<p style="text-align: justify;">नारियल के महत्वपूर्ण रोगों में रूट विल्ट एक प्रमुख रोग है। यह रोग फायटोप्लाज्मा जनित रोग है, जो कैंडीडेट्‌स फायटोप्लाज्मा ओराइजी नामक फायटोप्लाज्मा द्वारा होता है। इस रोग का सबसे शुरूआती लक्षण लीफलेट्‌स की असामान्य संरचना है। रोग बढ़ऩे पर नारियल की पैदावार में भारी कमी देखी गई है। यह रोग सभी आयु वर्ग के पौधों को प्रभावित करता है। वर्ष 1882 की भयानक बाढ़ के बाद केरल में नारियल जड़ (विल्ट) रोग पहली बार संज्ञान में आया। तब से यह तमिलनाडु, कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश और दक्षिण केरल प्रदेश में नारियल की फसल को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है। रोग के अंतिम चरण में नट्‌स में 20-80 प्रतिशत तक की कमी आ जाती है और नारियल बाजार लायक नहीं रह जाते। </p> <h3 style="text-align: justify;">लक्षण </h3> <p style="text-align: justify;">इस रोग के प्रमुख लक्षणों में विशेष रूप से पत्तियों के मध्य और बाहरी भंवरों का स्पष्ट रूप से झुकना, पत्तों का झड़ना तथा पत्तों का पीला होना और उनका परिगलन है। मादा फूलों के उत्पादन की क्षमता में कमी और विकृत जड़ प्रणाली इस रोग के महत्वपूर्ण लक्षण हैं। रोगग्रस्त पत्ती की स्पाइकलेट का पीलापन और परिगलन का सूखना इस रोग के लक्षण है। प्रतिवृक्ष नारियल की संख्या में भारी कमी एवं उनके आकार के कारण ये व्यापार लायक नहीं रह जाते हैं। नारियल के वृक्षों में फायटोप्लाज्मा जनित रोग के लक्षणों की प्रारंभिक अवस्था में पहचान करना एवं उनका नियंत्रण इस रोग के प्रंबधन में महत्वपूर्ण है। रोगरोधी प्रजातियों का विकास एवं फायटोप्लाज्मा रोग के अन्य प्राकृतिक स्रोत एवं रोग को फैलाने वाले कीटों की पहचान एवं उनका नियंत्रण भी इस रोग के प्रबंधन में अति महत्वपूर्ण हैं, जिन पर अध्ययन जारी है। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccPic.jpg" width="250" height="190" /></p> <h3 style="text-align: justify;">प्रसार </h3> <p style="text-align: justify;">मध्य और बाहरी भंवरों के पत्तों की परत एवं पत्ती के बाहरी भंवरों का पीलापन स्पष्ट लक्षण हैं। बाद में उत्पादित पत्तियों छोटी और पतली हो जाती हैं। जड़ों के पुनर्जनन में कमी रूट कॉर्टेक्स भूरे रंग का हो जाता है और जड़ें सूख जाती हैं। अनियंत्रित पुष्पक्रम में स्पाइकलेट्‌स के गोले और परिगलन का सूखना, पुष्पक्रम परिगलन, बहुत कम मात्रा में कोई मादा फूल, पराग के बांझपन और अपरिपक्व नट और बटन का उत्पादन नट के आकार और संख्या में कमी, खराब गुणवत्ता वाले अखरोट, खोपरा, पतली भूसी, कम फर्म खोल, कमजोर रेशे, कर्नेल की असमान मोटाई का उत्पादन एवं पतली कर्नेल कोपरा में कभी बहुत कम तेल की मात्रा आदि इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं। यह रोग विंग बग, स्टेफनीस टाइपिकस (डिस्टेंट) द्वारा फैलाया जाता है। सभी उम्र के वृक्ष इस रोग द्वारा प्रभावित होते हैं।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : गोविन्द प्रताप राव पादप रोगविज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान(खेती पत्रिका), नई दिल्ली-110012</p>