<h3 style="text-align: justify;">हेयरी रूट(बालों वालीजड़ें)/क्राऊन गॉल (मूल संधि पर गांठ की आकृति) </h3> <p style="text-align: justify;">हेयरी रूट तथा क्राऊन गॉल सेब पौधशाला में होने वाले विनाशकारी रोगों में शामिल हैं। ये रोग मृदाजनित जीवाणु (बैक्टीरिया) द्वारा उत्पन्न होते हैं जिसके फलस्वरूप सेब पौधशाला को भारी क्षति पहुंचती है। </p> <h4 style="text-align: justify;">लक्षण </h4> <p style="text-align: justify;">हेयरी रूट, क्राऊन गाल की तुलना में बहुत सामान्य अवस्था में पाई जाती है। हेयरी रूट से प्रभावित पौधों की जड़ों में एक जगह से बहुत सारी छोटी-छोटी पतली तारों या पतले धागों जैसी जड़ें पैदा हो जाती हैं जो पौधे की जड़ों को झाडू जैसी शक्ल में परिवर्तित कर देती हैं। इसके साथ पौधों की वृद्धि में भी कमी देखने को मिलती है। शुरूआत में हेयरी रूट के लक्षण क्राऊन गॉल के जैसे ही लगते हैं। सर्वप्रथम छोटे आकार के हल्के फीके रंग के ट्‌यूमर बनते हैं, जिनसे बाद में धागे के समान बहुत सारी जड़ें पैदा होती हैं, जो बिलकुल झाड़ू की तरह लगती है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccdownload.jpg" width="190" height="250" /></p> <p style="text-align: justify;">दूसरी ओर क्राऊन गॉल, पौधशाला तथा बड़े वृक्षों, दोनों जगहों में उपस्थित रहता है। क्रॉऊन गॉल रोग के विशेष लक्षण मृदा के पास स्थित जड़ों के ऊपर पाये जाते हैं। पौधे की सतह के पास कलम के स्थान पर या उसके नजदीक मूल संधि पर गांठें (ट्‌यूमर जैसी) बन जाती हैं, जिन्हें क्राऊन गॉल कहते हैं। गॉल का आकार गोलाकार, लंबा तथा अनियमित होता है किन्तु बाद में सख्त हो जाता है। क्राऊन गॉल रोग के संक्रमण से एक सामान्य कोशिका अनियंत्रित कोशिका विभाजन से ट्‌यूमर की तरह की कोशिका में बदल जाती है। संक्रमित पौधा प्रायः 1 या 2 वर्षों के उपरांत मर जाता है। बगीचों में संक्रमित वृक्षों के फल की पैदावार में निरन्तर कमी आती है। अंततः रोगग्रस्त पेड़ मर जाते हैं। </p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <h4>प्रबंधन </h4> <ul> <li>इन रोगों के निदान के लिए प्रतिवर्ष पौधशाला की जगह बदलते रहना चाहिए।</li> <li>निराई-गुड़ाई के समय पौधों की जड़ों या मूल संधि में किसी भी प्रकार का घाव न बनने दें। </li> <li>रोगग्रस्त पौधों को जलाकर नष्टकर देना चाहिए। </li> <li>पौधे लगाने से पहले डेढ़ घंटे तक स्वस्थ कलम को एक प्रतिशत कॉपर सल्फेट मिश्रण (10 ग्राम प्रति लीटर पानी) में डुबोकर रखें। </li> <li>प्रतिरोधक एग्रोबैक्टीरियम रेडियोबैक्टर यू.एच.एफ.बी.ए.-6 या यू.एच.एफ.बीए.-218 से बीज, नर्सरी, पौधों की जड़ों व मृदा का उपचार करें। </li> </ul> </td> </tr> </tbody> </table> <h3 style="text-align: justify;">स्कैब </h3> <p style="text-align: justify;">स्कैब रोग सेब में होने वाले सबसे अधिक विनाशकारी रोगों में से एक है। सर्वप्रथम भारत के कश्मीर में यह रोग अम्बरी किस्म पर वर्ष 1930 में पाया गया था। उसके उपरांत वर्ष 1977 में यह हिमाचल प्रदेश के मनाली तथा जन्जैहली स्थानों पर दर्ज किया गया। वर्ष 1973 में कश्मीर में इस रोग ने महामारी के रूप में आकर नुकसान किया। उसके बाद वर्ष 1983 तथा वर्ष 1996 में हिमाचल प्रदेश में भी इस महामारी ने सेब उत्पादन में करोड़ों का नुकसान पहुंचाया। वर्तमान में इसकी उपस्थिति फिर से हिमाचल प्रदेश के रोहडू तथा जन्जैहली क्षेत्रों में दर्ज की गई है, हालांकि वर्ष 1996 के बाद यह रोग प्रदेश में लगभग खत्म हो चुका था। </p> <h4 style="text-align: justify;">लक्षण </h4> <p style="text-align: justify;">इस रोग के विशेष लक्षण पत्तियों, डंठल, फूल, पंखुड़ियों तथा डंडी पर दिखते हैं तथा कई बार नई टहनी व कली पर पाये जाते हैं। इस रोग का आक्रमण सर्वप्रथम सेब की कोमल पत्तियों पर होता है। इन पत्तियों की निचली सतह पर हल्के जैतूनी व हरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। कुछ समय पश्चात पत्तों की ऊपरी सतह पर भी ऐसे धब्बे बन जाते हैं, जो अक्सर मखमली भूरे व काले तथा गोलाकार होते हैं। कई बार सेब का स्कैब रोग फलों पर गहरे काले धब्बों के रूप में उभरता है। संक्रमित पत्तियां समय से पूर्व पीली पड़कर गिर जाती हैं। इस रोग के धब्बे फलों पर भी देखे जा सकते हैं। बसंत ऋतु के आरंभ में ये धब्बे फलों के निचले सिरे यानी 'पुष्कोश अंत' पर पाये जाते हैं, जो प्रायः गोलाकार भूरे व काले रंग के होते हैं। अधिक संक्रमण होने पर फल विकृत हो जाते हैं। मौसम की अनुकूलता से यही धब्बे कॉर्कनुमा सख्त होकर फलों की सतह पर उभरते हैं तथा उनमें दरारें भी पड़ जाती हैं। इन्हीं दरारों से दूसरी प्रजातियों की फफूंद अंदर जाकर सड़न पैदा कर सकती हैं। बाद में फल जल्दी ही सिकुड़कर सड़ जाते हैं। </p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <h4>प्रबंधन </h4> <ul> <li>यह रोग बगीचों में गत वर्ष गिरी हुई स्कैबग्रस्त पत्तियों में पल रही फफूंद से उत्पन्न होता है। इन पत्तियों को इकट्‌ठा करके नष्ट करना चाहिए। पतझड़ शुरू होते ही वृक्षों पर 10 कि.ग्रा. यूरिया का 200 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। </li> <li>सुरक्षात्मक फफूंदनाशकाें जैसे मैन्काेजैब (0.3 प्रतिशत), कैप्टॉन (0.3 प्रतिशत), प्रोपीनैब (0.3 प्रतिशत), जीनैव (0.3 प्रतिशत), डोडीन (0.15 प्रतिशत), डायाथियानोन (0.5 प्रतिशत) तथा जीरम (0.3 प्रतिशत) इत्यादि के छिड़काव काफी असरदार होते हैं।</li> <li>उपचारक तथा उन्मूलक फफूंदनाशकों जैसे-कार्बेन्डाजिम (0.05 प्रतिशत), बैनोमिल (0.05 प्रतिशत), थायोफेनेट मिथायल (0.05 प्रतिशत), हैक्साकोनाजोल (0.05 प्रतिशत), डायफेनकोनाजोल (0.025 प्रतिशत), फैनेरीमोल (0.04 प्रतिशत), डायक्लोबुटैनिल (0.04 प्रतिशत) तथा विटरटानोल इत्यादि का प्रयोग करें।</li> <li>स्कैब प्रतिरोधी किस्में जैसे कोप-12, रैड फ्री प्राइमा, लिबर्टी व प्रफीडम के प्रयोग भी कापफी प्रभावी सिद्ध हुए हैं। </li> </ul> </td> </tr> </tbody> </table> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : सतीश कुमार शर्मा, जोगिन्दर सिंह, जे.एन. शर्मा और अंजू शर्मा, डा. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी, सोलन (हिमाचल प्रदेश), खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर)।</p>