन्नता नहीं की जा सकती है। इस विषाणु का संचारण निम्न तरीके से होता हैः माहूं द्वारा रोगी बीज द्वारा संपर्क द्वारा गन्ने की विषाणु संवेदनशील प्रजातियों द्वारा जैसे-को 740 जलवायु में परिवर्तनों से अधिक फैलता है। रोग फैलने का समय यह रोग अप्रैल से नवंबर तक रहता है, परंतु सितंबर-अक्टूबर में ज्यादा क्षति पहुंचाता है। क्षति करने का तरीका एवं लक्षण मोजेक की आरंभिक पहचान गन्ने की पत्तियों पर मिलने वाले लक्षणों से होती है। पत्तियों पर मिलने वाले लक्षणों की व्यापकता गन्ने की प्रजाति, तापमान, विषाणु के प्रभेद तथा परिस्थितियों पर निर्भर करती है। पत्ती के हरे रंग के बीच में विभिन्न प्रकार के हरे-पीले धब्बे पाये जाते हैं। ये धब्बे आकार एवं आकृति में एक जैसे नहीं होते हैं। इस रोग के प्रकोप से गन्ने की उपज घट जाती है तथा इसकी गुणवत्ता भी खराब हो जाती है। इसका बुरा असर शक्कर एवं गुड़ की मात्रा तथा किस्म पर पड़ता है। एक वर्ष से दूसरे वर्ष फिर यह रोग बीज द्वारा फैलता है। घासी या प्ररोह रोग (ग्रासी शूट) इस रोग को भारत में सर्वप्रथम वर्ष 1919 में कोयम्बटूर में देखा गया। इसके बाद वर्ष 1949 में बेलापुर (महाराष्ट्र) में देखा गया था। रोगकारक यह रोग माइकोप्लाज्मा के कारण फैलता है। रोग एक फसल से दूसरी फसल एवं कीट द्वारा फैलता है। यह रोग ज्वार पर भी आता है, जिससें कीट द्वारा गन्ने पर आ जाता है। ·गन्ना काटने वाले औजारों द्वारा भी यह फैलता है। क्षति करने का तरीका एवं लक्षण इस रोग का मुख्य लक्षण गन्नों के तनों के घास के समान होना है। रोगी पोरियों से निकला हुआ गन्ना बौना रह जाता है, पत्तियां पतली एवं छोटी रह जाती हैं। प्रारंभ में पत्तियां हल्की पीली से सफेद भी हो जाती हैं, जो क्लोरोसिस रोग का आभास देती हैं। तने पतले पड़ जाते हैं। तने में गठानों की दूरी कम हो जाती हैं। खड़े गन्ने की आंखों का अंकुरण आदि इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं। प्रभावित पौधों में अपरिपक्व पार्श्व कलिकाओं का अपक्षोकृत अधिक विकास हो जाता है। इसका गंभीर प्रकोप होने पर पूरा पौधा सूख जाता है। स्वस्थ पौधे में इस रोग का आक्रमण होने पर नई पत्तियों और कल्लों पर लक्षण दिखाई पड़ते हैं। ऐसे रोगी पौधों में नीचे से घास के समान अनेक कल्ले निकलते हैं। पेड़ी का बौनापन पेड़ी का बौनापन रोग की खोज सर्वप्रथम क्वीन्सलैंड में वर्ष 1944-45 में हुई, जब शुष्क मौसम के कारण गन्ने की एक नव विकसित प्रजाति क्यू-28 की पेड़ी फसल असाधारण रूप से बौनी रह गई थी। रोग फैलने का कारण वैज्ञानिकों ने इस रोग से ग्रसित गन्ने के रस मे क्लेवीवेक्टर जाइली नामक जीवाणु, जो कि कोरिनीफार्म स्वरुप में होता है पाया था। इस रोग के फैलने के मुख्य कारण निम्न हैं रोगी बीज का प्रयोग खरपतवारों की अधिकता रोग ग्रसित फसल की कटाई करने वाले चाकू का स्वस्थ फसल पर प्रयोग पेड़ी की अधिक फसल लेना गन्ने के खेतों में चूहों का होना तथा मक्का, ज्वार तथा दूब गन्ने के पास होना आदि क्षति करने का तरीका एवं लक्षण इस रोग से प्रभावित गन्ने की वृद्धि में कमी आ जाती है तथा पौधे कमजोर दिखाई देते हैं। संक्रमित पौधों की ऐसी दशा होती है जैसे उन पौधों की समुचित देखभाल न हुई हो। उनको समुचित मात्रा में पानी न मिला हो या उन्हें पोषक तत्वों के अभाव में उगाया गया हो। पेड़ी के बौनेपन के लक्षण सामान्यतः उस समय अधिक स्पष्ट होते हैं, जब पौधे को अति विकास के समय अभावों का सामना करना पड़ रहा हो। यदि पानी एवं पोषक तत्वों में कमी नहीं हुई हो, तो पैदावार में कमी नहीं होती है। पौध संरक्षण अपनाते समय आवश्यक सावधानियां कीटनाशक एवं फफूंदनाशक दवाओं का उपयोग करने से पहले उपकरण के बारे में ज्ञान, रखरखाव तथा जरूरी सावधानियों का ज्ञान होना आवश्यक है। प्रमुख सावधानियां निम्न हैं: दवा का उपयागे करने के पूर्व विशेषज्ञ या जानकार लोगों से सलाह अवश्य लें। कीटनाशक एवं फफूंदनाशक दवाओं के डब्बे या पैकेट पर लाल-नीला तथा पीला त्रिकोण चिन्ह अवश्य देख लें, जिससे उसके जहरीले होने की तीव्रता का पता चलता है। कीटनाशक या फफूंदनाशक दवाओं को बच्चों की पहुंच से दूर रखें। कीटनाशक दवाओं की शीशी, डब्बे एवं बोरों पर जहर लिखा होना चाहिए तथा उनके ऊपर जो निर्देश कम्पनी द्वारा लिखे रहते हैं। उनका पालन जरूरी है। फफूंदनाशकों एवं कीटनाशकों को खाने की वस्तुओं से दूर रखें। दवाओं के खाली डिब्बे, शीशी एवं बोरों को तुरंत नष्ट कर दें। दवा का घोल आवश्यकतानुसार बनाएं। दवा शरीर में न जाने पाये तथा दवा का शरीर से सीधा संपर्क न होने पाये। दवा का उपयोग करते समय धूम्रपान या अन्य वस्तुओं का सेवन न करें। फफूंदनाशकों एवं कीटनाशकों का उपयोग करते समय आंखों पर चश्मा और मुंह पर कपड़ा बांध लेना चाहिए। धूम्रयुक्त दवा का उपयोग करते समय नाक पर भी कपड़ा बांधना जरूरी है। हवा के बहाव के विपरीत छिड़काव या भुरकाव न करें। दवा का उपयोग किए गए क्षेत्रों में पशुओं को नहीं चरने दें। कीटनाशक या फफूंदनाशक दवाओं का उपयोग करने के बाद साबनु से अच्छी तरह हाथ धोएं सभंव हो तो स्नान करें। साग-सब्जियों पर अधिक देर तक असर करने वाले फफूंदनाशकों एवं कीटनाशकों का उपयोग नहीं करें। लौकी, कुम्हड़ा एवं सब्जियों पर डी.डी.टी., बी.एच.सी. आदि दवाओं का प्रयोग नहीं करें। बीज, अनाज एवं फलों की कटाई के 3-4 सप्ताह पहले से ही कीटनाशकों एव फफूंदनाशकों का प्रयोग नहीं करें। कीट एवं रोगों की प्रभावी रोकथाम के लिए दवा का उचित मात्रा में उपयोग करें। दवा मिश्रित फल एवं अनाज इत्यादि को पशुओं को न खिलायें। सब्जियों को पानी से धोकर प्रयोग करें। जहरीली गैसों तथा दवाओं के उपयोग में सावधानी रखें। गोदाम में चूहों के छेदों को बंद करना चाहिए तथा सोने के स्थान पर इन दवाओं का प्रयोग न करें। असावधानी होने पर उपाय दवा शरीर के अंदर चली गई होः इस स्थिति में 2 चम्मच नमक आधे गिलास पानी में गलाकर कुल्ले करवायें। उल्टी करवाने की कोशिश करें। मुंह में उंगली डालकर उल्टी करायें। उल्टी शुरू होने पर गर्म पानी का उपयोग करें। उपयोग किए गए शीशी या डब्बे को सुरक्षित रखें और उस शीशी या डिब्बे के बारे में डॉक्टर को बताएं। इस पर लिखी एंटीडोट दवाई, जो जहर को निष्प्रभावी बनायेगी, उसका प्रयोग करें। दवा के कपड़ों में लगने परः इस समय पूरे कपड़े निकालकर, साबुन से पूरे शरीर को जिस जगह पर दवा लगी हो उसे कई बार धोयें। चक्कर आना या श्वास बढ़ना : मरीज को कम्बल ओढ़कर खुली हवा में रखिये। कमरे के सभी खिड़की-दरवाजे खोल दीजिये, उसे पैदल नहीं चलाना चाहिए। आखों में कीटनाशक चला जाना:आंख को साफ पानी से 10 मिनट तक लगातार धोना चाहिए एवं आंख खुली रखें। इसके अतिरिक्त डॉक्टर की सलाह पर एट्रोपिन सल्फेट इंजेक्शन लगवायें। स्त्राेत : एस.एन. सिंह और आशीष कुमार, प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष, पाैधा राेग विभाग ,सहायक प्राध्यापक, पाैधा राेग विभाग, जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर(मध्यप्रदेश),खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर)।