तिल-महत्वपूर्ण तिलहनी फसल तिल एक महत्वपूर्ण तिलहनी फसल है, जो 3,000 से अधिक वर्षों से एशिया और अफ्रीका के उष्णकटिबंधीय और उप-क्षेत्रों में बोई जा रही है। इसकी दुनिया भर में 6.5 मिलियन हैक्टर क्षेत्रफल में खेती की जाती है और लगभग 3 मिलियन टन से अधिक बीज का उत्पादन होता है। सूडान, म्यांमार और चीन के साथ भारत, तिल का प्रमुख उत्पादनकर्ता देश है। विश्व उत्पादन का 68 प्रतिशत तिल उत्पादन भारत में होता है। तिल का बीज प्रोटीन (20 प्रतिशत) का एक समृद्ध स्रोत है। इसके साथ ही इसमें खाद्य तेल (50 प्रतिशत) और संतृप्त फैटी एसिड की उच्च मात्रा (47 प्रतिशत ओलिक एसिड और 39 प्रतिशत लिनोलेनिक एसिड) होती है। विभिन्न रोगों में फीलोडी तिल फसल का एक विध्वंसक रोग है। यह रोग फायटोप्लाज्मा द्वारा जनित होता है। यह तिल की खेती को प्रभावित करने वाला प्रमुख रोग है एवं 100 वर्ष पुराना है। लगभग सभी तिल की किस्में इस रोग के लिए अतिसंवेदनशील होती हैं। यह गंभीर आर्थिक नुकसान के लिए जिम्मेदार है। लक्षण इस रोग के प्रमुख लक्षण फीलोडी आरै पौधों का झाड़ूनुमा विकास है, जो उपज को पूरी तरह प्रभावित करता है। इस रोग की पहचान फ्लोएम छलनी के ऊतक कोशिकाओं में फायटोप्लाज्मा की उपस्थिति व पीसीआर आधारित विधि द्वारा की जाती है। फीलोडी एक पुष्प की पत्तीदार संरचनाओं का उत्पादन करने वाला रोग है। फूल का रंग हरे पत्ते के रंग में बदल जाता ह इसके साथ ही झाड़ूनुमा रचना (विचेज ब्रूम), तने का सपाट होना, और बीज कैप्सूल का टूटना व फट जाना इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं। ग्रसित पौधों में बीज कम बनते हैं और उत्पादन काफी कम हो जाता है। फीलोडी रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियां छोटी हो जाती हैं तथा पुष्प हरे पत्तों जैसी सरंचनाओं में तब्दील हो जाते हैं। इस रोग के परिणामस्वरूप 34 प्रतिशत तक हानि और अत्यधिक प्रभाव की अवस्था में 100 प्रतिशत नुकसान होने की आशंका हो जाती है। प्रसार यह रोग प्रकृति में अलग-अलग पर्णफुदका प्रजातियों द्वारा फैलता है। इसके अलावा कई खरपतवार प्रजातियां तिल फीलोडी से जुड़े फायटोप्लाज्मा का मेजबान स्रोत है। प्रबंधन अभी तक इस रोग के प्रति कोई प्रभावी रोग के नियंत्रण के उपाय की विधि विकसित नहीं की जा सकी है। तिल का कोई प्रतिरोधी जीनोटाइप भी उपलब्ध नहीं हो सका है। तिल की फीलोडी प्रतिरोधी प्रजातियों का उपयोग करके इस रोग को प्रबंधित किया जा सकता है। कीटनाशकों का उपयोग करके लीफ हॉपर वेक्टर के खिलाफ नियंत्रण के उपरान्त भी इस रोग के आपतन को कम करने में मदद मिलती है। कुछ खास तरीके, विशेष रूप से फसल चक्र प्रबंधन, बुआई का समय, कीटों की उपस्थिति का संज्ञान फीलोडी की गंभीरता को प्रभावित करता है। रासायनिक कीटनाशकों द्वारा वेक्टर को नियंत्रित कर प्रकोप कम कर सकते हैं लेकिन रोग का पूर्ण उन्मूलन संभव नहीं है। सेविथिया (कार्बेरिल 40 प्रतिशत, राथियोनमिथाइल मोनोक्राटोफॉस 0.025 प्रतिशत के 1.5 कि.ग्रा. हैक्टर पर 10 प्रतिशत) और मिथाइल -ओ-डेमेटन (0.025 प्रतिशत) का उपयोग कीट वेक्टर के खिलाफ संरक्षण फसल की वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण रणनीतियों में से एक है। टिकाऊ प्रतिरोधन क्षमता के साथ खेती का विकास फीलोडी सबसे अच्छा प्रबंधन स्रोत होगा, जो तिल प्रजनन का एक अभिन्न अंग होना चाहिए। इसमें तिल के जंगली रिश्तेदारों का प्रतिरोध जीन का उपायोग कर रोगरोधी प्रजातियों का विकास भविष्य में अच्छा विकल्प होगा, जि अच्छा विकल्प होगा, जिस पर शोध एवं अध्ययन जारी है। सुपारी-महत्वपूर्ण फसल सुपारी भारत की एक महत्वपूर्ण फसल है, जो दक्षिण एवं उत्तर-पूर्व भारत में बहुतायत से खेती के रूप में उगाई जाती है। यह किसानों के लिए आमदनी का एक अच्छा स्रोत है। सुपारी के वृक्षों में सुपारी का पीला पत्ती रोग एक फायटोप्लाज्मा जनित रोग है,जो कैन्डीडेटस फायटोप्लाज्मा ओराइजी द्वारा होता है। सबसे पहले वर्ष 1914 में इस रोग को केरल में रिपोर्ट किया, जो अब कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, असोम एवं त्रिपुरा प्रदेशों में बहुतायत से मिलता है और सुपारी के उत्पादन को अत्यधिक प्रभावित करता है। लक्षण इस रोग का मुख्य लक्षण पत्तियों का पीलापन है, जो बाद में सूखी पत्ती में बदल जाता है। सुपारी नट्स की संख्या एवं आकार में कमी, अनियन्त्रित पुष्पक्रम एवं उत्पादन काफी कम हो जाता है। रोग की अधिकता की अवस्था में रोगी पौधा सूख कर मर जाता है। सुपारी परिपक्व होने के पूर्व ही वृक्षों से गिरकर नष्ट हो जाती है। प्रसार सुपारी के पीला पत्ती रोग का प्राकृतिक प्रसार का स्रोत ज्ञात नहीं है। रोकथाम रोग की प्रांरभिक अवस्था में पहचान कर इस रोग को प्रसार होने से रोका जा सकता है। अभी तक सुपारी की कोई भी प्रजाति इस रोग के प्रति रोधी नहीं पाई गई है। भविष्य में रोगरोधी प्रजातियों का विकास इस रोग के नियंत्रण प्रबंधन में आवश्यक कदम होगा। इसके साथ ही रोग के प्राकृतिक स्रोत की पहचान कर इस रोग की रोकथाम सम्भव हो सकेगी, जिस पर अध्ययन जारी है। फसलों के रोगों में फायटोप्लाज्मा जनित रोग अध्ययन महत्वपूर्ण रोगों की श्रेणी में हो रहे हैं। पूरे विश्व में लगभग 800 पौधों में इस रोग की पहचान की गई है। फायटोप्लाज्मा जनित रोग मुख्यतः फल, फूल, दलहन, तिलहन, गेहूं धान, मक्का, गन्ना, सब्जियों, मसालों, पेड़ इत्यादि फसलों को प्रभावित कर अत्यधिक नुकसान पहुंचा रहे हैं। भारत में लगभग 150 पौधों में फायटोप्लाज्मा के दस विभिन्न समूहकी पहचान की गई है। फायटोप्लाजमा रोग का प्रभाव भारत में कृषकों के लिए यह रोग नया है। इस लेख में वर्णित जानकारी से हमारे कृषक बंधु बैंगन, चंदन, फूल, गन्ना, नारियल एवं सुपारी के फायटोप्लाज्मा रोगों की समय से पहचान कर उनकी रोकथाम के लिए उचित प्रबंधन की प्रक्रिया अपना सकते हैं। किसान अपनी फसलों को इस रोग से बचाकर अच्छी फसल का उत्पादन कर अच्छा लाभ कमा सकते हैं। मुझे पूरा विश्वास है, फायटोप्लाज्मा जनित रोगों की जानकारी कृषकों को अपनी आय दोगुनी करने में मददगार साबित होगी। स्त्राेत : गोविन्द प्रताप राव पादप रोगविज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान(खेती पत्रिका), नई दिल्ली-110012