कॉलर रॉट कॉलर रॉट या तना सड़न रोग को स्तंभमूल संधि विगलन रोग भी कहा जाता है। इस रोग का संक्रमण ऊंचे तथा कम ऊंचाइयों वाले सभी स्थानों में सेब की पौधशाला तथा बगीचों में पाया गया है लक्षण कॉलर रॉट मुख्यतः 'फाइटोफ्रथोरा कैक्टोरम' नामक फफूंद के कारण होता है हालांकि दूसरी अन्य पीथीयेसियस फफूंद भी इस तरह के लक्षण पैदा करने में सक्षम हैं। तना सड़न रोग के लक्षण मुख्यतः पेड़ की स्तंभमूल संधि (तने-जड़ों का सन्धि स्थान) में पाये जाते हैं। रोग का संक्रमण जमीन से लगे तने के भाग से शुरू होकर जमीन के नीचे जड़ों में फैलता है। जमीन के पास तने की छाल में लाल व भूरे रंग के समान धब्बे बन जाते हैं। इसके उपरांत पेड़ की छाल भी नरम पड़ जाती है तथा स्पंज की तरह पिलपिली हो जाती है। बाद में तना गलकर कैंकर का रूप धारण कर लेता है। अगर रोग तने के चारों तरपफ फैल जाए तो पौधा मर जाता है। रोगग्रसित पौधों की पत्तियां पीली व उनकी शिराएं तथा किनारे लाल रंग के हो जाते हैं। बरसात के मौसम में रोगी पौधे की ऊपरी शाखाओं में हल्के बैंगनी लाल रंग की झलक वाली पत्तियां दिखाई पड़ती हैं, जिससे ग्रसित पौधे के पत्ते बगीचों में अलग ही दिखाई देने लगते हैं। फफूंद साधारणतया ऊस्पोर उत्पन्न करते हैं, जोकि प्राथमिक इनोक्यूलम का कार्य करते हैं। सक्रंमण दरारयुक्त घाव एवं घाव रहित दोनों तरह की छाल पर हो सकता है। कवकजाल के अंतरकोशी होने के कारण छाल के ऊतक शीघ्र ही मर जाते हैं। दोबारा नया संक्रमण पूरे मौसम में स्पोरैंजियां तथा जूस्पोर से होता है। इस रोग का संक्रमण छोटे वृक्षों पर भी होता है, परंतु दस वर्ष से अधिक आयु वाले पौधे अधिक रोग ग्राही होते हैं। प्रबंधन तना सड़न रोग की रोकथाम के लिए बगीचों में पानी की निकासी का उचित प्रबंधन करना चाहिए। स्तंभमूल संधि के चारों ओर की मृदा हटाकर धूप में खुला छोड़ दें। रोग प्रतिरोधी किस्मों के मूलवृंतों जैसे एम.-2, एम.-4, एम.-9, एम.एम-26, एम.एम.-114, एम.एम.-115, सैलेकाओं-69 का प्रयोग करना चाहिए। रोगग्रसित पेड़ की छाल को चाकू से हटा लें और इसके स्थान पर बोर्डो पेस्ट (नीला थोथा 800 ग्राम+चूना एक कि.ग्रा. प्रति 10 लीटर पानी) लगायें। प्रभावित व आसपास के पौधे की मैन्कोजैब 400 ग्राम या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 500 ग्राम या रीडोमील एम जैड 300 ग्राम का प्रति 100 लीटर पानी में घोल बनाकर मार्च, अगस्त व सितंबर में सिंचाई करें। रोगजनक ज्यादातर कलिका कलम के साथ प्रवेश करता है इसलिए कलम का जोड़ भूमि की सतह से कम से कम 20-25 सें.मी. की ऊंचाई पर होना चाहिए। सरसों की खली, बनाह (वाईटेक्स) के पत्ते या दरेक के बीज का प्रयोग इस रोग की रोकथाम में उचित पाये गए हैं। प्रभावित पौधों को 'एप्रोच ग्राफ्टिंग करके भी बचाया जा सकता है। प्रतिरोधक सूक्ष्मजीवों जैसे बैसिल्स सबटीलिस तथा जेटोबैक्टर एरोजीन्स भी रोग को रोकने में सक्षम पाए गए हैं। स्त्राेत : सतीश कुमार शर्मा, जोगिन्दर सिंह, जे.एन. शर्मा और अंजू शर्मा, डा. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी, सोलन (हिमाचल प्रदेश), खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर)।