गाजर घास क्या है? गाजर घास का वैज्ञानिक नाम पारथेनियम हिस्टोफोरस है। गाजर घास को अन्य नामों जैसे- काग्रेस घास, सफ्रेद टोपी, छतक चांदनी, गधी बूटी आदि नामों से भी जाना जाता है। यह एस्टीरेसी (कम्पोजिटी) कुल का पौधा है। इसका मूल स्थान वेस्टइंडीज और मध्य व उत्तरी-अमेरिका माना जाता है। भारत में सर्वप्रथम यह गाजरघास पूना (महाराष्ट्र) में 1955 में दिखाई दी थी। ऐसा माना जाता है कि हमारे देश में इसका प्रवेश 1955 में अमेरिका अथवा कनाडा से आयात किये गये गेहूँ के साथ हुआ।परन्तु अल्पकाल में ही यह गाजरघास पूरे देश में एक भीषण प्रकोप की तरह लगभग 35 मिलियन हेक्टेयर भूमि पर फैल चुकी है। वैसे तो गाजरघास मुख्यत: शहरों में खुले स्थानों,औद्योगिक क्षेत्रों,सड़कों के किनारे,रेलवे लाइनों के किनारे तथा नालियों एवं पड़ती भूमि में मुख्यत: पाई जाती है पर अब यह खेत-खलिहानों में भी होने लगी है। गाजरघास का पौधा हर प्रकार के वातावरण में उगने की अभूतपूर्व क्षमता रखता है। इसके बीजों में सुषुप्तवस्था नहीं पायी जाती है। अत: यह नमी होने पर कभी भी अंकुरित हो जाता है। गाजरघास एक विनाशकारी खरपतवार क्यों ? गाजरघास फसलों में नुकसान पहुंचाने के अलावा मनुष्यों और उसके जानवरों के स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचाती है। इसकी उपस्थिति के कारण स्थानीय वनस्पतियां नहीं उग पाती जिससे स्थानीय जैवविविधता पर प्रभाव पड़ता है और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है। इस खरपतवार की उपस्थिति के कारण मनुष्यों में त्वचा रोग, बुखार और दमा हो जाता है। जैविक खरपतवार नियंत्रण क्या है? यह देखा गया है कि गाजरघास को काटने, उखाड़ने या रसायनिक खरपतवारनाशी द्वारा नियंत्रण करना काफी कठिन है। क्योंकि काटने, उखाड़ने या रसायन द्वारा नष्ट करने वाले तरीकों को बार-बार अपनाना पड़ता है और इन तरीकों में खर्च भी अधिक आता है। चूंकि गाजरघास मुख्यतः पड़ती भूमि, सड़क और खाली जगहों में पाये जाने वाला खरपतवार है अतः ऐसी जगहों से इसे नष्ट करने के लिये जनसमुदाय अपना समय और पैसा लगाना व्यर्थ समझते है। अतः ऐसे स्थानों के लिये गाजरघास का जैविक कीटों द्वारा नियंत्रण एक उत्तम विधि है। जैविक खरपतवार नियंत्रण का मतलब है ‘जीवों द्वारा हानिकारक खरपतवारों को नष्ट करना और जिस विधि में हम खरपतवारों को नष्ट करने के लिये कीट समुदाय का सहारा लेते है उसे कीटों द्वारा खरपतवार का जैविक नियंत्रण कहते है। इस विधि का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसे बार-बार अपनाना नहीं पड़ता और यह एक स्वचलित प्रक्रिया है। साथ ही इस विधि का कोई भी हानिकारक प्रभाव वातावरण, मानव एवं पशुओं पर नहीं पड़ता है। इस विधि के अंतर्गत ऐसे कीटों को खोजा जाता है जो खरपतवार को अच्छी तरह नष्ट करने में सक्षम होते है और उपयोगी वनस्पति पर कोई प्रभाव नहीं डालते है। गाजरघास का जाइगोग्रामा बाइक्लोराटा द्वारा नियंत्रण अध्ययन द्वारा यह पता चला कि मैक्सिको में जो गाजरघास का मूल उत्पत्ति स्थान है, अनेक कीट गाजरघास का भक्षण करते हैं। जैविकीय खरपतवार नियंत्रण विधि के अंतर्गत मुख्यतः ऐसी जगहों में पाये जाने वाले कीटों को ही आगे के अध्ययन के लिये दूसरे देशों में जहां इसी प्रकार के खरपतवार को नष्ट करना होता है आयात किया जाता है। सन् 1982 में भृग जाति के कीट जाइगोग्रामा बाइक्लोराटा को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् ने बैंगलोर में आयात किया और संगरोध प्रयोगशालाओं में सघन वर्णात्मक परीक्षणों के पश्चात् भारत सरकार ने इस कीट को गाजरघास को नष्ट करने के लिये वातावरण में छोड़ने की अनुमति दे दी। इस कीट ने बैंगलोर और आसपास के क्षेत्रों में गाजरघास के प्रकोप को कम करने में अपार सफलता और ख्याति प्राप्त की है। इसकी सफलता को देखते हुए भारत के कई प्रदेशों में छोड़ा गया और सफल पाया गया। एक अनुमान के अनुसार गाजरघास भारत में करीब 35 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई है और मैक्सिकन बीटल भी 1989 से अब तक करीब 7 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में फैल चुकी है।अतः भारत में बीटल द्वारा जैवकीय नियंत्रण की अभी भी अपार संभावनायें हैं।पहले शुरु-शुरु में जब मैक्सिकन बीटल को भारत में छोड़ा गया था तो यह सोचा गया था कि यह बीटल भारत के कम और बहुत अधिक तापमान वाले क्षेत्रों में अधिक सक्रिय नहीं हो पाएगी पर अब तक बीटल भारत के पंजाब, हरियाणा,उत्तरप्रदेश,उत्तरांचल,मध्यप्रदेश,महाराष्ट्र,उड़ीसा,हिमाचल प्रदेश,तमिलनाडू,कर्नाटक,आंध्रप्रदेश एवं जम्मू एंड कश्मीर के अनेक स्थानों पर अच्छी तरह से स्थापित हो चुकी है। जबलपुर में किये गये अध्ययनों में ज्ञात हुआ है कि मैक्सिकन बीटल छोड़ने के तीसरे साल से गाजरघास का नियंत्रण होना शुरु होगया जो पांचवें वर्ष तक करीब-करीब 4000 हेक्टेयर हो गया। इतने क्षेत्र में गाजरघास को मेट्रीब्यूजिन नामक शाकनाशी द्वारा नियंत्रण करने में करीब-करीब एक करोड़ रुपये लगते । यदि हम पर्यावरण की सुरक्षा की दृष्टि से बीटल द्वारा लाभ का आंकलन करें तो यह कई गुना अधिक होगा। भृंग (बीटल) का जीवन चक्र एक मादा अपने जीवनकाल में 1500 से 2000 तक अंडे दे सकती है। मादा अन्डों को कोमल पत्तियों की निचली सतह पर चिपका देती है। अंडे छोटे-छोटे और पीले रंग के होते हैं जिससे 4 से 6 दिन में बच्चे निकल आते हैं। जातक (ग्रब) पत्तियों को बुरी तरह से खाते हैं जिससे पौधा पूरी तरह पत्ती विहीन होकर मर जाता है। यदि पौधे पर फूल आ भी जाते है तो फूलों की संख्या बहुत कम रहती है। अधिक संख्या में होने पर तो इस भृग के लार्वा पौधों को बिल्कुल ढूंठ बना देते हैं। यदि गाजरघास पर इस भृग का आक्रमण इसके उगने या छोटी अवस्था में ही हो जाता है तो वयस्क भूग एवं इसके जातक गाजरघास को बड़ा होने से पहले ही चट् कर जाते हैं। यह कीट अपना जीवन चक्र करीब 25 से 30 दिन में पूराबीटल के अण्डे बीटल के जातक एवं प्रौढ़ बीटल द्वारा खाये गय गाजरघास के बड़े पौध कर लेता है। जून से अक्टूबर के प्रथम पखवाड़े तक यह बीटल अधिक सक्रिय रहती है। सर्दी बढ़ने पर इसके वयस्क मिट्टी के अंदर घुसकर करीब 6 से 8 महीने वहां सुषुप्तावस्था में पड़े रहते है। वातावरण अनुकूल होने पर सुषुप्तावस्था से निकलकर फिर अपना शेष जीवन पूरा करते है। यह भी देखा गया है कि अनुकूल परिस्थितियां होने पर यह कीट मई महीने जैसे गर्म दिनों में अपना जीवनचक्र पूरा करते हुए गाजरघास को नष्ट कर सकता है। बीटल कब छोड़े ? प्रयोगों द्वारा यह पाया गया है कि एक वयस्क बीटल एक गाजरघास के पूर्ण पौधे को 6 से 8 सप्ताह में चट कर जाता है। यदि इस दृष्टि से गणना करें तो करीब एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिये 7 से 11 लाख कीटों की आवश्यकता होगी । इतने अधिक कीटों को छोड़ना एक समस्या हो जायेगी। पर चूंकि जाइगोग्रामा वाइक्लोराटा में प्रजनन की अद्भुत क्षमता होती है अतः एक स्थान पर जहां गाजरघास अच्छी मात्रा में हो, कम से कम 500 से 1000 तक वयस्क बीटल छोड़ने चाहियें। एक स्थान की गाजरघास खत्म हो जाने पर बीटल पास वाले क्षेत्रों की गाजरघास पर आकर्षित होकर स्वतः ही चले जायेगें। अतः एक बड़े क्षेत्र में कई जगह निर्धारित कर अलग-अलग बीटल छोड़गें तो उनका प्रसार तेजी से होगा और गाजरघास अधिक तेजी से नष्ट होगी। निदेशालय के जैवकीय नियंत्रण के लिये प्रयास विगत कई वर्षों से खरपतवार विज्ञान अनुसंधान निदेशालय गाजरघास को पर्यावरण मित्र जैवकीय विधि द्वारा नियंत्रण के लिये प्रयासरत है। इस कार्य को करने के लिये निदेशालय द्वारा प्रतिवर्ष वर्षा ऋतु में हजारों कीटों को विशेष प्रकार के डिब्बों में बंद कर पोस्ट द्वारा देश के कोने-कोने में खरपतवार नियंत्रण अनुसंधान परियोजना के केन्द्रों में वहां मोचन (छोड़ने) हेतु भेजा जाता है। इसके अलावा इन कीटों को थोड़ी मात्रा में किसानों और जागरूक नागरिकों को मुफ्त में भी दिये जाते हैं ताकि वो अपने-अपने क्षेत्रों में इन कीटों को छोडकर गाजरघास का नियंत्रण कर सके। आम जनों में जैवकीय नियंत्रण के प्रति जागरूकता लाने के लिये इन कीटों को विभिन्न प्रकार के आयोजन कर समाज के प्रतिष्ठ लोगों द्वारा भी छुड़वाया जाता है। विगत 10 वर्षों में यह निदेशालय लगभग 75 लाख बीटलों को देश के लगभग सभी मुख्य स्थानों में विभिन्न संस्थानों के सहयोग से छुड़वा चुका है। खरपतवार निदेशालय गाजरघास के जैवकीय नियंत्रण के लिये सरकारी या गैरसरकारी संस्थानों को परामर्श (कसलटेंशी) भी देता है। इस दिशा में निदेशालय ने महाराष्ट्र कृषि विभाग, नागपुर को कसलटेंशी प्रदान कर वहां लगभग 60 लाख कीटों को छोड़ा है। बीटल को नई जगहों पर छोड़ने के लिये कैसे पकड़े औट कैसे छोड़ें ? नई जगहों पर छोड़ने के लिये बीटल को जुलाई से सितम्बर माह के दौरान संक्रमित स्थानों से पकडा जा सकता है या इस दौरान प्रयोगशाला में इसे आसानी से पालकर इसकी संख्या बढ़ाई जा सकती है। यह बीटल इतनी अधिक प्रतिरोधी होती है कि इनको पकड़ने और रखने के लिये कुछ भी चीज उपयोग में लायी जा सकती है। घरों में पाई जाने वाली प्लास्टिक की पन्नियों में सुई द्वारा छेदकर बीटल को इसमें संग्रहित किया जा सकता है। इन थैलियों में गाजरघास की छोटी-छोटी पत्ती विहीन टहनी डाल देनी चाहिये ताकि बीटल इन टहनियों को पकड़ सके और पन्नी संकुचित न हो पाये। यदि बीटलों को कहीं दूर ले जाने के लिये पकड़ना है और ऐसी संभावना हो कि तीन से चार दिन यात्रा में लग सकते हैं तो पत्ति विहीन गाजरघास की ताजी टहनियां छेद की हुई पन्नियों, गत्तों के डिब्बों या प्लास्टिक के डिब्बों में रखकर बीटल को इनमें छोड़ देना चाहिये। पत्तियों की वजह से बंद थैलियों या डिब्बों में अधिक नमी होने से बीटल पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। यदि पांच सात दिन भूगों को भोजन न भी मिले तो इनका कुछ भी नहीं बिगड़ता। बीटल को कहाँ छोड़े ? चूंकि इस कीट का जीवन चक्र मिट्टी में पूरा होता है। अतः इसे शुरू-शुरू में ऐसे स्थानों पर छोड़ना चाहिये, जहाँ मनुष्यों द्वारा कम व्यवधान होता है और जमीन में उथल-पुथल कम हो ताकि अधिक से अधिक बीटल अपना जीवन चक्र पूर्ण कर अपनी संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि कर सकें। हमेशा पानी में भरे रहने वाले क्षेत्रों में भी इसे नहीं छोड़ना चाहिये। क्या यह बीटल दूसरी फसलों को नुकसान पहुंचा सकता है ? नहीं, बीटल सिर्फ गाजरघास को खाकर ही अपना पेट भरता है। बैंगलोर और उसके आसपास के क्षेत्रों में इसे छोड़ने के लगभग 78 वर्ष बाद, कुछ लोगो ने यह देखा कि यह कीट की पत्तियों को खा रहा है। इस बात को लेकर विवाद की स्थिति पैदा हो गई कि कहीं यह कीट भविष्य मेंसूरजमुखी को भक्षण करने वाल मुख्य कीट न बन जाये ? यथार्थ को जानने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् ने एक “सत्य खोजी समिति” का गठन किया। सघन अनुसंधान के पश्चात यह पाया गया कि इस कीट में यह क्षमता नहीं है कि यह सूरजमुखी का मुख्य कीट बन सके। क्या यह बीटल मनुष्य को श्री काट कट जुकक्षाज पहुँचा सकता है ? नहीं, यह बीटल मनुष्य को नहीं काटता। और न ही किसी प्रकार के रोग फैलाने का कारण बनता है। बीटल को कैसे पालकर संख्या बढ़ायें ? चूंकि इस भूग में प्रजनन की अच्छी क्षमता होती है, इसलिये इसे प्रयोगशाला या अपने घरों के किसी रिक्त स्थान में आसानी से पालकर संख्या बढ़ाई जा सकती है। पालने के लिये हम घरों में बेकार पड़े टीन या प्लास्टिक के डिब्बों का प्रयोग भी कर सकते है। छोटे आकार के डिब्बों में अण्डे और छोटे जातक रख सकते है। छोटे डिब्बों में अण्डे देने के लिये एक जोड़ी नर और मादा ही काफी होगी। यदि डिब्बे बड़े है तो दो-तीन जोड़ी भी रख सकते है। गाजरघास की ताजी पत्तियां टहनी समेत तोड़कर इस टहनी को पानी से भीगी हुई रूई में लपेटकर इन डिब्बों में रख सकते है। इस प्रकार रखने में पत्तियां कई दिन तक अच्छी रहती है या पत्तों से लगी टहनी को एक छोटी-सी शीशी में जो कि पानी से भरी हो भी रख सकते है। अगले दिन इन पत्तियों की निचली सतह पर पीले रंग के अण्डे समूह में या अलग-अलग चिपके मिलेगें। इन पत्तियों को तोड़कर अलग डिब्बों में रख देना चाहिये, तीन-चार दिन बाद इन अण्डों से बच्चे निकल आते है जो पत्तियों को खाना शुरू कर देते है। आवश्यकतानुसार समय-समय पर पुरानी खाई हुई पत्तियों को निकालकर ताजी गाजरघास की पत्तियां डाल देनी चाहिये। शनः-शनः बच्चे बड़े होने लगते हैं। बड़े ग्रब को बड़े डिब्बों में स्थांनांरित करते रहना चाहिये। इस भृग की चौथी अवस्था के ग्रब को ऐसे बड़े डिब्बों में रखना चाहिये जिसकी सतह पर दो-तीन इंच मोटी परत मिट्टी की हो। ये बड़े लार्वा मिट्टी में कायान्तरण के लिये घुस जाते हैं। छ:-आठ दिन बाद लार्वा से बीटल बन जाते है जो मिट्टी से बाहर आ जाते हैं। इन ताजा निकले वयस्को को फिर से अलग डिब्बों में पत्तियों के ऊपर छोड़ देना चाहिये। तीन-चार दिन बाद ये वयस्क बीटल फिर से जोड़ी बनाकर प्रजनन शुरू कर देगें। अधिक संख्या में बीटल तैयार करने के लिये गाजरघास को उखाडकर चित्रों में दिखाये गये पिंजडों में रोप देना चाहिये। इन पिंजड़ों में पालने का लाभ यह है कि पत्तियों को बार-बार बदलना नहीं पड़ेगा। बीच-बीच में गाजरघास के बीटल द्वारा खा जाने पर फिर नये गाजरघास के पौधे रोप देना चाहिये। दूसरा एक आसान तरीका यह भी है कि घर के आंगन, किचिन गार्डन आदि जगहों पर आवश्यकता और अनुसार चाहिये। क्यारी के कोनों में डंडे आदि लगाकर क्यारी को नाईलोन या कपड़े की जाली से चित्र के अनुसार ढंक देना चाहिये। इन क्यारियों में जगह अनुसार पांच से दस जोड़ी बीटल छोड़ दें। वयस्क यहां आसानी से स्वतः ही अण्डे देकर अपनी संख्या बढ़ा लेगें। क्यारियों में आवश्यकतानुसार गाजरघास के नये पौधे रोप देने चाहिये और पुराने खाये हुये पौधों को निकाल देना चाहिये। गाजरघास का चकोड़ा द्वारा नियंत्रण अनुसंधान में पाया गया है कि कुछ वनस्पतिया जैसे चकोड़ा, जंगली चौलाई, हिपटिस आदि गाजरघास से प्रतिस्पर्धा कर कम से कम इसे वर्षा ऋतु में विस्थापित कर सकती है, ये सभी प्रयोगों में चकोड़ा से गाजरघास को नियंत्रण करने में अच्छी सफलता मिली है। चकोडा के बीजों को अक्टूबर-नवम्बर माह में इकट्ठा कर अपैल-मई में उन स्थानों पर छिड़क देना चाहिए जहा गाजरघास का नियंत्रण करना है। मानसून आने पर चकोड़ा का गाजरघास की अपेक्षा तेजी से अकुंरण होता है और चकोड़ा गाजरघास को विस्थापित कर देता है। ताजटघाझ कालेोंदा द्वाटा जियंत्रण संरक्षित जगह जहां पशु प्रवेश न कर पायें जैसे कि औद्योगिक संस्थान कार्यालय, फार्म हाउस आदि में, सड़कों के किनारे या खेतों की मेड़ों पर गेंदों के पौधों को रोप दें या इनके बीजों को वहां छिड़क दें। गेंदा गाजरघास को उगने से रोकता है। गाजरघास का गेंदा द्वारा नियंत्रण संरक्षित जगह जहां पशु प्रवेश न कर पायें जैसे कि औद्योगिक संस्थान कार्यालय, फार्म हाउस आदि में, सड़कों के किनारे या खेतों की मेड़ों पर गेंदों के पौधों को रोप दें या इनके बीजों को वहां छिड़क दें। गेंदा गाजरघास को उगने से रोकता है। इस संबंध में और अधिक जानकारी के लिये सम्पर्क करें: डॉ. ए.आर. शर्मानिदेशक, खरपतवार विज्ञान अनुसंधान निदेशालय,महाराजपुर, जबलपुर - 482004 (म.प्र.)फोन : 91-761-2353101, फक्रा : +91-761-2353129लेखक : डॉ. सुशील कुमार, प्रधान वैज्ञानिक मदण-2012